श्री अनन्तनाथ पूजन
(छन्द कवित्त)
पुष्पोत्तर तजि नगर अजुध्या जनम लियो सूर्याउर आय ।
सिंघसेन नृप के नन्दन, आनन्द अशेष भरे जगराय ।।
गुन अनन्त भगवन्त धरे, भवदन्द हरे तुम हे जिनराय ।
थापतु हों त्रय बार उचरिकैं, कृपासिन्धु तिष्ठहु इत आय ।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिन ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् ।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिन ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिन ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् ।
(छन्द गीता तथा हरिगीता)
शुचि नीर निरमल गंगको लैं, कनकभृंग भराइया ।
मल करम धोवन हेत मनवचकाय धार ढराइया ।।
जगपूज परमपुनीत मीत, अनन्त संत सुहावनों ।
शिवकंतवंत महंत ध्यावों, भ्रन्ततंत नशावनों ।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलम् नि० स्वाहा ।
हरिचन्द कदलीनन्द कुंकुम, दन्दताप निकन्द है ।
सब पापरजसंतापभंजन, आपको लखि चन्द है ।।जग०।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय भवतापविनाशनाय चन्दनम् नि० स्वाहा ।
कनशाल दुति उजियाल हीर, हिमालगुलकनितें घनी ।
तसु पुंज तुम पदतर धरत, पद लहत स्वच्छ सुहावनी ।।जग०।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतम् नि० स्वाहा ।
पुष्कर अमरतर जनित वर, अथवा अवर कर लाइया ।
तुम चरनपुष्करतर धरत, सरशूल सकल नशाइया ।।जग०।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय कामबाणविध्वंसनाय पुष्पम् नि० स्वाहा ।
पकवान नैना घ्रानरसना को प्रमोद सुदाय हैं ।
सो ल्याय चरन चढ़ाय रोग, छुधाय नाश कराय हैं ।।जग०।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय क्षुधारोगविनाशनाय नैवेद्यं नि० स्वाहा ।
तममोह भानन जानि आनन्द, आनि सरन गही अबै ।
वर दीप धारों बारि तुमढिग, सुपरज्ञान जु द्यो सबैं ।।जग०।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपम् नि० स्वाहा ।
यह गन्ध चूरि दशांग सुन्दर, धूम्रध्वज में खेय हों ।
वसुकर्म भर्म जराय तुम ढिग, निज सुधातम वेय हों ।।जग०।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अष्टकर्मविध्वंसनाय धूपम् नि० स्वाहा ।
रसथक्क पक्क सुभक्क चक्क, सुहावनें मृदु पावनें ।
फलसार वृन्द अमंद ऐसो, ल्याय पूज रचावनें ।।जग०।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय मोक्षफलप्राप्तये फलम् नि० स्वाहा ।
शुचि नीर चन्दन शालिशंदन, सुमन चरु दीवा धरों ।
अरु धूप जुत मैं अरघ करि, करजोरजुग विनति करों ।।जग०।।
ॐ ह्रीं श्रीअनन्तनाथजिनेन्द्राय अनर्घ्यपदप्राप्तये अर्घ्यं नि० स्वाहा ।
पञ्चकल्याणक
(छन्द सुन्दरी तथा द्रुतविलम्बित)
असित कातिक एकम भावनों, गरभको दिन सो गिन पावनों ।
किय सची तित चर्चन चावसों, हम जजें इत आनन्द भावसों ।।
ॐ ह्रीं कार्तिक कृष्णैक प्रतिपदायां गर्भमंगलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जनम जेठवदी तिथि द्वादशी, सकल मंगल लोकविषैं लसी ।
हरि जजें गिरिराज समाजतें, हम जजें इत आतम लाजतें ।।
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णद्वादश्यां जन्ममङ्गलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
भवशरीर विनश्वर भाइयो, असित जेठदुवादशि गाइयो ।
सकल इन्द्र जजे तित आइकें, हम जजें इत मंगल गाइकें ।।
ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णद्वादश्यां तपोमङ्गलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
असित चैत अमावसको सही, परम केवलज्ञान जग्यो कही ।
लही समोसृत धर्म धुरंधरो, हम समर्चत विघ्न सबै हरो ।।
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णामावस्यायां ज्ञानमङ्गलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
असित चैत अमावस गाइयो, अघतघाति हने शिव पाइयो ।
गिर समेद जजे हरि आयकें, हम जजें पद प्रीति लगाइकें ।।
ॐ ह्रीं चैत्रकृष्णामावस्यायां मोक्षमङ्गलमण्डिताय श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
जयमाला
(छन्द दोहा)
तुम गुण वरनन येम जिम, खंविहाय करमान ।
तथा मेदिनी पदनिकरि, कीनों चहत प्रमान ।।
जय अनन्त रवि भव्यमन, जलज वृन्द विहसाय ।
सुमति कोक तियथोक सुख, वृद्ध कियो जिनराय ।।
(छन्द नयमालनी, चंडी तथा तामरस)
जै अनन्त गुनवंत नमस्ते, शुद्ध ध्येय नित सन्त नमस्ते ।
लोकालोक विलोक नमस्ते, चिन्मूरत गुनथोक नमस्ते ।।
रत्नत्रयधर धीर नमस्ते, करमशत्रु करि वीर नमस्ते ।
चार अनन्त महन्त नमस्ते, जय जय शिवतियकंत नमस्ते ।।
पञ्चाचार विचार नमस्ते, पञ्च कर्ण मदार नमस्ते ।
पञ्च पराव्रत-चूर नमस्ते, पञ्चमगति सुखपूर नमस्ते ।।
पञ्चलब्धि-धरनेश नमस्ते, पञ्च भाव सिद्धेश नमस्ते ।
छहों दरव गुनजान नमस्ते, छहों काल पहिचान नमस्ते ।।
छहों काय रच्छेश नमस्ते, छह सम्यक् उपदेश नमस्ते ।
सप्तविशनवनवह्नी नमस्ते, जय केवल अपरन्हि नमस्ते ।।
सप्ततत्व गुनभनन नमस्ते, सप्त शुभ्रगति हनन नमस्ते ।
सप्तभंग के ईश नमस्ते, सातों नय कथनीश नमस्ते ।।
अष्ट करम मलदल्ल नमस्ते, अष्ट जोग निरशल्ल नमस्ते ।
अष्टम धराधिराज नमस्ते, अष्ट गुननिसिरताज नमस्ते ।।
जय नवकेवल प्राप्त-नमस्ते, नव पदार्थथिति आप्त नमस्ते ।
दशों धरमधरतार नमस्ते, दशों बंधपरिहार नमस्ते ।।
विघ्न महीधर विज्जु नमस्ते, जय ऊरधगतिरिज्जु नमस्ते ।
तन कनकदुति पूर नमस्ते, इख्वाकज गनसूर नमस्ते ।।
धनु पचासतन उच्च नमस्ते, कृपासिधु गुन शुच्च नमस्ते ।
सेही अंग निशंक नमस्ते, चितचकोर मृग अंक नमस्ते ।।
राग-दोष-मदटार नमस्ते, निजविचार दुखहार नमस्ते ।
सुर सुरेश-गन-वृन्द नमस्ते. ‘वृन्द’ करो सुखकन्द नमस्ते ।।
(छन्द घत्तानन्द)
जय जय जिनदेवं सुरकृतसेवं, नित कृतचित्त हुल्लासधरं ।
आपदउद्धारं समतागारं, वीतराग विज्ञानभरं ।।
ॐ ह्रीं श्री अनन्तनाथजिनेन्द्राय महार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा ।
(छन्द मदावलिप्तकपोल तथा रोड़क)
जो जन मनवचकाय लाय, जिन जजैं नेह धर ।
वा अनुमोदन करैं करावै पढ़ै पाठ वर ।।
ताके नित नव होय, सुमंगल आनन्ददाई ।
अनुक्रमतैं निरवान, लहै सामग्री पाई ।।
पुष्पांजलि क्षिपेत, इत्याशीर्वादः ।
रचयिता: कविवर वृन्दावन
स्रोत: बृहज्जिनवाणी संग्रह (चौबीस तीर्थङ्कर पूजन खण्ड), पृष्ठ ३४२ से ३४५