श्री बुंदेलखंड तीर्थ यात्रा पूजन
स्थापना
ऊँचे-ऊँचे शिखरों वाले हैं ये तीरथ हमारे।
भाव विशुद्धि जगाते हैं ये तीरथ हमारे ।।
जिन संस्कृति के परम धरोहर ।
आत्म शांति के तट अति सुन्दर ।।
ध्यान का ध्येय दिखावें रे ये तीरथ हमारे ।
अन्तर्मुख जिनबिम्ब निहारूं ।।
ऐसा ही हूँ सदा विचारूं ।
अपने में खो जाऊँ रे कहे तीरथ हमारे ।।
भाव सहित वंदे जो कोई ।
ताहि नरक पशुगति नहिं होई ।।
विषय कषाय छुड़ावें रे ये तीरथ हमारे ।
कृत्रिम अकृत्रिम तीरथ सारे ।।
सबको अगणित नमन हमारे ।
रत्नत्रय सब पाओ रे कहें तीरथ हमारे ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतीर्थक्षेत्र समूह ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतीर्थक्षेत्र समूह ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री सर्वतीर्थक्षेत्र समूह ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(सखी)
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
मुनि मन सम उज्ज्वल जल ले, प्रभु तेरे चरण पखारूँ ।
प्रभु होय साधना ऐसी, जन्मादि न अब फिर धारूँ ॥
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ॥
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।
जड़ चंदन अतिशय न्यारा, मैं तो बस जाननहारा।
जो होना सो निश्चित है, सुन मंत्र मिटे दुख सारा ।।
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ॥
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।
अक्षय स्वभाव अनुभव से, भटकन प्रभु कभी न आती ।
अक्षत स्वभाव समझाती, जिनवाणी सदा जगाती ।।
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु कामवासना के वश, भव - भव अनंत दुख पाये ।
कभी शील स्वभाव न भाया, ये सीख यहीं मिल पावे ॥
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो कामबाण विनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।
यह क्षुधा-व्याधि नागिन-सी, व्यंजन से तृप्ती न आती।
अनशन स्वभाव आस्वादूँ, प्रभु शाश्वत समता आती ॥
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ॥
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
प्रभु भेद ज्ञान ज्योति से, मोहांध भाव विनसाऊँ ।
जागे विवेक स्व पर का, कब समता उर में पाऊँ ॥
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।
कर्मों ने दुख पहुँचाया, चहुँगति में नाच नचाया ।
यह बात सर्वथा झूठी, सुन अनेकान्त सुख पाया ।।
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ॥
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
संकल्प-विकल्पों का फल, संसार सदा फलता है ।
दो घड़ी आत्म अनुभव का, फल मुक्ति-कमल खिलता है।।
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ॥
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा ।
चौबीसों श्री जिन प्रभुवर, आनंदकंद सुखकारी ।
अन्तर्मुख नासादृष्टि, छबि सोहे प्रभु अविकारी ।।
जल फल आठों द्रव्यों से, प्रभु अर्घ्य संजोकर लाया।
पाऊँ अनर्घ पद ऐसा, जैसा पद तुमने पाया ।।
संस्कृति के परम धरोहर, जिन शासन के रखवारे ।
जिन तीर्थ सदा अभिनन्दूँ, चौबीस जिनेश हमारे ।।
ॐ ह्रीं श्री सर्व तीर्थक्षेत्रेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
आत्मानुभव तीर्थ ही, सब तीर्थों में सार ।
द्रव्य-भाव तीरथ अहो, करे भवार्णव पार ॥
(मानव छंद)
संस्कृति की अमर धरोहर, ये तीर्थ हमारे सारे ।
ये हैं प्रतीक समता के, प्रभुता के सहज सहारे ।।
आत्मा की सहज साधना, के हैं ये अमर धरोहर ।
है केन्द्र उपासना के ये, सब करो साधना जी-भर ।।
जयवंत रहे जिनशासन, गूंजे घर-घर जिनवाणी ।
जो चहुँगति दुख से डर हो, तज दो प्रमाद दुखदानी ।।
साधर्मी जीवों का भी, यहाँ मधुर मिलन हो जाता ।
चर्चा होती तत्त्वों की, अन्तर्मुखी ज्ञान जगाता ।।
जिन मंदिर महा मनोहर, जिन भव्यों ने पधराये ।
खड़गासन कोई पद्मासन, अन्तर्मुख अचल बिठाये ।।
बहुमूल्यमयी रत्नों की, जिन प्रतिमायें पधराई ।
स्फटिकमणी प्रतिमा श्री, लगे नंदीश्वर से आई ॥
श्री अतिशय क्षेत्र पनागर, करो शांतिनाथ के दर्शन ।
अति मनहारी मुद्रा है, हो जावे जीवन धन-धन ।।
रामटेक अहार पपौरा, सब जगह शांति प्रभु पाये ।
धनि धन्य पूर्वजों ने तो, मनहारी प्रभु पधराये ।।
बहोरीबंद क्षेत्र के दर्शन, सुख शांति सहज दर्शाते ।
बजरंगढ़ में प्रभु के रंग, में भवि जन हैं रंग जाते ।।
श्री शांति कुंथु अर प्रभु ने, सब राजपाठ ठुकराया ।
चैतन्य धाम से बढ़कर, आनंद कहीं न पाया ।।
चौबीस जिनेश चंदेरी, के दर्शन जी भर कर लो ।
जीवन-भर भूल न पाओ, आतम अनुभव फल चखलो ॥
थोवन जी अतिशय पावन, जिनबिम्ब विशाल मनोहर ।
धनि धन्य हुये वे श्रावक, जिन थापी अचल धरोहर ।।
अब चलो द्वीप नंदीश्वर, खनियांधाना तो आओ ।
अर्न्तमुख प्रभु छबि लखकर, अंतरमुखी भाव जगाओ।।
गुरुदत्त मुनीश्वर वन्दूँ, द्रोणागिर तीर्थ हमारा ।
उपसर्गजयी मुनि वन्दूँ, समता का लिया सहारा ।।
नैनागिरि तीर्थ चलें हम, जहाँ पार्श्वनाथ प्रभु आये ।
वरदत्तादि ऋषि वन्दूँ, जिनबिम्ब नमूँ मन भाये ।।
त्रैकालिक चौबीसी के, दर्शन कर लो मनहारी ।
धर्मी अशोकनगरी में, जिन मंदिर प्रभु छबि प्यारी ॥
पचराई प्रभु दर्शन कर, फिर गोलाकूट पधारो ।
पर्वत पर बैठे प्रभु की, छबि बारम्बार निहारो ।।
कुंडलपुर आदीश्वर जी, कितने सुन्दर हैं प्यारे ।
यही सिद्ध भूमि श्रीधर की, अतिशय जग से हैं न्यारे ।।
कोनीजी तीरथ पावन, जिन सहस्रकूट चैत्यालय ।
प्रभु पार्श्वनाथ के दर्शन, कर लो हैं बहुत मनोहर ।।
खजुराहो शांति जिनेश्वर, के निश्चित दर्शन करना ।
यहाँ कलाकृति से निर्णय, धर्मी पूर्वज का करना ॥
जिनदेव बसें कण-कण में, वह भूमि देवगढ़ जानो ।
कैसे होंगे वे श्रावक, अनुमोदन कर श्रद्धानो ।।
अब नगर जबलपुर आओ, नंदीश्वर दर्शन पाओ ।
यहाँ पिसनहारी मढ़िया का, वंदन कर आनंद पाओ ।।
जो हाथ मिले हैं उनसे, प्रभु का अभिषेक रचाओ ।
पीड़ित प्राणी जन-जन को, तुम अपने गले लगाओ ।।
जो दृष्टि आपने पाई, प्रभु मुद्रा खूब निहारो ।
तन-मन-धन न्यौछावर कर, जिनशासन को उजियारो ।।
इस तरह तीर्थ यात्रा हो, भवसागर से तिर जायें ।
प्रभु तेरे अनुशासन में, बस सिद्ध दशा पा जायें ॥
ॐ ह्रीं श्री सर्व बुंदेलखंड तीर्थक्षेत्रेभ्यो जयमाला महाअर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
(दोहा)
जयवन्ते जिन तीर्थ शुभ, जयवन्ते जिनधर्म ।
आत्मतीर्थ से प्रभु तिरे, यही एक लूँ शर्ण ॥
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
प्रूफरीडिंग बाकी है