श्री चन्द्रप्रभ जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Chandraprabh Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री चन्द्रप्रभ जिन पूजन

महासेन नृपनंद चंद्रप्रभ चंद्रनाथ जिनवर स्वामी ।
मात लक्ष्मणा के प्रियनन्दन जगउद्धारक प्रभु नामी ।।
निज आत्मानुभूति से पाई मोक्ष लक्ष्मी सुखधामी ।
वीतराग सर्वज्ञ हितैषी करुणामय शिव पुरगामी ।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्र ! अत्र मम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

तन की प्यास बुझाने वाला यह निर्मल जल लाया हूँ ।
आत्मज्ञान की प्यास बुझाने प्रभु चरणों में आया हूँ ।।
चंद्र जिनेश्वर चंद्र नाथ चंद्रेश्वर चन्दा प्रभु स्वामी ।
राग द्वेष परिणति के नाशक मंगलमय अन्तर्यामी ।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।

तन का ताप मिटाने वाला शीतल चंदन लाया हूँ ।
राग आग की दाह मिटाने प्रभु चरणों में आया हूँ ।।चन्द्र.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।

परम शुद्ध अक्षय पद पाने उज्ज्वल अक्षत लाया हूँ ।
भव समुद्र से पार उतरने प्रभु चरणों में आया हूँ ।।चन्द्र.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।

कामबाण से घायल होकर पुष्प मनोहर लाया हूँ ।
महाशील शीलेश्वर बनने प्रभु चरणों में आया हूँ ।।चन्द्र.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।

पर द्रव्यों से भूख न मिट पाई तो प्रभु चरु लाया हूँ ।
आत्म तत्त्व की भूख मिटाने प्रभु चरणों में आया हूँ ।।चन्द्र.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

अन्धकार तप हरने वाला दीप प्रभामय लाया हूँ ।
आत्मदीप की ज्योति जलाने प्रभु चरणों में आया हूँ ।।चन्द्र.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।

पर परिणति का धुआं उड़ाने धूप सुगन्धित लाया हूँ ।
अष्टकर्म अरि पर जय पाने प्रभु चरणों में आया हूँ ।।चन्द्र.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।

पर विभाव फल से पीड़ित होकर नूतन फल लाया हूँ ।
अपना सिद्ध स्वपद पाने को प्रभु चरणों में आया हूँ ।।चन्द्र.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय महामोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।

अष्ट द्रव्य का अर्घ मनोरम हर्षित होकर लाया हूँ ।
चिदानन्द चिन्मय पद पाने प्रभु चरणों में आया हूँ ।।चन्द्र.।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

श्री पंच कल्याणक

चैत्र कृष्ण पंचमी मात उर वैजयंत तज कर आए ।
सोलह स्वप्न हुए माता को रत्न सुरों ने बरसाये ।।
मात लक्ष्मणा स्वप्न फलों को जान हृदय में हर्षाये ।
हुआ गर्भ कल्याण महोत्सव घर घर में आनन्द छाये ।।

ॐ ह्रीं श्री चैत्रकृष्णपंचम्यां गर्भमंगल प्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

पौष कृष्ण एकादशम् को चन्द्रनाथ का जन्म हुआ ।
मेरु सुदर्शन पर मंगल उत्सव कर सुरपति धन्य हुआ ।।
चन्द्रपुरी में बजी बधाई तीन लोक में सुख छाया ।
महासेन राजा के गृह में देवों ने मंगल गाया ।।

ॐ ह्रीं श्री पौषकृष्णएकादश्यां जन्ममंगल प्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

पौष कृष्ण एकादशी को राज्य आदि सब छोड़ दिया ।
यह संसार असार जानकर तप से नाता जोड़ दिया ।।
पंच महाव्रत धारण करके वस्त्राभूषण त्याग दिये ।
तप कल्याण मनाया देवों ने जिनवर अनुराग लिए ।।

ॐ ह्रीं श्री पौषकृष्णएकादश्यां तप कल्याणप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

तीन मास छद्मस्थ रहे प्रभु उग्र तपस्या में हो लीन ।
प्रतिमा योग धार चन्दा प्रभु शुक्ल ध्यान में हुए स्वलीन ।।
ध्यान अग्नि से त्रेसठ कर्म प्रकृतियों का बल नाश किया ।
फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन केवलज्ञान प्रकाश लिया ।।

ॐ ह्रीं श्री पौषकृष्णसप्तम्यां केवलज्ञान प्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

शेष प्रकृति पिच्यासी का भी अन्त समय अवसान किया ।
फाल्गुन शुक्ल सप्तमी के दिन प्रभु ने पद निर्वाण लिया ।।
ललितकूट सम्मेदशिखर से चन्दा प्रभु जिनमुक्त हुए ।
ऊर्ध्वगमन कर सिद्ध लोक में मुक्ति रमा से युक्त हुए ।।

ॐ ह्रीं श्री फाल्गुनशुक्लसप्तम्यां मोक्षमंगलप्राप्ताय श्रीचन्द्रप्रभजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला

चन्द्र चिह्न चित्रित चरण चन्द्रनाथ चित धार ।
चिन्तामणि श्री चन्द्रप्रभ चन्द्रामृत दातार ।।
चन्द्रपुरी के न्यायवान श्री महासेन राजा बलवान ।
देवी लक्ष्मणा रानी उर से जन्में चन्द्रनाथ भगवान् ।।

इन्द्र शची सुर किन्नर यक्ष सभी ने गाये मंगल गान ।
तीर्थंकर का जन्म जानकर धरती में भी आए प्राण ।।
बड़े हुए प्रभु राज काज में न्याय पूर्वक लीन हुए ।
जग के भौतिक भोग भोगते सिंहासन आसीन हुए ।।

इक दिन नभ में बिजली चमकी, नष्ट हुई तो किया विचार ।
नाशवान पर्याय जान छाया, तत्क्षण वैराग्य अपार ।।
वन सर्वार्थ नागतरु नीचे परिजन परिकर धन सब त्याग ।
पंच मुष्टि से केश लोंचकर किया महाव्रत से अनुराग ।।

हुए तपस्या लीन आत्मा का ही प्रतिपल करते ध्यान ।
शाश्वत् निजस्वरूप आश्रय ले पाया तुमने केवलज्ञान ।।
थे तिरानवै गणधर जिनमें प्रमुख दत्त स्वामी ऋषिवर ।
मुख्य आर्यिका वरुणा, श्रोता दानवीर्य आदिक सुरनर ।।

समवसरण में तुमने प्रभुवर वस्तु तत्त्व उपदेश दिया ।
उपादेय है एक आत्मा यह अनुपम सन्देश दिया ।।
ज्ञाता दृष्टा बने जीव तो राग-द्वेष मिट जाता है ।
जो निजात्मा में रहता है वही परम पद पाता है ।।

हो अयोग केवली आपने हे स्वामी पाया निर्वाण ।
अर्द्ध चन्द्र सम सिद्ध शिला पर पहुँचे चन्दा प्रभु भगवान् ।।
अर्ध चन्द्र शोभित चरणों में अष्टम तीर्थंकर स्वामी ।
जन्म मरण का चक्र मिटाने आया हूँ अन्तर्यामी ।।

ॐ ह्रीं श्री चन्द्रप्रभजिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।

चन्दा प्रभु के पद कमल भाव सहित उर धार ।
मन वच तन जो पूजते वे होते भव पार ।।
।।इत्याशीर्वाद।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ १५० से १५३