श्री आचार्य कुन्दकुन्द पूजन | Shri Acharya Kundkund Pujan

आचार्य कुन्दकुन्द पूजन
(ताटंक)
हे कुन्दकुन्द आचार्य श्री, चैतन्य ऋद्धिधारी प्रणाम ।
हे गगन बिहारी मुनि पुंगव, चैतन्य चक्रवर्ती ललाम ।।
परमागम परमामृत रचना कर, कलीकाल सर्वज्ञ हुये ।
हे मूल संघ के अधिनायक, तुम जैसे जग में तुम्ही हुये ।।
आह्वानन करके आज तुम्हें, अपने मन में पधराऊँगा।
अपने उर के सिंहासन पर, गदगद हो नाथ बिठाऊँगा ।।
मेरा आंगन पावन कर दो, हे नाथ हृदय में आ जाओ।
मेरे चैतन्य जिनालय में, हे मुनिवर आप समा जाओ ।॥
(दोहा)
हुये न हैं न होयेंगे, कुन्दकुन्द से देव ।
महाभाग्य गुरूवर मिले, सहज मिटे भव टेव ।।
ॐ ह्रीं श्री कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य कुन्दकुन्द देव ! अत्र अवतर – अवतर संवौषट् आह्वाननं।
ॐ ह्रीं श्री कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य कुन्दकुन्द देव ! अत्र तिष्ठ ठः ठः स्थापनं ।
ॐ ह्रीं श्री कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य कुन्दकुन्द देव ! अत्र मम सन्निहितो भव भव
वषद् सन्निधिकरणं । पुष्पांजलि क्षिपामि ।
(वीर)
परमागम का मकरंद अहो, मुनिवर निर्झर से झरता है ।
परमामृत सेवन कर भविजन, चैतन्य कमल दल खिलता है ॥
भगवान आत्मा सुनते ही, मिलती है शान्ति सहज स्वामी ।
निर्मल जल चरण चढ़ाता हूँ, हे कुन्दकुन्द ऋषिवर नामी ।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय जन्मजरामृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति …
प्रभु सहज शान्त जीवन जीते, नहिं शत्रु मित्र का नाम कहीं।
चंदन-सी महक रही परिणति, करते समता रसपान सही ।।
अहमिक्को खलु शुद्धो निर्मम, यह शांति मंत्र दातानामी ।
चरणों में चंदन अर्पित है, हे कुन्दकुन्द ऋषिवर नामी ॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय संसारताप विनाशनाय चंदनं निर्वपामीति…

चेतन की प्राण प्रतिष्ठा कर, अक्षय पद तुमने अपनाया ।
अक्षय स्वभाव का अनुभव कर, अक्षय वैभव ही दर्शाया ।।
ध्रुव अचल अनूपम गति पाऊँ, हो सफल साधना जग नामी।
अक्षत प्रभु चरण चढ़ाता हूँ, हे कुन्दकुन्द ऋषिवर नामी ।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय अक्षयपदप्राप्तये अक्षतं निर्वपामीति…
शुभ-अशुभ विभावी भावों से, बस गुरूवर तुम्ही बचाते हो ।
आकिंचन अर ब्रह्मचर्य धर्म की, सबको सीख सिखाते हो ॥
विषयों में सुख की अभिलाषा से, सुखी कौन होगा स्वामी ।
चरणों में पुष्प चढ़ाता हूँ, हे कुन्दकुन्द ऋषिवर नामी ।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीति…
निर्दोष सरस आहार मिले, पर उदासीन ही रहते थे ।
शुद्धोपयोग से सहज तृप्त, आनंद रसामृत पीते थे ।।
है क्षुधा ज्ञान का ज्ञेय मात्र, यह बोध जगाऊँ हे स्वामी ।
नैवेद्य समर्पित करता हूँ, हे कुन्दकुन्द ऋषिवर नामी ।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं निर्वपामीति …
कुछ मोह भाव वो नहीं मेरा, उपयोग मात्र हूँ दर्शाया ।
जिसमें सब ज्ञेय झलकते है, वह ज्ञायक प्रभु हूँ दिखलाया ।।
हूँ समयसार शाश्वत प्रदीप, चैतन्य दीप दाता नामी ।
मोहांध भाव क्षय हो जावे, हे कुन्दकुन्द ऋषिवर नामी ।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय मोहांधकार विनाशनाय दीपं निर्वपामीति…
आठों कर्मों में रहकर भी, आतम अबंध ही रहता है ।
गतियों में रहकर भी गति से, न्यारा अनुभव में आता है ।।
मैं हूँ अबद्ध अस्पर्शित प्रभु, चैतन्य रत्न निरखूँ स्वामी ।
दश धर्मों की सौरभ सुरभित हो, कुन्दकुन्द ऋषिवर स्वामी ॥
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय सकलकर्म दहनाय धूपं निर्वपामीति…
जो शुद्ध स्वभाव निरखता है, वह शुद्ध बुद्ध हो जाता है।
जैसी दृष्टी वैसी सृष्टी, भावों का फल वो पाता है ॥
शिवभूति मुनीश्वर सिद्ध हुये, तुष-मास मंत्र से हे स्वामी ।
अंजन फल मिला निरंजन पद, हे कुन्दकुन्द ऋषिवर नामी ।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय मोक्षफलप्राप्तये फलं निर्वपामीति…

हे श्रमण संस्कृति के गौरव, हे गगन-विहारी रमण राम ।
हे पद्मनंदि हे वक्रग्रीव, हे कुन्दकुन्द मुनिवर प्रणाम ।।
हे गृद्धपिच्छ, श्री मुनि पुंगव, हे एलाचार्य गुरु महान ।
हे वीतराग विज्ञान पथिक, सतपथदर्शी हे तीर्थधाम ॥
भक्ति भावों से अर्घ चढ़ा, अविचल अनर्घ प्रगटे स्वामी ।
जयवंत रहे जिन धर्म सदा, हे कुन्दकुन्द ऋषिवर नामी ।।
ॐ ह्रीं श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय अनर्घ्यपद प्राप्तये अर्घ्य निर्वपामीति …

जयमाला
(दोहा)
कुन्दकुन्द की कलम को, नमन करूँ शतबार ।
अद्भुत निधि तुम दे गये, समयसार सा सार ।।
(ताटंक)
आगर्भ दिगंम्बर हे गुरुवर, हे पद्म-नंदि मुनिवर प्यारे ।
आचार्य श्री हे मुनिपुंगव, जिन शासन के तुम रखवारे ।।
तुमने परमागम प्राभृत रच, सर्वज्ञ विरह को भुला दिया ।
कलिकाल कोठरी महातमा में, तुमने दिव्य प्रकाश किया ।।
चेतन की प्राण प्रतिष्ठा की, अध्यात्म छंद तुमने गाये ।
चिर निद्रा से हो जायें मुक्त, इस तरह दिव्य स्वर गुंजाये ।।
मैं हूँ स्वभाव से समयसार, यह समयसार में बतलाया ।
जो काल अनंत नहीं समझा, वह कलीकाल में दर्शाया ।।
आचार्य श्री आत्मानुभूति में, मग्न सदा ही रहते थे ।
अनुभव का अमृत पीते थे, भव बंधन सहज छुड़ाते थे ।।
पौन्नूरमलै पर हे गुरुवर, किस पावन तिथि पर आये थे ?
श्री समयसार जी रचने के, कैसे शुभ भाव संजोये थे ?
भगवान आत्मा अनुभवकर, लिख गये अमर वे गाथायें ।
मैं नहिं प्रमत्त अप्रमत्त नहीं, ज्ञायक हूँ रच दीं रचनायें ।॥
सीमंधर प्रभु के दर्शन का, गौरव गुरूवर तुमने पाया ।

चारण ऋद्धि के धनी किन्तु, चैतन्य ऋद्धि गौरव आया ।।
हे गुरुवर शाश्वत सुखदर्शक, रत्नत्रय पंथ तुम्हारा है ।
शुद्धोपयोगी हे सन्त नमूँ, बस आतम धर्म सहारा है ।।
परमागम प्राभृत भेंट दिया, अनमोल आत्मनिधि दर्शाने ।
चैतन्य निधि को भूले थे, सब अपनी महिमा को जाने ।।
विषयों की विषय वासना में, सारा जग पल-पल जलता है।
करूणा के सागर आप बिना, यह व्यथा कौन हर सकता है ?
कैसे होंगे मुनि कुंदकुंद, कैसे छोटे लगते होंगे ?
ले पिछी कमंडलु ग्यार वर्ष में, गज-मंथर चलते होंगे ।।
पूरब भव में जब ग्वाला थे, तब तुमने शास्त्र का दान दिया ।
उस ज्ञानदान के फल से ही, मानो यह ज्ञान महान मिला ।।
वह धन्य हो गई घड़ी प्रभु, जिस क्षण समाधि की शरण बढ़े।
कुन्दाद्री पर्वत धन्य हुआ, तुम जैसा योगी पाकर के ॥
वह धन्य हुई शान्तला मात, जिनने ऐसे सुत को जाया ।
वह धन्य धर्मी गुणकीर्ति पिता, जिनके घर योगी था आया ॥
वह धन्य हुई भारत भूमि, वो धन्य हुये भोजन-पानी ।
वे धन्य धर्मि-दाता जय हो, जय हो श्री कुन्दकुन्द ज्ञानी ।।
ॐ श्री आचार्य कुन्दकुन्ददेवाय जयमाला पूर्णार्घ्यं निर्वपामीति …
(दोहा)
कुन्दकुन्द आचार्य की, महिमा अपरम्पार ।
परम भक्ति हृदय बसी, यही करे भव पार ॥
।। पुष्पांजलिं क्षिपामि ।।


Artist: पं. राजेन्द्र कुमार जैन
स्रोत: जिनेन्द्र पूजन

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