श्री चतुर्विंशति तीर्थंकर स्तुति (कवि राजमल पवैया) | Shri Chaturvinshati Tirthankar Stuti (Rajmal Pavaiya)

श्री चतुर्विंशति तीर्थंकर स्तुति

जय ऋषभदेव जिनेन्द्र जय, जय अजित प्रभु अभयंकरम् ।
जय नाथ सम्भव भव विनाशक, जयतु अभिनन्दन परम् ।।१।।

देह तो अपनी नहीं है देह से फिर मोह कैसा ।
जड अचेतन रूप पुदगल द्रव्य से व्यामोह कैसा । ।
जय सुमतिनाथ सुमति प्रदायक, पदम प्रभु प्रणतेश्वरम् ।
जय जय सुपार्श्वस्वपर प्रकाशक, चन्द्रप्रभु चन्द्रेश्वरम् ।।२।।

जय पुष्पदन्त पवित्र पावन जयति शीतल शीतलम् ।
जयश्रेष्ठ श्री श्रेयांस प्रभुवर, वासुपूज्य सु निर्मलम् ।।३।।

जय अमल अविकल विमल प्रभु, जयजय अनन्त आनंदकम् ।
जय धर्मनाथ स्वधर्मरवि, जय शान्ति जग कल्याणकम् ।।४।।

जय कुन्थुनाथ अनाथ रक्षक, अरहनाथ अरिंजयम् ।
जय मल्लि प्रभु हत दुर्नयम् जय मुनिसुव्रत मृत्युंजयम् ।।५।।

जय मुक्तिदाता नमि जिनोत्तम्, नेमि प्रभु लोकेश्वरम् ।
जय पार्श्व विध्नविनाशनम्, जय महावीर महेश्वरम् ।।६।।

जय पाप पुण्य निरोधकम, ज्ञानेश्वरम् क्षेमकरम् ।
जय महामंगल मूर्ति जय, चौबीस जिन तीर्थंकरम् ।।७।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १६१ से १६२