महाभाग्य से दर्शन पाया, प्रभु अनन्त अम्लान।
तुम्हें देखते दीखे अपना, आतम देव महान् ॥१॥
अमृतमय है परम अलौकिक, परमानन्द की खान।
परम पारिणामिक ध्रुव ज्ञायक, है शाश्वत भगवान् ॥२॥
ज्ञायक आश्रय से ही प्रगटे, रत्नत्रय अम्लान ।
अकृत्रिम परमातम ज्ञायक, अक्षय प्रभुतावान ।।३।।
अपने धर्मों में व्यापक विभु, अद्भुत वैभववान।
है समर्थ निज की रचना में, निज से वीरजवान ॥४॥
ध्रुव मंगल है लोकोत्तम है, अनन्य शरण गुण खान।
सन्मुख आते अहो जिनेश्वर, हुआ सहज श्रद्धान॥५॥
अमृतमय है रूप आपका, अमृतमय परिणाम।
अमृतमय मुद्रा है जिनवर, वचनामृत सुखखान ॥६॥
साँचे देव दिया है प्रभुवर, मुक्ति मार्ग का दान।
हम सम्यक् अनुगामी होकर, करें स्व-पर कल्याण॥७॥
Artist: रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह