श्री अजितनाथ जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Ajitanath Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री अजितनाथ जिन पूजन

द्वितीय तीर्थंकर जिनस्वामी अजितनाथ प्रभु को वन्दन ।
भाव द्रव्य संयममय मुनि बन किया आत्म का आराधन ।।
पंच महाव्रत धारण करके निज स्वरूप में लीन हुए ।
कर्म नाशकर वीतराग प्रभु स्वयं सिद्ध स्वाधीन हुए ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्र अत्र अवतर अवतर, ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्र , अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ , ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्र अत्रमम् सन्निहितो भव भव वषट् ।

परम पवित्र पुनीत शुद्ध भावना नीर उर में लाऊँ ।
मैं मिथ्यात्व शल्य क्षय करके अजर अमर पद कोपाऊँ ।।
अजितनाथ के चरणाम्बुज पर मैं न्योछावर हो जाऊँ ।
विषय कषाय रहित होकर मैं महामोक्ष पदवी पाऊँ ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जल नि ।

निर्मल शीतल भावपूर्ण शुचिमय चन्दन उर में लाऊँ ।
माया शल्य नाश करके प्रभु भव आतप पर जय पाऊँ ।।अजित।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय संसारताप विनाशनाय चंदनं नि ।

धवल शुद्ध पावन स्वरूप निज भावों के अक्षत लाऊँ ।
शीघ्र निदान शल्य को हरकर निज अक्षय पद कोपाऊँ ।।अजित।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षत नि. ।

आत्म ज्ञान के समयसार मय भाव पुष्प निज में लाऊँ ।
वीतराग सम्यक्त्व प्राप्त कर काम भाव क्षय कर पाऊँ ।।अजित।।४ ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि ।

निज स्वभाव की महिमा आए बिना जीव भ्रमता जाता है ।
पंच परावर्तन के द्वारा ही भवसमुद्र के दुख पाता है । ।
समता के परिपूर्ण सहज नैवेद्य भाव उर में लाऊँ ।
भव भोगों की आकांक्षा हर क्षुधाव्याधि पर जयपाऊँ ।।अजित।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि ।

जगमग जगमग ज्ञान ज्योति मय भाव दीप उर में लाऊँ ।
निज कैवल्य प्रकाशित कर जग अंधकार को हर पाऊँ ।।अजित।।६ ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीपं नि ।

शुद्धातम परिमल सुगंधमय भाव धूप उर में लाऊँ ।
बनूँ ध्यानपति निज स्वभाव से अष्टकर्म हर सुख पाऊँ ।।अजित।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय अष्टकर्म विध्वंसनाय धूपं नि ।

राग देष से रहित वीतरागी भावों के फल लाऊँ ।
निज चैतन्य सिद्ध पद पाकर परममुक्ति शिवमय पाऊँ ।।अजित।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय महामोक्षफल प्राप्तये फल नि ।

अष्ट अंग सह रहित दोष पच्चीस हृदय समकित लाऊँ ।
सहज विशुद्ध अर्घ्य भावों का ले अनर्घ्य पद प्रगटाऊँ ।।अजित।।८ ।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेन्द्राय अनर्घपद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

श्री पंचकल्याणक

विजय विमान त्याग माता विजया देवी उर धन्य किया ।
कृष्ण अमावस ज्येष्ठ मास, साकेतपुरी ने नृत्य किया ।।
देव देवियों ने रत्नों की वर्षा कर आनन्द लिया ।
अजितनाथ तीर्थंकर प्रभु को भाव भक्ति से नमनकिया ।।१।।

ॐ ह्रीं ज्येष्ठकृष्णअमावस्या श्री अजितनाथजिनेन्द्राय गर्भमंगलमण्डिताय अर्घ्यं ।

माघ शुक्ल दशमी को स्वामी नगर अयोध्या जन्मलिया ।
नृप जितशत्रु हर्ष से पुलकित देवों ने आनन्द किया ।।
देव क्षीरसागर जल लाये इन्द्रों ने अभिषेक किया ।
मात पिता को सौंप इन्द्र ने अजितनाथ प्रभु नाम दिया ।।२।।

ॐ ह्रीं श्री माघशुक्लदशम्यां श्री अजितनाथ जिनेन्द्रायजन्ममंगलप्राप्ताय अर्घ्यं ।

आत्म सूर्य के ज्योति पुन्ज से तिमिर रश्मियां हुई विकीर्ण ।
निज स्वरूप लखी होते ही हो जाता भवरस सब क्षीण ।।
माघशुक्ल दशमी को प्रभु ने तपधारण का किया विचार ।
लौकान्तिक ब्रम्हर्षिसुरों ने किया आपका जय जयकार ।।
वन में जाकर तरु सप्तच्छंद नीचे जिन दीक्षाधारी ।
जय जय अजितनाथ देवों ने तप कल्याण किया भारी ।।३।।

ॐ ह्रीं माघशुक्लदशम्यां श्री अजितनाथजिनेन्द्राय तपोमंगलमण्डिताय अर्घ्यं ।

मौन तपस्वी बारह वर्ष रहे छद्मस्थ अजित भगवान् ।
प्रतिमायोग धार कुछदिनमें ध्याया शुक्लध्यानमयध्यान ।।
त्रेसठ कर्म प्रकृतियां नाशी तुमने पाया केवलज्ञान ।
पौष शुक्ल एकादशी को दिया मुक्ति संदेश महान् ।।४।।

ॐ ह्रीं पौषशुक्लएकादश्यां श्री अजितनाथजिनेन्द्राय केवलज्ञान प्राप्ताय अर्घ्यं ।

अ,इ,उ,ऋ,लृ, उच्चारण में लगता है जितना काल ।
उतने में ही कर्म प्रकृतिपिच्चासी का कर क्षय तत्काल ।।
कूट सिद्धवर शिखर शैल से चैत्र शुक्ल पंचमी स्वकाल ।
अजितनाथ ने मोक्ष प्राप्त कर सम्मेदाचलकियानिहाल ।।५।।

ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लपंचम्यां श्री अजितनाथजिनेन्द्राय मोक्षमंगल प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

जयमाला

जयजय अजितनाथ अद्भुतनिधि, अजर अमर अतिसत्यंकर ।
अमल अचल अतिकान्तिमान, अप्रेयात्मा अभयंकर ।।१।।

दीक्षाधर सर्वज्ञ हुए प्रभु जन जन का कल्याण किया ।
रत्नत्रयमय मोक्षमार्ग का ही उपदेश महान् दिया ।।२।।

नब्बे गणधर थे जिनमें थे केसरिसेन मुख्य गणधर ।
प्रमुख आर्यिका श्री “प्रकुब्जा” समवशरण सुन्दरसुखकर ।।३।।

बंध मार्ग केजो कारण है उन सबको प्रभु बतलाया ।
निज स्वभाव का आश्रय लेकर सिद्ध स्वपद को प्रगटाया ।।४।।

मिथ्यातम अविरति प्रमाद कषाय योग बंध के हेतु ।
भव समुद्र से पार उतरने को है रत्नत्रय का सेतु ।।५।।

जो विकल्प है आश्रव युत है निर्विकल्प ही आश्रव हीन ।
जो स्वरूप में थिर रहता है वही ज्ञान है ज्ञान प्रवीण । ।
एकान्त विनय विपरीत और संशय अज्ञान भरा उर में ।
यह गृहीत अरु अगृहीत पाँचों मिथ्यात्व भाव उर में ।।६।।

इनके नाश बिना सम्यकदर्शन हो सकता कभी नहीं ।
मोक्ष मार्ग प्रारम्भ, बिना, समकित के होता कभी नहीं ।।७।।

पृथ्वी वायु वनस्पति जल अरु अग्नि काय की दया नहीं ।
त्रस की हिंसा सदा हुई षटकायक रक्षा हुई नहीं ।।८।।

स्पर्शन रसना घ्रान चक्षुकर्णन्द्रिय वश में हुई नहीं ।
पंचेन्द्रिय के वशीभूत हो मन को वश में किया नहीं ।।९।।

पंचेन्द्रिय अरु क्रोधमान माया लोभादिक चार कषाय ।
भोजन, राज्य, चोर, स्त्री की कथा, चार विकथा दुखदाय ।।१०।।

निद्रा नेह मिलाकर पंद्रह होते आगे अस्सी भेद ।
हैं सैंतीस हजार पाँच सौ इस प्रमाद के पूरे भेद ।।११।।

क्रोधमान माया लोभादिक चार कषाय भेद सोलह ।
नो कषाय मिल भेद हुए पच्चीस बंध के ही उपग्रह ।।१२।।

इनके नाश बिना प्रभु चेतन इस भव वन में अटका है ।
विषय कषाय प्रमादलीन हो चारों गति में भटका है ।।१३।।

मन वच काया तीनयोग ये कर्मबंध के कारण हैं ।
पंद्रह भेद ज्ञान करलो जो भव भव में दुखदारुण हैं ।।१४।।

मनोयोग के चार भेद हैं वचनयोग के भी है चार ।
काय योग के सात भेद है ये सब योग बन्ध के द्वार ।।१५।।

सत्य, असत्य, उभय, अनुभय, ये मनोयोग के चारों भेद ।
सत्य, असत्य, उभय, अनुभय, ये मनोयोग के चारों भेद ।।१६।।

काय योग के सात भेद हैं औदारिक, औदारिकमिश्र ।
वैक्रियक, वैक्रियकमिश्र है, आहारक आहारकमिश्र ।।१७।।

कार्माण है भेद सातवाँ जो जन करते इनका नाश ।
अष्टम वसुधा, सिद्ध स्वपद वे पाते हैं, अविचल अविनाश ।।१८।।

कर्मबंध के ये सब कारण इनको करूँ शीघ्र विध्वंस ।
परम मोक्ष की प्राप्ति करूँ शाश्वत सुख पाए चेतन हंस ।।१९।।

विनय भाव से भक्ति पूर्वक मैंने प्रभु की की है पूजन ।
जब तक शुद्ध स्वरूप न पाऊँ रहूँ आपकी चरणशरण ।।२०।।

ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय पूर्णार्घ्यं नि. स्वाहा ।

गजलक्षण युत अजित पद भाव सहित उरधार ।
मनवचतन जो पूजते वे होते भव पार ।।२१।।

इत्याशीर्वाद

जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्री अजितनाथ जिनेंद्राय नम


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १७५ से १७९