श्री चैतन्य धाम पूजन
(स्थापना)
(रोला छन्द)
जयवन्ते चैतन्य धाम, यह तीर्थ हमारा ।
आत्म रसिक भव्यों को, अनुपम यही सहारा ॥
अन्तर्मुख छबि जिनबिम्बों की, यहाँ निहारो ।
जिनदर्शन से निजदर्शन कर भाव सम्हारो ॥
वीतराग छबि देख, हृदय पुलकित हो जाता ।
भव-भव का सन्ताप, हिमालय-सा गल जाता ॥
आओ प्रभूजी, मेरे मन-मंदिर में आओ ।
जब तक मुक्ति न पाऊँ तब तक हृदय समाओ ।॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिन समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिन समूह ! अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिन समूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
(मानव छंद)
हूँ चेतन जाननहारा, सुन दिव्यध्वनि श्रुतधारा ।
आनंद अपूरब आता, जागा सौभाग्य हमारा ।।
चैतन्य धाम शुभ तीरथ, लगता कितना मनहारा ।
निर्मल जल चरण चढ़ाऊँ, जयवंते तीर्थ हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं
निर्वपामीति
जिनदर्शन से निज दर्शन, होते भवताप उतरता ।
समता आती अंतर में, कोई शत्रु-मित्र न दिखता ॥
चैतन्य धाम शुभ तीरथ, लगता कितना मनहारा ।
चंदन प्रभु-चरण चढ़ाऊँ, जयवंते तीर्थ हमारा ।।
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो भवाताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति
अक्षय स्वभाव अनुभवते, अक्षय स्वभाव दर्शाते ।
क्षत का अभिमान करूँ क्या ? अद्भुत सामर्थ जगाते ॥
चैतन्य धाम शुभ तीरथ, लगता कितना मनहाराः ।
अक्षत प्रभु-चरण चढ़ाऊँ, जयवंते तीर्थ हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अक्षय पद प्राप्तये अक्षत’ निर्वपामीति
चैतन्य विहारी प्रभुवर, निज में विहार नित करते ।
पंचेन्द्रिय विषय सुखों को, विषधर समान ही तजते ॥
चैतन्य धाम शुभ तीरथ, लगता कितना मनहारा ।
चरणों में पुष्प चढ़ाऊँ, जयवंते तीर्थ हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति
चैतन्य-रसामृत पीते, तुम तृप्त हुये हे स्वामी ।
यह क्षुधा देह की पीड़ा, मेटो हे अन्तर्यामी ॥
चैतन्य धाम शुभ तीरथ, लगता कितना मनहारा ।
नेवज प्रभु-चरण चढ़ाऊँ, जयवंते तीर्थ हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवैद्यं निर्वपामीति
प्रभु जाननहार जनाता, यह बात समझ अब आई ।
ज्ञेयाकारों में भी तो, ज्ञायक ही दिया दिखाई ॥
चैतन्य धाम शुभ तीरथ, लगता कितना मनहारा ।
चरणों में दीप चढ़ाऊँ, जयवंते तीर्थ हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति
संसार-महाभव वन में, विष-वृक्ष फले न चाहूँ ।
कैसा भी हो कर्मोदय, समता ही मन में धारूँ ॥
चैतन्य धाम शुभ तीरथ, लगता कितना मनहारा ।
ले धूप दशांग चढ़ाऊँ, जयवंते तीर्थ हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
शुभ-अशुभ भाव के फल में, चारों गति के दुख पाये।
नहिं रहे कामना कोई, यह मंत्र सीखने आये ॥
चैतन्य धाम शुभ तीरथ, लगता कितना मनहारा ।
निर्मल फल चरण चढ़ाऊँ, जयवंते तीर्थ हमारा ॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
चैतन्य धाम में चेतन, की स्वर लहरी महकाती ।
चातकवत चेतन आते, परिणति अंतर ढल जाती ॥
भावों के अर्घ्य सजाऊँ, शुद्धात्म भावना भाऊँ ।
निर्ग्रन्थ दशा अपनाकर, अर्हन्त सिद्ध पद पाऊँ ॥
वृषभादिक वीर जिनेश्वर, प्रभु पूजन करने आया ।
चरणों में अर्घ्य चढ़ाऊँ, मेरा चेतन धाम दिखाया ॥
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
वीतराग सर्वज्ञ प्रभु, सब देवों के देव ।
नाथों के तुम नाथ हो, नमूं सहज स्वयमेव ॥
(चौपाई)
जयवन्ते शुभ तीर्थ हमारा, आत्म साधकों को गुरू द्वारा ।
भव्यजनों को अतिशय प्यारा, चेतनधाम ये तीर्थ हमारा ॥
जयवंते जिनदेव हमारे, मुक्तिमार्ग दर्शावनहारे ।
महामनोज्ञ जिनेश निहारे, ऐसा ही हूँ भाव सम्हारे ॥
यह अनादि अनिधन जग सारा, है स्वाधीन परिणमन सारा ।
है स्वतंत्र अणु-अणु समझाया, मैं तो हूँ बस जाननहारा ॥
विश्व व्यवस्था अति मनहारी, जो माने उसकी बलिहारी ।
मोह करे कोलाहल सारा, भूल गया जिन आगम प्यारा ॥
ज्यों मृग दौड़े फिरे विपिन में, मृगतृष्णा वश भटके वन में ।
त्यों चेतन प्रभु इस भववन में, भटके चौरासी योनिन में ॥
राग-द्वेष सबसे हैं न्यारे, चिदानंद भगवान हमारे ।
ग्रहण-त्याग-बिन महिमा न्यारी, सोहे चेतन प्रभु अविकारी ॥
धन्य-धन्य अर्हन्त जिनेश्वर, शत-शत इंद्र नमें जगदीश्वर ।
प्रभु सर्वोदय तीर्थ तुम्हारा, स्याद्वाद बहती ध्रुव धारा ॥
अनेकान्तमय वस्तु बतायी, सारी भ्रमणा दूर भगायी ।
प्रभु ! सुरपति तेरे गुणगावें, गणधर गावें पार न पावें ।
राग बिना प्रभु जगजन तारे, क्रोध भाव विन कर्म निवारे ॥
शीलव्रती फिर भी सुख भोगी, योगी हो या प्रभू अयोगी ।
रत्नत्रय निधि के तुम धारी, पंचकल्याणक तदपि विरागी ।।
प्रभु सर्वज्ञ आपको मानें, या आत्मज्ञ तुम्हें पहचानें ।
यत्न साध्य से शिवपद पाया, फिर भी सहज साध्य समझाया ॥
कैसी महिमा अचरज भारी, बातें लगें अटपटी सारी ।
शान्त सुधारस नित पीते हो, फिर भी क्षुधारोग रीते हो ॥
तुमरो सुजस कौन कह पावे ? गणधर भी कह पार न पावे ।
गुण अनन्त कैसे कर गाऊँ, मनमंदिर में तुम्हें बिठाऊँ ।।
बार-बार मैं शीश नवाऊँ, तुम जैसी प्रभुता प्रगटाऊँ ।
नेमीश्वर यहाँ विचरे होंगे, ढूंढ़ो चरण कहाँ वो होगें ?
सिद्ध क्षेत्र तारंगा आओ, चेतनधाम अवश्य पधारो ।
वीतराग प्रभु दर्शन पाओ, जीवन अपना धन्य बनाओ ॥
चेतन धाम विद्यालय प्यारा, ज्ञान निकेतन सरस हमारा ।
यहीं ज्ञान संस्कार दिलाओ, बोधि समाधि नींव जमाओ ।।
जयवंते यह तीर्थ हमारा, भव्यजनों को एक सहारा ।
अशरण जग में शरण सहारा, जिन शासन जयवंत हमारा ।।
ॐ ह्रीं श्री चैतन्यधाम स्थित सर्वजिनेन्द्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
चौबीसों श्री जिनचंद के, चरण कमल चितलाय ।
आनंदकंद दशा प्रभु, कब तुम-सम प्रगटाय ।।
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
प्रूफरीडिंग बाकी है