श्री आदिनाथ भरत बाहुबलि जिन पूजन (कवि राजमल पवैया) | Shri Adinath Bharat Bahubali Jin Pujan (Rajmal Pavaiya)

श्री आदिनाथ भरत बाहुबलि जिन पूजन

स्थापना

आदिनाथ प्रभु भरत बाहुबलि स्वामी को सादर वन्दन ।
पिता पुत्र शिवपुरगामी तीनों को सविनय अभिनन्दन ।।
शुद्धज्ञान का आश्रय लेकर निजस्वभाव को किया नमन ।
केवलज्ञान प्रगट कर पाया सहज भाव से मुक्ति सदन ।।
निज चैतन्य राज को ध्याया पापों का परिहार किया ।
निज स्वभाव से मुक्त हुए प्रभु सबने जयजयकार किया ।।
आदिनाथ प्रभु भरत बाहुबलि की पूजन कर हर्षाऊँ ।
निजस्वरुप की प्राप्ति करूँ मैं नित नूतन मंगल गाऊँ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबलि जिनेन्द्र अत्र अवतर संवौषट आहवाहन ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबलि जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठ ठ स्थापनम् ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबलिजिनेन्द्र अत्र मम सन्नि हितो भवभव वषट् सन्नि धिकरणम् ।

भेद ज्ञान की प्राप्ति हेतु मैं करूँ आत्मा का निर्णय ।
सम्यक् जल की भेंट चढाऊँ हो जाऊँ मैं अमर अभय ।।
आदिनाथ प्रभु भरत बाहुबलि की पूजन कर हर्षाऊँ ।
नित स्वरुप की प्राप्ति करूँ मैं नित नूतन मंगल गाऊँ ।।१।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबलि जिनेन्द्राय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जल नि ।

ज्ञानानन्द स्वरूप स्वरस ही पीने का करना पुरुषार्थ ।
मुनि पद पाने का उद्यम करता है सफल सकल परमार्थ ।।
निज स्वभाव रस प्राप्ति हेतु मैं भेदज्ञान का लूँ आधार ।
सम्यक् चन्दन भेंट चढाऊँभव आताप सकल निर वार ।।आदिनाथ।।२ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय संसारताप विनाशनाय चंदन नि ।

स्वपर विवेक जगा अन्तर में अक्षय पद को प्राप्त करूँ ।
सम्यक् अक्षत भेंट चढाऊँवेदनीय दुखत्वरित हरूँ ।।आदिनाथ।।३ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय अक्षय पद प्राप्ताय अक्षत नि ।

कामभाव विध्वंस हेतु मैं शील स्वभाव महान् धरूँ ।
सम्यक् पुष्प भेंट कर स्वामी पर विभाव अवसार करूँ ।।आदिनाथ।।४ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्प नि ।

क्षुधारहित मेरा स्वभाव है इसे नहीं जाना जिनराज ।
सम्यक् चरु की भेंट चढाऊँपाऊँस्वामी निजपद राज ।।आदिनाथ।।५ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेध नि ।

मोहभान्ति के महा शत्रु ने घेरा है मुझको दिनगत ।
सम्यक् दीप चढाकर स्वामी पाऊँमे सम्यक्त्व प्रभात ।।आदिनाथ।।६ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय मोहान्धकार विनाशनाय दीप नि ।

अष्टकर्म के बंधन में पड चारों गति में भरमाया ।
सम्यक् धूप चढाऊँइनके क्षय का अब अवसर आया ।।आदिनाथ।।७ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय अष्टकर्म दहनाय धूप नि ।

भवविषतरु फल खाए अब तक शाश्वत निज स्वभाव को भूल ।
सम्यक् फल अर्पित करके प्रभु हो जाऊँनिज के अनुकूल ।।आदिनाथ।।८ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय मोक्षफल प्राप्ताय फल नि ।

सम्यक् अर्घ्य चढा कर स्वामी पद अनर्घ्य निश्चित पाऊँ ।,
मेरी यही प्रार्थना है प्रभु फिर न लौट भव में आऊँ ।।आदिनाथ।।९ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्य नि ।

अर्घ्यावलि

आदिनाथ को नमन कर बन्दूँ भरत महेश ।
चरण बाहुबलि पूजकर वन्दूँ त्रय परमेश ।।
प्रथक प्रथक त्रय अर्घ्य विनय सहित अर्पण करूँ ।
सकल विकारीभावना करूँ शुद्ध स्वभाव से ।।

श्री आदिनाथजी

ऋषभदेव को नमन करूँ मैं नाभिरायनृप के नंदन ।
मरू देवी के राजदुलारे बारबार तुम्हें वन्दन ।।१।।

तुम सर्वार्थ सिद्धि से आए नगर अयोध्या जन्म लिया ।
इन्द्रादिक सुरनर सबने मिल जन्मोत्सव सानंद किया ।।२।।

नंदा आर सुनंदा से परिणय कर लोकिक सुख पाया ।
नंदा के सो पुत्र सुनंदा ने सुत बाहुबली जाया ।।३।।

नीलान्जना मरण लख तुमने वन में जा वेराग्य लिया ।
ज्येष्ठ पुत्र थे भरत जिन्हें प्रभु तुमने राज्य प्रदान किया ।।४।।

ओपाधिक सारे विकार हर कर्म घाति अवसान किया ।
एक सहस्त्र वर्ष तप करके तुमने केवल्ज्ञान लिया ।।५।।

भरत क्षेत्र के भव्य प्राणियों को निश्चय संदेश दिया ।
खुला मोक्ष पथ जो कि बन्द था आत्म तत्त्व उपदेश दिया ।।६।।

अखिल विश्व में जल थल नभ में प्रभु का जय जयकार हुआ ।
कोटि कोटि जीवों का प्रभु के द्वारा परमोपकार हुआ ।।७।।

मुक्त हुए कैलाश शिखर से प्रतिमा योग किया धारण ।
अष्टकर्म हर शिवपुर पहुँचे जग के हुए तरणतारण ।।८।।

बार बार वन्दन करता हूँ बार बार मैं करूँ नमन ।
बार बार वन्दन करता हूँ तुमकों मैं आदिनाथ भगवान् ।।९।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

मुनिपद तो निग्रन्थ भावना का प्रतीक है शिव सुखकार ।
अंतरंग में तथा बाह्य में नहीं परिग्रह का कुछ भार ।।

श्री भरत जी

भरत चक्रवर्ती की महिमा तीन लोक में है न्यारी ।
छह खण्डों के स्वामी होकर भी प्रभु रहे निर्विकारी ।।१।।

दर्श मोह तो जीत चुके थे पूर्व भवों में ही कर यत्न ।
पर चरित्र मोह जय करने का ही किया महान् प्रयत्न ।।२।।

अनुज बाहुबलि से हारे पर मन में आया नहीं कुभाव ।
वस्तुस्वरूप विचारा प्रभु ने मेरा तो है ज्ञान स्वभाव ।।३।।

नीरक्षीर का था विवेक जल कमल भांति वे रहते थे ।
तेल तोय सम प्रथक प्रथक वे पर भावों से रहते थे ।।४।।

रागद्वेष को जय करने का सदा यत्न वे करते थे ।
सम भावों से हर्ष विषादों को वे पल में हरते थे ।।५।।

लाख तिरासी पूर्व आयु तक भोगे भोग ध्रौव्यविशाल ।
किन्तु लक्ष्य में शुद्ध आत्मा थी जो शाश्वत अटूट त्रिकाल ।।६।।

इसीलिए तो भरत चक्रवर्ती के मन में था उत्साह ।
पर में रहकर पर में भिन्न रहे ऐसा था ज्ञान अथाह ।।७।।

पूर्व भवों में भेद ज्ञान की कला रही थी उनके पास ।
ज्ञाता दृष्टा बनकर भोगे भोग रहे स्वभाव के पास ।।८।।

निज स्वभाव में आते आते ही वैराग्य महान् हुआ ।
ज्ञानपयो निधि रस पीते पीते ही केवल ज्ञान हुआ ।।९।।

यह सब कुछ अन्तमुहूर्त में हुआ भरत जी को तत्काल ।
आत्मज्ञान वैभव का महिमा दिया राग सब त्वरित निकाल ।।१०।।

उनकी ऐसी उत्तम परिणति के पीछे था ज्ञान महान् ।
इसीलिए अन्तमुहूर्त में किए घातिया अरि अवसान ।।११।।

दे उपदेश भव्य जीवों को किया सर्व जग का कल्याण ।
धन्य धन्य हे भरत महाप्रभु इन्द्रादिक गाते गुणगान ।।१२।।

निजानंद रसलीन हुए फिर शेष कर्म भी कर अवसान ।
ऐसे मुनियों के दर्शन कर हृदय कमल खिल जाता है ।
जा अनादि से कभी न पाया वह शिव पथ मिल जाता है ।।
पहुंचे सिद्ध शिला पर स्वामी पाया सिद्ध स्वपद निर्वाण ।।१३।।

यही कला यदि आ जाए प्रभु इस जीवन में अब मेरे ।
फिर न लगाना मुझे पडेगा इस जग के अनन्त फेरे ।।१४।।

ॐ ह्रीं श्री भरत जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

श्री बाहुबलि जी

बाहुबली प्रभु के चरणों में नमन करूँ मैं बार बार ।
राज्य संपदा को तज तप का अवसर पाया भली प्रकार ।।१।।

छह खण्डों के विजयी भरत चक्रवर्ती जीते क्षण में ।
राज्य अखंड साधना करने जूझे कर्म रिसे रण में ।।२।।

घोर तपस्या का व्रत लेकर निश्चय संयम उर में धार ।
एक वर्ष तप करके तुमने किया निर्जरा का व्यापार ।।३।।

पहिलेघाति कर्म जय कर के केवलज्ञान लब्धि पाई ।
फिर अघातिया जीते प्रभु ने मुक्तिरमा भी हर्षाई ।।४।।

पोदनपुर में मुक्त हुए प्रभु पाया शाश्वत पद निर्वाण ।
इन्द्रादिक देवों ने आकर गाए प्रभु के जय जय गान ।।५।।

हे प्रभु मेरे संकट हरलो मैं अनादि से हूँ दुख युक्त ।
निज स्वभाव साधन की निधि दो हो जाऊँभव दुख से मुक्त ।।६।।

ॐ ह्रीं श्री बाहुबली जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।

जयमाला

जिन गुण वर्णन कर सकूँ शक्ति नहीं भगवान् ।
जिन गुण संपत्ति प्राप्ति हित करूँ स्वयं का ध्यान ।।

छंदताटक

ऋषभदेव जिनवर को वन्दूँ बार बार मैं हर्षाकर ।
ज्ञानभाव की प्राप्ति करूँ मैं भेद ज्ञान रस वर्षा कर ।।
भरत मोक्ष गामी को बन्दूँ पूजन करके अष्ट प्रकार ।
पंच महाव्रत पंच समिति त्रय गुप्ति सहित विचरण करते ।
अटाईस मूल गुण पूरे निरतिचार धारण करते ।।
भाव वन्दना द्रव्य वन्दना दोनों से कर लूँ सत्कार ।।
श्री बाहुबलि को मैं बन्दूँ पर भावों का करूँ विनाश ।
अथक अडिग तप करूँ निरंतर ऐसा दो प्रभु ज्ञान प्रकाश ।।
भव तन भोगों से विरक्त हो चलूँ आपके पथ पर नाथ ।
मैं अनाथ भी एक दिवस बन जाऊँगा तुव कृपा सनाथ ।।
दृष्टि बदल जाते ही दिशा बदल जाती है सहज स्वयम् ।
हो जाता पुरुषार्थ सफल मिट जाता है मिथ्या भ्रमतम ।।
जब तक दृष्टि नहीं बदलेगी तब तक ही भव दुख होगा ।
दृष्टि बदल जाएगी तो फिर अन्तर में शिव सुख होगा ।।
अब तक तो पर्याय दृष्टि रह यह समार बढाया है ।
द्रव्य दृष्टि से सदा दूर यह बंध मार्ग अपनाया है ।।
अब तो द्रव्य दृष्टि बन हरलूँ यह अनादि का मिथ्यातम ।
निज स्वभाव साधन से पाऊँ अविचल सिद्ध स्वपद क्रमक्रम ।।
नाथ आपकी भव्य मूर्ति के दर्शन से होकर पावन ।
दो आशीर्वाद हे स्वामी पाऊँ निज स्वभाव साधन ।।
जय तप व्रत संयम का वेभव मुझे प्राप्त हो जाए देव ।
सम्यक् दर्शन ज्ञान चरितमय पाऊँ मुक्ति मार्ग स्वयमेव ।।
निज चेतन्य राज पद पाऊँ ऐसी कृपा कोर करदो ।
सम्यक् दर्शन प्रगटाऊँ मैं ऐसी भव्य भोर कर दो ।।
निश्चय संयम के प्रभाव में अष्ट कर्म अवसान करूँ ।
शुक्ल ध्यान का सबल पाकर महा मोक्ष निर्वाण वरूँ ।।

ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय अनर्घ्य पद प्राप्ताय अर्घ्यं नि

ऋषभ भरत श्री बाहुबलि चरण कमल उर धार ।
मनवच तन जो पूजते हो जाते भव पार ।।

इत्याशीर्वाद

जाप्य मंत्र-ॐ ह्रीं श्री आदिनाथ भरत बाहुबली जिनेन्द्राय नमः ।
मूर्च्छा भाव नहीं है मुझ में सर्व शल्य स हूँ नि शल्य ।
आत्म भावना के अतिरिक्त नहीं है मुझमें कोई शल्य ।।


Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ ६१ से ६७