अभिनन्दन अभ्यधन अयोगी अविनश्वर अध्यात्म स्वरूप ।
अमित ज्योति अभ्यर्च आत्मन् अविकारी अतिशुद्ध अनूप ।।
रत्नत्रय की नौका पर चढ़ आप हुए भवसागर पार ।
सकल कर्म मल रहित आप की गूंज रही है जयकार ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दनाथ जिनेन्द्र अत्र अवतर-अवतर संवौषट्, ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्र अत्र तिष्ठ-तिष्ठ ठ ठ , ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दनाथ जिनेन्द्र अत्रमम् सन्निहितो भव भव वषट् ।
क्षीरोदधि का धवल दुग्धसम अति निर्मल जल मलहारी ।
जन्म जरा मृतरोग नशाऊँ पाऊँ शिवपद अविकारी ।।
हे अभिनन्दननाथ जगत्पति भव भय भजन दुखहारी ।
जन मन रंजन नित्य निरंजन जगदानन्दन सुखकारी ।।१।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दनाथजिनेन्द्राय जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं नि ।
मलयागिर का बावन चन्दन लाऊँ शीतलताकारी ।
भव भव का आताप मिटाऊँ पाऊँ शिवपद अविकारी ।।हे अभि.।।२ ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दनाथ जिनेन्द्राय संसार ताप विनाशनाय चन्दनं नि. आत्मिक रुचि ही तो अनंत सुख की है पावन साधना ।
परम शुद्ध चैतन्य ब्रह्म की सहज जगाती भावना ।।
उत्तम पुञ्ज अखण्डित तंदुल लाऊँ उज्ज्वलता धारी ।
भवसागर से पार उतर कर पाऊँ शिवपद अविकारी ।।हे अभि।।३ ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथजिनेंद्राय अक्षयपद प्राप्ताय अक्षतं नि ।
परम पारिणामिक भावों के सहज पुष्प प्रभु भवहारी ।
शीलस्वगुण से कामभाव हर पाऊँशिवपद अविकारी ।।हे अभि.।।४ ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनंदननाथजिनेंद्राय कामबाण विध्वंसनाय पुष्पं नि.
परद्रव्यों की भूख न मिट पाई है क्षुधारोग धारी ।
पंच महाव्रत के चरु लाऊँ पाऊँशिवपद अविकारी ।।हे अभि।।५ ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथजिनेंद्राय क्षुधारोग विनाशनाय नैवेद्यं नि ।
मिथ्याभ्रम के कारण अब तक छाई भीषण अंधियारी ।
स्वपर प्रकाशक ज्योति प्रकाशूं पाऊँशिवपद अविकारी ।।हे अभि।।६ ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनन्दननाथजिनेंद्राय मोहान्धकारविनाशनाय दीपं नि ।
अष्टकर्म बंधन में पडा चहुँ गति में पाया दुखभारी ।
ध्यान धूप से कर्म जलाऊँ पाऊँ शिवपद अविकारी ।।हे अभि।।७ ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनंदननाथ जिनेंद्राय अष्ट कर्म विध्वंसनाय धूपं नि ।
निजपरिणति रसपान करूँप्रभु पर परिणति तजभयकारी ।
परममोक्ष फलसिद्ध स्वगति ले पाऊँ शिवपद अविकारी ।।हे अभि।।८ ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनंदननाथजिनेंद्राय महामोक्ष फल प्राप्ताय फलं नि ।
सम्यकदर्शन ज्ञानचरितमय बन रत्नत्रय गुणधारी ।
निज अनर्घ पदवी को धारूँपाऊँशिवपद अविकारी ।।हे अभि।।९ ।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनंदननाथ जिनेन्द्राय अनर्घ पद प्राप्ताय अर्घ्यं नि ।
श्री पंचकल्याणक
शुभ वैशाख शुक्लषष्ठी को विजय विमान त्यागआये ।
धन्य हुई माता सिद्धार्था रत्नसुरों ने बरसाये ।।
छप्पन दिक्कुमारियों ने माँ की सेवा कर सुखपाए ।
हे अभिनन्दन स्वामी जय जय देवों ने मंगलगाए ।।१।।
एक मात्र पुरुषार्थ यही है सम्यक् पथ पर आ जाओ ।।
अंतस्तल की गहराई में आकर निज दर्शन पाओ ।।
ॐ ह्रीं श्रीवैशाखशुक्लषष्ठीदिने श्री अभिनन्दननाथ जिनेन्द्राय गर्भमंगल प्राप्ताय अर्घ्यं नि. ।
माघ शुक्ल द्वादश को स्वामी नगर अयोध्या जन्म हुआ ।
नृपति स्वयंवर के प्रांगण में हर्ष हुआ आनन्द हुआ ।।
एक सहस्र अष्ट कलशों से गिरि सुमेरु अभिषेक हुआ ।
हे अभिनन्दन पांडुकवन में इन्द्रशचीसुर नृत्य हुआ ।।२।।
ॐ ह्रीं माघशुक्ल द्वादश्यां जन्म मंगल प्राप्ताय श्रीअभिनंदननाथजिनेंद्राय अर्घ्यं नि ।
नश्वर मेघों का परिवर्तन लखकर प्रभु वैराग्य हुआ ।
अग्रोद्यान सरस तरु नीचे वस्त्राभूषण त्याग हुआ ।।
माघ शुक्ल द्वादश लौकांतिक देवों का जयनाद हुआ ।
हे अभिनन्दन पंचमहाव्रत धारे दूर प्रमाद हुआ ।।३।।
ॐ ह्रीं माघशुक्लद्वादश्यां तपोमंगलम प्राप्ताय श्री अभिनंदननाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि ।
पौष शुक्ल चतुदर्शी को निर्मल केवलज्ञान हुआ ।
समवशरण की रचनाकर धनपति को अतिबहुमान हुआ ।
द्वादश सभा बीच दिव्यध्वनि खिरी दिव्य उपदेश हुआ ।
हे अभिनन्दन भव्यजनों को प्राप्त मुक्ति संदेश हुआ ।।४।।
ॐ ह्रीं पौषशुक्ल चतुर्दश्यां केवलज्ञानप्राप्ताय अभिनंदननाथजिनेंद्राय अर्घ्यं नि ।
प्रतिमायोग किया जब धारण पावन गिरिसम्मेद हुआ ।
शुभ वैशाख शुक्ल षष्टम आनन्दकूट से मोक्ष हुआ ।।
चार प्रकार देव सब आये हर्षित इन्द्र महान् हुआ ।
हे अभिनन्दननाथ जिनेश्वर परम मोक्ष कल्याण हुआ ।।५।।
ॐ ह्रीं वैशाख शुक्ल षष्ट्यां मोक्षमंगल प्राप्ताय अभिनंदननाथजिनेन्द्राय अर्घ्यं नि. स्वाहा ।
जयमाला
कर्म भूमि के चौथे तीर्थंकर जिनपति अभिनन्दन नाथ ।
देव आपकी पूजन करके मैं अनाथ भी हुआ सनाथ ।।१।।
ज्ञानदीप की शिखा प्रज्ज्वलित होते ही भ्रम दूर हुआ ।
सम्यक् दर्शन की महिमा से गिरि मिथ्यातम चूर हुआ । ।
हुए एक सौ तीन सुगणधर पहिले वज्रनाभि गणधर ।
मुख्य आर्यिका श्री मेरुषेणा, श्रोता थे सुर मुनिवर ।।२।।
नाथ कर्म सिद्धान्त आपका है अकाट्य अनुपम आगम ।
कर्म शुभाशुभ भव निर्माता कर्ता भोक्ता जीव स्वयम् ।।३।।
प्रकृति कर्म की मूल आठ हैं सभी अचेतन जड़ पुद्गल ।
इनमें संयोगी भावों से होता आया जीव विकल ।।४।।
यदि पुरुषार्थ करे यह चेतन निज स्वरूप का लक्ष करे ।
ज्ञाता दृष्टा बनकर इनका सर्वनाश प्रत्यक्ष करे ।।५।।
प्रकृति द्रव्य पुण्यों की अडसठ द्रव्य पाप की एक शतक ।
प्रकृति एक सौ अडतालीस कर्म की बीस उभय सूचक ।।६।।
कर्म घाति की सैंतालिस हैं एक शतक इक अघाति की ।
ये सब है कार्माण वर्गणा महामोक्ष के घातकी ।।७।।
ज्ञानावरणी की पाँच प्रकृति हैं दर्शनआवरणी की नो ।
मोहनीय की अट्ठाइस हैं अन्तराय की पाँच गिनों ।।८।।
घाति कर्म की ये सैंतालिस निज स्वभाव का घात करे ।
इन चारों का नाश करे जो वही ज्ञान कैवल्य वरें ।।९।।
वेदनीय दो, आयु चार हैं, गोत्र कर्म की तो हैं दो ।
नामकर्म की तिरानवे हैं एक शतक अरु एक गिनों ।।१०।।
इनमें से सोलह अघाति की घाति कर्म संग जाती है ।
शेष रही पच्चासी पर वे अति निर्बल हो जाती है ।।११।।
इनका होता नाश चतुर्दश गुणस्थान में है सम्पूर्ण ।
शुद्ध सिद्ध पर्याय प्रकट हो सादि अनन्त सुखों से पूर्ण ।।१२।।
मुझको प्रभु आशीर्वाद दो मैं अब भव का नाश करूँ ।
सम्यक् पूजन का फल पाऊँ कर्मनाश शिव वास करूँ ।।१३।।
कर्म प्रकृतियाँ एक शतक अरु अड़तालीस अभाव करूँ ।
मैं लोकाग्र शिखर पर जाकर सिद्ध स्वरूप स्वभाव करूँ ।।१४।।
नाथ आपकी पूजन करके मुझको अति आनन्द हुआ ।
जन्म जन्म के पातक नाशे दूर शोक दुख द्वंद हुआ ।।१५।।
ॐ ह्रीं श्री अभिनंदन जिनेंद्राय अनर्घपद प्राप्ताय पूर्णार्घ्यं नि
कपि लक्षण प्रभु पद निरख अभिनन्दन चित् धार ।
मन वच तन जो पूजते हो जाते भव पार ।।
इत्याशीर्वाद
जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्री अभिनंदन जिनेंद्राय नम.
Artist: कवि राजमल जी पवैया
स्रोत: जैन पूजांजलि (श्री रूपचन्द्र सुशीलाबाई दि. जैन ग्रंथमाला, विदिशा, १९९२), पृष्ठ १८३ से १८७