श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली पूजन | Shri Adinath Bharat Bahubali Pujan

(दोहा)

आदिनाथ को नमन कर, भरत प्रभु को ध्याऊँ।
बाहुबली को सिर झुका, पूजा साथ रचाऊँ॥

(ज्ञानोदय)

आदि प्रवर्तक आदिनाथ ने, पथ दे जीना सिखा दिया।
चक्री भरतदेव ने चक्कर, कर्म चक्र का छुड़ा दिया॥
बाहुबली ने बाहुबली हो, कर्म शत्रु को हरा दिया।
इन्हें विराजित करके मन में, मैंने माथा झुका दिया॥

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रा! अत्र अवतर-अवतर…।

अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठः ठः… । अत्र मम सन्निहितो… । (पुष्पांजलिं…)

आधा जीना आधा मरना, नाथ! यही अभिशाप हरो।
पूरा जीना पूरा मरना, मुझे सिखा दो पाप हरो॥
जनम मरण का मरण करा दो, प्रासुक नीर समर्पित है।
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है॥

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यो जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय जलं…।

क्रोध आग जब क्षमा नीर से, बुझे तभी चित शीतल हो।
आतम बगिया महक उठे फिर, संयम का पथ मंगल हो
क्रोध आग हर क्षमा नीर दो, चंदन तुम्हें समर्पित है।
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है॥

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यः संसारताप-विनाशनाय चंदनं…।

जड़ को चेतन चेतन को जड़, बहिरातम बनके माना।
परमातम अन्तर आतम का, अन्तर अब तक ना जाना
भेद ज्ञान अब मुझे करा दो, तंदुल पुंज समर्पित है।
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यो अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान्… ।

इन पुष्पों ने भगवन् मेरा, चैन छीन बेचैन किया।
काम रोग की व्यथा बढ़ाकर, फिर व्याकुल दिन रैन किया
जिन बनकर मैं काम नशाऊँ, जीवन पुष्प समर्पित है।
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यः कामबाण-विध्वंसनाय पुष्पं…।

भोग मुझे हर समय भोगते, मैं क्या भोगूँ भोगों को।
लेकिन भोगों की इच्छा से, बढ़ा रहा भव रोगों को
ज्ञानामृत दो क्षुधा नशाऊँ, ये नैवेद्य समर्पित है।
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यः क्षुधारोग-विनाशनाय नैवेद्यं…।

सूर्य नाम सुनते ही जग में, अंधकार दादा भागें।
वैसे ही प्रभु नाम सुनें तो, मोह नींद से उठ जागें
आतम का मैं दीप जलाऊँ, प्रभु पद दीप समर्पित है।
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यो मोहान्धकार-विनाशनाय दीपं…।

कब तक मुझको धूप जलाना, तथा धूप में जलना है।
कब चिन्मय सा रूप सजा के, मुक्तिरमा से मिलना है
धूल उड़ा दो मम कर्मों की, अनुपम धूप समर्पित है।
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यो अष्टकर्म-दहनाय धूपं…।

जैसे फल पेड़ों से जुड़कर, बनते सरस मधुर मीठे ।
वैसे मुझको जोड़े रखना, अपने चरणों से नीके
महा मोक्षफल चरण आपके, ये फल जिन्हें समर्पित है।
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यो मोक्षफल-प्राप्तये फलं…।

रत्नों जैसा अर्घ्य न मेरा, सुर छन्दों मय वचन नहीं।
भाव भक्ति भी दिखा न सकता, गुण गाने का यतन नहीं
फिर भी अनर्घ्यपद को पाने, सादर अर्घ्य समर्पित है।**
आदि-भरत प्रभु बाहुबली की, चरण वन्दना अर्चित है।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य…।

जाप्य मंत्र-ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अर्ह श्री त्रयजिनेन्द्राय नमो नमः ।

जयमाला

(दोहा)

आदि-भरत-बाहुबली, प्रथम किए कल्याण।
जिनकी महिमा गीत को, गाऊँ मैं धर ध्यान॥

(ज्ञानोदय)

रोटी कपड़ा मकान को जग, दुखी-दुखी मर मार रहा।
कल्पवृक्ष जब खो बैठा तो, करता हा-हाकार रहा॥
तब आदीश्वर ने शिक्षा दे, भक्तों पर उपकार किया।
कृषी करो या ऋषी बनो ये, भव्यों को उपहार दिया॥१॥

असि मसि आदिक षट्कर्मों का, दिया दिया वरदान दिया।
ब्राह्मी और सुन्दरी दोनों, कन्याओं को ज्ञान दिया॥
प्रजा व्यवस्थित करके तुमने, धारा था वैराग्य महा।
खोले धर्म द्वार इस युग में, आदिम जिनवर बने यहाँ॥२॥

मोक्षमार्ग बतलाया चलके, षट्-आवश्यक भी पाले।
इसीलिए हे पागल मनवा, जिनवर के गुण तू गा ले॥
आदिनाथ के पुत्र भरत जो, बने चक्रवर्ती पहले।
चौथा वर्ण बना के जग में, राज्यों की जय को निकले॥३॥

चक्र चला के जय पाई पर, हुआ न वापिस चक्र जहाँ।
तब गुस्सा आई चक्री को, दुश्मन मेरा कौन यहाँ॥
मेरी जिसे दासता अथवा, ये सत्ता स्वीकार नहीं।
तब पाए लघु भ्राता अपने, जिसने मानी हार नहीं॥४॥

तभी भरतजी बाहुबली को, हार दिलाना ज्यों सोचे।
जल्ल मल्ल फिर दृष्टि युद्ध में, हारे भरत चक्र फेंके॥
परिक्रमा कर चक्र रुका तब, लज्जित हुए भरत हारे।
बाहुबली फिर वैरागी बन, राज-पाट त्यागे सारे॥५॥

एक साल तक उपवासी बन, ध्यान किया उपसर्ग सहा।
लेकिन केवलज्ञान हुआ ना, हाय ! हाय ! यह कर्म कथा॥
भरत भ्रात ने तब जाकर के, जैसे क्षमा याचना की।
बाहुबली निर्विकल्प बने तब, अपनी पूर्ण साधना की॥६॥

केवलज्ञानी बनकर स्वामी, श्री कैलाशधाम पहुँचे।
बाहुबली जी आदिनाथ से, पहले मोक्ष धाम पहुँचे॥
केवलज्ञान शीघ्र उपजा के, भरत बने शिवपुर वासी।
आदिनाथ फिर मोक्ष पधारे, मैं तीनों का पद वासी॥७॥

तीन-तीन प्रभुओं की अर्चा, मैंने साथ रचा डाली।
इसका फल बस इतना पाऊँ, रात दिवस हो दीवाली॥
राग द्वेष औ मोह तीन ये, दोष सभी मम नाथ हरो।
रत्नत्रय से मुझे सजाकर, ‘सुव्रत’ के सब पाप हरो॥८॥

(दोहा)

त्रय योगों को शुद्ध कर, गाए ये गुणगान।
इसके फल से कण्ठ मम, प्रभु से हो स्वरवान॥

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ-भरत-बाहुबली त्रय जिनेन्द्रेभ्यो अनर्घपद-प्राप्तये जयमाला पूर्णार्घ्यं… ।

शान्ति शान्तिधारा करें, करें शान्ति चहुँ ओर।
पुष्पांजलि से हो रहे, भक्त करल के भोर॥

(शान्तये शान्तिधारा…पुष्पांजलिं…)


Artist: मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज
स्रोत: श्री जिनवाणी (पूजन-पाठ संग्रह)