श्री अरनाथ जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Aranath Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री अरनाथ जिन पूजन

जय जय श्री अरनाथ जिनेश्वर परमेश्वर अरि कर्मजयी ।
अमल अतुल अविकल अविनाशी प्रभु अनंत गुणधर्ममयी ।।
अष्टा-दशम तीर्थंकर जिन वीतराग विज्ञानमयी ।
सकल लोक के ज्ञाता दृष्टा निजानन्द रस ध्यानमयी ।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर-अवतर संवौषट ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ । ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्र अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट ।

परम अहिंसामयी धर्म शुचिमय पावन जल लाऊँ ।
षटकायक की दया पालकर निज की दया निभाऊँ ।।
श्री अरनाथ चरण चिह्नों पर चलकर शिवपद पाऊँ ।
सुदृढ भक्ति नोका पर चढकर भवसागर तर जाऊँ ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि ।

परम सत्यमय धर्म ग्रहणकर शीतल चन्दन लाऊँ ।
परद्रव्यों से राग तोडकर निज की प्रीति जगाऊँ ।।श्री अरनाथ।।२ ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय संसारतापविनाशनायचंदन नि ।

परम अचौर्यमयी स्वधर्म के उज्ज्वल अक्षत लाऊँ ।
पर पदार्थ से ममता छोडूँ निज से ममत बढाऊँ ।।श्रीअरनाथ।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षत नि ।

परमशील निज ब्रह्मचर्य मय धर्म कुसुम उरलाऊँ ।
शुद्ध स्वरूपाचरण भव्य चारित्र किरण प्रगटाऊँ ।।श्री अरनाथ।।४ ।।

व्रत संयम बाहयोपचार है ज्ञान क्रिया अन्तर उपचार ।
मान और सम्मान हलाहल विष सम इसे न कर स्वीकार ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।

परमधर्म अपरिग्रह मय आकिंचन चरू लाऊँ ।
परद्रव्यों से मूर्छा त्यागूँ निज स्वभाव में आऊँ ।।श्री अरनाथ।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय, नैवेद्य नि ।

परम धर्म सम्यक्त्व मयी दीपक की ज्योति जलाऊँ ।
स्वपर प्रकाशक भेदज्ञान से चिर मिथ्यात्त्व भगाऊँ ।।श्री अरनाथ।।६ ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि ।

परम ज्ञानमय धर्म धूप ले शुक्ल ध्यान कब ध्याऊँ ।
अष्टम गुणस्थान पा श्रेणी चढ घातियानशाऊँ ।।श्री अरनाथ।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूप नि ।

यथाख्यात चारित्र प्राप्तकर मोहक्षीण थल पाऊँ ।
सकल निकल परमातम बनकर परम मोक्ष फलपाऊँ ।।श्री अरनाथ।।८ ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्ताय फल नि

परम धर्ममय रत्नत्रय पथ पाऊँ अर्घ चढाऊँ ।
निज स्वरूप सौन्दर्य प्रगटकर अनर्घपद पाऊँ ।।श्री अरनाथ।।९ ।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्ताय अर्घ्य नि ।

श्री पंच कल्याणक

फागुन शुक्ला तृतिया के दिन अपराजित तजकर आए ।
मंगल सोलह स्वप्न मात मित्रादेवी को दर्शाए ।।
नगर हस्तिनापुर के अधिपति नृपति सुदर्शन हर्षाए ।
धनपति रत्नों की वर्षाकर अरहनाथ के गुण गाए ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय फाल्गुन शुक्ल तृतीया गर्भ कल्याणक प्राप्ताय अर्घ्य नि ।

मगसिर शुक्ला चतुर्दशी को अरनाथ जग में आए ।
मेरु सुदर्शन पांडुक वन में पांडुक शिला, देव भाए ।।
एक चार वसुयोजन स्वर्णकलश इकसहस्त्र आठ लाए ।
क्षीरोदधि सागर के जल से इन्द्र नव्हन कर हर्षाए ।।२।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय मगसिर शुक्ल चतुर्थ्यां जन्म कल्याण प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

मगसिर शुक्ला दशमी के दिन तप कल्याण हुआ अनुपम ।
लौकातिक देवों ने आ प्रभु का वैराग्य किया दृढतम ।।
चक्रवर्ति पद त्याग श्री अरनाथ स्वयं दीक्षा धारी ।
सब सिद्धों को वन्दन करके मौन तपस्या स्वीकारी ।।३।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय मगसिर शुक्लादश्यां तप कल्याणक प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

कार्तिक शुक्ल द्वादशी प्रभु ने केवलज्ञान लब्धि पाई ।
छयालीस गुण सहित पूज्य अरहंत स्वपदवी प्रगटाई ।।
समवशरण की ऋद्धि हुई तीर्थंकर प्रकृति उदय आई ।
अष्ट प्रातिहार्यों की छवि लख जग ने प्रभु महिमा गाई ।।४।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय कार्तिकशुक्लद्वादश्यां ज्ञानकल्याणक प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

चैत्र मास की कृष्ण अमावस्या को योग अभाव किया ’
अष्ट कर्म से रहित अवस्था पा निज पूर्ण स्वभाव लिया ।।
नाटक कूट शैल सम्मेदाचल से पद निर्वाण लिया ।
इन्द्रादिक ने श्री अरजिन का भव्य मोक्ष कल्याण किया ।।५।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय चैत्र कृष्ण अमावस्यायां मोक्षकल्याण प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

जयमाला

अष्टादशम तीर्थंकर प्रभु अरहनाथ को करूँ नमन ।
सप्तम चक्री कामदेव चौदहवें अधिपति को वन्दन ।।१।।

मेघ विलय लख तुमको स्वामी पलभर में वैराग्य हुआ ।
गए सहेतुक वन में प्रभुवर दीक्षा से अनुराग हुआ ।।२।।

हानि लाभ यश अपयश दुख सुख में समता का गीत सुहाए ।
राग द्वेष से विमुख बने तो नर पर्याय सफल हो जाए ।।
सोलह वर्ष रहे छदमस्थ और फिर पाया केवलज्ञान ।
दिव्यध्वनि द्वारा जग के जीवों का किया परम कल्याण ।।३।।

गणधर थे प्रभु तीस मुख्य जिनमें थे श्री कुन्थु गणधर ।
प्रमुख आर्यिका श्री कुन्थुसेना थी समवशरण सुन्दर ।।४।।

मैं भी प्रभु उपदेश आपका निज अन्तर में ग्रहण करूँ ।
तत्त्व प्रतीति जगे मन मेरे आत्मरुप चिंतवन करूँ ।।५।।

अनन्तानुबन्धी अभाव कर दर्शन मोह अभाव करूँ ।
चौथे गुणस्थान को पाऊँ समकित अंगीकार करूँ ।।६।।

अप्रत्याख्यानावरणी हर एकदेश व्रत ग्रहण करूँ ।
पंचम गुणस्थान को पाकर विशुद्धि की वृद्धि करूँ ।।७।।

प्रत्याख्यानावरण विनाशु मैं मुनिपद को स्वीकार करूँ ।
छठा सातवाँ गुणस्थान पा पंच महाव्रत को धारूँ ।।८।।

अष्टम गुणस्थान श्रेणीचढ शुक्ल ध्यानमय ध्यान धरूँ ।
तीव्र निर्जरा द्वारा मैं प्रभु घातिकर्म अवसान करूँ ।।९।।

करु संज्वलन का अभाव चारित्र मोह का नाश करूँ ।
यथाख्यात चारित्र प्राप्तकर निज कैवल्य प्रकाश करूँ ।।१०।।

हो सयोग केवली अनन्त चतुष्टय का वैभव पाऊँ ।
लोकालोक ज्ञान में झलके निज सर्वज्ञ स्वपद पाऊँ ।।११।।

हो अयोग केवली प्रकृति पच्चीसी का भी नाश करूँ ।
उर्ध्वलोक में गमन करूँ निज सिद्धस्वरुप प्रकाश करूँ ।।१२।।

सादि अनंत स्वपद को पाकर सिद्धालय में वास करूँ ।
इसप्रकार क्रमक्रम से अपना मोक्षस्वरुप विकास करूँ ।।१३।।

जिस प्रकार अरनाथ देव तुम तीन लोक के भूप हुए ।
निज स्वभाव के साधन द्वारा मुक्ति भूप चिद्रूप हुए ।।१४।।

उस प्रकार मैं भी अपना पुरुषार्थ जगाऊँ वह बल दो ।
रत्नत्रय पथ पर आ जाऊँ इस पूजन का यह फल हो ।।१५।।

ॐ ह्रीं श्री अरनाथ जिनेन्द्राय पूर्णार्घ्यं नि स्वाहा ।

भोगों को परिसीमित करने अनासक्ति के भाव जगा ।
वीतरागता का फल पाने को विराग के बीज उगा ।।
मीन चिह्न शोभित चरण अरहनाथ उरधार ।
मन वच तन जो पूजते हो जाते भव पार ।।

इत्याशीर्वाद

जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्री अरहनाथ तीर्थंकरेभ्यो नम


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ २४२ से २४६