वासुपूज्य तीर्थंकर की निर्वाण भूमि चम्पापुर धाम ।
शुद्ध हृदय से बदन कर प्रभु चरणाम्बुज में करूँ प्रणाम ।।
जय थल नभ में वासुपूज्य प्रभु का ही गूँज रहा जयगान ।
जल फलादि वसु द्रव्य सजाकर पूजन करता हूँ भगवान ।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्र अत्र अवतर-अवतर संवौषट् तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ , अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
पावन समता रस नीर चरणों में लाया ।
मिथ्यात्त्व पाप का नाश करने मैं आया । ।
चंपापुर क्षेत्र महान दर्शन सुखकारी ।
जय वासुपूज्य भगवान प्रभु मंगलकारी ।।१।।
द्रव्य अनदि अनंत एक परिपूर्णा शुद्ध ज्ञायक गतिमान ।
स्वपर प्रकाशक ज्ञान स्वरुपी है सर्वांश अमित छविमान । ।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि ।
समता रस चंदनसार अति शीतल लाया ।
क्रोधादि कषाऐं नाश करने मैं आया । ।चंपापुर ।।२।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो संसारताप विनाशनाय चन्दन नि ।
त्रैकालिक ज्ञायक भाव निज अक्षत लाया ।
अक्षय निधि पाने नाथ चरणों में आया । ।चंपापुर ।।३।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षत नि ।
निज अंतररुप मनोज्ञ शील सुमन लाया ।
प्रभु विषय वासना नाश करने मैं आम्रा ।।चंपापुर।।४ ।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो कामवाण विध्वंशनाय पुष्प नि ।
धुन जागीनिज ध्रुवधाम की तो चरु लाया ।
अष्टादश दोष विनाश करने मैं आया । ।चंपापुर ।।५।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्य नि ।
निज आत्मज्ञान का दीप ज्योतिर्मय लाया ।
अज्ञान अँधेरा नष्ट करने मैं आया । । चंपापुर ।।६।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोहान्धकारविनाशनाय दीप नि ।
निज आत्म स्वरुप अनुप सुधूप अति शुचिमय लाया ।
वसु कर्मों को विध्वंस करने मैं आया । ।चंपापुर ।।७।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो अष्ट कर्म दहनाय धूप नि ।
शिवमय अनुभव रस पूर्ण उत्तम फल लाया ।
निज शुद्ध त्रिकाली सिद्ध पद पाने आया । ।चंपापुर ।।८।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोक्ष फल प्राप्तये फल नि ।
परिणाम शुद्ध का अर्घ्य चरणों में लाया ।
अष्टम वसुधा का राज्य पाने को आया । ।चंपापुर ।।९।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ्य नि ।
संतों की भाषा संतों का संबोधन कल्याण स्वरुप ।
सर्वाकुलता क्षय करने का साधन अद्भुत शान्त अनूप ।।
जयमाला
सिद्ध क्षेत्र चंपापुरी भरत क्षेत्र विख्यात ।
वासुपूज्य जिनराज ने किए कर्म वसु घात ।।१।।
और अनेकों मुनि हुए इसी क्षेत्र से सिद्ध ।
विनय सहित वन्दनकरूँ चरणाम्बुज सुप्रसिद्ध ।।२।।
जय जय वासुपूज्य तीर्थंकर जय चंपापुर तीर्थ महान ।
गर्भ जन्म तप ज्ञान भूमि निर्वाण क्षेत्र अतिश्रेष्ठ प्रधान ।।३।।
नृप वसुपूज्य सुमाता विजया के नंदन संसार प्रसिद्ध ।
वासुपूज्य अभयकर नामी बाल ब्रम्हचारी सुप्रसिद्ध ।।४।।
स्वर्ग त्याग माता उर आए हुई रत्न वर्षा पावन ।
जन्म समय सुरपति से नव्हनकिया सुमेरु पर मन भावन ।।५।।
यह संसार असार जानकर लघुवय में दीक्षाधारी ।
लौकांतिक ब्रम्हर्षिसुरों ने धन्य ध्वनि उच्चारी ।।६।।
सोलह वर्ष रहे छद्मस्थ किया चंपापुर वन में ध्यान ।
निज स्वभाव से घातिकर्म विनशाये हुआ ज्ञान कल्याण ।।७।।
केवलज्ञान प्राप्त कर स्वामी वीतराग सर्वज्ञ हुए ।
दे उपदेश भव्य जीवों को पूर्ण देव विश्वज्ञ हुए ।।८।।
समवशरण रचकर देवों ने प्रभु का जय जयकार किया ।
मुख्य सुगणधर मंदर ऋषि ने द्वदशांग उद्धार किया ।।९।।
चंपापुर के महोद्यान में अंतिम शुक्ल ध्यान ध्याया ।
चउ अघातिया भी विनाश से परम मोक्ष पद प्रगटाया ।।१०।।
जिन जिनपति जिन देव जगेष्ट परम पूज्य त्रिभुवननामी ।
मैं अनादि से भव समुद्र में डूबा पार करो स्वामी ।।११।।
चंपापुर में हुए आप के पाँचों कल्याणक सुखकार ।
चरण कमल वंदन करता हूँ जागा उन में हर्ष अपार ।।१२।।
ज्ञानमयी वैराग्य भाव उपयुक्त हो गया उसी समय ।
द्रव्य दृष्टि से सदा शुद्ध निज भाव हो गया उसी समय ।।
यहाँ अनेकों भव्य जिनालय प्रभु की महिमा गाते हैं ।
जो प्रभु का दर्शन करते उनके संकट टल जाते हैं ।।१३।।
चंपापुर के तीर्थ क्षेत्र को बार बार मेरा वंदन ।
सम्यक् दर्शन पाऊँगा मैं नाश करूँगा भव बंधन ।।१४।।
ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थक्षेत्रेभ्यो पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।
चंपापुर के तीर्थ की महिमा अपरम्पार ।
निज स्वभाव जो साधते हो जाते भवपार ।।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्री चंपापुर तीर्थ क्षेत्रेभ्यो नम ।
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २९१ से २९४