श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्र पूजन
(स्थापना)
(रोला छंद)
तीर्थंकर की खान अयोध्या का अभिनंदन,
भगवन्तों की शान साधना भूमि वंदन ।।
यह अनादि से तीर्थंकर जनती आई है,
रत्नों की बरसात यहीं होती आई है।
यहीं जिनेश्वर मातायें शुभ स्वप्न देखतीं,
और धन्य जीवन कर लेतीं समकित पातीं ।
चौबीसी में पंच जिनेश्वर यहीं हुये हैं,
ऋषभ अजित अभिनंदन सुमत अनंत हुये हैं ।
महाभाग्य हम सबके पावन भूमि आये,
धन्य हुये हैं नेत्र सभी ने दर्शन पाये ।
हृदय विराजो सभी सिद्ध परमेश पधारो,
मंगलमय जिनधर्म मर्म प्रभु वर दर्शाओ ।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्याजी अतिशय क्षेत्र सर्व जिनसमूह अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(विजया)
प्रभो ज्ञान आनंद मंदिर में सुंदर ।
अन्तरमुखी सौम्य मुद्रा निहारी ।।
निजानंद में केलि करते हो जिनवर,
यही हो दशा आप सम प्रभु हमारी ।
जनम अर मरण दुःख सहते अनंतों,
बहुत काल बीता शरण आज आया ।
करूँ अर्चना आदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ महाभाग्य पाया ।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं
निर्वपामीति …
भवाताप ज्वर वासना डाले डेरा,
भंवर में फंसा दिख रहा न किनारा ।
भरा आत्मा में सहज सुख समुंदर,
सुनी देशना दिव्य तेरे ही द्वारा ।
समझ जाग जाये, ये मन मान जाये,
न भटकूं प्रभु चार गति कष्ट कारा ।
करूँ अर्चना आदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ महाभाग्य पाया ।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो संसारताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति …
अक्षत हो प्रभुवर तुम्ही नाथ जग में,
शरणागतों को भी अक्षत बनाते !
अक्षत अखंडित शुद्धातम है शाश्वत,
दरश करते तेरे दरश आत्म पाते ।
धरूं ध्यान ऐसा प्रभु सम निरंतर,
बहे शांत रस की प्रभो ज्ञानधारा ।
करूँ अर्चना आदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ महाभाग्य पाया ।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो अक्षय पद प्राप्तये अक्षतान्
निर्वपामीति …
प्रभो काम की वासना जीती कैसे ?
सहज शील संयम का लेकर सहारा।
विषय वासना से तड़पता था क्षण-क्षण,
तुम्ही ने दिखाया ये मंदिर हमारा ।
विषय भोग लगते प्रभू क्यों सुहाने ।
सदा ये ही जीते मैं क्यों इनसे हारा ।।
करूँ अर्चना आदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ महाभाग्य पाया ।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो कामकलंक विध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामीति …
क्षुधा देह व्याधि सहे कष्ट चेतन,
है अज्ञान की ये गहल महिमा भारी ।
तृप्ति हुई व्यंजनों से कभी भी क्या ?
अनशन स्वभावी दशा तुमने धारी ।
प्रभो शान्त रसपान करते तुम्हीं हो,
यही शांति पाने शरण तेरी आया ।
करूँ अर्चना आदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ महाभाग्य पाया ।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो क्षुधापीड़ा विनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति …
सहज ज्ञान ज्योति जगे प्रभु हृदय में,
चिनानंद चैतन्य चिन्मय निहारूं ।
महामोह तमहर, प्रभो ज्योति पाउँ ।
न परमाणु पर भी मैं स्वामित्व धारूं ।
प्रभो ज्ञान वैराग्य ऐसा जगा दो,
निजानंद में ही रमे मन हमारा ।
करूँ अर्चनाआदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ महाभाग्य पाया ।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति ..
कर्मों को क्या दोष दूं हे जिनेश्वर,
स्वयं जो किये कर्म फल वैसे पाये ।
अनीति है मेरी मढ़े दोष पर पर,
महन्तपने में स्वयं गोते खाये !
महाजन मुनीश्वर मगन निज में रहते,
वही आत्म वैभव मुझे लागे प्यारा ।
करूँ अर्चना आदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ महाभाग्य पाया !
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो अष्टकर्म विनाशनाय धूपं निर्वपामीति …
महामोक्ष फल आपने नाथ पाया,
भव भव भ्रमण की खतम हुई कहानी ।
महावज्र पौरुष, हुये मुक्त प्रभुवर
यही हो दशा नाथ मेरी सुहानी ।
चहुंगति में चेतन थका भव भ्रमण कर
दिखाया शुद्धातम का शाश्वत सहारा
करूँ अर्चना आदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ महाभाग्य पाया।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो मोक्षफल प्राप्ताय फलं निर्वपामीति…
सजाऊँ प्रभो अर्घ्य आठों दरब ले,
भक्ति तुम्हारी हृदय बस गयी है।
न भटकूंगा संसार में अब कभी भी,
मिले आप प्रभुलब्धि भी पक गयी है
जगेनाथ पुरुषार्थसम्यक् हमारा
नशे कर्म की कालिमा कष्टकारा ।
करूँ अर्चना आदि प्रभु सम सभी की,
अयोध्या जी तीरथ है प्यारा हमारा
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घ्य निर्वपामीति …
जयमाला
(दोहा)
तीर्थंकर भगवंत की, जन्म भूमि सुखधाम ।
सरयू नदी के तीर पर, बसा अयोध्या धाम ।
आत्म तीर्थ आराधना, तीन भुवन में सार ।
हुई सफल शिव साधना, यहीं सहज सुखकार ।
(वीर)
शाश्वत तीरथ धाम अयोध्या, जग में महामहान् है।
तीर्थंकर की खान अयोध्या, तीर्थों की ये शान है ।।
यहां सदा ही महापुरुषजन, लेते आये हैं अवतार ।
आता है सौधर्म इंद्र, धर्मी लेकर सारा परिवारं ।।
कोषाध्यक्ष कुबेर यहां, रत्नों की करता है बरसात ।
जयवंते जिनधर्म हमारा, त्रिभुवन व्यापी अति आल्हाद ।।
ऋषभ अजित अभिनंदन भगवन, सुमत अनंतनाथ प्रभुवर ।
पांचों तीर्थंकर यहीं जन्मे, भाग्य विधाता शिव सुखकर
भरत प्रथम चक्री वैरागी, षटखंडाधिपति शासन ।।
बाहुबली से कामदेव , यहीं विरक्त हुए भगवन ।
रघुकुल भूषण रामचंद्र दशरथ नंदन जग को भाये ।
अष्टम थे बलभद्र आप लक्ष्मण से नारायण पाये ।
सीता जैसी महासती भी यहीं कभी विचरी आयीं ।।
चरम शरीरी लवकुश जन्मे, पावागढ से मुक्त हुये ।।
अग्नि परीक्षा सीता सति की देख मुनीश्वर यहीं हुये ।।
बालि महाबलि मुनि वन्दूं, वन्दू हनूमान भगवान् ।
और अनंतों महापुरुषों से शोभित हुई यह भूमि महान्
दर्शाया भगवान् आत्मा, इसकी महिमा है न्यारी ।
भव्य जीव अनुभव करते हैं, बन जाते शिव अधिकारी ।
अहो जीवराजा कहकर ही सन्त हमारे जगा रहे ।।
महामोह से हमें जगाने, दिव्य देशना सुना रहे ।
भेद ज्ञान की महिमा अनुपम भव सागर लगता खारा ।
आतम अनुभव रस जल मीठा भव सागर तारणहारा।
आनंदमय निज अनुभूति से महामोह करके परिहार ।।
पर ममत्व पर भाव तजूं में पर कर्तृत्व तजूं दुखकार ।
सहज परिणमन होता भासे, ऐसा हो प्रभु सम्यग्ज्ञान ।
कुछ भी इष्ट अनिष्ट न भासे, तजूं मोह माया दुखखान।
भाउं मैं निर्ग्रन्थ भावना, कब मुनि बन वन वन विचरूं।
करूँ निर्जरा सब कर्मों की समता धर शिवनारि वरूं ।।
सिद्धालय में आप विराजे, भवनालय से मुक्त हुये !
अपने पास बुला लो भगवन, यही भक्ति भव पार करे।
ॐ ह्रीं श्री अयोध्या अतिशय क्षेत्रेभ्यो अनर्घपद प्राप्ताय जयमाला महार्घ्य
निर्वपामीति …
(दोहा)
शुद्धातम को साधकर, तिरे अनंतों धीर ।।
ज्ञान ध्यान वैराग्य ही, तरणी दो गंभीर
पुष्पाजलिं क्षिपेत्
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन
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