श्री चन्द्रप्रभ पूजन (कविवर वृन्दावन) | Shri Chandraprabh Pujan (Vrindavan)

श्री चन्द्रप्रभ पूजन

(छप्पय)
चारुचरन आचरन, चरन चित-हरन-चिह्न चर,
चन्दचन्दतनचरित, चंदथल चहत चतुर नर ।
चतुक चंडचक चूरि, चारि चिद्चक्र गुनाकर,
चंचल चलित-सुरेश, चूलनुत चक्र धनुरहर ।।
चर-अचर-हितु तारनतरन, सुनत चहकि चिरनंद शुचि ।
जिन-चंद-चरन चरच्यो चहत, चितचकोर नचि रचि रुचि ।।

(दोहा)
धनुष डेढ़ सौ तुंग तन, महासेन नृप-नन्द ।
मातु लछमना उर जये, थापों चन्द-जिनन्द ।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

गंगा-ह्रद निरमल नीर, हाटक भृंग-भरा,
तुम चरन जजों वर वीर, मेटो जनमजरा ।
श्री चन्दनाथ दुति चन्द, चरनन चंद लगे,
मनवचतन जजत अमंद, आतमजोति जगे ।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री खण्ड कपूर सुचंग, केशर रंगभरी ।
घसि प्रासुक जल के संग, भव-आताप हरी ।।श्री.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

तन्दुल सित सोम समान, सम ले अनियारे ।
दिय पुंज मनोहर आन, तुम पदतर प्यारे ।।श्री.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

सुरद्रुम के सुमन सुरंग, गन्धित अलि आवै ।
तासों पद पूजत चंग, काम-बिथा जावै ।।श्री.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पंनिर्वपामीति स्वाहा ।

नेवज नाना परकार, इन्द्रिय बलकारी ।
सो लै पद पूजों सार, आकुलता-हारी ।।श्री.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

तम भंजन दीप संवार, तुम ढिंग धारतु हों ।
मम तिमिर-मोह निरवार, यह गुन धारतु हों ।।श्री.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

दशगंध हुतासन माहिं, हे प्रभु खेवतु हौं ।
ममकरम दुष्ट जरि जाहिं, यांतै सेवतु हौं ।।श्री.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

अति उत्तम फल सुमंगाय तुम गुन गावतु हौं ।
पूजों तनमन हरषाय, विघन नशावतु हौं ।।श्री.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

सजि आठों दरब पुनीत, आठों अंग नमों ।
पूजों अष्टम जिन मीत, अष्टम अवनि गमों ।।श्री.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

पंच कल्याणक

कलि पंचम चैत सुहात अली, गरभागम मंगल मोद भली ।
हरि हर्षित पूजत मातु पिता, हम ध्यावत पावत शर्मसिता ।।

ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णपंचम्यां गर्भमंगलप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

कलि पौष इकादशि जन्म लयो, तबलोकविषे सुख थोक भयो ।
सुर-ईश जजें गिर-शीश तबै, हम पूजत हैं नुतशीष अबैं ।।

ॐ ह्रीं पौषकृष्णैकादश्यां जन्ममंगलप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

तप दुद्धर श्रीधर आप धरा, कलि पौष इग्यारसी पर्व वरा ।
निज ध्यानविषैं लवलीन भये, धनि सो दिन पूजत विघ्न गये ।।

ॐ ह्रीं पौषकृष्णैकादश्यां तपकल्याणकप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

वर केवलभानु उद्योत कियो, तिहुँ लोक तणों भ्रम मेट दियो ।
कलि फाल्गुन सप्तमी इन्द्र जजे, हम पूजहिं सर्व कलंक भजे ।।

ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णसप्तम्यां केवलज्ञानप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

सित फाल्गुण सप्तमि मुक्त गये, गुणवन्त अनन्त अबाध भये ।
हरि आय जजें तित मोद धरे, हम पूजत ही सब पाप हरे ।।

ॐ ह्रीं फाल्गुनकृष्णसप्तम्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

(दोहा)
हे मृगांकअंकित चरण, तुम गुण अगम अपार ।
गणधरसे नहिं पार लहिं, तौ को वरनत सार ।।

पै तुम भगति हिये मम, प्रेरैं अति उमगाय ।
तातैं गाऊँ सुगुण तुम, तुम ही होउ सहाय ।।

(पद्धरि छंद)
जय चन्द्र जिनेन्द्र दया निधान, भव कानन हानन दव प्रमान ।
जय गरभ जनम मंगल दिनन्द, भवि जीव विकाशन शर्मकन्द ।।

दशलक्ष पूर्व की आयु पाय, मनवांछित सुख भोगे जिनाय ।
लखि कारण है जगतैं उदास, चिन्त्यो अनुप्रेक्षा सुखनिवास ।।
तित लौकांतिक बोध्यो नियोग, हरि शिविका सजि धरियो अभोग ।
तापै तुम चढि जिन चन्दराय, ता छिनकी शोभा को कहाय ।।

जिन अंग सेत सित चमर ढार, सित छत्र शीस गल-गुलकहार ।
सित रतन जड़ित भूषण विचित्र, सित चन्द्र-चरण चरचैं पवित्र ।।
सित तन द्युति नाकाधीश आप, सित शिविका कांधे धरि सुचाप ।
सित सुजस सुरेश नरेश सर्व, सित चित में चिन्तित जात पर्व ।।

सित चन्द नगर तें निकसि नाथ, सित वन में पहुँचे सकल साथ ।
सितशिला शिरोमणि स्वच्छ छांह, सित तप तित धार्यो तुम जिनांह ।।
सित पय को पारण परम-सार, सित चन्द्रदत्त दीनों उदार ।
सित कर में सो पयधार देत, मानो बाँधत भव सिंधु सेत ।।

मानो सुपुण्य-धारा प्रतच्छ, तित अचरज पनसुर किय ततच्छ ।
फिर जाय गहन सित तप करंत, सित केवलज्योति जग्यों अनंत ।।
लहि समवसरण रचना महान, जाके देखत सब पाप-हान ।
जहं तरु अशोक शौभे उत्तंग, सब शोक तनो चूरैं प्रसंग ।।

सुर सुमन वृष्टि नभतैं सुहात, मनु मन्मथ तज हथियार जात ।
बानी जिन मुखसौं खिरत सार, मनु तत्त्व प्रकाशन मुकुरधार ।।
जहँ चौसठ चमर अमर ढुरंत, मनु सुजसमेघ झरि लगिय तन्त ।
सिंहासन है जहँ कमलजुक्त, मनु शिवसरवर को कमलशुक्त ।।

दुंदुभि जित बाजत मधुर सार, मनु करमजीत को है नगार ।
सिर छत्र फिरै त्रय श्वेतवर्ण, मनु रतन तीन त्रयताप हर्ण ।।
तन प्रभातनों मण्डल सुहात, भवि देखत निज भव सात सात ।
मनु दर्पणद्युति यह जगमगाय, भविजन भव दुख देखत सुआय ।।

इत्यादि विभूति अनेक जान, बाहिज दीसत महिमा महान ।
ताको वरणत नहिं लहत पार, तौ अन्तरंग को कहै सार ।।
अनअन्त गुण-निजुत करि विहार, धरमोपदेश दे भव्य तार ।
फिर जोगनिरोधि अघाति हान, सम्मेदथकी लिय मुकति-थान ।।

‘वृन्दावन’ वन्दत शीश नाय, तुम जानत हो मम उर जु भाय ।
तातैं का कहौं सु बार-बार, मनवांछित कारज सार-सार ।।

(छन्द घत्तानन्द)
जय चन्द जिनंदा आनंद-कंदा, भव भय भंजन राजै हैं ।
रागादिक द्वन्दा हरि सब फन्दा, मुकतिमांहि थिति साजै हैं ।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय महाअर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

(छन्द चौबोला)
आठों दरव मिलाय गाय गुण, जो भविजन जिनचन्द जजैं ।
ताके भव भव के अघ भाजैं, मुक्ति सारसुख ताहि सजैं ।।
जमके त्रास मिटैं सब ताके, सकल अमंगल दूर भजैं ।
‘वृन्दावन’ ऐसो लखि पूजत, जातैं शिवपुर राज रजैं ।।

।।पुष्पांजलिं क्षिपेत्।।


Artist: कविवर वृन्दावन जी
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ १४५ से १४९