श्री आहारजी सिद्ध क्षेत्र पूजन | Shri Aharji Siddh Kshetra Pujan

श्री आहारजी सिद्ध क्षेत्र पूजन

स्थापना
(चांद्रायण)
श्री आहार जी सिद्ध क्षेत्र पर आइये ।
शांतिनाथ-सी शांति अपूरव पाइये ।।
त्रय चौबीसी प्रभू बहत्तर पूजिये ।
अन्तरमुख मुद्रा लख आनंद लीजिये ।।
मदन कुमार जी कामदेव यहीं मुक्त हुये ।
विषकंवल मुनिनाथ सिद्ध हो शिव गये ।।
महाभाग्य से प्रभु दर्शन हम पा गये ।
हृदय पधारो नाथ भक्ति स्वीकारिये ।।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे श्री शांतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र अवतर अवतर संवौषट्।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे श्री शांतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः ।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे श्री शांतिनाथ जिनेन्द्र ! अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्।
पुष्पांजलिं क्षिपेत्
(वीर छंद)
महा भाग्य प्रभु दर्शन पाये, रोम - रोम में हर्ष अपार ।
प्रीति चित्त से जिनवाणी सुन, जन्म-मरण का हो परिहार ॥
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वन्दूँ शांतिनाथ भगवान ।
श्री आहार जी सिद्ध क्षेत्र पर, सिद्ध समान धरूँ निज ध्यान ॥
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं
निर्वपामीति स्वाहा ।

भव-आताप मिटाने वाली, सच्ची माता जिनवाणी ।
स्व पर विवेक जगाती माता, दुःख मिटाती प्रभु वाणी ॥
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वन्दूँ शांतिनाथ भगवान। श्री आहार जी.।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय भवाताप विनाशनाय चंदनं
निर्वपामीति स्वाहा।

जिनवाणी माँ सदा सुनाती, अक्षत पद की गाथायें ।
संयोगों का नहीं भरोसा, क्षत-विक्षत फल विपदायें ।।
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वन्दूँ शांतिनाथ भगवान । श्री.।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय अक्षयपद प्राप्तये अक्षतं
निर्वपामीति स्वाहा ।
कैसे भोगूं भोग जहर-सम, लगते सुन्दर हैं विद्रूप ।
काम बाण की पीड़ा नाशें, देखूँ सुन्दर शांत स्वरूप ।।
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वन्दूँ शांतिनाथ भगवान ।श्री.।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं
निर्वपामीति स्वाहा ।
शुद्धातम अनुभव रस पीकर, तृप्त रहें मुनिनाथ जिनेन्द्र ।
जड़ रस मुझको भी न सुहावें, ऐसी शक्ति दो आत्मेन्द्र ।।
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वन्दूँ शांतिनाथ भगवान ।श्री.।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं
निर्वपामीति स्वाहा ।
छह द्रव्यों में जीव द्रव्य हूँ, मुझमें है चैतन्य प्रकाश ।
भेदज्ञान-दीपक दाता प्रभु, यही करेगा मोह विनाश ।।
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वन्दूँ शांतिनाथ भगवान । श्री.।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय मोहांधकार विनाशनाय दीपं
निर्वपामीति स्वाहा ।
नाविक-नाव न्याय जैसा ही, कर्मों का हमसे सम्बन्ध ।
जागृत हो तो कर्म कटेंगे, गर प्रमाद तो भ्रमण प्रबंध ॥
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वन्दूँ शांतिनाथ भगवान । श्री.।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वपामीति स्वाहा ।
पाप-पुण्य पर भावों का फल, चार गति दुख ही पाये ।
पाप-पुण्य से भिन्न ज्ञानघन, समझे तो शिव सुख आये ॥
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वन्दूँ शांतिनाथ भगवान ।श्री.।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्तये फलं निर्वपामीति स्वाहा।

अष्ट द्रव्यमय अर्घ्य सजाऊँ, दो अनर्घ पद हे स्वामी ।
धरूँ पंथ निर्ग्रथ दिगम्बर, तुम्ही भवांतक जगनामी ।।
वीतराग सर्वज्ञ जिनेश्वर, वंदूँ शांतिनाथ भगवान ।
श्री आहार जी सिद्ध क्षेत्र पर, सिद्ध समान धरूँ निज ध्यान ॥
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा ।

जयमाला
(दोहा)
तीन लोक के जिन भवन, कृत्रिम अकृत्रिम सर्व ।
विनय सहित वंदन करूँ, तजूँ मान मद गर्व ॥
(वीर छंद)
श्री अहार जी तीर्थ क्षेत्र पर, जिन मंदिर अतिशय अभिराम ।
शांतिनाथ प्रभु यहीं विराजे, शत-शत वंदन करूँ प्रणाम ।।
त्रय चौबीसी जिन प्रतिमायें, अन्तर्मुखी विराज रहीं ।
दर्शन कर अन्तर्मुख होऊँ, फिरे दृष्टि प्रभु भाव यही ।।
हे जिनदेव ! आप बिन जग में, कौन बताये आतमराम ?
बिना आपके कौन बतावे, प्रभुता मेरी महा महान ।।
चक्रवर्ती जैसी विभूति भी, मिली तृप्ति न हो पायी ।
इन्द्रादिक के पद पाये पर, चैन कहीं न दिखलायी ।।
जिसने निज स्वरूप को जाना, उसने शिवपद प्रगटाया ।
जिसने पर से मोह किया, उसने अब तक भवदुख पाया ।।
परभावों की मदिरा पीकर, मैं भी स्वामी भ्रमित हुआ ।
दिव्य ध्वनि जब सुनी प्रीति से, तब मन में अति हर्ष हुआ ।।
छह द्रव्यों में जीव द्रव्य हूँ, आगम में बतलाया है ।
नव तत्त्वों में छुपी हुई, जो ज्योति उसे समझाया है ।।
ज्ञान निरन्तर झरता रहता, ज्ञायक तत्त्व यही भगवान ।
कहाँ खोजता-फिरता चेतन, घर में धनी स्वयं धनवान ।।

सिंह और गजराज जीव भी, अनुभव करके धन्य हुये ।
शिवभूति मुनि जैसे जग में, भेदज्ञान से मुक्त हुये ।।
धन्य - धन्य निर्ग्रथ दिगम्बर, तारण-तरण महान हैं ।
आत्म ध्यान में मग्न सदा, करते अमृत-रस पान हैं ।।
भूतकाल अपराध हुये जो, प्रागभाव से समझूँ भिन्न ।
और वासना भविष्यकाल की, प्रध्वंसा से देखूँ अन्य ।।
गुणग्राही दृष्टि अपनाऊँ, सभी जीव परमात्म स्वरूप ।
एक समय की ही विकृति है, अंदर में शुद्धात्म स्वरूप ।।
पापभाव से द्वेष करूं न, पुण्यभाव से प्रेम नहीं ।
पाप-पुण्य दोनों भावों को, भिन्न गिनूँ बस भाव यही ।।
होनी अनहोनी न होवे, चिंता कभी न मन आवे ।
जैसे बंध बंधे पूरव भव, वैसा ही फल जग पावे ।।
शांति मंत्र श्री शांतिनाथ ने, हमें एक बतलाया है ।
हर प्रसंग में ज्ञाता रहना, धर्म यही समझाया है ।।
मुनि भगवन्तों की आराधना, जीवन में कब आ जावे ।
सिद्ध समान सुपद प्रभु मेरा, और नहीं कुछ मन भावे ।।
देह भिन्न है, राग भिन्न है, होता स्वयं जगत परिणाम ।
दिव्य ध्वनि का सार यही है, मात्र जानना मेरा काम ।।
सिद्ध क्षेत्र भी यही भूमि जहाँ, मुनियों ने निर्वाण लिया ।
धन्य किया मानव जीवन, अर जगती को भी धन्य किया ।।
ॐ ह्रीं श्री आहारजी सिद्धक्षेत्रे शांतिनाथ जिनेन्द्राय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति स्वाहा।
(दोहा)
मंगलमय मंगलकरन, आत्म स्वभाव महान ।
नमहुँ ताहि जातें भये, अरिहंतादि महान ।।
(पुष्पांजलिं क्षिपामि)


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन