श्री चांदखेड़ी क्षेत्र पूजन | Shri Chandkhedi Kshetra Pujan

श्री चांदखेड़ी क्षेत्र पूजन

(वीर)
प्रथम तीर्थंकर आदि जिनेश्वर, ऋषभनाथ वंदन कर लूँ।
धर्मतीर्थ के आद्य प्रवर्तक, शत-शत अभिनंदन कर लूँ ।।
चाँदखेड़ी में सर्व विराजित, जिन भगवंत नमूँ हर्षाय ।
धर्म श्रेणी में चढूँ निरन्तर, शुद्धातम ध्याऊँ सुखदाय ।।
हृदय-कमल में आओ विराजो, भक्ति-भाव से करूँ प्रणाम ।
हे चैतन्य चमत्कारी प्रभु, पाऊँ तुम पद शिव अभिराम ।।
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी अतिशय क्षेत्र स्थित श्री आदिनाथ जिनेन्द्रादिः समस्त जिनबिम्ब
समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम सन्निहितो
भव भव वषट् । पुष्पांजलिं क्षिपेत् ।
(सरसी)
महापुण्य की बेला आई, दर्शन आज मिला ।
कली - कली खिल गयी हृदय की, पूरव पुण्य फला ॥
देख आपकी शांत सौम्य छवि, अंतर्मुख प्यारी ।
चाँदखेड़ी आदीश्वर वन्दूँ, अरचूँ जल थारी ।।
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय
जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रमुदित मन मेंढक जब आया, प्रभुवर पूजन को ।
मिली संपदा स्वर्गादिक की, क्षणभर में उसको ॥
जिन पूजन भावों से ही प्रभु, स्वर्ग सहज पाया ।
भक्ति भाव का चंदन लेकर शरण तेरी आया ।।
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो भवाताप विनाशनाय चंदन
निर्वपामीति स्वाहा ।
सब प्रश्नों के उत्तर मिलते, प्रभु के दर्शन से ।
जन्म-जन्म के बंधन खुलते, प्रभु के वंदन से ।।
अक्षय पदवी देख आपकी, मन ललचाया है ।
अक्षत पद पाने अक्षत ले, मन हुलसाया है ।।
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।

प्रभुवर तुझमें शक्ति अनंतों, एक शक्ति देना ।
काम-बाण की मिटे वासना वह युक्ति देना ॥
हो निष्काम वंदना मेरी, मन हर्षाया है ।
चाँदखेड़ी आदीश्वर वन्दूँ, पुष्प चढ़ाया है ।।
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो काम-बाण-विध्वंसनाय
पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
क्षुधा-वेदनी सदा सताती, तृप्ति नहीं मिलती ।
खाद्य-अखाद्य विचार नहीं कुछ, नागिन-सी डसती ॥
जहाँ देह निजमय नहिं भासे, क्षुधा रहे कैसे ?
भेद ज्ञान की कला सीखने, आया प्रभु तुमसे ॥
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो क्षुधा रोग विनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
भेदज्ञान की ज्योति जलाऊँ, भ्रमतम परिहारी ।
निज को निज, पर को पर जानूँ, आतम अविकारी ॥
छः द्रव्यों से न्यारा हूँ में, सात तत्त्व से भिन्न ।
वैज्ञानिक बन जाऊँ खोजूँ, शोधूँ आत्म अभिन्न ॥
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकार विनाशनाय
दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
सिद्धशिला तक सहज सुगंधी, उड़-उड़ कर जावे ।
दशधर्मों की सौरभ सुरभित, प्रभु के गुन गावे ॥
ध्यान-अग्नि में, ध्रुव की धुन में, ऐसा खो जाऊँ ।
मुझमें तुम हो तुममें मैं हूँ, घुल-मिल सुख पाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
हे आदीश्वर ! हे जगदीश्वर ! मुक्ति श्री पायी ।
महा मोक्ष फल मिले सहज, वो युक्ति दर्शायी ॥
निज-चैतन्य प्रभो अब मेरे, भी मन भाया है ।
कोई कामना शेष रहे ना, ये फल चाहा है ॥
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं
निर्वपामीति स्वाहा ।

धर्म तीर्थ के आद्य प्रवर्तक, आदीश्वर भगवान ।
अन्तर्मुख छवि देख आपकी, हुई आत्म पहचान ॥
मुक्तिमार्ग का उद्घाटन प्रभु, तेरे दर पाया ।
तेरी छत्र-छाया सिर पर, रहे यही चाहा ।।
जल फलादि वसु द्रव्य चढ़ाऊँ, पद अनर्घ पाऊँ ।
जनम-जनम तक गीत तुम्हारे, गाऊँ हर्षाऊँ ।।
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला
(दोहा)
आदीश्वर परमेश प्रभु, पूजत मन हर्षाय ।
शिवपथ के सृष्टा प्रथम, त्रिभुवन के तुम राय ॥
क्षायिक श्रेणी मांडकर, आप हुये अरिहंत ।
चाँदखेड़ी में मिल रहे, दर्शन श्री भगवंत ।।
भक्ति भाव से जो जजें, नित नव मंगल होय ।
पंचमगति के पात्र हों, भव-भ्रमणा सब खोय ।।
(ताटंक)
प्रथम तीर्थंकर आदि जिनेश्वर, भाव सहित मैं करूँ प्रणाम ।
धर्म-चक्र के आद्य प्रवर्तक, आदिनाथ वन्दूँ गुणधाम ।।
अठ-दश कोड़ा-कोड़ी सागर, कल्पकाल के बीत गये ।
जन्मे जब आदीश्वर स्वामी, भरत भूमि के भाग्य जगे ।।
भोग भूमि थी भोगों में रम, जीव मुक्ति नहिं पाते थे ।
पुण्य उदय को भोग-भोग कर, देवगति ही जाते थे ।।
प्रभु सर्वार्थ सिद्धि से आकर, मध्य लोक अवतार लिया ।
असि मसि कृषि वाणिज्य आदि की, शिक्षा दे उपकार किया ।।
राजकाज में लाख तिरासी, पूर्व काल का बीत गया ।
देख निधन नीलांजन देवी उसी समय वैराग्य हुआ ।।

धिक-धिक जग की स्वारथ वृत्ति, कैसा क्षणभंगुर संसार ।
जन्म-मरण का चक्रनाशने, धर्मचक्र ही शरणाधार ।।
सहज ज्ञान-वैराग्य शक्ति के, धारी दीक्षा अपनायी ।
लौकांतिक अनुमोदन आये, धन्य-धन्य हे बड़भागी ।।
छः महिने तक ध्यान मग्न रह, निज आतम का किया मनन ।
सिद्ध सुपद की ऐसी धुन थी, भूल गये भोजन यापन ।।
तेरह महिने नौ दिन बीते, नृप श्रेयांस ने दिया आहार ।
दान तीर्थ का हुआ प्रवर्तन, अक्षय तीज तिथि निर्धार ।।
एक हजार वर्ष तप करके, केवलज्ञान लिया भगवान ।
हुये अनन्त चतुष्टय धारी, प्रथमदेव अर्हन्त महान ।।
धर्मसभा में प्रथम बार ही, खिरी देशना मंगल सार ।
सभी जीव भगवान आत्मा, जानें समयसार का सार ।।
वृषभसेन आदि चौरासी, गणधर से श्रोता गुणवान ।
भरत चक्री अर कामदेव से, श्रोता बाहुबली बलवान ।।
बही ज्ञान-गंगा प्रभु जबसे, खुला मुक्ति का मंगल द्वार ।
भव्य अनेकों पार हो गये, जिनशासन का ले आधार ।।
धन्य हुआ कैलाशधाम प्रभु, तुमने मुक्ति यहीं पायी ।
बद्रीनाथजी क्षेत्र अभी भी, बना हिमालय में शाही ।।
चाँदखेड़ी में श्री जिनमुद्रा, अतिशयवान विराज रही ।
जग के सारे भवि जीवों को, मुक्ति संदेशा सौंप रही ।।
भक्ति-भाव से करूँ वंदना, तलघर में बैठे भगवान ।
निज स्वभाव के तलघर जाऊँ, हो जाऊँ मैं आप समान ।।
ॐ ह्रीं श्री चाँदखेड़ी तीर्थे विराजित समस्त जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ पद प्राप्तये अर्घ्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।

(दोहा)
आदिनाथ भगवान की, महिमा अपरम्पार ।
भक्तिभाव हृदय धरूँ, पाऊँ भवदधि पार ॥
।। पुष्पांजलिं क्षिपामि ।।


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन