धन्य हैं वे भरतराज, पायो निज को सुराज।
जिनको यश वचन सों, कहत न बनत है।।1।।
दिग्विजय हेतु जो प्रयाण करे सैन्य साथ।
रत्नाकर किनारे, चैतन्य रत्नाकर धरत हैं।।2।।
युद्ध की नहीं है चिन्ता, कर्मनि से युद्ध करे।
ध्यान बल भूप आय, चरणन परत है।।3।।
बत्तीस हजार नृप चरणों में शीश धरें।
पर जिन शीश, जिन-चरण में झुकत है।।4।।
छियानवें हजार नारीं, जिनको हृदय में धरें।
पर जिन हृदय में नारि नाहिं, जिन बसत हैं।।5।।
चक्रवर्ती मान छोड़, नित्य जिनपूजा करें।
युक्ति भक्ति से सु द्वारा-पेक्षण करत हैं।।6।।
घर में विरागी, स्व-स्वरूप में अनुरागी।
मुनि हो अन्तर मुहूर्त केवल लहत हैं।।7।।
ऐसे वीतराग भरतेश्वर के चरणों में।
श्रद्धा भक्ति पूर्वक हम पुनि-पुनि नमत हैं ।। 8 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह