श्री अष्टान्हिका पर्व पूजन
आया पर्व अठाई महान्, भक्ति भावों से करें गुणगान ।
आनंद रस झरता है, आनंद रस झरता है।
आठमों द्वीप देव नंदीश्वर आय के, सारा परिवार करे पूजन हर्षाय के
झूमें नाचें गायें गुणगान-झूमें नाचें गायें गुणगान आनंद रस झरता है …
नंदीश्वर मंदिर में शाश्वत भगवान् हैं, उपशम रस बरसाती प्रतिमा अभिराम है।
दर्श करते होवे सम्यग्ज्ञान, आनंद रस झरता है।
पर्वों में बड़ा पर्व यही कहलात है, भक्ति में देवों के हृदय उलसात हैं ।
हम भी कब पावें समकित महान्, आनंद रस झरता है ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमा समूह अत्र
अवतर अवतर संवौषट । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापन । अत्र मम
सन्निहितौ भव-भव वषट् सन्निधिकरणं… ।।
गीतिका छन्द
चैतन्य में ही मग्न हो, चैतन्य दर्शाती अहो।
ऐसी अलौकिक जैन शासन, में ही जिन मुद्रा विभो ।।
द्वीप नंदीश्वर जिनालय, की करूँ नित वंदना ।
जजूं अति उल्लास से प्रभु फेर हो न आवना ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
बाह्य दर्शन तो अनंते, वार हम सबने किये।
ऐसा ही प्रभु मैं भी हूँ, यह भाव ही भव तप हरे ॥
द्वीप नंदीश्वर जिनालय की करूँ मैं वंदना ।
जजूं अति उल्लास सो प्रभु फेर हो न आवना ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो भवआताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति स्वाहा ।।
गंवाया जीवन सदा धनधान्य संग्रह में वृथा ।
छोड़ चल देते हैं या मैं ही हो जाता विदा ।।
द्वीप नंदीश्वर जिनालय की करूँ नित्य वंदना ।
जजूं अति उल्लास सो प्रभु फेर हो न आवना ।।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति स्वाहा ।।
ब्रह्मदत्त सुभौम चक्री भी न तृप्ति पा सके।
कामिनी कंचन के मोही, को न जिन शासन रूचे ॥
द्वीप नंदीश्वर जिनालय की करूँ मैं वंदना ।
जजूं हर्ष उछाह सों प्रभु, फेर हो न आवना ॥
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो कामबाणविनाशनाय पुष्पं निर्वपामीति स्वाहा ।।
पंच इन्द्रिय विषय सेवन, वश किये घनघोर पाप।
समता रस स्वादी जिनेश्वर बिना व्यंजन तृप्त आप ॥
द्वीप नंदीश्वर जिनालय की, करूँ मैं वंदना ॥
जजूं हर्ष उछाह सों प्रभु, फेर हो न आवना ॥
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
इन्द्र भूति ब्राह्मण से बन भये गणधर प्रभो ।
गल गया सब मान सारा, देव दर्शन से अहो ।।
द्वीप नंदीश्वर जिनालय की करूँ मैं वंदना।
जजूं हर्ष उछाह सों प्रभु, फेर हो न आवना ॥
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
आनंदमय आराधना से, ध्यान की अग्नि जले ॥
परणति अन्तर, ढले प्रभु, धर्म समता मय झरे ॥
द्वीप नंदीश्वर जिनालय की करूँ मैं वंदना ।
जजूं हर्ष उछाह सों प्रभु, फेर हो न आवना ॥
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो अष्टकर्मविनाशनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।।
सिद्ध पद की प्राप्ति होवे एक ही यह ही भावना।
इन्द्र चकी आदि वैभव की न होवे कामना ।।
द्वीप नंदीश्वर जिनालय की करूँ मैं वंदना।
जजू हर्ष उछाह सों प्रभु, फेर हो न आवना ॥
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो मोक्षफलप्राप्तय फलं निर्वपामीति स्वाहा ।।
भक्ति भावों में भरा यह अर्घ मैं लाया प्रभो ।
आपकी हो छत्र छाया, साधना साधू 'अहो ॥
अकृत्रिम जिनभवन वंदो, अकृत्रिम जिनवर सभी ।
शांति दाता शांति पाऊँ, बुला लो अपने समीप
द्वीप नंदीश्वर जिनालय की करूँ मैं वंदना।
ज जूँ हर्ष उल्लास सों प्रभु फेर हो न आवना।
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे द्विपंचास जिनालयस्थ जिन प्रतिमाभ्यो अनर्घपद प्राप्तये अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।।
जयमाला
द्वीप नंदीश्वर हो आऊँ, द्वीप नंदीश्वर हो आऊँ।
जा न सकूं तो यहीं भावना जाने की भाऊँ ॥
अष्टम द्वीप श्री नंदीश्वर, महामहिम मनुहार ।
पर्व अष्टाह्निक देव वंदना, करते हर्ष अपार ॥
पद्मासन जिनबिम्ब रत्नमय अकृत्रिम अविकार ।
मानो प्रभु अर्हन्त विराजै, साक्षात् सुखकार॥
दर्शकर समता प्रगटाऊँ, दर्शकर समता प्रगटाऊँ।
जा न सकूं तो यहीं, भावना जाने की भाऊँ ॥
चारों दिशि में एक-एक, पर्वत अंजन अभिराम।
बिम्ब एक सौ आठ रत्नमय, शोभे सहज ललाम।
चारों दिशि में चार चार, दधिमुख पर्वत सुन्दर।
आठ आठ रतिकर पर्वत, जिन मंदिर अगम अधार ॥
दर्शकर आत्मशांति पाऊँ, …।
जा न सकूँ तो यहीं, भावना जाने की भाऊँ ॥
एक एक दिश में तेरह तेरह, मंदिर शोभें।
महामनोहर जिन-दर्शन कर, सुर हर्षित होवे।
कार्तिक फाल्गुन ऽषाढ़ माह में, आता पर्व महान् ।
हर्षित हो जाते हैं भविजन, करें आत्म-कल्याण ॥ द्वीप. ॥
जा न सकूँ तो यहीं भावना, जाने की भाऊँ ॥
मानुषोत्तर के पार गमन नहिं, कैसे आऊँ पास ।
भाऊँ यहीं भावना भगवन्, जागा अति उल्लास ॥
वैसी ही रचना बनवाऊँ, भरत क्षेत्र में नेक।
सिद्धचक्र मंडल विधान रचवाऊँ वर्ष प्रत्येक ।
सिद्ध प्रभु - भक्ति हृदय लाऊँ ।
जा न सकूँ तो यहीं, भावना जाने की भाऊँ ॥
जैसे बिम्ब अकृत्रिम अनुपम, वैसा ही निज देव ।
अन्तर्मुख दृष्टि हो जाती, दर्शत ही स्वयमेव ॥
सूर्य-चन्द्र की ज्योति फीकी, पड़ जाती हे देव ॥
किससे करूँ आपकी तुलना, मेट्यो राग-कुटेव ॥
सिद्धों - सी समता प्रगटाऊँ, …।
हास्य नहीं पर अति प्रसन्न, मुद्रा मनहर शोभे ।
मानो बोल रही हो हमसे, तेरा प्रभु तू है॥
कैसी सुन्दर जिन-प्रतिमा है, कैसा सुन्दर रूप
जिसे देखते मोह भागता, दिखता आत्म स्वरूप ॥
ऐसे प्रभु दर्शन कब पाऊँ, … ।
जा न सकूँ तो यहीं भावना, जाने की भाऊँ ॥
ॐ ह्रीं श्री नंदीश्वर द्वीपे पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण दिशः स्थित
सर्वजिन-बिम्बेभ्यो अर्घ्यं निर्वपामिति स्वाहा।
नंदीश्वर जिनधाम, अकृत्रिम आंनदमय।
जागे आत्मज्ञान, वंदन भव-बंधन हरे ॥
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन