श्री चन्द्रप्रभ की स्तुति | Shri Chandraprabh ki Stuti

श्री चन्द्रप्रभ की स्तुति

हे चन्द्रप्रभो ! मैं आज आपकी, अद्भुत महिमा पहिचानी।
तुमही सच्चे देव अहो ! हे वीतराग केवलज्ञानी ॥

रागी-द्वेषी देवों को ही, मैंने अब तक पूजा है।
जब तुमको परखा तो जाना, आप समान न दूजा है ॥

रागी देव कुमार्ग बताकर, जगत-जाल में उलझाते।
अपनी सेवा को ही वे सब, सुख का साधन बतलाते ॥

वीतराग गुण देख आपमें, हे प्रभु! मैं आकृष्ट हुआ।
कल्याणी वाणी सुन तेरी, मेरा मन सन्तुष्ट हुआ ॥

मुझको विस्मय होता है, ये भक्त आपके कैसे हैं?
पुत्र, पौत्र, धन मांगे तुमसे, अतः भिखारी जैसे हैं॥

भोगों की आशा से ही ये, भक्ति आपकी करते हैं।
विषय-वासना की ज्वाला में, इनके हृदय सुलगते हैं ॥

महाभाग्य से जैनधर्म को, पाकर योंही खोते हैं।
अपने ही हाथों से मूरख, बीज दु:खों का बोते हैं ॥

वीतराग हो या रागी हो, कोई कुछ भी नहिं देता।
व्यर्थ कल्पना करके मूरख, घड़ा पाप का भर लेता ॥

मुझको तो बस मात्र आपकी, वीतरागता भाई है।
इसीलिये मेरे उर में प्रभु! भक्ति आपकी आई है ॥

वैभवशाली समोशरण है, इस कारण मैं भक्त नहीं।
परमौदारिक दिव्य देह है, इससे मैं आसक्त नहीं ॥

सुरपति तुमको पूजें इसकी, मुझको नहिं आती महिमा।
गणधर भी नत मस्तक होते, इससे क्या बढ़ती गरिमा ॥

गर्भ, जन्म पर आ देवों ने, रत्नों की बहु बरसा की।
स्वर्ग समान सुसज्जित करके, चन्द्रपुरी की शोभा की ॥

फिर सुमेरु पर जा सुरपति ने, कलशों से अभिषेक किया।
चौंसठ चंवर ढुरे सिर ऊपर, देवों ने जयकार किया ॥

ये सब पुण्य उदय के फल थे, इन सबसे तुम पूज्य नहीं।
ये अतिशय होने से प्रभुवर ! तुम मेरे आराध्य नहीं‌ ॥

वीतरागता पर ही केवल, मेरा हृदय लुभाया है।
अंतर्मुखी मगनता लखकर, रोम रोम हर्षाया है ॥

नहीं चाहता जड़वैभव मैं बस निज में ही मगन रहूँ।
वीतराग नहिं होता तबतक, मात्र आपकी शरण गहूँ ॥

बारबार प्रभु! विनय यही है, स्वाभाविक सुख प्रगटाउँ।
अपने में परिपूर्ण लीन हो, तुम जैसा ही बनजाउँ ॥