श्री भरत जिन पूजन
(मानव)
हे भरत जिनेश्वर मेरी, परिणति में आ तिष्ठाओ।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, मुझको प्रतिक्षण दर्शाओ।।
प्रभु मेरी इस परिणति से, फिर कभी नहीं तुम जाना।
इस पर में रत परिणति को, प्रभु भरत स्व-रत करवाना।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, मुझको प्रतिक्षण दर्शाओ।।
प्रभु मेरी इस परिणति से, फिर कभी नहीं तुम जाना।
इस पर में रत परिणति को, प्रभु भरत स्व-रत करवाना।
ॐ ह्रीँ श्री भरतजिनेन्द्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीँ श्री भरतजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीँ श्री भरतजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
ॐ ह्रीँ श्री भरतजिनेन्द्र! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीँ श्री भरतजिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
जल को तृप्ति का साधन, समझा था पर दुख पाया।
तुम जल बिन पूर्ण तृप्त हो, इसलिए पास मैं आया।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
तुम जल बिन पूर्ण तृप्त हो, इसलिए पास मैं आया।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
ॐ ह्रीँ श्री भरतजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
भव भोगों में मत तपना, तुमने प्रभुवर सिखलाया।
निज आत्म स्वभाव ही शीतल, चंदन को व्यर्थ बताया।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
निज आत्म स्वभाव ही शीतल, चंदन को व्यर्थ बताया।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
ॐ ह्रीँ श्री भरतजिनेन्द्राय संसारतापविनाशनाय चन्दनं निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु मैं जिस-जिस में रमता, वह सब कुछ क्षय हो जाता।
अक्षय स्वभाव का रस ही, हे प्रभु मुझको अब भाता।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
अक्षय स्वभाव का रस ही, हे प्रभु मुझको अब भाता।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
ॐ ह्रीँ श्रीभरतजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ।
हे भरतराज जिन स्वामी, तुम तो हो त्रिभुवन ज्ञानी।
निज आतम ही है सुखमय, यह बात मैं तुमसे जानी।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
निज आतम ही है सुखमय, यह बात मैं तुमसे जानी।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
ॐ ह्रीं श्रीभरतजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
मैं अरस स्वभावी चेतन, पर रस से सर्वथा न्यारा।
तुम चेतन रस के भोगी, वही चेतन मुझको प्यारा।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
तुम चेतन रस के भोगी, वही चेतन मुझको प्यारा।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
ॐ ह्रीं श्रीभरतजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
ज्ञायक की सुखमय आभा, में रत हे भरत जिन नामी।
जड़ दीपक की यह ज्योति, तुम सन्मुख तुच्छ है स्वामी।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
जड़ दीपक की यह ज्योति, तुम सन्मुख तुच्छ है स्वामी।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
ॐ ह्रीं श्रीभरतजिनेन्द्राय मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
निज आत्म ध्यान ही जिनवर, सब कर्मों का नाशक है।
यह जड़मय धूप तो केवल, वसु-कर्म की उत्पादक है।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
यह जड़मय धूप तो केवल, वसु-कर्म की उत्पादक है।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
ॐ ह्रीं श्रीभरतजिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
लौकिक फल तो अब सारे, मुझको निष्फल लगते हैं।
निज आत्म लीनता के फल, प्रभु मोक्ष रूप फलते हैं।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
निज आत्म लीनता के फल, प्रभु मोक्ष रूप फलते हैं।।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।।
ॐ ह्रीं श्रीभरतजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।
हे नाथ अर्घ्य कितने ही, मैंने अब तक हैं चढ़ाए।
पदवी अनर्घ्य पाने को, अब मन मेरा ललचाए।
अहो! भरत जिनेश्वर तुमने, वैराग्य भाव उर धारा।
क्षण में चक्री पद छोड़ा, निज आतम रूप निहारा।
निज थिरता से प्रभु तुमने, आनंद अतीन्द्रिय पाया।
अन्तर्मुहूर्त में ही प्रभु, फिर केवलज्ञान उपाया ।
प्रभु चक्र रत्न को तजकर, था धर्म चक्र प्रकटाया।
भव चक्र आप विनशाकर, फिर सिद्धचक्र को पाया।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।
पदवी अनर्घ्य पाने को, अब मन मेरा ललचाए।
अहो! भरत जिनेश्वर तुमने, वैराग्य भाव उर धारा।
क्षण में चक्री पद छोड़ा, निज आतम रूप निहारा।
निज थिरता से प्रभु तुमने, आनंद अतीन्द्रिय पाया।
अन्तर्मुहूर्त में ही प्रभु, फिर केवलज्ञान उपाया ।
प्रभु चक्र रत्न को तजकर, था धर्म चक्र प्रकटाया।
भव चक्र आप विनशाकर, फिर सिद्धचक्र को पाया।
अब तुम्हें निरखकर स्वामी, मुझको मेरी सुधि आई।
ज्ञायक स्वभाव की महिमा, तुमने मुझको दिखलाई।
ॐ ह्रीं श्री भरत जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
जयमाला
(दोहा)
आदिप्रभु के ज्येष्ठ सुत, भरतेश्वर जिनराज।
क्षण में सब वैभव तजा, आत्म रमणता काज।।
क्षण में सब वैभव तजा, आत्म रमणता काज।।
(मानव)
प्रभु जब-जब तुमको देखा, मुझे आतम देव दिखाया।
निज आतम दर्शन करके, आनंद अपूरव छाया ।।
मैं मात्र जानने वाला, कर्तापन दूर भगाया।
इस अकर्तृत्व भाव का, रस अब मैंने चख पाया ।।1।।
निज आतम दर्शन करके, आनंद अपूरव छाया ।।
मैं मात्र जानने वाला, कर्तापन दूर भगाया।
इस अकर्तृत्व भाव का, रस अब मैंने चख पाया ।।1।।
क्या तीव्र रहा होगा प्रभु, पावन पुरुषार्थ तुम्हारा।
षट्खंडों में रहकर भी, नित एक अखंड निहारा ।।
चक्री का वह वैभव भी, प्रभु तुमको लुभा न पाया।
निज आतम वैभव अनुपम, ही प्रभु तुम्हें मन भाया ।।2।।
षट्खंडों में रहकर भी, नित एक अखंड निहारा ।।
चक्री का वह वैभव भी, प्रभु तुमको लुभा न पाया।
निज आतम वैभव अनुपम, ही प्रभु तुम्हें मन भाया ।।2।।
प्रभु राज्यावस्था में भी, थे जल तें भिन्न कमल से।
दिखते थे जग वैभव में, पर पृथक रहे थे उससे ।।
थी रानी हजार छियानवे, पर स्वानुभूति में रमते।
यही रमने योग्य है रमणी, प्रभु निज जीवन से कहते ।।3।।
दिखते थे जग वैभव में, पर पृथक रहे थे उससे ।।
थी रानी हजार छियानवे, पर स्वानुभूति में रमते।
यही रमने योग्य है रमणी, प्रभु निज जीवन से कहते ।।3।।
प्रभु पुण्योदय में भी तुम, थे उदयातीत ही लखते।
सब कर्म कर्मफल तजकर, निज ज्ञायक रूप ही भजते ।।
दिखता बंधन में पर जो, सब बंधों से है न्यारा।
उस अबंध आत्म का अनुभव, ही था प्रभु तुमको प्यारा ।।4।।
सब कर्म कर्मफल तजकर, निज ज्ञायक रूप ही भजते ।।
दिखता बंधन में पर जो, सब बंधों से है न्यारा।
उस अबंध आत्म का अनुभव, ही था प्रभु तुमको प्यारा ।।4।।
प्रभु भोगों में रहकर भी, तुम थे निशंक अंतर में।
निज आतम ही है सुखमय, सब छोड़ गए पल भर में ।।
हैं भोग ना सुख के कारण, सुख अपने से ही आता।
अपने को पूरा लख कर, निःकांक्षित भाव ही भाता ।।5।।
निज आतम ही है सुखमय, सब छोड़ गए पल भर में ।।
हैं भोग ना सुख के कारण, सुख अपने से ही आता।
अपने को पूरा लख कर, निःकांक्षित भाव ही भाता ।।5।।
इन क्षणिक विकारों से भी, न्यारा है निज शुद्धातम।
तज कर विचिकित्सा इनसे, उस आतम को ही लखते।।
है ज्ञान ज्ञान से ही प्रभु, ज्ञेयों से ज्ञान न आता।
अमूढ़दृष्टि होते ही, निरपेक्ष ज्ञान दर्शाता ।।6।।
तज कर विचिकित्सा इनसे, उस आतम को ही लखते।।
है ज्ञान ज्ञान से ही प्रभु, ज्ञेयों से ज्ञान न आता।
अमूढ़दृष्टि होते ही, निरपेक्ष ज्ञान दर्शाता ।।6।।
जब हो आतम पर दृष्टि, पर्याय गौण हो जाती।
उपगूहन होता उनका, फिर आत्म-रमणता भाती।।
स्व में जम जाते रमते, स्व-स्थिरता ही भाती।
अस्थिरता पर्यायों की, इस स्थिति में न आती ।।7।।
उपगूहन होता उनका, फिर आत्म-रमणता भाती।।
स्व में जम जाते रमते, स्व-स्थिरता ही भाती।
अस्थिरता पर्यायों की, इस स्थिति में न आती ।।7।।
मुक्ति ले जाने वाला, जो आत्म स्वभाव है अनुपम।
उसमें ही रति हे जिनवर, वात्सल्य भाव सर्वोत्तम।।
प्रभु पंचम भाव के आश्रय, से हो प्रभावना उत्तम।
इस जगत प्रभाव को तजकर, जिनपथ भाये सर्वोत्तम ।।8।।
उसमें ही रति हे जिनवर, वात्सल्य भाव सर्वोत्तम।।
प्रभु पंचम भाव के आश्रय, से हो प्रभावना उत्तम।
इस जगत प्रभाव को तजकर, जिनपथ भाये सर्वोत्तम ।।8।।
प्रभु समाचार जब पाया, आदिप्रभु मुक्ति पधारे।
उमड़ी वैराग्य की धारा, पर-भाव लखे सब न्यारे।।
धन्य-धन्य हैं आदीश्वर प्रभु, जो सिद्ध दशा प्रगटाये।
पर मोह-भ्रमित इस जग को, अब राह कौन दिखलाये ।।9।।
उमड़ी वैराग्य की धारा, पर-भाव लखे सब न्यारे।।
धन्य-धन्य हैं आदीश्वर प्रभु, जो सिद्ध दशा प्रगटाये।
पर मोह-भ्रमित इस जग को, अब राह कौन दिखलाये ।।9।।
हे प्रभु हम जैसे पामर, अब कैसे धैर्य धरेंगे।
सब पाप-प्रणाशिनी वाणी, जिनवाणी कैसे सुनेंगे।।
पर हे प्रभु तुमने ही तो, हैं निमित्त अकर बतलाए।
निज उपादान की शक्ति, भव-पार मुझे ले जाए ।।10।।
सब पाप-प्रणाशिनी वाणी, जिनवाणी कैसे सुनेंगे।।
पर हे प्रभु तुमने ही तो, हैं निमित्त अकर बतलाए।
निज उपादान की शक्ति, भव-पार मुझे ले जाए ।।10।।
धिक्-धिक् प्रभु मैं अब तक भी, क्यों उलझा हूँ इस जग में।
सब वस्तु परिणमित निज से, क्या करूँ राज कारज मैं।।
जो होना हो सो होता, कुछ मम आधीन नहीं रे।
क्यों षट्खंडों के शासन, का बोझ धरूँ मैं सिर रे ।।11।।
सब वस्तु परिणमित निज से, क्या करूँ राज कारज मैं।।
जो होना हो सो होता, कुछ मम आधीन नहीं रे।
क्यों षट्खंडों के शासन, का बोझ धरूँ मैं सिर रे ।।11।।
है कण-कण इस धरती का, अतिसुंदर अरु अनुशासित।
हर वस्तु स्वतंत्र विश्व में, सब कुछ अपने से चालित।।
इस स्व अनुशासित जग में, शासन अरु प्रशासन का।
मैं बोझ धरूँ फिर क्योंकर, अब चखूँ स्वाद निज-रस का ॥12॥
हर वस्तु स्वतंत्र विश्व में, सब कुछ अपने से चालित।।
इस स्व अनुशासित जग में, शासन अरु प्रशासन का।
मैं बोझ धरूँ फिर क्योंकर, अब चखूँ स्वाद निज-रस का ॥12॥
अब तक मैंने नर-भव का, अधिकांश भाग है खोया।
अब निज पुरुषार्थ जगाऊँ, जो काल अनादि से सोया।।
अब सर्व परिग्रह त्यागूँ, अरु रमूँ प्रभु मैं निज में।
रे त्यागूँ क्या मैं इसको, यह नहीं प्रविष्ट था मुझ में ।।13।।
अब निज पुरुषार्थ जगाऊँ, जो काल अनादि से सोया।।
अब सर्व परिग्रह त्यागूँ, अरु रमूँ प्रभु मैं निज में।
रे त्यागूँ क्या मैं इसको, यह नहीं प्रविष्ट था मुझ में ।।13।।
सब भिन्न रहा था मुझसे, अरु जुदा-जुदा है अब भी।
फिर त्याग-ग्रहण की पर में, बातें हैं सब कल्पित ही।।
पर का परमाणु न मुझमें, मैं त्यागूँ क्या अब जग में।
मेरा सब कुछ है मुझमें, मैं ग्रहण करूँ क्या निज में ।।14।।
फिर त्याग-ग्रहण की पर में, बातें हैं सब कल्पित ही।।
पर का परमाणु न मुझमें, मैं त्यागूँ क्या अब जग में।
मेरा सब कुछ है मुझमें, मैं ग्रहण करूँ क्या निज में ।।14।।
मैं निज में तृप्त रहूँगा, अब निज में ही विहरूंगा।
अपने अनंत गुण वाले, उपवन में केलि करूँगा।।
जब मेरा सब कुछ मुझमें, क्या काम बाह्य वैभव का।
निज सुख में बाधक बनते, यह खेल न होने दूँगा ।।15।।
अपने अनंत गुण वाले, उपवन में केलि करूँगा।।
जब मेरा सब कुछ मुझमें, क्या काम बाह्य वैभव का।
निज सुख में बाधक बनते, यह खेल न होने दूँगा ।।15।।
इस भाँति भरत प्रभुवर जी, रात्रि भर रहे सोचते।
सूरज की प्रथम किरण के, आते ही कानन पहुँचे।।
दीक्षित होते ही प्रभुवर, रम गए आत्म-उपवन में।
सब भेद-विकल्प भी त्यागे, हो निर्विकल्प अंतर में ।।16।।
सूरज की प्रथम किरण के, आते ही कानन पहुँचे।।
दीक्षित होते ही प्रभुवर, रम गए आत्म-उपवन में।
सब भेद-विकल्प भी त्यागे, हो निर्विकल्प अंतर में ।।16।।
अंतर में ऐसे ठहरे, जम गए रम गए निज में।
फिर केवलज्ञान-लक्ष्मी, प्रकटी अन्तर क्षणभर में।।
अंतर्मुहूर्त में प्रभुवर, हुआ ज्ञान-अनंत उजारा।
जल, थल अर नभ में जिनवर, गूँजा तव जय-जयकारा ।।17।।
फिर केवलज्ञान-लक्ष्मी, प्रकटी अन्तर क्षणभर में।।
अंतर्मुहूर्त में प्रभुवर, हुआ ज्ञान-अनंत उजारा।
जल, थल अर नभ में जिनवर, गूँजा तव जय-जयकारा ।।17।।
षट्खंडों के सब प्राणी, चरणों में दौड़े आये।
सर्वज्ञ हुए भरतेश्वर, सब दर्शन कर हर्षाये।।
वसु कर्मों से जग पीड़ित, वो कर्म आप विनशाये।
आतम की शक्ति कैसी, अब सब जग यह लख पाये ।।18।।
सर्वज्ञ हुए भरतेश्वर, सब दर्शन कर हर्षाये।।
वसु कर्मों से जग पीड़ित, वो कर्म आप विनशाये।
आतम की शक्ति कैसी, अब सब जग यह लख पाये ।।18।।
जब तेज-पुंज निज आतम, कर्मों से डरना कैसा।
जब रमे आत्मा निज में, फिर दैन्य और भय कैसा।।
प्रभुवर की कर्म-विजय पर, सब जग-जन मिल हर्षाये।
हम भी नाशें कर्मों को, वीरत्व भाव प्रगटाये ।।19।।
जब रमे आत्मा निज में, फिर दैन्य और भय कैसा।।
प्रभुवर की कर्म-विजय पर, सब जग-जन मिल हर्षाये।
हम भी नाशें कर्मों को, वीरत्व भाव प्रगटाये ।।19।।
निज मुक्त स्वरूप ही लखकर, मुक्ति प्रभु तुमने पाई।
मैं भी उसको ही निरखूँ, अब मुक्त दशा मन भाई ।।
प्रभु सिद्ध-शिला में तिष्ठे, सब आवागमन नशाया।
मैं भी तिष्ठूँ प्रभु निज में, अब यही भाव उमगाया ।।20।।
मैं भी उसको ही निरखूँ, अब मुक्त दशा मन भाई ।।
प्रभु सिद्ध-शिला में तिष्ठे, सब आवागमन नशाया।
मैं भी तिष्ठूँ प्रभु निज में, अब यही भाव उमगाया ।।20।।
॥ ॐ ह्रीं श्री भरत जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ॥
(दोहा)
भरत जिनेश्वर आप ही, हो आदर्श प्रधान।
मैं भी धारूँ आप सम, विमल विराग महान्।।
मैं भी धारूँ आप सम, विमल विराग महान्।।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
— ऋचा जैन