अहो आदि स्वामी शरण तेरी आया।
आनन्द मेरे उर न समाया ॥ टेक ॥
पिता नाभिराजा, मरूदेवी माता ।
करम भूमि की आदि में हे विधाता ॥
सहज लोक जीवन भी तुमने सिखाया ॥ अहो.. ॥१॥
निधन देख नीलांजना का हे जिनवर।
अंतर से वैराग्य जागा था सुखकर ॥
अहो देव निर्ग्रन्थ पद अपनाया ॥ अहो.. ॥२॥
इच्छा-निरोधमयी तप सु-कीना।
हने कर्म घाति, अर्हत पद सु-लीना ॥
धर्मतीर्थ भव्यों को प्रभु जी बताया ॥ अहो.. ॥३॥
यही भावना मैं भी जिनमार्ग पाऊँ।
परम ध्येय ध्रुवरूप ज्ञायक सु ध्याऊँ॥
सहज भक्ति से शीश चरणों में नाया ॥ अहो..॥४॥
इन्द्रिय सुखों की न, प्रभु कामना है।
विनाशीक वैभव की, अब चाह ना है॥
शाश्वत विभव मैंने अन्तर में पाया ॥ अहो..॥५॥
Artist: रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह