चैतन्यधाम तीर्थ
( दिग्पाल )
चैतन्यधाम तीर्थ, दुनिया में सबसे न्यारा।
शुद्धात्म साधना को, साधर्मी प्राण प्यारा॥
संसार सिन्धु तिरने जिन धर्म ही शरण है।
शुद्धात्म साधने को ये तीर्थ है नमन है॥
अनमोल है ये जीवन, मिलना महा है दुर्लभ।
महा भाग्य मिल गया वो सार्थक करो ये भविजन॥
महावीर प्रभु का मंदिर दर्शत आनंद आवें।
पारस प्रभु सीमंधर जी भी यहीं विराजे॥
श्री शांतिनाथ नेमीश्वर, भवि जीव वंदते है।
जिनवाणी गूँजती है, गुरुदेव गूँजते हैं॥
गोम्मटेश तीर्थ यात्रा महा भाग्य आज आयें।
विषयों में मन ना जाये, निर्ग्रंथ पंथ भाये॥
ये धर्मी तीर्थ यात्रा आराधना प्रथम हो।
बस साधना प्रथम हो वात्सल्य हो विनय हो।
हमें राग जीतना हैं हमें राग टालना हैं।
इच्छाओं की गुलामी से अब तो छूटना है॥
जीवन सफल हमारा हो नाथ तुव शरण में।
आराधना हो मंगल. जिन धर्म की शरण में॥
मंगलाचरण
मंगलं भगवान वीरो, मंगलम गौतमो गणी। मंगलं कुंद कुंदाद्यो, जैन, धर्मोस्तु मंगलं॥
सर्व मंगल्य मांगल्यं, सर्व कल्याण कारकं। प्रधानं सर्व धर्माणां, जैनम् जयतु शासनम्॥
( रोला )
तीन काल के सब सिद्धो को, नमन हमारा।
नाम मात्र ही धन्य आपका तारण हारा।
तीन काल के अरिहंतों से जग उजियारा।
मोह महातम मेटन समरथ दीप तुम्हारा॥
तीन काल के गणधर प्रभु जयवंत हमारे।
दिव्यध्वनि के धर्म मर्म प्रकाशनहारे॥
तीन काल के आचार्यों की करूँ वंदना।
पंचाचार परायण गुरुवर की आराधना॥
उपाध्याय भगवंत पठन-पाठन करनारे।
द्वादशांग में उपादेय चैतन्य निहारें।
तीनकाल के सर्व साधुओं का अभिनंदन।
चलते फिरते सिद्ध हमारे शत् शत् वंदन।
सभी अकृत्रिम कृत्रिम चैत्यालय को वन्दू।
जिन बिम्बों को मन मंदिर में नित अभिनन्दु॥
जैन बद्री अर मूल बद्री तीर्थ को वंदन।
रत्नो के जिन बिम्ब विराजे प्रभु अभिनंदन॥
ताड़पत्र पर रची यहीं जिनवाणी राजे।
धवल जयधवल आदि पूज्य श्रुत यहीं विराजें॥
धर्मस्थल कुंद्रादि और पोन्नूर मलय है।
कुंद कुंद विदेह गये यहीं वो स्थल है॥
बाहुबली प्रभु दर्शन पाये धनि पावन दिन।
देव-शास्त्र-गुरु पंच नमूं परमेष्ठी वंदन॥
(परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
तीर्थ वंदना ( उद्देश्य )
( रोला छंद )
तीर्थ वास की सहज भावना भविजन भाते।
मोह जाल से बचने धर्मी भाव जगाते॥
शुद्धात्म ही तीर्थ शाश्वत प्रभु बतलाया।
रत्नत्रय ही धर्म तीर्थ जिन मुनि सब गाया॥
विषय वासना से बचने हम तीरथ आये।
पाप ताप संताप मिटें प्रभु शरणा पाये॥
दक्षिण में जो सन्त साधु मुनिराज हुए हैं।
दक्षिण में ही निर्ग्रन्थो ने ग्रंथ रचे हैं॥
यहीं जिनागम परमागम जी रचे गये हैं।
यहीं सुरक्षित ताडपत्र भी अभी रखे हैं॥
संस्कृति की रक्षा में जीवन होम कर गये।
धन्यधन्य वे श्रावक मंदिर हमें दे गये॥
शुद्धात्म की आओ साधना यही करें हम।
परमातम हूँ रुचि जगाकर धन्य बनें हम॥
(परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
श्री गोम्मटेश्वर बाहुबली पूजन
( छंद-रोला )
जिन शासन की शान, बाहुबली प्रभु हमारे।
जिन शासन के प्राण तत्त्व दरसावन हारें॥
नग्न दिगम्बर रुप सहज स्वाभाविक प्यारा।
ज्ञान ध्यान में मग्न मुनीश्वर रुप तुम्हारा॥
धिक् धिक् यह संसार स्वार्थ जग वृत्ति निरखकर।
दीक्षा लेकर मग्न हो गये, विन्ध्य गिरी पर॥
कामदेव थे प्रथम, मुक्ति भी प्रथमहि पायें।
हृदय विराजों बाहुबली, भगवान हमारें॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम्। अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम्।
(जोगी रासा)
अहो विश्व विजयी होकर भी, राज्य नहीं मन भाया।
मोह जयी होने दीक्षा ली, सार्थक जन्म तुम्हारा॥
बाहुबलि जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पायें।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा।
भवाताप में नही झुलसना, स्वाभिमान उर जागा
स्वारथ का संसार निरखकर दीक्षा ली मुनि नाथा॥
बाहुबली जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पाये।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये।
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय भवाताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा।
तीनो ऋतुयें सिर पर बीती, अचल रहे गुरु ज्ञानी।
अक्षय पद की प्राप्ती हेतु दृढ संकल्पित मुनि ध्यानी॥
बाहुबली जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पाये।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
कामदेव होकर भी तुमने, वश में काम किया था।
कंचन और कामनी सुख कों, निजबल जीत लिया था॥
बाहुबली जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पाये।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय कामबाण- विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
अहो! स्वानुभव अमृत रस के स्वादी धन्य मुनीश्वर।
एक वर्ष तक अनशन तपसे कर्म झराये झर-झर॥
बाहुबली जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पाये।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सूर्य-चंद्र-मणि रत्नदीप से, मोह महांध ना जावे।
आत्म ज्ञान की एक किरण ही मुक्ति यहीं दिखलावे॥
बाहुबली जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पाये।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
तनसे लिपट गई थी बेले लिपटे सर्प भुजंगे।
आत्म ध्यान धरि कर्म विनाशे अंतर आनंद बरसे॥
बाहुबली जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पाये।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय अष्ट कर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
देख तपस्या बाहुबली की, भरतचक्री सिरनाया।
उसी समय कैवल्य ज्ञान, प्रकटा फल उत्तम पाया॥
बाहुबली जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पाये।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय मोक्ष फल प्राप्तये फलम् निर्वपामीति स्वाहा।
धन्य धन्य बाहुबली मुनिवर जिनवर आप सभी हो।
भरत क्षेत्र अवसर्पिणी काल के प्रथम जिनेश तुम्ही हो॥
भक्ति भावों के अर्घ्य सजाकर नाथ चढ़ानें आया।
आप समान बना लो स्वामी जिनवर पद मन भाया॥
बाहुबली जी परिषह विजयी, प्रथम मुक्ति श्री पाये।
विश्व विमोही जिन प्रतिमा लख, रोम रोम हर्षाये॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली-जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
( जयमाला )
( दोहा )
बाहुबली पूजा हुई, हर्षित हृदय अपार।
महा भाग्य दर्शन हुये अब गाऊ जयकार॥
अंतर में आनंद छायो, जिनवर दर्शन पायो।
बाहुबली प्रभु दर्शन पाकर, रोम रोम हर्षायो-हर्षायो॥
अन्तर में आनंद छायो…॥ टेक॥
कब से थी अभिलाष हमारे, भाई भावना आज पधारे।
अन्तरमुख प्रभु दर्शन करके, सफल भये है नेत्र हमारे॥
जीवन धन्य बनायो-बनायो। अन्तर में आनंद छायो …॥१॥
प्रतिमा सुंदर अति मनहारी, भक्ति उमडती भव भय हारी।
इकटक रहूँ निरखता प्रभु को, बंद ना होंते पलक हमारी॥
भाव यही उमगायो-उमगायो। अन्तर में आनंद छायो …॥२॥
नेमिचंद्र मुनिराज हमारे, गोम्मट राजा को समझा ये रहे।
विन्ध्यगीरी पर्वत पर देखो, वहाँ बाहुबली नाथ विराजे॥
शिल्पी ने दर्शन पायो रे पायो। अन्तर में आनंद छायो …॥३॥
आप बाहुबली नाथ कहाते लेकिन तन बल भिन्न दिखाते।
ऐसा आतम ध्यान जमाया, बरसों अमृत आनंद पाया॥
सांचे मुनी हमारे-हमारे। अन्तर में आनंद छायो …॥४॥
विजय श्री चक्री ले आये, बाहुबली सिर नही झुकाये।
युद्ध प्रसंग बना भाई से, तब हृदय वैराग्य जगा रे॥
स्वारथी जग दिखलायो-दिखलायो। अन्तर में आनंद छायो …॥५॥
दीक्षा ले मुनिराज हमारे खडे हुए बरसो तप धारे।
लिपट गई तन पर बेले रे, बांबीं बनी सर्पों की वहीं रे॥
ऐसो ध्यान जमायो-जमायो। अन्तर में आनंद छायो …॥६॥
श्रवण बेलगोला भू प्यारी, वीरसेन तपथली है न्यारी।
सौ व्यक्ति को जैन बनाते, तब आहार करन को जातें॥
सुनकर अचरज आयो जी आयो। अन्तर में आनंद छायो …॥७॥
लेने कभी आहार न आयें, नही विहार करने मन भायें।
ज्ञान-ध्यान व्यवसाय बढ़ाया, केवलज्ञान महाफल पाया॥
आनंद-आनंद छायो जी छायो। अन्तर में आनंद छायो …॥८॥
जैसी दशा आपने धारी, ऐसी दशा होय कब म्हारी।
विषयों में मन कभी न जावें, इन्द्रादिक पद याद न आवें॥
आशिष लेने आयो जी आयो। अन्तर में आनंद छायो …॥९॥
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्तये जयमाला महार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
बाहुबली भगवान दिखलाया जग स्वार्थमय।
पाऊ आतम ज्ञान, मोह जयी मैं भी बनूं॥
(परिपुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्)
श्री नेमीचंद्राचार्य देव पूजन
(रोला छंद)
धन्य मुनिश्वर नेमीचंद्र गुरु नमन हमारा।
बाहुबली प्रभु दर्श मिले उपकार तुम्हारा॥१॥
विषयाशा आरंभ रहित मुनि दर्श तुम्हारें।
जिन-शासन की शान तुम्ही आदर्श हमारे॥२॥
आप परीषह जयी, अहो ! उपसर्ग जयी हो।
मोह जयी हो, कर्म जयी, इन्द्रिय विजयी हो॥३॥
वायु सम निःसंग अवनि सम समता सागर।
चक्री चरणन शीश नाय निर्मानी गुरुवर॥४॥
जिन-शासन स्तंभ दर्श ही दुर्लभ थारे।
हृदय पधारो नाथ तरसते नैन हमारे॥५॥
ॐ ह्रीं श्री नेमिचंद्र-आचार्य ! अत्र अवतर अवतर ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः॥
अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधिकरणम् !!! पुष्पांजलि क्षिपेत्॥
(छंद-वीर)
धन्य धन्य मुनिदशा स्वानुभवमय, जिनका मंगल जीवन है।
धन्य आप की समता-थिरता, सहज ज्ञान वैराग्य नमन है॥
भव सागर में पड़े, हुए हम, तुम ही शरण सहारे हो।
गोम्मटेश दर्शन दाता गुरु, तारो तारण हारे हो॥
ॐ ह्रीं श्री नेमिचंद्र- मुनिवरेभ्यो जन्म-जरा- मृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा॥
भव आताप विनाशनहारी, धन्य आपकी वाणी है।
अणु-अणु की स्वतंत्रा घोषक, मंगलमय सुखदानी है॥
अहंकार ममकार गला दे, तुम्हीं जगावनहारे हो।
गोम्मटसार, रचयिता गुरुवर तारो तारणहारे हो॥
ॐ ह्रीं श्री नेमिचंद्र-मुनिवरेभ्यो संसारतापविनाशनाय चंदन निर्वपामीति स्वाहा॥
पिता झलक ज्यो दिखे पुत्र में, झलक आपमें भगवन् की।
चौबीसों परिग्रह के त्यागी, शान्त सौम्य छवि मुनिवर की॥
पर्यय मूढ बना परसमया, तुम्ही बचावनहारे हो।
षट्खंडागम मर्मी गुरुवर, तारो तारणहारे हो॥
ॐ ह्रीं श्री नेमिचंद्र-मुनिवरेभ्यो अक्षयपदप्राप्तये अक्षतान निर्वपामीति स्वाहा।
सहज स्वानुभव के झूले में, सदा झूलते रहते हो।
चिदानंद चैतन्य बाग में, गुरुवर क्रीडा करते हौ॥
भोग-रोग से पाप ताप से, तुम्ही बचावनहारे हो।
जिनशासन के मर्मी गुरुवर तारो तारणहारे हो॥
ॐ ह्रीं श्री नेमिचंद्र मुनिवरेभ्यो कामबाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा।
एक बार दिन में आहार गुरु, पाणिपात्र में लेते हो।
रस विहीन आहार ग्रहण कर सरस दिव्य ध्वनि देते हो॥
सोने का सूरज ऊंगा ज्यो, लगता जब दर्शन होते।
षट्खंडागम मर्मी गुरुवर तारो तारणहारे हो॥
ॐ ह्रीं श्रीनेमिचंद्र मुनिवरेभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा।
हे चैतन्य प्रदीप आपसे ही धरती पर उजियारा।
कौन बतावे चेतन राजा, निज निधि आनंद भंडारा॥
मोहमहामद पियो अनादि, भटक्यो भवदधि खारा हो।
षट्खंडागम मर्मी गुरुवर तारो तारणहारे हो॥
ॐ ह्रीं श्रीनेमिचंद्र मुनिवरेभ्यो मोहांधकारविनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा।
घोर परिषह उपसर्गों में, तुमने समता भाव धरा।
ऐसी दशा होय कब मेरी जगे आत्मबल प्रभु मेरा॥
ध्यान अग्नि से कर्म जलाये, धर्म दशांगी धारे हो।
षट्खंडागम मर्मी गुरुवर तारो तारणहारे हो॥
ॐ ह्रीं श्रीनेमिचंद्र मुनिवरेभ्यो अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा।
महा भाग्य से मिला जिन धरम, मर्म समझ में अब आया।
अपना ही भगवान आत्मा, भूल स्वयं ही दुख पाया॥
बाहर सुख को फिरा खोजता, निज घर भरे भंडारे हो।
षट्खंडागम मर्मी गुरुवर तारो तारणहारे हो॥
ॐ ह्रीं श्रीनेमिचंद्र मुनिवरेभ्यो मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा॥
धन्य , मुनिश्वर, आप जिनेश्वर, जिन शासन स्तंभ अहो।
अहो! तीन कम नौ करोड मुनि जग में नित जयंवत रहो॥
गुरु बिन मार्ग शुरु कैसे हो, गुरु खेवटिया तारण हार।
शान्त सौम्य छवि देख आपकी, आनंद होवे अपरम्पार॥
पद अनर्घ्य पाने हे गुरुवर राह दिखावन हारे हो।
हे सिद्धान्त चक्रवर्ती गुरु, तारो तारणहारे हो॥
ॐ ह्रीं श्रीनेमिचंद्र- मुनिवरेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये अर्घ्य निर्व. स्वाहा॥
जयमाला
मुक्ति वधू वरने चले, धन्य मुनिश्वर संत।
गाऊँ जयमाला सुखद, भक्ति करे भव अंत॥
(जोगीरासा)
धन्य-धन्य निर्ग्रन्थ मुनिश्वर, दर्शन तेरा पाया।
महा भाग्य खिल गया हमारा रोम रोम हर्षाया॥१॥ धन्य…
महा सुखी है ऋषि हमारे ऋद्धि-सिद्धि शिर नाये।
चक्री चरणन शीश नवाये, रंच मान नहि आये॥
महा पुण्य से गुरुवर तेरी चरण शरण में आया।
धन्य-धन्य मुनिदशा देखते, मुनि होने मन आया॥२॥ धन्य..
विषयों की आशा नहिं जिनके, साम्य भाव धन रखते।
शुद्ध उपयोगी परम विरागी मगन ध्यान में रहते॥
धर्म अहिंसा की मूरत हो, आतम राम सुहाया॥३॥ धन्य…
पंचेन्द्रिय विषयो में फंसकर, कैसे प्राण गंवायें।
मृग गज मीन अलि अहि आदिक, तड़प-तड़प दुखपाये॥
चारो गति दयनीय दशा का, कोई न तारणहारा॥४॥ धन्य…
दिव्य देवगति मिली भाग्य से, देखें विषय नजारें।
भूल गया आतम आराधन, सागर उम्र गुजारें॥
ढली एक दिन खिली कली अर, थावर मांहि समाया॥
धन्य-धन्य निर्ग्रथ मुनिश्वर, सुन वैराग्य समाया॥५॥
पाप किये फल मिली अधोगति, चीखें साथी सारे।
घोर वेदना भूखप्यास वहाँ तड़फे प्राण हमारे॥
अब न करुंगा पाप, लिये संकल्प निकल तो आया॥६॥ धन्य.
मायाचारी के फल मैंने, गति तिर्यंच की पायी।
क्षुधा वेदनी पिंड न छोडे, वध बंधन दुखदायी॥
साथी सारे निकल गये, मै अब तक रो रो हारा॥७॥ धन्य.
महाभाग्य मानुष तन पाया, मान न पीछा छोड़े।
मान महा विष रुप जगत में घोर वेदना जोड़े॥
कैस हो कल्याण प्रभुजी, अब मैं अति घबराया॥८॥ धन्य.
है चैतन्य शिल्पी बाहुबली, तुमको प्रथम दिखायें।
तिल में तेल दूध में घृत ज्यों प्रभु पाषाण समायें॥
नग्न दिगम्बर साधु मुद्रा, ही होती समझाया॥९॥ धन्य.
मुनि दीक्षा ली बार अनंतो, जिन दीक्षा नहिं भायी।
आतम ज्ञान बिना हे ! गुरुवर, सुख की किरण न आयी॥
बाह्यांतर निर्ग्रन्थ बनूं मैं, यह संकल्प समाया॥१०॥ धन्य.
कब अपूर्व अवसर यह आवे, चेतन रस में डोलूं।
शुद्ध उपयोगी सन्त बनूं मैं, ज्ञान सुधारस घोलूं।
होवे दशा तुम्हारी जैसी, सहज भाव रंग लाया॥११॥
धन्य-धन्य निर्ग्रंथ मुनिश्वर, दर्शन तेरा पाया।
ॐ ह्रीं श्रीनेमिचंद्र- मुनिवरेभ्यो अनर्घ्य पद प्राप्तये महार्घ्य निर्व. स्वाहा॥
(दोहा)
श्रवणबेलगोला अहो! तीरथ महा पुनीत।
वंदु बाहुबली प्रभो जयवन्तो जयईश॥
(परिपुष्पांजलिं क्षिपेत्)
अर्घ्यावली
सुद्धस्स य णिव्वाणं सोच्चिय सिद्धो णमो तस्स।
सुद्धस्स य सामण्णं भणियं सुद्धस्स दंसणं णाणं॥
( रोला )
शुध उपयोगी सन्त धन्य मुनिराज हमारे।
शुध उपयोगी सन्त तुम्ही भवि तारणहारे॥
रत्नत्रय के धनी धर्म के मर्म बताते।
खुद रहते निर्भर, जगत निर्भर बनाते॥
ऐसे साधु मुनिवर के गुण कैसे गाऊँ।
भक्ति करे वाचाल मौन भी न रह पाऊँ।
ॐ ह्रीं श्री समस्त शुद्धोपयोगी- मुनिवरेभ्यो नमः अनर्घ्य निर्व. स्वाहा॥
मुनिवरों का सुख
तत्सुखं न देव राजस्य, न सुखं चक्रवर्तिनः।
यत्सुखं वीतरागस्य मुनेरेकांत वासिनः॥
(रोला)
रत्नत्रय के धनी धन्य मुनिराज हमारे।
सतत स्वानुभव रस पीते आनंद सदा रे॥
पराधीन सपनेहूँ सुख नाहि, ज्ञान कराते।
सहज सदा स्वाधीन सौख्य पीते-पिलवाते॥
बाहर हो अंधियारा भीतर ज्ञान उजारा।
बाहर दीखे मलिन देह भीतर शुचि धारा॥
धन्य धन्य मुनिराज, मग्न निज चेतन माहि
आनंद अपरम्पार कह सकें कोऊ नाहि॥
ॐ ह्रीं श्री रत्नत्रयधारी समस्त मुनिवरेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
तीन कम नौ करोड मुनिराजो का अर्घ्य
(रोला)
भक्ति भाव से अर्घ्य लिये आया प्रभु द्वारे।
शत इन्दो से वंदित प्रभुवर धन्य हमारे॥
नाथ कहूँ क्या कथा आप सब जानत ज्ञानी।
जग प्रपंच में पड़ा कभी नहिं महिमा जानी॥
महामोह वश दीन हीन भव-भव भटकाया।
दिव्य ध्वनि तो सुनी मगर सरधान न लाया॥
आज आपकी शरण मिली, अति आनंद पाया।
प्रभो आपने ज्ञायक हूँ भगवान दिखाया॥
जयवन्तों मुनिराज धन्य पौरुष है थारा।
महाअर्घ्य से पद अनर्घ पाऊँ शिव द्वारा॥
ॐ ह्रीं श्री तीन कम नौ करोड मुनिवरेभ्यो अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
मुनीश्वर-भक्ति
(तर्ज- जब मुनिवर आते है, वैराग्य जगाते है …)
जो तीरथ आते है, सौभाग्य जगाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य सजाते हैं॥
जिन मंदिर में जिनवर, तन मंदिर में मुनिवर।
बस ज्ञान ध्यान में ही, नित मग्न रहें गुरुवर॥
बिन बोले मुद्रा से, शिव पंथ दिखाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य जगाते है॥१॥
हीरा घन चोटों को, हंसते-हंसते सहता।
जो अग्नि संग करे, वो लोहे संग पिटता॥
बस भेदविज्ञानी ही, आनंद मनाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य जगाते है॥२॥
भगवन्तौ की वाणी, भव्यो को सुखदानी।
जब जो होना निश्चित, कहते केवलज्ञानी॥
निश्चित मुनीश्वर ही,निश्चित बनाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य जगाते है॥३॥
षट द्रव्य मयी दुनिया यह अकृत नगरी हैं।
कर्ता-धर्ता न कोइ, सृष्टि अति संदुर हैं॥
ज्ञाता-दृष्टा प्राणी, ही शिव सुख पाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य जगाते है॥४॥
जैसे पर के धन से, कोई धनी नहिं होता।
वैसे से ही ज्ञेयों से, कोइ ज्ञानी नहिं होता॥
विषयाभिलाषी प्राणी, भव-भव दुःख पाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य जगाते हैं॥५॥
लहराता है जिनके, समता सागर सत्वर।
नहिं शत्रु-मित्र दीखे, समरस झरता निर्झर॥
चलते फिरते तीरथ, सिद्धों से दिखाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य जगाते हैं॥६॥
सम्मेदशिखर पावन, चम्पापुर, पावापुर।
कैलाशशिखर वंदु, गिरनार तीर्थ मनहर॥
चौबीसो जिनवर को हम शीश झुकाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य जगाते है॥७॥
यह ढाई दीप सारा, मानो सिद्धालय है।
पर्वत गिरि गुफा समुंद्र मुनि वृंद चैत्यालय हैं॥
निर्वाण लिया जिनने, सबको सिर नाते हैं।
यह जीवन धन्य बने, वैराग्य जगाते है॥८॥
ॐ ह्रीं श्री समस्त मुनिवरेभ्यो अनर्घ्य पदप्राप्तये जयमाला महाअर्घ्य निर्व. स्वाहा।
तीर्थ क्षेत्र की वंदना, मन आनंदित होय।
विषय वासना भी गले, जीवन निर्मल होय॥
पुष्पांजलि क्षिपेत्॥
२४ तीर्थंकरों का अर्घ्य
जिन मंदिर समवशरण है, अर वेदी गंध कुटी हैं।
जहां गूंजे दिव्यध्वनि प्रभु, हो जाये मोह कट्टी हैं॥
जिन मंदिर शिक्षालय है, भवतरिणी शिक्षा देते।
जिन मंदिर दीक्षालय है, सारे तनाव हर लेते॥
जिन मंदिर भव्य बनाते साधर्मी लाभ उठातें।
स्वाध्याय गहन मिल करते, कोई कुंदकुंद बन जातें॥
तन मन धन सबसे न्यारा, यह चेतन राम हमारा।
जहां देह नहीं हो अपनी, वहां होगा कोन हमारा॥
सर्वज्ञ वीतरागी प्रभु, सांचे आदर्श हमारें।
कर्ता-धर्ता न कोई है, सुन अहंकार मर जावें॥
भगवान आत्मा जिन ध्वनि, सुन आतम महिमा आती।
सब जीव सिद्ध प्रभु सम हैं, परिणति में समता आती॥
जीव दया धर्म दशलक्षण, भावों में लहराता हैं।
साधर्मी बंधु जनों लख, वात्सल्य उमड़ पडता हैं॥
हो प्रेमभाव जीवों में, गुणिजनो में हर्ष प्रभु हो।
करुणा का स्त्रोत बहे प्रभु बस मुक्ति प्राप्ति की धुन हों॥
कितनी सुंदर जिन प्रतिमा साक्षात प्रभु आये हैं।
महाभाग्य जैनियों के है, ऐसे प्रभु हम पाये हैं॥
वह मूक संदेशा देती, अंतर्मुख प्रभु निहारो।
भगवान आत्मा हो तुम, अनुभव कर मुक्ति सिधारो॥
पौन्नुर मलै का अर्घ्य
( रोला )
कुंदकुंद आचार्य श्री को शत शत वंदन।
गगन विहारी मुनि पुंगव शतगत अभिनंदन॥
परमागम परमामृत रचना, गजब कर गये।
आत्म निधि की विधि बताके धन्य कर गये॥
विरहखला सर्वज्ञ प्रभु हम कहाँ आ गये।
वीतराग सर्वज्ञ दर्श बिन चैन नहीं रे॥
सीमंधर सर्वज्ञ प्रभु आशिष मिल गया।
यही सदेह विदेह गये रे पुण्यफल गया॥
इसी भुमि पर ग्रंथ रचे श्री समयसार जी।
प्रवचनसार जी रचा और पंचास्तिकाय जी॥
भक्ति भाव से सब सन्तों को नमन हमारा।
अर्घ्य चढाऊँ मुक्ति प्राप्त हो आशिष प्यारा॥
सीमंधर जिनदेव जिनालय में पधराये।
कब होगें साक्षात दर्श, यहीं दर्शन पाये॥
ॐ ह्रीं श्री सीमंधरजिनेन्द्राय कुंदकुंद-आचार्यनमः अर्घ्य निर्वपामी स्वाहा।
कृत्रिम अकृत्रिय जिन वंदना अर्घ्य
तीन लोक में जहां जहां, जिन मंदिरजी सुंदर अभिराम।
कृत्रिम और अकृत्रिम, सबही मन वच तन से करूँ प्रणाम॥
उनमें जो जिनबिम्ब विराजे अन्तर्मुखी सौम्य भगवान।
आत्म तत्त्व दरसावन हारे सबको बारम्बार प्रणाम॥
ॐ ह्रीं श्री समस्त कृत्रिम-अकृत्रिम जिन चैत्यालयेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा
जैन बद्री-मूड बद्री का अर्घ्य
(चौपाई)
धवल जिनालय, धवल जिनेन्द्र।
धवल जयधवल- ग्रंथ मुनिन्द्र॥
धवल हुये परिणाम हमारे, धवल मुक्ति मारग भायारे।
ताड़ पत्र पर ग्रंथ रचायें, काटों से अक्षर लिखवाये॥
कितना समय दिया गुरु ज्ञानी, वंदू बार बार जिनवाणी।
स्वाध्याय प्रति दिवस करूँगा, अपना जीवन धन्य करुंगा॥
ॐ ह्रीं श्री समस्त जिनबिम्बेभ्यो द्वादशांग-जिनवाणी अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
धर्मस्थल तीर्थ का अर्घ्य
धर्मस्थल भी अजब-गजब का यहाँ नजारा।
बाहुबली भगवान विराजें अतिशय प्यारा॥
यहाँ हजारों धर्मी जन दर्शन को आते।
बिना खर्च के यहाँ ठहरते भोजन पाते॥
शिक्षा भी निःशुल्क यहाँ का राजा देता।
औषध भी निःशुल्क व्यवस्था राजा करता॥
करो गहन स्वाध्याय समाधि लाभ उठाओ।
रत्नत्रय की प्राप्ति करों, मुनि हो शिव पाओ॥
जिन प्रतिमाएँ जिन मंदिर सबको है वंदन।
अर्घ्य समर्पित करूँ नाथ मेटो भव बंधन॥
ॐ ह्रीं श्री धर्मस्थलस्थित सर्व जिनबिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
कुंदाद्री तीर्थ क्षेत्र का अर्घ्य
(आचार्य कुंदकुंद देवकी समाधि स्थली)
कुंदाद्री पर्वत पर कुंद कुंद मुनि आयें।
यहीं समाधि धारण की, इतिहास बतायें॥
नियमसारजी ग्रंथ रचा निज-हित पाने को।
पाठ किया स्वान्तः सुख भव तिर जाने को॥
ध्रुव की धुन में जमे रमे, प्रभु धन्य हो गए।
समयसार दे भरत क्षेत्र निहाल कर गये॥
भक्ति भाव से अर्घ्य चढाऊँ करूँ वंदना।
शुद्धात्म भगवान आत्म की करूँ साधना॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुंदकुंद देव समाधी स्थलेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
सोनगढ स्थित श्री बाहुबली भगवान का अर्घ्य
(तर्ज:- कुंडलपुर की धुल सिर लगाने आया हूँ )
सोनगढ की साधना भुमि को वंदन है।
बाहुबली भगवान का शत्-शत् अभिनंदन हैं॥
सीमंधर भगवान की मुद्रा ही प्यारी है।
वेदेही भगवान की आत्मा ही न्यारी है॥
मानस्तंभ देखते ही मान गलता है।
परमागम मंदिर से प्रभुवर ज्ञान मिलता है॥
पंचमेरु दर्शन से, निज दर्शन होते हैं।
नंदीश्वर के अर्चन से आनंद झरते हैं॥
समवशरण मंदिर में मन शांत होता है।
कुंदकुंद के दर्शन कर मन नाच उठता है॥
गूंजती गुरुदेव की जहाँ वाणी प्यारी है।
आत्म के आराधकों की भुमि न्यारी हैं॥
बाहुबली भगवान सोनगढ़ में आये हैं।
साधकों के भाग्य दर्शन देने आये हैं॥
निर्ग्रन्थों मुनियों की मुद्रा कैसी होती हैं।
देखलो दिगम्बर मुद्रा ऐसी होती है॥
ऐसी पावन धूल शिर लगाने आया हूँ।
अपने आतम देव को जगाने आया हूँ॥
श्रवण बेलगोला हो या सोनगढ तीरथ।
बाहुबली तो एक ही हैं शांत श्री मूरत॥
मानो गोम्मटगिरी के बाहुबली ही आये हैं।
हम तो महा भाग्यशाली दर्शन पाये हैं॥
सोनगढ की साधना भूमिको वंदन है।
बाहुबली भगवान का शत्-शत् अभिनंदन हैं॥
ॐ ह्रीं श्री सोनगढ तीर्थक्षेत्र स्थित बाहुबली जिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
महा जयमाला
तीर्थ गोम्मटगिरि तो चालो…२
तीरथ करलो, भाव जगालो कल्मष घो डालो॥टेक॥
यहीं भूमि गौरवशाली, गुरु भद्रबाहु आयें।
चंद्रगुप्त सम्राट मुनिश्वर, पद पा संघ लायें॥
चंद्रगिरी पर्वत पर दोनों ने समाधि पायी।
बाहुबली भगवान दर्शकर मुनि महिमा आयी॥
शांति से मुनिमुद्रा ध्यालो…२
धन्य मुनिश्वर जिन शासन में होते आए हैं।
नग्न दिगम्बर मुद्रा जिनकी आगम गाये है॥
गोम्मटेश बाहुबली प्रतिमा सहस्त्र वर्ष प्राचीन।
निर्विकारी निःस्पृहि परिग्रह बिन होते है मुनि जिन॥
दिगम्बर मुनिमुद्रा ध्यालो …२
कंचन काँच बराबर जिनके महल मशान समान।
शत्रु मित्र की बात कहाँ सब दिखतें है भगवान॥
जिन्हे कंकडो जैसा ही है मणि मुक्ता का ढ़ेर।
जिनका समता धन खरीदने को असमर्थ कुबेर॥
बाहुबली प्रभु से सिख पालो…२
दक्षिण दिशि का महा तीर्थ यह गोमटेश भगवान।
उत्तर में सब सिद्धक्षेत्र है, सम्मेदादि महान॥
वात्सल्य साधर्मी जागे भाव समाये हैं।
साधना सम्यक् मन ध्यालो…२
हे ! चेतन यदि चार गति दुःख से बचना चाहों।
वीतराग मुनि धर्म ग्रहण कर शुद्धात्म ध्यालों॥
निज चैतन्य गुफा में बसते ऐसे महा मुनिश।
प्रचुर स्वसंवेदन आनंद मय तारणहार ऋषिश॥
बाहुबली सा आतम ध्यालो…२
ॐ ह्रीं श्री बाहुबली जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
महाअर्घ्य
पूजों श्री अर्हन्त परम गुरु, दिव्य देशना के दातार।
पूजों श्री भगवंत सिद्ध सब, साध्य सिद्धि के जो आधार॥
आचार्यों की करूँ अर्चना, धर्म स्वरुपाचरण धरूँ।
उपाध्याय पाठक पद पूजूँ, स्वाध्याय बिन नही रहूँ॥
ज्ञान ध्यान वैराग्य मूर्ति के, धारी सभी साधु भगवान।
जिनवाणी कल्याणी माता, पढूं अनुभवूं आनंद खान॥
तीन लोक के सभी अकृत्रिम, कृत्रिम चैत्यालय वंदूँ।
उनमें जो जिन बिंब विराजे, सबको शत्-शत् अभिनंदूँ॥
विद्यमान तीर्थंकर बीसों, वंदूँ वैदेही भगवान।
चौबीसी तीर्थंकर वंदूँ महामहिम जो धर्म निधान॥
दशलक्षण रत्नत्रय पूजों, सोलहकारण पर्व महान।
जल-थल-नभ में जहाँ जहाँ हो, वंदूँ वीतराग भगवान॥
शाश्वत सिद्ध क्षेत्र सम्मेदाचल, पूजों अतिशय जिन वर क्षेत्र।
पावापुर, चंपापुर, श्री कैलाश और गिरनार विशेष॥
( दोहा )
जल-फलादि वसु द्रव्य ले, अनुपम अर्घ्य बनाय।
सर्व पूज्य पद पूजहों, भक्ति भाव उर लाय॥
ॐ ह्रीं श्री अरहन्तसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो, द्वादशांगजिनवाणीभ्यो.
उत्तमक्षमादिदशलक्षणधर्माय, दर्शनविशुद्धियादिषोडशकारणेभ्यो, सम्यग्दर्शनज्ञान
चारित्रेभ्यो, त्रिलोकसम्बन्धिकृत्रिमाकृत्रिमजिनचैत्यालयेभ्यो, पंचमेरौ, अशीतिचैत्यालयेभ्यो,
नन्दीश्वरद्वीपस्थद्विपंचाशज्जिनालयेभ्यो, श्री सम्मेदशिखर, गिरनारगिरि, कैलाशगिरि,
चम्पापुर, पावापुर आदि सिद्धक्षेत्रेभ्यो, समस्त अतिशयक्षेत्रेभ्यो, विदेहक्षेत्रेस्थित
सीमंधरादिविद्यमानविंशतितीर्थंकरेभ्यो, ऋषभदिचतुर्विंशतितीर्थंकरेभ्यो, भगवज्जिन
सहस्त्राष्टनामेभ्येश्च अनर्घ्यपदप्राप्तये महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
शांतिपाठ
पूजन विधान हुआ आज जिनराज, वीतरागी देव पाये जागा मेरा भाग॥
मन में प्रसन्नता है खुशियाँ अपार, वीतरागी धर्म से ही पाऊँगा उद्धार॥
नाचे मेरा रोम-रोम नाचे मेरा मोह, श्रद्धा ज्ञान नाचे प्रभु, होवे न बिछोह॥
माता जिनवाणी दे दो मंगल आशीर्वाद, अर्हन्त देव जैसा पाऊँ आह्लाद॥
मुनि दशा प्यारी लागे, प्यारा जिनधर्म, चार गति में न रुलूँ पाऊँ शिवशर्म॥
सभी जीवों से हैं मेरी क्षमा साम्यभाव, सभी जीव सुखी होवें प्रभु यही चाव॥
महाशांति पाऊँ प्रभो आया तेरे द्वारा, विश्व शांति पाये प्रभु हैं शांतिदातार॥
॥ पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्॥
विसर्जन
जान में अनजान में जो हुई भूलें हे प्रभों।
क्षमा करिये क्षमा के भंडार तुम ही हो अहों॥
विशुद्धि थोड़ी जगी पूजन भजन में आ गया।
मन बड़ा चंचल मेरा कहाँ भागता फिर रहा॥
पूजन विधि जानूँ नहीं आह्वान भी जानूँ नहीं।
विसर्जन मैं नही जानूँ क्षमा याचूँ हे प्रभों॥
भक्ति भी बनती नही, और मौन भी नही रह सकूँ।
वाचाल हूँ करना क्षमा, पथ वीतरागी चल सकूँ॥
॥ पुष्पाञ्जलिं क्षिपेत्॥
स्रोत: श्री गोम्मटेश्वर बाहुबली मंगलयात्रा (पूजन, स्वाध्याय, भक्ति), पृष्ठ ५० (श्री गोम्मटेश्वर बाहुबली मंगलयात्रा (पूजन, स्वाध्याय, भक्ति) | Shri Gommateshwar Bahubali Mangalyatra)