श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र (विधि एवं अर्थ सहित)
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श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
(विधि एवं अर्थ सहित)
श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
(विधि, अर्थ एवं प्रश्नोत्तर सहित)
संपादक :
पार्श्व कुमार मेहता
गुरु हरसी का यह फरमान
सामायिक स्वाध्याय महान
गुरु हीरा का यह सन्देश
व्यसनमुक्त हो सारा देश
विधि सामायिक सूत्र
सामायिक-साधना करने की विधि
सबसे पहले पुंजनी से स्थान को पूँज कर व आसन की प्रतिलेखना करके आसन को बिछावें। बाद में सफेद बोल-पट्टा, दुपट्टा, मुँहपत्ति आदि सामायिक की वेशभूषा की प्रतिलेखना कर उसको धारण करें व मुँहपत्ति मुँह पर बाँधें। तत्पश्चात् गुरुदेव या सतिर्जी हो तो उनकी ओर मुँह करके और नहीं हो तो पूर्व दिशा, उत्तर दिशा अथवा ईशान कोण की तरफ मुँह करके निम्न पाठ से तीन बार विधिवत् वन्दना करें।
वन्दना विधि-तिखुत्तो का पाठ बोलते तिखुत्तो शब्द के उच्चारण के साथ ही दोनों हाथ ललाट के बीच में रखने चाहिए। आयाहिणं शब्द के उच्चारण के साथ अपने दोनों हाथ अपने मस्तक के बीच में से अपने स्वयं के दाहिने (Right) कान की ओर ले जाते हुए गले के पास से होकर बायें (Left) कान की ओर घुमाते हुए पुनः ललाट के बीच में लाना चाहिए। इस प्रकार एक आवर्तन पूरा करना चाहिए। इसी प्रकार से पयाहिणं और करमि शब्द बोलते हुए भी एक-एक आवर्तन पूरा करना, इस प्रकार तिखुत्तो का एक बार पाठ बोलने में तीन आवर्तन देने चाहिए। बाद में घुटनों के बल बैठकर बदामि बोले तथा पंचांग (दोनों हाथ, दोनों घुटने व एक सिर) नमस्कार नमंसामि बोलें। बाद में घुटनों के बल सीधे बैठकर पज्जुवासामि तक बोलें, फिर ‘मत्थएण वंदामि’ शब्दोच्चारण के साथ ही जोड़े हुए दोनों हाथ एवं मस्तक गुरु-चरणों में अथवा जमीन पर झुकावें।
(1) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
1. गुरु वन्दना सूत्र
तिक्खुत्तो, आयाहिणं, पयाहिणं, करोमि, वंदामि, णमंसामि, सक्कारेमि, सम्माणेमि, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, चेइयं, पज्जुवासामि, मत्थएण वंदामि।
इसके बाद ईर्यापथिक चउवीसत्थव की आज्ञा लेवें।
2. णवकार महामंत्र
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं।
णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्व-साहूणं ।।
एसो पंच-णमोक्कारो, सव्व-पावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ।।
3. इर्यापथिक सूत्र
इच्छकारणेण संदिसह भगवं ! इरियावहिए पडिक्कमामि इच्छं!
इच्छामि पडिक्कमिउं। इरियावहियाए विराहणाए गमणागमणे
पाणक्कमणे, बीयक्कमणे, हरियक्कमणे, ओसा, उत्तिंग, पणग,
दग, मट्टी, मक्कडा, संताणा संकमणे जे मे जीवा विराहिया
एगिंदिया, बेइंदिया, तेइंदिया, चउरिंदिया, पंचिंदिया अभिहया,
वत्तिया, लेसिया, संघाइया, संघट्टिया, परियाविया, किलामिया,
उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया तस्स
मिच्छामि दुक्कडं।
- प्रचलित प्रयोग “मिच्छामि दुक्कडं” को मिच्छामि मे के रूप में देने का अभिप्राय “मिच्छामि”
के अर्थ को स्पष्ट करना है। साथ ही व्याकरण की दृष्टि से भी “मिच्छामि” प्रयोग समीचीन
प्रतीत होता है। ‘मिच्छा’ का अर्थ है-मिथ्या एवं ‘मि’ का अर्थ है-मेरा।
(3) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
4. आत्म शुद्धि सूत्र
तस्स उत्तरी-करणेणं, पायच्छित्त-करणेणं, विसोहि-करणेणं,
विसल्ली-करणेणं, पावाणं कम्माणं निग्घायणट्ठाए, ठामि काउस्सग्गं।
अन्नत्थ ऊससिएणं, नीससिएणं, खासिएणं, छीएणं, जंभाइएणं,
उड्डुएणं, वायनिस्सग्गेणं, भमलीए, पित्तमुच्छाए, सुहुमेहिं
अंगसंचालोहिं, सुहुमेहिं खेलसंचालोहिं, सुहुमेहिं दिट्ठिसंचालोहिं,
एवमाइएहिं आगारेहिं, अब्भंगो अविरहिओ हुज्ज मे काउस्सग्गो जाव
अरिहंताणं भगवंताणं णमोक्कारेणं, न पारेमि ताव कायं ठाणेणं,
मोणेणं, झाणेणं, (एक इच्छक्कारोणं का काउस्सग्ग’) अप्पाणं
वोसिरामि ।।
5. कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ
काउस्सग्ग में आर्तध्यान, रौद्रध्यान ध्याया हो, धर्मध्यान-
शुक्लध्यान नहीं ध्याया हो तथा काउस्सग्ग में मन, वचन और काया
चलित हुई हो तो तस्स मिच्छामि दुक्कडं।
- काउस्सग्ग में तस्स मिच्छामि दुक्कडं के स्थान पर “आलोएणं” कहें। फिर काउस्सग्ग पूर्ण
होने पर ‘णमो अरिहंताणं’ कह कर काउस्सग्ग पाले, बाद में कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ बोलें।
काउस्सग्ग विधि-खड़े होकर करें तो दोनों पैरों के बीच में तीन इंच अंगुल व आगे चार
अंगुल जगह छोड़कर दोनों हाथ सीधे लटका कर पैरों के अंगूठे की सीध में दृष्टि जमा कर
काउस्सग्ग करें और बैठे-बैठे करें तो पल्यंक आसन से बैठ कर बायें हाथ की हथेली पर दायें
हाथ की हथेली रखकर उस पर दृष्टि जमाकर ‘अप्पाणं वोसिरामि’ शब्द बोलने के साथ
काउस्सग्ग प्रारम्भ करें।
(3) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
6. लोगस्स (तीर्थंकर स्तुति) सूत्र
लोगस्स उज्जोयगरे, धम्म-तित्थयरे जिणे।
अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसं पि केवली ।।1।।
उसभमजियं च वंदे, संभवमभिणंदणं च सुमइं च।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।।2।।
सुविहिं च पुप्फदंतं, सीयल-सिज्जंस-वासुपूज्जं च।
विमलमणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ।।3।।
कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं णमिजिणं च।
वंदामि रिट्ठणेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।।4।।
एवं मए अभिथुआ, विहुयरयमला पहीणजरामरणा।
चउवीसं पि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।5।।
कित्तिय वंदिय महिया, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा।
आरुग्ग-बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।6।।
चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयायरा।
सागरवर-गंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।।7।।
फिर निम्न पाठ से सामायिक करने की प्रतिज्ञा स्वीकार करें।
7. सामायिक-प्रतिज्ञा सूत्र
करेमि भंते ! सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि, जावन्नियमं
पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं, न करेमि न कारवेमि, मणसा
- जावन्नियमं के बाद जितनी सामायिक लेनी हो “उत्तरे मुहूर्त्त न पारें तब तक” ऐसा
बोल शेष पाठ पूर्ण करें।
(4) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
वंदना
वयसा कायसा, तरस भंते ! पडिक्कमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं वोसिरामि।
फिर बायीं घुटना (गोडा) खड़ा करके व दायीं घुटना उल्टाकर नीचे दबाकर, बायें घुटने पर दोनों हाथ जोड़कर घुटने पर जोड़े हुए दोनों हाथ व उसके ऊपर मस्तक झुकाकर दो बार नमोत्थु णं देवें।
8. शक्रस्तव (नमोत्थु णं) सूत्र
नमोत्थु णं अरिहंताणं भगवंताणं आइगराणं, तित्थयराणं, सय-संबुद्धाणं, पुरिसुत्तमाणं, पुरिससीहाणं, पुरिसवर-पुंडरीयाणं, पुरिसवरगंधहत्थीणं, लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहियाणं, लोगपईवाणं, लोगपज्जोअगराणं, अभयदयाणं, चक्खुदयाणं, मग्गदयाणं, सरणदयाणं, जीवदयाणं, बोहिदयाणं, धम्मदयाणं, धम्मदेसयाणं, धम्मनायगाणं, धम्मसारहीणं, धम्मवर-चाउरंत-चक्कवट्टीणं, दीवोत्तमाणं, सरणगइ-पइठ्ठाणं अप्पडिहयवरनाण-दंसण-धराणं, विअट्ट-छउमाणं, जिणाणं, जावयाणं, तिन्नाणं तारयाणं, बुद्धाणं, बोहयाणं, मुत्ताणं, मोयगाणं, सव्वन्नूणं, सव्वदरिसीणं, सिव-मयल-मरुअ-मणंत्त-मक्खय-मव्वाबाह-मपुणराव-वित्ति, सिद्धिगइ-नामधेयं, ठाणं संपत्ताणं’ नमो जिणाणं जिअभयाणं।
- दूसरे नमोत्थु णं में ‘ठाणं संपत्ताणं’ के स्थान पर ‘ठाणं संपत्तगाणं’ बोलें, शेष पूर्ण पाठ पहले की तरह बोलें।
(5) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
सामायिक ग्रहण के पश्चात् समापन का तक की क्रिया
अध्ययन, स्वाध्याय, ध्यान, जप आदि करना, माला व आंगुष्ठी फेरना तथा प्रार्थना, स्तवन आदि बोलना एवं प्रवचन सुनना।
सामायिक साधना समापन विधि
सामायिक सम्बन्धी दोष निवारणार्थ चउवीसत्थव करने की आज्ञा है। फिर नवकार मंत्र, इच्छकारणेण, तस्स उत्तरी के पाठ में ‘झाणेणं’ तक बोलकर ‘एक लोगस्स का काउस्सग्ग’ ऐसा बोलकर अप्पाणं वोसिरामि बोलने के साथ विधिवत् एक लोगस्स का काउस्सग्ग करें, फिर लोगस्स पूर्ण होने पर ‘नमो अरिहंताणं’ ऐसा कहकर काउस्सग्ग पालें, बाद में कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ व लोगस्स का पाठ बोलकर विधिपूर्वक दो बार नमोत्थु णं देवें, बाद में सामायिक पारने व अन्य दोष निवारण हेतु निम्नलिखित पाठ बोलें।
9. एयस्स नवमस्स का पाठ
(सामायिक समापन सूत्र)
- एयस्स नवमस्स सामाइय-वयस्स, पंच अइयारा जाणिअव्वा, न समायरिअव्वा, तं जहा ते आलोउं-मणदुप्पणिहाणे, वयदुप्पणिहाणे, कायदुप्पणिहाणे, सामाइयस्स सइ अकरणाया, सामाइयस्स अणावट्टियस्स करणाया, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
(6) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
-
सामाइयं सम्मं कारणं न फासिअं, न पालिअं, न तीरिअं, न किट्टिअं, न सोहिअं, न आराहियं, अणुपालियं न भवइ, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
-
सामायिक में दस मन के, दस वचन के, बारह काया के इन बत्तीस दोषों में से किसी भी दोष का सेवन किया हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
-
सामायिक में स्त्री कथा’, भक्त कथा, देश कथा, राज कथा इन चार विकथाओं में से कोई विकथा की ही हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
-
सामायिक में आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा, इन चार संज्ञाओं में से किसी भी संज्ञा का सेवन किया हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
-
सामायिक में अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार का जानते, अनजांते, मन, वचन, काया से किसी भी दोष का सेवन किया हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
-
श्राविकाएँ ‘स्त्री कथा’ के स्थान पर ‘पुरुष कथा’ बोलें।
(7) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
सामायिक व्रत विधि
-
सामायिक व्रत विधि से ग्रहण किया, विधि से पूर्ण किया,
विधि में कोई अतिविधि हो गई हो तो तस्स मिच्छा मि
दुक्कडं।। -
सामायिक में पाठ उच्चारण करते काना, मात्रा, अनुस्वार,
पद, अक्षर, ह्रस्व, दीर्घ, कम, ज्यादा, आगे-पीछे, विपरीत
पढ़ने, बोलने में आया हो तो अनन्त सिद्ध केवली भगवान
की साक्षी से तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
फिर तीन बार नवकार मंत्र का स्मरण कर सामायिक पारें।
।। सामायिक साधना समापन विधि समाप्त ।।
।। सविधि सामायिक सूत्र समाप्त ।।
(8) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
।। श्री महावीरराय नमः ।।
अतिविधि प्रतिक्रमण सूत्र
साधु-साध्वी हों तो उनके सम्मुख, अन्यथा पूर्व-उत्तर दिशा
(ईशान कोण) की ओर मुँह करके तीन बार विधिपूर्वक तिवखुत्तो के
पाठ से वन्दना करें।
चउवीसत्थव की आज्ञा
देवसिय’ प्रतिक्रमण चउवीसत्थव की आज्ञा है कहकर, निम्न
पाठ बोलें :- नवकार मन्त्र, इच्छकारोणं व तस्स उत्तरी में ब्राह्मण तक
बोलकर एक लोगस्स का काउस्सग्ग’ ऐसा बोलकर अप्पाणं वोसिरामि
बोलने के साथ काउस्सग्ग करें, फिर लोगस्स पूर्ण होने पर ‘णमो
अरहंताणं’ ऐसा बोल कर काउस्सग्ग पालें, बाद में कायोत्सर्ग शुद्धि
का पाठ व लोगस्स का पाठ बोलकर विधिपूर्वक दो बार नमोत्थुणं
देवें। फिर तीन बार तिवखुत्तो के पाठ से वन्दना करें।
प्रतिक्रमण लाने की आज्ञा
देवसिय प्रतिक्रमण की आज्ञा है कहकर अग्रलिखित पाठ बोलें।
- प्रात-काल में राहु, पक्खी के दिन पक्खिवण, चौमासी के दिन चाउम्मासिय तथा संवत्सरी के
दिन संवच्छरीओ बोलें।
1. इच्छामि ठामि भंते का पाठ
इच्छामि ठामि भंते! तुम्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे देवसिय’
पडिक्कमणं ठामि देवसिय-नाण-दंसण-चरित्ताचरित्त-तव-
अइयार-चित्तणत्थं करेमि काउस्सग्गं।
फिर एक नवकार मंत्र बोल कर तिवखुत्तो के पाठ से तीन बार
वन्दन करें।
प्रथम आवश्यक
प्रथम आवश्यक की आज्ञा कहकर 'करेमि भंते!" का पाठ
बोलें फिर निम्न पाठ बोलें।
2. इच्छामि ठामि का पाठ
इच्छामि ठामि काउस्सग्गं जो मे देवसिओ’ अइयारो कओ,
काइओ, वाइओ, माणसिओ, उस्सुत्तो, उम्मग्गो, अकप्पो,
अकरणिज्जो, दुज्झाओ, दुव्विचिंतओ, अणायारो, अणिच्छिओ,
असावगपाउग्गो, नाणे तह दंसणे, चरित्ताचरित्ते, सुए सामाइ,
तिण्हं गुत्तीणं, चउण्हं कसायाणं, पंचण्हमणुव्वयाणं, तिण्हं
गुणव्वयाणं, चउण्हं सिक्खावयाणं बारस-विहस्स सावग-धम्मस्स,
जं खंडियं जं विराहियं तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
- प्रात-काल में राहु, पक्खी के दिन पक्खिवण, चौमासी के दिन चाउम्मासिय और संवत्सरी के
दिन संवच्छरीओ बोलें। - प्रात-काल में राहु, पक्खी के दिन पक्खिवण, चौमासी के दिन चाउम्मासिय और संवत्सरी
के दिन संवच्छरीओ बोलें।
(10) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
फिर तस्स उत्तरी का पाठ
ज्ञानपूर्ण तक उच्चारण कर ‘99 अतिचारों का काउस्सग्ग’ ऐसा बोलकर ‘अप्पाणं वोसिरामि’ बोलने के साथ विधि सहित काउस्सग्ग’ करे। काउस्सग्ग में निम्नलिखित 99 अतिचारों का, समुच्छन्न पाठ, अग्राह्य पाप स्थान और इच्छाभि ठामि का चिन्तन करे। किन्तु ‘इच्छामि ठामि काउस्सग्ग’ के स्थान पर ‘इच्छामि आलोउं’ कहे। उक्त अतिचारों का चिन्तन करने के पश्चात् ‘नमो अरिहंताणं’ ऐसा बोल कर काउस्सग्ग पाले तथा कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ प्रकट में बोले।
3. आगमे तिविहे का पाठ
आगमे तिविहे पण्णत्ते तं जहा-सुत्तागमे, अत्थागमे, तदुभयागमे, इस तरह तीन प्रकार के आगम रूप ज्ञान के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउं-जं वाइयं, वइयमेलियं, हीणक्खरं, अच्चक्खरं, पयहीणं, विणयहीणं, जोगहीणं, घोसहीणं, सुट्ठिदुण्णं, दुट्ठ-पडिवक्खियं, अकाले कओ सज्झाओ, काले न कओ सज्झाओ, अलसज्झाओ सज्झाए, सज्झाए न सज्झाए, भणता, गुणता, विचरता ज्ञान और ज्ञानवंत पुरुषों की अविनय आशातना की हो तो (इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो) तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
4. दर्शन सम्यक्त्व का पाठ
अरिहंतो महदेवो, जावज्जीवं सुसाहुणो गुरुणो। जिण-पण्णत्तं तत्तं, इअ सम्मत्तं मए गहियं ।।1।।
- काउस्सग्ग में इन सब पाठों में ‘मिच्छा मि दुक्कडं’ के स्थान पर ‘आलोउं’ कहें।
(11) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
परमत्थ-संथवो वा, सुद्धिद-परमत्थ-सेवणा वा वि। वावण्ण-कुदंसण-वज्जणा, य सम्मत्त-सद्दहणा ।।2।।
इअ सम्मत्तस्स पंच अइयारा पेयाला जाणिगव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोउं-संका, कंखा, वितिगिच्छा, परपासंड-पसंसा, परपासंड-संथवो।
इस प्रकार श्री सम्यक्ति रत्न पदार्थ के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउं-1. श्री जिन वचन में शंका की हो, 2. परदर्शन की आकांक्षा की हो, 3. धर्म के फल में सन्देह किया हो, 4. पर पाखण्डी की प्रशंसा की हो, 5. पर पाखण्डी का परिचय किया हो और मेरे सम्यक्त्व रूप रत्न पर मिथ्यात्व रूपी रज मेल लगा हो (इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो) तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
5-16. पन्नह कम्मादान सहित बारह व्रतों के अतिचार
- पहला स्थूल प्राणातिपात-विरमण व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउं-1. रोषवश गाढ़ा बंधन बांधा हो 2. गाढ़ा घाव घाला हो 3. अवयव’ का छेद किया हो, 4. अधिक भार भरा हो, 5. भन्न पाणी का विच्छेद किया हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
- अवयव नाम आदि का।
(12) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
- दूसरा स्थूल मृषावाद विरमण व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउं-1. सहसाकार से किसी के प्रति कूड़ा आल (झूठा दोष) दिया हो, 2. एकान्त में गुप्त बातचीत करते हुए व्यक्तियों पर झूठा आरोप लगाया हो, 3. अपनी स्त्री को मर्म प्रकाशित किया हो’, 4. मृषा उपदेश दिया हो, 5. कूड़ा लेख लिखा हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
- तीसरा स्थूल अदत्तादान विरमण व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउं-1. चोर की चुराई हुई वस्तु ली हो, 2. चोर को सहायता दी हो, 3. राज्य के विरुद्ध काम किया हो, 4. कूड़ा तोल कूड़ा माप किया हो, 5. वस्तु में भेल संभेल किया हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
- चौथा स्थूल स्वदार संतोष परदार विरमण’ रूप मैथुन विरमण व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउं-1. इत्तरियपरिग्गहिया’ से गमन किया हो, 2. अपरिग्गहिया’ से गमन किया हो, 3. अनंग क्रीड़ा की हो, 4. पराये का विवाह नाता कराया हो, 5. काम भोग की तीव्र अभिलाषा की हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
- स्त्रियों अपने पुरुष का मर्म प्रकाशित किया हो, बोलो।
- स्त्रियां अपनी संतोष, परपुरुष विरमण बोलो।
- इत्तरियपरिग्गहिया के स्थान पर स्त्रियां इत्तरियपरिग्गहिया तथा अपरिग्गहिया के स्थान पर अपरिग्गहिया बोलो।
(13) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
5. पाँचवाँ स्थूल परिग्रह विरमण व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-1. खेत-वस्तु का परिमाण अतिक्रमण किया हो, 2. हिरण्य-सुवर्ण का परिमाण अतिक्रमण किया हो, 3. धन-धान्य का परिमाण अतिक्रमण किया हो, 4. दोपद-चौपद का परिमाण अतिक्रमण किया हो, 5. कुपिय का परिमाण अतिक्रमण किया हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
6. छठ्ठे दिशिव्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-1. ऊँची, 2. नीची, 3. तिरछी दिशा का परिमाण अतिक्रमण किया हो, 4. क्षेत्र बढ़ाया हो, 5. क्षेत्र का परिमाण भूल जाने से, पंथ का संदेह पड़ने पर आगे चला हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
7. सातवाँ उपभोग परिभोग परिमाण व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-पच्चक्खाण उपरान्त 1. सचित्त का आहार किया हो, 2. सचित्त प्रतिबद्ध का आहार किया हो, 3. अपक्व का आहार किया हो, 4. तुपक्व का आहार किया हो, 5. तुच्छोषधि का आहार किया हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
(14) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
पन्द्रह कर्मादान’ जो श्रावक-श्राविका के जानने योग्य है किन्तु आचरण करने योग्य नहीं है, उनके विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-1. इंगालकम्मे, 2. वणकम्मे, 3. साडीकम्मे, 4. भाडीकम्मे, 5. फोडीकम्मे, 6. दन्त-वाणिज्जे, 7. लक्खवाणिज्जे, 8. रसवाणिज्जे, 9. केस-वाणिज्जे, 10. विसवाणिज्जे, 11. जंतपीलणकम्मे, 12. निलेछणकम्मे, 13. दवग्गितदाणया, 14. सरदह-तलाव-सोसणया, 15. असई-जण-पोसणया, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
8. आठवें अनर्थदण्ड विरमण व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-1. काम-विकार पैदा करने वाली कथा की हो, 2. भण्ड-कुचेष्टा की हो, 3. मुखरी वचन बोला हो, 4. अधिकरण’ जोड़ खड़ा रहा हो, 5. उपभोग-परिभोग अधिक बढ़ाया हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
9. नवमें सामायिक व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-1. मन, 2. वचन, 3. काया के अशुभ योग प्रवर्तते हो, 4. सामायिक की स्मृति न रखी हो, 5. समय पूर्ण हुए बिना सामायिक पाली हो, इन अतिचारों में से
- अधिक हिंसा वाले कार्यों से आजीविका चलाना कर्मादान है अथवा जिन संस्थानों से कर्मों का निरन्तर बन्ध होता हो उन्हें कर्मादान कहते हैं।
- हिंसाकारी शस्त्र यादी हिंसा के साधन अधिकरण कहलाते हैं।
(15) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
10. दसवें देशावकाशिक व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-1. नियमित सीमा के बाहर की वस्तु मंगवाई हो, 2. भिजवाई हो, 3. शब्द करके चेताया हो, 4. रूप दिखा करके अपने भाव प्रकट किये हो, 5. कंकर आदि फेंककर दूसरे को बुलाया हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
11. ग्यारहवें प्रतिपूर्ण पौषध व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-1. पौषध में शय्या संथारा न देखा हो या अच्छी तरह से न देखा हो, 2. प्रमार्जन न किया हो या अच्छी तरह से न किया हो, 3. उच्चार पासवण की भूमि को न देखी हो या अच्छी तरह से न देखी हो, 4. पूँजी न हो या अच्छी तरह से न पूँजी हो, 5. उपवास युक्त पौषध का सम्यक् प्रकार से पालन न किया हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
12. बारहवें अतिथि संविभाग व्रत के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ-1. उचित वस्तु सचित्त पर रखी हो, 2. अचित्त वस्तु सचित्त से ढँकी हो, 3. साधुओं को भिक्षा देने के समय को टाल कर भावना भावी हो, 4. आप सुखाता होते हुए भी दूसरों से दान दिलाया हो, 5. मत्सर (ईर्ष्या) भाव से दान दिया हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
(16) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
17. संलेखना के पाँच अतिचार का पाठ
संलेखना के विषय में जो कोई अतिचार लगा हो तो आलोउ- (1) इस लोक के सुख की कामना की हो, (2) परलोक के सुख की कामना की हो, (3) जीवित रहने की कामना की हो, (4) मरने की कामना की हो, (5) कामभोग की कामना की हो, इन अतिचारों में से मुझे कोई दिवस सम्बन्धी अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं॥
18. 99 अतिचारों का (समुच्चय) पाठ
इस प्रकार 14 ज्ञान के, 5 समिति के, 60 बारह व्रतों के, 15 कर्मदान के, 5 संलेखना के इन 99 अतिचारों में से किसी भी अतिचार का जानते, अजानते, मन, वचन, काया से सेवन किया हो, कराया हो, करते हुए की भला जाना हो तो अनन्त सिद्ध केवली भगवान की साक्षी से जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं॥
19. अठारह पाप स्थान का पाठ
अठारह पाप स्थान आलोउ-1. प्राणातिपात, 2. मृषावाद, 3. अदत्तादान, 4. मैथुन, 5. परिग्रह, 6. क्रोध, 7. मान, 8. माया, 9. लोभ, 10. राग, 11. द्वेष, 12. कलह, 13. अभ्याख्यान, 14. पैशून्य, 15. परपरिवाद, 16. रति-अरति, 17. माया-मृषावाद, 18. मिथ्यादर्शन शल्य, इन 18 पाप स्थानों में से किसी का सेवन किया हो, कराया हो, करते हुए को भला जाना हो तो अनन्त सिद्ध केवली भगवान की साक्षी से जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।
(17) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
फिर तिरखुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना करें, पहला सामायिक आवश्यक समाप्त हुआ।
दूसरा आवश्यक
दूसरे आवश्यक की आज्ञा है ऐसा कहकर ‘लोगस्स का पाठ’ प्रकट में बोलें। इसके बाद तिरखुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना करें। पहला सामायिक, दूसरा चउवीसत्थव, दो आवश्यक समाप्त हुए।
तीसरा आवश्यक
तीसरे आवश्यक की आज्ञा है कहकर दो बार निम्नलिखित पाठ से विधिवत् वन्दना करें।
20. इच्छामि खमासमणो का पाठ
इच्छामि खमासमणो! वंदिउं जावणिज्जाए निसीहियाए अणुजाणह मे मिउग्गहं, निसीहि, अहो काय-संफासं खमणेज्जो भं! किलामो अप्पकिलंतणं बहुसुभेणं भं! देवसिअं वइक्कमो जा मे उवविओ जं व मे खामेमि खमासमणं, देवसिअं वइक्कमं आवस्सियाए पडिक्कमणामि खमासमणं देवसिआए।
1-3. देवसिक प्रतिक्रमण में बोलना चाहिए-तिन्सो वइक्कमो, देवसिअं वइक्कमो, आसायणाए, देवसिओ अइयारो।
रात्रिक प्रतिक्रमण में बोलना चाहिए-राइ वइक्कमो, राइअं आसायणाए, राइओ अइयारो।
पक्षिक प्रतिक्रमण में बोलना चाहिए-पक्खो वइक्कमो, पक्खिअं वइक्कमं, पक्खिआए आसायणाए, पक्खिओ अइयारो।
चातुर्मासिक प्रतिक्रमण में बोलना चाहिए-चाउम्मासो वइक्कमो, चाउम्मासिअं वइक्कमं, चाउम्मासिआए आसायणाए, चाउम्मासिओ अइयारो।
(18) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
खमासमण देने की विधि-इच्छामि खमासमणो का पाठ प्रारम्भ कर जब निसीहि शब्द आवे तब दोनों घुटने खड़े कर उक्तवत् आसन से बैठें, घुटनों के बीच में दोनों हाथ जोड़े हुए “निसीहि” के पश्चात् ‘अहो’-‘काय’-‘काय’-ये तीन आवर्तन मस्तक नमाकर इस प्रकार दे-कमलमुद्रा में अञ्जलिबद्ध (हाथ जोड़कर) दोनों हाथों से गुरु-चरणों को स्पर्श करने के भाव से मंद स्वर से ‘अ’ अक्षर कहना, तत्पश्चात् अञ्जलिबद्ध हाथों को मस्तक पर लगाते हुए उच्च स्वर से ‘हो’ अक्षर कहना, यह पहला आवर्तन है। इसी प्रकार ‘का’…‘य’ और ‘का’…‘य’ के शेष दो आवर्तन भी दिये जाते हैं।
*‘वइक्कमो’ के पश्चात् ‘जाता भं’, ‘जवणि’, ‘जं च भं’-ये तीन आवर्तन इस प्रकार दे-कमल-मुद्रा से अञ्जलि बाँधे हुए दोनों हाथों से गुरुचरणों को स्पर्श करने के भाव से मन्द स्वर में ‘अ’ अक्षर कहना चाहिए। पुनः हृदय के पास अञ्जलि लाते हुए मध्यम स्वर से ‘सा’ अक्षर कहना तथा फिर अपने मस्तक को छूते हुए उच्च स्वर से
- सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में बोलना चाहिए-संवच्छरो वइक्कमो, संवच्छरिअं वइक्कमं, संवच्छरिआए, आसायणाए, संवच्छरिओ अइयारो।
(19) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
‘अ’ अक्षर कहना चाहिए। यह प्रथम आवर्तन है। इसी पद्धति से ‘अ’ ‘आ’ ‘अँ’ और ‘ऊँ’ ‘अ’ ‘भ’ ये शेष दो आवर्तन भी करने चाहिए। प्रथम खमासमणो के पाठ में उपर्युक्त छह तथा इसी प्रकार दूसरे खमासमणो के पाठ में भी छह, कुल बारह आवर्तन होते हैं।
फिर ‘वइक्कम्म’ तक बैठे-बैठे बोलें। ‘आवस्सियाए पडिक्कममि’ बोलने के साथ खड़े होवें तथा शेष सम्पूर्ण पाठ खड़े-खड़े बोलें। इसी प्रकार दूसरी बार भी ‘खमासमणो’ देवें किन्तु इसमें ‘आवस्सियाए पडिक्कममि’ नहीं बोलें व ‘वइक्कम्म’ शब्द बोलने के बाद खड़े न होवें, सम्पूर्ण पाठ बैठे-बैठे ही बोलें।)
फिर तित्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना करें। पहला सामायिक, दूसरा चउवीसत्थव, तीसरी वन्दन ये तीन आवश्यक समाप्त हुए।
चौथा आवश्यक
चौथे आवश्यक की आज्ञा है कहकर, खड़े-खड़े या बायाँ घुटना खड़ा करके प्रकट में निम्नलिखित पाठ बोलें- आगमे तिविहे, अरिहंतो महदेवे, 12 स्थूल, छोटी संखना, 99 अतिचारों का पाठ, अठारह पापस्थान, इच्छामि ठामि। इसके बाद निम्न पाठ बोलें।
21. तस्स उत्तरस्स का पाठ
तस्स उत्तरस्स देवसियस्स’, अइयारस्स, दुच्चिआरिय-दुच्चिन्तिय-दुब्भासियस्स आलोयेणं पडिक्कमामि।
फिर तित्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना करें।
- प्रातःकाल में रहस्य, पक्खी के दिन पडिक्कमण, चौमासी के दिन चाउम्मासियस्स और संवत्सरी के दिन संवच्छरियस्स शब्द बोलें।
(20) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
श्रावक सूत्र की आज्ञा
श्रावक सूत्र की आज्ञा है कहकर, दाहिना घुटना खड़ा करके बैठकर नवकार मंत्र तथा करेमि भंते का पाठ बोल कर निम्न पाठ बोलें।
22. चत्तारि मंगल का पाठ
चत्तारि मंगलं, अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं। चत्तारि लोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलि-पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो। चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरिहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलि-पण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि। अरिहन्तों का शरण, सिद्धों का शरण, साधुओं का शरण, केवली प्ररूपित दया धर्म का शरण।
चार शरणा दुःख हरणा और न शरणा कोय।
जो भव्य प्राणी आदरे तो अक्षय अमर पद होय।।
इसके बाद में इच्छामि ठामि’ व दुक्खक्खओ का पाठ बोलें। बाद में बैठे-बैठे ही “व्रत अतिचार सहित बोलने की आज्ञा है”, ऐसा बोलें। फिर आगमे तिविहे का पाठ बोल कर निम्न पाठ बोलें।
23. दंसण सम्मत समात्त का पाठ
दंसण-सम्मत-पलयत्थ-संधवो वा, सुविट्ठ-परमत्थ-सेयणा वा वि।
वायणा-कुदंसण-वज्जणा, य सम्मत-सद्दहणा।।
- इस पाठ के उच्चारण में ‘इच्छामि ठामि काउस्सग्ग’ के स्थान पर ‘इच्छामि पडिक्कमितुं’ कहें।
(21) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
इअ सम्मस्स पंच-अइयारा पेयाला जाणिअव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोडे-1. संका, 2. कंखा, 3. वितिगिच्छा, 4. पर-पासंड-पसंसा, 5. परपासंड-संथवो, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
24-35. बारह व्रत अतिचार सहित
- पहला अणुव्रत-थूलाओ पाणाइवायाओ वेरमणं, त्रसजीव, बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चउरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, जान के पहिचान के, संकल्प करके, उसमें सगे सम्बन्धी व स्व शरीर के भीतर में पीड़ाकारी, सापराधी को छोड़कर निरपराधी को आकुड़ी की बुद्धि से हनने का पच्चक्खाण, जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा ऐसे पहले स्थूल प्राणातिपात विरमण व्रत के पंच-अइयारा पेयाला जाणिअव्वा, न समायरियव्वा तं जहा ते आलोडे-बंधे, वहे, छविच्छेए, अइभारे, भत्तपाण-विच्छेए, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
- दूजा अणुव्रत-थूलाओ मुसावायाओ वेरमणं, कन्नालीए, गोवालीए, भोमालीए, गासावहारे, कूडसक्खिवज्जे इत्यादि मोटा झूठ बोलने का पच्चक्खाण, जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा, एवं दूजा स्थूल मृषावाद विरमण व्रत के पंच-अइयारा जाणिअव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोडे-
(22) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
सहससम्भक्खाणे, रहससम्भक्खाणे, सदारसंत-भेए’, मोसोवएसे, कुडल्लेहकरणे, जो मे देवसिओ अइयारो तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
-
तीजा अणुव्वत-थूलाओ अदिण्णादाणाओ वेरमणं, खात खनकर, गादि खोदकर, ताले पर कुँची लगाकर, मार्ग में चलते हुए को लूटकर, पड़ी हुई धणियाती मोटी वस्तु जानकर लेना इत्यादि मोटा अदत्तादान का पच्चक्खाण, सगे सम्बन्धी, व्यापार सम्बन्धी तथा पड़ी निर्धनी वस्तु के उपरान्त अदत्तादान का पच्चक्खाण जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा एवं तीजा स्थूल अदत्तादान विरमण व्रत के पंच-अइयारा जाणिज्जव्वा न समायरियव्वा ते जहा ते आलोडे-तेनाहडे, तक्करप्पओगे, विरुद्ध-रज्जाईक्कमे, कुडत्तुल-कुडमाणे, तप्पडिरूवगववहारे, जो मे देवसिओ अइयारो केओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
-
चोथा अणुव्वत-थूलाओ मेहुणाओ वेरमणं, सदार-संतोसिए अवसेस-मेहुणविहिं पच्चक्खामि, जावज्जीवाए देव-देवी सम्बन्धी दुविहं तिविहेणं, न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा तथा मनुष्य तिर्यंच सम्बन्धी एगविहं एगविहेणं न करेमि, कायसा एवं चौथा स्थूल स्वदार
-
स्त्रियाँ ‘सदारसंतोसे’ के स्थान पर ‘सप्प-संत-भेए’ बोलें।
-
स्त्री को ‘सदार’ के स्थान पर ‘सप्प’ व पूर्ण त्यागी को ‘सदार-संतोसिए अवसेस-मेहुणविहिं’ के स्थान पर ‘सल्ल-मेहुणविहिं’ बोलना चाहिए।
(23) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
संतोष, परदार’ विवर्जन रूप मैथुन विरमण व्रत के पंच अइयारा जाणिज्जव्वा न समायरियव्वा ते जहा ते आलोडे-इत्तरियपरिग्गहिया-गमणे, अपरिग्गहिया-गमणे’, अनंगक्रीडा, परविवाह-करणे, कामभोगतिव्वाभिलासे, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
5. पांचवां अणुव्वत-थूलाओ परिग्गहाओ वेरमणं, खेत-वत्थु का यथा परिमाण, हिरण्ण-सुवण्ण का यथा परिमाण, धण-धण्ण का यथा परिमाण, दुप्पय-चउप्पय का यथा परिमाण, कुविय का यथा परिमाण एवं जो यथा परिमाण किया है उसके उपरान्त अपना करके परिग्रह रखने का पच्चक्खाण जावज्जीवाए एगविहं तिविहेणं न करेमि, मणसा, वयसा, कायसा एवं पांचवा स्थूल परिग्रह विरमण व्रत के पंच-अइयारा जाणिज्जव्वा न समायरियव्वा ते जहा ते आलोडे-खेतवत्थुप्पमाणाइक्कमे, हिरण्ण-सुवण्ण-प्पमाणाइक्कमे, धणधण्णप्पमाणाइक्कमे, दुप्पय-चउप्प-यप्पमाणाइक्कमे, कुवियप्पमाणाइक्कमे, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
6. छट्ठा विरतिव्रत-उद्दिसी का यथा परिमाण, अहोदिसी का यथा परिमाण, तिरियदिसी का यथा परिमाण एवं जो यथा परिमाण किया है उसके उपरान्त स्वेच्छा काया से
- स्त्री को ‘परदार’ के स्थान पर ‘परवत्ति’ तथा ‘परदार’ की जगह ‘परवत्ति’ बोलना चाहिए।
- स्त्री को ‘इत्तरियपरिग्गहिया-गमणे’ के स्थान पर ‘इत्तरियपरिग्गहिया-गमणे’ तथा ‘अपरिग्गहिया-गमणे’ के स्थान पर ‘अपरिग्गहिया-गमणे’ बोलना चाहिए।
(24) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
आगे जाकर पांच आसव सेवन का पच्चक्खाण, जावज्जीवाए एगविहं’ तिविहेणं न करेमि’, मणसा, वयसा, कायसा एवं छट्ठे दिसिव्रत के पंच-अइयारा जाणिज्जव्वा न समायरियव्वा ते जहा ते आलोडे-उद्ध-दिसिप्पमाणाइक्कमे, अहोदिसिप्पमाणाइक्कमे, तिरिय-दिसिप्पमाणाइक्कमे, खित्तवुद्धी, सद्द-अन्तरद्धा, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
7. सातवां व्रत-उपभोग परिभोगविधि पच्चक्खायमाणे उल्लत्तियाविहि, दंतपक्खालि, फलविहि, अब्भंगणविहि, उव्वट्टणविहि, मज्जणविहि, वत्थविहि, विलेवणविहि, पुप्फ-विहि, आभरणविहि, धूवविहि, पेज्जणविहि, भक्खण-विहि, ओदणविहि, सूपविहि, विगयविहि, सागविहि, महुरविहि, जीमणविहि, पाणियविहि, मुखवासविहि, वाहणविहि, उवाणहविहि, सयणविहि, संचित्तविहि, दव्वविहि इन 26 बोलों का यथा परिमाण किया है, इसके उपरान्त उपभोग-परिभोग वस्तु को भोग निमित्त से भोगने का पच्चक्खाण जावज्जीवाए एगविहं तिविहेणं न करेमि, मणसा, वयसा, कायसा एवं सातवां व्रत उपभोग परिभोग दुविहे पण्णत्ते ते जहा, भोयणाओ य कम्माओ व भोयणाओ समोवसरणं पंच-अइयारा जाणिज्जव्वा न समायरियव्वा ते जहा ते आलोडे-
- ‘एगविहं’ के स्थान पर ‘दुविहं’ और ‘न करेमि’ के स्थान पर ‘न कारवेमि, न कारवेमि’ भी बोलते हैं।
(25) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
श्लोक
सचित्ताहारे, सचित्त-पडिबद्धाहारे, अप्पउली-ओसहि-भक्खणाया, दुप्पउली-ओसहि-भक्खणाया, तुच्छोसहि-भक्खणाया कम्मोअ य णं, समणोवासएणं पन्नरस-कम्मादाणाई जाणियव्वाई, न समायरियव्वाई तं जहा ते आलोडे-1. इंगालकम्मे, 2. वणकम्मे, 3. साडीकम्मे, 4. भोडीकम्मे, 5. फोडीकम्मे, 6. दंतवाणिज्जे, 7. लक्खवाणिज्जे, 8. रस-वाणिज्जे, 9. केसवाणिज्जे, 10. विसवाणिज्जे, 11. जंत-पीलणकम्मे, 12. निल्लंछ-णकम्मे, 13. दवग्गिदावणया, 14. सरदहलाव-सोसणया, 15. असई-जण-पोसणया, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
8. आठवाँ अठ्ठादण्ड-विरमण व्रत ध्रुव्विहे अठ्ठादंडे पन्नासे तं जहा-अवड्डाणयारिये, पमायायारिये, हिंसप्पयाणं, पावकम्मप्पसंगे एवं आठवाँ अठ्ठादण्ड सेवन का पच्चक्खाण, जिसमें आठ आगार-आए वा, राए वा, नाए वा, परियारे वा, देवे वा, नागे वा, जक्खे वा, भूए वा, एत्तिरहं आगारिहं अणत्थ जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा एवं आठवाँ अठ्ठादण्ड विरमणं व्रत के पंच-अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोडे-कंदप्पे, कुक्कुइए, मोहिरिए, संजूआ-हियारणे, उवभोगपरभोगा-इत्तिरिसे, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
(26) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
-
नवमां सामायिक व्रत-सावज्जं जोगं पच्चक्खामि, जाव नियमं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा, ऐसी मेरी सद्दहणा प्ररूपणा तो है सामायिक का अवसर आवे, सामायिक करूं तब फस्सणा करके शुद्ध होउं एवं नवमें सामायिक व्रत के पंच-अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोडे-मणुयमुणिहाणे, वयहमुणिहाणे, काय-दुप्पणिहाणे, सामाइयस्स सइ अकरणे, सामाइयस्स अणवट्ठिअस्स करणाया, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
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दसवां देशावगासिक व्रत-दिन प्रति प्रभात से प्रारम्भ करके पूर्वादि छहों दिशाओं में जितनी भूमिका की मर्यादा रखी है, उसके उपरान्त पाँच आस्रव सेवन निमित्त स्वेच्छा काया से आगे जाने तथा दूसरों को भेजने का पच्चक्खाण जाव अहोरात्तं दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा तथा जितनी भूमिका की हद रखी है उसमें जो द्रव्यादि की मर्यादा की है, उसके उपरान्त उपभोग-परिभोग वस्तु को भोग निमित्त से भोगने का पच्चक्खाण जाव अहोरात्तं एगविहं तिविहेणं न करेमि, मणसा, वयसा, कायसा एवं दसवें देशावगासिक व्रत के पंच-अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोडे-आणवणप्पओगे, पेसणप्पओगे, सद्दाणुवाए, रूवाणुवाए, बहियाणुप्पओगेव, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
(27) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र -
ग्यारहवां पडिपुण्ण पोसह व्रत-अस्सणं, पाणं, खाइमं, साइमं का पच्चक्खाण, अबंभ सेवन का पच्चक्खाण, अमुकप्पणि सुवण्णं का पच्चक्खाण, मालावण्णग-विलेवण का पच्चक्खाण, ससप्पमुसलादि सावज्जजोग सेवन का पच्चक्खाण, जाव अहोरात्तं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा ऐसी मेरी सद्दहणा प्ररूपणा तो है, पोषध का अवसर आवे, पोषध करूं तब फस्सणा करके शुद्ध होउं एवं ग्यारहवां प्रतिपुर्ण पोषध व्रत के पंच-अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोडे-1. अप्पडिलेहिय-दुप्पडिलेहिय-सेजजासंथारए, 2. अप्पमज्जियदुप्प-मज्जिय-सेजजा-संथारए, 3. अप्पडिलेहिय-दुप्पडि-लेहिय-उच्चार-पासवण-भूमि, 4. अप्पमज्जिय-दुप्पमज्जिय-उच्चार-पासवण-भूमि, 5. पोसहस्स सम्मं अणणुपालणया, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं।।
-
बारहवां आतिथि संविभाग व्रत-समणे निग्गंथे फासुयएस-णिज्जेणं, असण-पाण-खाइम-साइम-वत्थ-पडिग्गह-केवल-पायपुंछणेणं, पडिहारिय-पीठ-फलग-सेजजासंथारएणं, ओसह-भेसज्जेणं, पडिलाभेमाणो विहरामि, ऐसी मेरी सद्दहणा प्ररूपणा तो है, साधु-साध्वियों का योग मिलने पर निर्दोष दान दूं, तब फस्सणा करके शुद्ध होउं एवं बारहवें आतिथि संविभाग
(28) श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
36. बड़ी संलेखना का पाठ
अह भंते ! अपच्छिम-मारणंतिय-संलेहणा, जुसणा, आराणा, पोषधशाला पूंज ण कर, उच्चारापसवन भूमि पडिलेह पडिलेह कर, गमणागमणे पडिक्कम पडिक्कम कर, दब्भिक संथारा संथार संथार कर, दब्भिक संथारा दुरुह दुरुह कर, पूर्व तथा उत्तर दिशा सम्मुख पर्यंकादिक आसन से बैठ-बैठ कर, करयल-संपरिग्गहिय सिरसावत्त मत्थए अंजलि-कट्टु एवं वयसी-नमोत्थु णं अरिहंताणं भगवंताणं जाव संपत्ताणं, ऐसे अनन्त सिद्ध भगवान को नमस्कार करके, ‘नमोत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं जाव संपविउक्कामाणं’ जयवन्ते वर्तमान काल महावीर क्षेत्र में विचरते हुए तीर्थङ्कर भगवान को नमस्कार करके अपने धर्माचार्य जी को नमस्कार करता हूँ। साधु प्रमुख चारों तीर्थों को क्षमा के, सर्व जीव राशि को क्षमाकर के, पहले जो व्रत आदरे हैं, उनमें जो अतिचार दोष लगे हैं, वे सर्व आलोचना के, पडिक्कम करके, निंद के, निःशल्य होकर के, सव्वं पाणाइवाय पच्चक्खामि, सव्वं मुसावादं पच्चक्खामि, सव्वं अदिण्णादाणं पच्चक्खामि, सव्वं
मेहुणं पच्चक्खामि, सव्वं परिग्गह पच्चक्खामि, सव्वं कोहं माणं जाव मिच्छादंसणसल्लं सव्वं अकरणिज्जं जोगं पच्चक्खामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, करतेपि अन्नं न समणुजाणामि, मणसा, वयसा, कायसा, ऐसे अठारह पापस्थान पच्चक्ख के, सव्वं असणं, पाणं, खाइमं, साइमं, चउव्विहंपि आहारं पच्चक्खामि जावज्जीवाए, ऐसे चारों आहार पच्चक्ख के जं पिणं इमे सरीरे इट्टं, कंतं, पियं, मणुण्णं, मणामं, विज्झं, विसासियं, सम्मयं, अणुमयं, बहुमयं, भण्डकरण्डगसमाणां, खवणकरण्डगभूयं, मा णं सोयं, मा णं उण्हं, मा णं खुहा, मा णं पिवासा, मा णं वाला, मा णं चोरा, मा णं दंसमसगा, मा णं वाइदे, पित्तियं, कफियं, संभीमं सण्णिवाइयं विविहा रोगायंका परीसहा उवस्सग्गा फासा फुसंतु एवं णियं ण चरमेहिं उस्सासणियासेहिं वासिरामि णि कट्ठट्ठ एसे शरीर को वोसिरा के कालणंणवक्केखमाणे विहरामि, ऐसी मेरी सहणा प्ररूपणा तो है, फरसना करूं तब शुद्ध होवे, ऐसे अपच्छिम मारणांतिय संलेहणा जुसणा आराहणाए पंच-अइयारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ने आलोइ-इहलोगासंसप्पओगे, परलोगासंसप्पओगे, जीवायासंसप्पओगे, मरणासंसप्पओगे, कामभोगासंसप्पओगे, जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
फिर खड़े होकर 18 पाप स्थान, इच्छामि ठामि का पाठ बोल कर निम्नलिखित पाठ बोलें।
- यहाँ भी ‘इच्छामि ठामि काउस्सग्गं’ के स्थान पर ‘इच्छामि पडिक्कमियं’ कहें।
37. तस्स धम्मस्स का पाठ
तस्स धम्मस्स केवलिपण्णत्तस्स अट्ठट्ठिआणि आराहणाए, चिरओमि विराहणाए तिविहेणं पडिक्कंतो वंदामि जिण-चउव्वीसं।
फिर दो बार इच्छामि खमासमणो के पाठ से विधिवत् वन्दना करें।
पाँच पदों की भाव वन्दना
पंचोंगे नमस्कार पाँच पदों की भाव वन्दना की आज्ञा है कहकर निम्न दोहा बोलें।
प्रथम सात अक्षर पढ़ो, पाँच पद चित्त लाय।
सात, सात, नव अक्षरा, पढ़त पाप झड़ जाय ।।
फिर नवकार मंत्र को प्रकट में बोलकर निम्नलिखित पाठों से भाव वन्दना करें।
- पहले पद श्री अरिहंत भगवान, जघन्य बीस तीर्थङ्करजी उत्कृष्ट एक सौ साठ तथा एक सौ सित्तर देवाधिदेव जी उनमें वर्तमान काल में 20 विहरमानजी महाविदेह क्षेत्र में विचरते हुए हैं। एक हजार आठ लक्षण के धरणहार, चौंतीस अतिशय पैंतीस वाणी कर के विराजमान, चौंसठ इन्द्रों के वन्दनीय, पूजनीय, अठारह दोष रहित, बारह गुण सहित (1) अनन्त ज्ञान, (2) अनन्त दर्शन, (3) अनन्त चारित्र, (4) अनन्त बल वीर्य, (5) दिव्य ध्वनि, (6) भामण्डल, (7) स्फटिक सिंहासन, (8) अशोक वृक्ष, (9) कुसुम वृष्टि, (10) देव-
दुन्दुभि
(11) छत्र धारी, (12) चँवर बिजावे, पुरुषाकार पराक्रम के धरणहार, ऐसे अढ़ाई द्वीप पन्द्रह क्षेत्र में विचरते हैं। जघन्य दो क्रोड केवली उत्कृष्ट नव क्रोड केवली, केवल ज्ञान, केवल दर्शन के धरणहार, सर्वद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के जाननहार-
सवैया
नमुँ श्री अरिहंत, कर्मों का किया अन्त।
हुआ सो केवल वन्त, करुणा भण्डारी है।।1।।
अतिशय चौंतीसधार, पैंतीसवाणी उच्चार।
समझाये नर-नार, पर उपकारी है।।2।।
गम्भीर सुन्दरकार, सूरज सो झलकार।
गुण है अनन्त सार, दोष परिहारी है।।3।।
कहत है तिलोक सिध, मन वच काया करी।
तुली-तुली बारबार, वन्दना हमारी है।।4।।
ऐसे श्री अरिहन्त भगवान, दीनदयालुजी महाराज, आपकी दिवस सम्बन्धी अविनय आशातना की हो तो हे अरिहन्त भगवान! मेरा अपराध बारम्बार क्षमा करिये, मैं हाथ जोड़, मान मोड़, शीश नवाकर तिस्सुत्तो के पाठ से 1008 बार वन्दना नमस्कार करता हूँ।
तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि, वंदामि, णमंसामि, सक्कारेमि, सम्माणेमि, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, चेइयं, पज्जुवासामि, मत्थएण वंदामि।
आप मांगलिक हो, आप उत्तम हो, हे स्वामिन! हे नाथ! आपका इस भव, पर भव, भव भव में सदाकाल शरण होवे।
- प्रातःकाल में रात्रि संबंधी, पक्खी के दिन पक्खी सम्बन्धी, चौमासी के दिन चौमासी संबंधी और संवत्सरी के दिन संवत्सरी संबंधी बोलें।
{32} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
- दूजे पद श्री सिद्ध भगवान महाराज 14 प्रकार पन्द्रह भेदे अनन्त सिद्ध हुए हैं। आठ कर्म खपाकर मोक्ष पहुँचे हैं।
(1) तीर्थ सिद्ध, (2) अतीर्थ सिद्ध, (3) तीर्थंकर सिद्ध, (4) अतीर्थंकर सिद्ध, (5) स्वयं बुद्ध सिद्ध, (6) प्रत्येक बुद्ध सिद्ध, (7) बुद्ध बोधित सिद्ध, (8) स्त्रीलिंग सिद्ध, (9) पुरुषलिंग सिद्ध, (10) नपुंसकलिंग सिद्ध, (11) स्वलिंग सिद्ध, (12) अन्यलिंग सिद्ध, (13) गृहस्थलिंग सिद्ध, (14) एक सिद्ध, (15) अनेक सिद्ध।
जहाँ जन्म नहीं, जरा नहीं, मरण नहीं, भय नहीं, रोग नहीं, शोक नहीं, दुःख नहीं, दारिद्र्य नहीं, कर्म नहीं, काया नहीं, मोह नहीं, माया नहीं, चाकर नहीं, ठाकर नहीं, भूख नहीं, तृषा नहीं, ज्योत में ज्योत विराजमान सकल कार्य सिद्ध करके चौदह प्रकार पन्द्रह भेदे अनन्त सिद्ध भगवन्त हुए हैं जो-(1) अनन्त ज्ञान, (2) अनन्त दर्शन, (3) अव्याबाध सुख, (4) क्षायिक समकित, (5) अटल अवगाहना, (6) अमूर्त, (7) अगुरु-लघु, (8) अनन्त आत्म सामर्थ्य, ये आठ गुण कर के सहित है।
सवैया
सकल करम टाळ, वश कर लियो काल।
मुगती में रह्या बाल, आत्मा को तारी है।।1।।
देखत सकल भाव, हुआ है जगत् राव।
सदा ही क्षायिक भाव, भवे अधिकारी है।।2।।
{33} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
अचल अटल रूप, आवे नहीं भव कूप।
अनूप स्वरूप रूप, ऐसे सिद्ध धारी है।।3।।
कहत हैं तिलोक सिद्ध, बताओ ए वास प्रभू।
सदा ही उणते सुर’, वन्दना हमारी है।।4।।
ऐसे श्री सिद्ध भगवान, दीनदयालुजी महाराज, आपकी दिवस सम्बन्धी अविनय आशातना की हो तो हे सिद्ध भगवान! मेरा अपराध बारम्बार क्षमा करिये, मैं हाथ जोड़, शीश नवाकर तिस्सुत्तो के पाठ से 1008 बार वन्दना नमस्कार करता हूँ।
तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि, वंदामि, णमंसामि, सक्कारेमि, सम्माणेमि, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, चेइयं, पज्जुवासामि, मत्थएण वंदामि।
आप मांगलिक हो, आप उत्तम हो, हे स्वामिन! हे नाथ! आपका इस भव, पर भव, भव भव में सदाकाल शरण होवे।
-
तीजे पद श्री आचार्य जी महाराज 36 गुण करके विराजमान, पाँच महाव्रत पाले, पाँच आचार पाले, पाँच इन्द्रियाँ जीते, चार कषाय टाले, नववाड़ सहित शुद्ध ब्रह्मचर्य पाले, पाँच समिति तीन गुप्ति शुद्ध आराधें। ये 36 गुण करके सहित है। आठ सम्पदा-1. आचार सम्पदा, 2. श्रुत सम्पदा, 3. शरीर सम्पदा, 4. वचन सम्पदा, 5. वाचना सम्पदा, 6. मति सम्पदा, 7. प्रयोगमति सम्पदा और 8. संग्रह सम्पदा सम्पदा सहित है।
-
सायंकाल के समय “प्रभु ही सायंकाल बोलें।”
{34} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
आगे जाकर पाँच आस्रव सेवन का पच्चक्खाण,
{25} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
सचित्ताहारे, सचित्त-पडिबद्धाहारे, अप्पउली-ओसहि- भक्खणया, दुप्पउली-ओसहि-भक्खणया, तुच्छोसहि- भक्खणया कम्मओ य णं, समणोवासएणं पण्णरस-
कम्मादाणाई जाणियव्वाइं, न समायरियव्वाइं तं जहा ते आलोउं-1. इंगालकम्मे, 2. वणकम्मे, 3. साडीकम्मे, 4. भाडीकम्मे, 5. फोडीकम्मे, 6. दन्तवाणिज्जे, 7. लक्खवाणिज्जे, 8. रस-वाणिज्जे, 9. केसवाणिज्जे, 10. विसवाणिज्जे, 11. जंत-पीलणकम्मे, 12. निल्लंछ- णकम्मे, 13. दवग्गिदावणया, 14. सरदहतलाय-
सोसणया, 15. असई-जण-पोसणया, जो मे देवसिओ
अड्यारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
- आठवाँ अणट्ठादण्ड-विरमण व्रत चउव्विहे अणट्ठादंडे पण्णत्ते तं जहा-अवज्झाणायरिये, पमायायरिये, हिंसप्पयाणे, पावकम्मोवएसे एवं आठवाँ अणट्ठादण्ड सेवन का पच्चक्खाण, जिसमें आठ आगार-आए वा, राए
वा, नाए वा, परिवारे वा, देवे वा, नागे वा, जक्खे वा, भूए वा, एत्तिएहिं आगारेहिं अण्णत्थ जावज्जीवाए दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा एवं आठवाँ अणट्ठादण्ड विरमण व्रत के पंच-अड्यारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोउं-कंदप्पे, कुक्कुइए, मोहरिए, संजुत्ता-हिगरणे, उवभोगपरिभोगा- इरित्ते, जो मे देवसिओ अड्यारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
{26} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
-
नवमाँ सामायिक व्रत-सावज्जं जोगं पच्चक्खामि, जाव नियमं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा, ऐसी मेरी सद्दहणा प्ररूपणा तो है सामायिक का अवसर आये, सामायिक करूँ तब फरसना करके शुद्ध होऊँ एवं नवमें सामायिक व्रत के पंच-अड्यारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोउं-मणदुप्पणिहाणे, वयदुप्पणिहाणे, काय- दुप्पणिहाणे, सामाइयस्स सइ अकरणया, सामाइयस्स अणवट्ठियस्स करणया, जो मे देवसिओ अड्यारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
-
दसवाँ देसावगासिक व्रत-दिन प्रति प्रभात से प्रारम्भ करके पूर्वादिक छहों दिशाओं में जितनी भूमिका की मर्यादा रखी है, उसके उपरान्त पाँच आस्रव सेवन निमित्त स्वेच्छा काया से आगे जाने तथा दूसरों को भेजने का पच्चक्खाण जाव अहोरत्तं दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा तथा जितनी भूमिका की हद्द रखी है उसमें जो द्रव्यादि की मर्यादा की है, उसके उपरान्त उपभोग-परिभोग वस्तु को भोग निमित्त से भोगने का पच्चक्खाण जाव अहोरत्तं एगविहं तिविहेणं न करेमि, मणसा, वयसा, कायसा एवं दसवें देशावकाशिक व्रत के पंच-अड्यारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोउं-आणवणप्पओगे, पेसवणप्पओगे,
-
ग्यारहवाँ पडिपुण्ण पौषध व्रत-असणं, पाणं, खाइमं, साइमं का पच्चक्खाण, अबंभ सेवन का पच्चक्खाण, अमुकमणि सुवर्ण का पच्चक्खाण, मालावणग्ग-
विलेवण का पच्चक्खाण, सत्थमूसलादिक सावज्जजोग सेवन का पच्चक्खाण, जाव अहोरत्तं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा ऐसी मेरी सद्दहणा प्ररूपणा तो है, पौषध का अवसर आये, पौषध करूँ तब फरसना करके शुद्ध होऊँ एवं ग्यारहवाँ प्रतिपूर्ण पौषध व्रत के पंच-अड्यारा जाणियव्वा न समायरियव्वा तं जहा ते आलोउं- 1. अप्पडिलेहिय- दुप्पडिलेहिय-सेज्जासंथारए, 2. अप्पमज्जियदुप्प- मज्जिय-सेज्जा-संथारए, 3. अप्पडि-लेहिय-दुप्पडि- लेहिय-उच्चार-पासवण-भूमि, 4. अप्पमज्जिय-
दुप्पमज्जिय-उच्चार-पासवण-भूमि, 5. पोसहस्स सम्मं अणणुपालणया, जो मे देवसिओ अड्यारो कओ तस्स
मिच्छा मि दुक्कडं ।।
वत्थ-पडिग्गह-कंबल-पायपुंछणेणं, पडिहारिय-, पीढ-फलग-सेज्जासंथारएणं, ओसह-भेसज्जेणं,
पडिलाभेमाणे विहरामि, ऐसी मेरी सद्दहणा प्ररूपणा तो है, साधु-साध्वियों का योग मिलने पर निर्दोष दान दूँ, तब फरसना करके शुद्ध होऊँ एवं बारहवें अतिथि संविभाग {28} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
व्रत के पंच-अड्यारा जाणियव्वा, न समायरियव्वा तं जहा ते आलोउं-सचित्त-निक्खेवणया, सचित्त-
पिहणया, कालाइक्कमे, परववएसे, मच्छरियाए, जो मे देवसिओ अड्यारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
फिर पालथी आसन से बैठकर बड़ी संलेखना का पाठ बोलें । 36. बड़ी संलेखना का पाठ
अह भंते ! अपच्छिम-मारणंतिय-संलेहणा, झूसणा,
आराहणा, पौषधशाला पूँज पूँज कर, उच्चारपासवण भूमि पडिलेह पडिलेह कर, गमणागमणे पडिक्कम पडिक्कम कर, दर्भादिक संथारा संथार संथार कर, दर्भादिक संथारा दुरूह दुरूह कर, पूर्व तथा उत्तर दिशा सम्मुख पल्यंकादिक आसन से बैठ-बैठ कर, करयल-संपरिग्गहियं सिरसावत्तं मत्थए अंजलि-कट्टु एवं वयासी-नमोत्थु णं अरिहंताणं भगवंताणं जाव संपत्ताणं, ऐसे अनन्त सिद्ध भगवान को नमस्कार करके, ‘नमोत्थुणं अरिहंताणं भगवंताणं जाव संपाविउकामाणं’ जयवन्ते वर्तमान काले महाविदेह क्षेत्र में विचरते हुए तीर्थङ्कर भगवान को नमस्कार करके अपने धर्माचार्य जी को नमस्कार करता हूँ। साधु प्रमुख चारों तीर्थों को खमा के, सर्व जीव राशि को खमाकर के, पहले जो व्रत आदरे हैं, उनमें जो अतिचार दोष लगे हैं, वे सर्व आलोच के, पडिक्कम करके, निंद के, निःशल्य होकर के, सव्वं पाणाइवायं पच्चक्खामि, सव्वं मुसावायं पच्चक्खामि, सव्वं अदिण्णादाणं पच्चक्खामि, सव्वं {29} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
- तस्स धम्मस्स का पाठ
पाँच पदों की भाव वन्दना
- पहले पद श्री अरिहंत भगवान, जघन्य बीस तीर्थङ्करजी उत्कृष्ट एक सौ साठ तथा एक सौ सित्तर देवाधिदेव जी उनमें वर्तमान काल में 20 विहरमानजी महाविदेह क्षेत्र में विचरते हैं। एक हजार आठ लक्षण के धरणहार, चौंतीस अतिशय पैंतीस वाणी कर के विराजमान, चौसठ इन्द्रों के वन्दनीय, पूजनीय, अठारह दोष रहित, बारह गुण सहित (1) अनन्त ज्ञान, (2) अनन्त दर्शन, (3) अनन्त चारित्र, (4) अनन्त बल वीर्य, (5) दिव्य ध्वनि, (6) भामण्डल, (7) स्फटिक सिंहासन, (8) अशोक वृक्ष, (9) कुसुम वृष्टि, (10) देव- {31} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
दुन्दुभि, (11) छत्र धरावें, (12) चॅवर बिजावें, पुरुषाकार पराक्रम के धरणहार, ऐसे अढ़ाई द्वीप पन्द्रह क्षेत्र में विचरते हैं। जघन्य दो क्रोड़ केवली उत्कृष्ट नव क्रोड़ केवली, केवल ज्ञान, केवल दर्शन के धरणहार, सर्वद्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव के जाननहार-
सवैया- नमूँ श्री अरिहंत, कर्मों का किया अन्त । हुआ सो केवल वन्त, करुणा भण्डारी है ।।। ।।
अतिशय चौंतीसधार, पैंतीसवाणी उच्चार ।
समझावे नर-नार, पर उपकारी है ।।2 ।।
शरीर सुन्दरकार, सूरज सो झलकार ।
गुण है अनन्त सार, दोष परिहारी है ।।3 ।।
कहत है तिलोक रिख, मन वच काया करी ।
अमूर्त, (7) अगुरु-लघु, (8) अनन्त आत्म सामर्थ्य, ये आठ गुण कर के सहित हैं।
सवैया- सकल करम टाल, वश कर लियो काल ।
मुगती में रह्या माल, आत्मा को तारी है ।।। ।।
देखत सकल भाव, हुआ है जगत् राव ।
सदा ही क्षायिक भाव, भये अविकारी है ।।2 ।।
{33} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
अचल अटल रूप, आवे नहीं भव कूप ।
अनूप स्वरूप ऊप, ऐसे सिद्ध धारी हैं ।।3 ।।
कहत हैं तिलोक रिख, बताओ ए वास प्रभू ।
सदा ही उगते सूर’, वन्दना हमारी है ।।4।
ऐसे श्री सिद्ध भगवान, दीनदयालजी महाराज, आपकी दिवस सम्बन्धी अविनय आशातना की हो तो हे सिद्ध भगवान ! मेरा अपराध बारम्बार क्षमा करिये, मैं हाथ जोड़, मान मोड़, शीश नमाकर तिक्खुत्तो के पाठ से 1008 बार वंदना नमस्कार करता हूँ।
आप मांगलिक हो, आप उत्तम हो, हे स्वामिन् ! हे नाथ ! आपका इस भव, पर भव, भव भव में सदाकाल शरण होवे । 40. तीजे पद श्री आचार्य जी महाराज 36 गुण करके विराजमान, पाँच महाव्रत पाले, पाँच आचार पाले, पाँच इन्द्रियाँ जीते, चार कषाय टाले, नववाड़ सहित शुद्ध ब्रह्मचर्य पाले, पाँच समिति तीन गुप्ति शुद्ध आराधें। ये 36 गुण करके सहित हैं। आठ सम्पदा-1. आचार सम्पदा, 2. श्रुत सम्पदा, 3. शरीर सम्पदा, 4. वचन सम्पदा, 5. वाचना सम्पदा, 6. मति सम्पदा, 7. प्रयोगमति सम्पदा और 8. संग्रह परिज्ञा सम्पदा सहित हैं।
- सायंकाल के समय “सदा ही सायंकाल बोलें।”
{34} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
सवैया- गुण है छत्तीस पूर, धरत धरम उर ।
मारत करम क्रूर, सुमति विचारी है ।।। ।।
शुद्ध सो आचारवन्त, सुन्दर है रूप कंत ।
भणिया सब ही सिद्धांत, वाचणी सु प्यारी है।।2।। अधिक मधुर वेण, कोइ नहीं लोपे केण ।
सकल जीवों का सेण, कीरति अपारी है ।।3।।
कहत हैं तिलोक रिख, हितकारी देत सीख ।
ऐसे आचाराज जी को, वन्दना हमारी है ।।4।।
ऐसे श्री आचार्य जी महाराज ! न्याय पक्षी, भद्रिक परिणामी, परम पूज्य, कल्पनीय, अचित्त वस्तु के ग्रहणहार, सचित्त के त्यागी, वैरागी, महागुणी, गुणों के अनुरागी, सौभागी हैं। ऐसे श्री आचार्य जी महाराज आपकी दिवस सम्बन्धी अविनय आशातना की हो तो हे आचार्य जी महाराज ! मेरा अपराध बारम्बार क्षमा करिए। मैं हाथ जोड़, मान मोड़ शीश नमाकर तिक्खुत्तो के पाठ से 1008 बार वन्दना नमस्कार करता हूँ। तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि, वंदामि, नमंसामि, सक्कारेमि, सम्माणेमि, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, चेइयं, पज्जुवासामि, मत्थएण वंदामि ।।
आप मांगलिक हो, आप उत्तम हो, हे स्वामिन् ! हे नाथ! आपका इस भव, पर भव, भव भव में सदाकाल शरण होवे । 41. चौथे पद श्री उपाध्याय जी महाराज 25 गुण करके विराजमान, ग्यारह अंग, बारह उपांग, चरण सत्तरी, करण सत्तरी ये पच्चीस {35} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
गुण करके सहित हैं, ग्यारह अंग का पाठ अर्थ सहित सम्पूर्ण जाने, चौदह पूर्व के पाठक और बत्तीस सूत्रों के जानकार हैं- ग्यारह अंग-आचारांग, सूयगडांग, ठाणांग, समवायांग, भगवती, ज्ञाताधर्मकथा, उवासगदसा, अंतगडदसा, अणुत्तरो- ववाइय, प्रश्नव्याकरण, विपाक सूत्र ।
बारह उपांग-उववाई, रायप्पसेणी, जीवाजीवाभिगम, पन्नवणा, जम्बूदीवपन्नत्ती, चन्दपन्नत्ती, सूरपन्नत्ती, निरयावलिया, कप्पवडंसिया, पुप्फिया, पुप्फचूलिया, वण्हिदसा । चार मूल सूत्र-उत्तराध्ययन, दशवैकालिक, नन्दीसूत्र और अनुयोगद्वार सूत्र ।
चार छेद-दशाश्रुत स्कन्ध, वृहत्कल्प, व्यवहार सूत्र, निशीथ सूत्र और
बत्तीसवाँ आवश्यक सूत्र-तथा अनेक ग्रन्थों के जानकार, सात नय, चार निक्षेप, निश्चय, व्यवहार, चार प्रमाण आदि स्वमत तथा अन्यमत के जानकार । मनुष्य या देवता कोई भी विवाद में जिनको छलने में समर्थ नहीं, जिन नहीं पण जिन सरीखे, केवली नहीं पण केवली सरीखे हैं ।
सवैया- पढ़त इग्यारह अंग, कर्मों से करे जंग । पाखंडी को मान भंग, करण हुशियारी है ।।। ।।
चवदे पूर्वधार, जानत आगम सार ।
भवियन के सुखकार, भ्रमता निवारी है ।।2 ।।
पढ़ावे भविक जन, स्थिर कर देत मन ।
तप करि तावे तन, ममता को मारी है ।।3 ।।
{36} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
कहत है तिलोक रिख, ज्ञान भानु परतिख ।
ऐसे उपाध्याय जी को, वन्दना हमारी है ।।4।।
ऐसे श्री उपाध्याय जी महाराज मिथ्यात्व रूप अन्धकार के मेटणहार, समकित रूप उद्योत के करणहार, धर्म से डिगते प्राणी को स्थिर करने वाले, सारए, वारए, धारए इत्यादि अनेक गुण करके सहित हैं। ऐसे श्री उपाध्यायजी महाराज आपकी दिवस सम्बन्धी अविनय आशातना की हो तो, हे
उपाध्याय जी महाराज ! मेरा अपराध बारम्बार क्षमा करें। मैं हाथ जोड़, मान मोड़, शीश नमाकर तिक्खुत्तो के पाठ से 1008 बार वन्दना नमस्कार करता हूँ।
आप मांगलिक हो, आप उत्तम हो, हे स्वामिन् ! हे नाथ ! आपका इस भव, पर भव, भव भव में सदा काल शरण होवे। 42. पाँचवें पद ‘नमो लोए सव्व साहूणं’ अढ़ाई द्वीप पन्द्रह क्षेत्र रूप लोक के विषय में सर्व साधुजी महाराज जघन्य दो हजार क्रोड़, उत्कृष्ट नव हजार क्रोड़ जयवन्ता विचरें। पाँच महाव्रत पाले, पाँच इन्द्रिय जीते, चार कषाय टाले, भाव सच्चे, करण सच्चे, जोग सच्चे, क्षमावंत, वैराग्य वंत, मन समाधारणया, वय समाधारणया, काय समाधारणया, नाण सम्पन्ना, दंसण सम्पन्ना, चारित्त सम्पन्ना, वेदनीय समाअहियासन्निया, मारणंतिय {37} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
समाअहियासन्निया ऐसे सत्ताईस गुण करके सहित हैं। पाँच आचार पाले, छहकाय की रक्षा करे, सात भय त्यागे, आठ मद छोड़े, नववाड़ सहित शुद्ध ब्रह्मचर्य पाले, दस प्रकारे यति धर्म धारे, बारह भेदे तपस्या करे, सतरह भेदे संयम पाले, अठारह पापों को त्यागे, बाईस परिषह जीते, तीस महामोहनीय कर्म निवारे, तैंतीस आशातना टाले, बयालीस दोष टाल कर आहार पानी लेवे, सैंतालीस दोष टाल कर भोगे, बावन अनाचार टाले, तेड़िया (बुलाये) आवे नहीं, नेतीया जीमे नहीं, सचित्त के त्यागी, अचित्त के भोगी, लोच करे, नंगे पैर चले इत्यादि कायक्लेश और मोह ममता रहित हैं।
सवैया- आदरी संयम भार, करणी करे अपार ।
समिति गुप्तिधार, विकथा निवारी है ।।। ।।
जयणा करे छः काय, सावद्य न बोले वाय ।
बुझाय कषाय लाय, किरिया भण्डारी है ।।2 ।।
ज्ञान भणे आठों याम, लेवे भगवन्त नाम ।
धरम को करे काम, ममता कूँ मारी है ।।3 ।।
कहत है तिलोक रिख, करमों को टाले विख ।
ऐसे मुनिराज ताकूँ, वन्दना हमारी है ।।4 ।।
ऐसे मुनिराज महाराज आपकी दिवस संबंधी अविनय आशातना की हो तो हे मुनिराज महाराज ! मेरा अपराध बारम्बार क्षमा करिये। मैं हाथ जोड़, मान मोड़, शीश नमाकर तिक्खुत्तो के पाठ से 1008 बार वन्दना नमस्कार करता हूँ।
{38} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
आप मांगलिक हो, आप उत्तम हो, हे स्वामिन् ! हे नाथ ! आपका इस भव, पर भव, भव भव में सदा काल शरण होवे। दोहा
सागर में पाणी घणों, गागर में न समाय ।
पाँचों पदों में गुण घणा, माँ सू कह्यो न जाय ।। इसके बाद सीधे बैठ कर अग्रलिखित पाठ बोलें । 43. अनन्त चौबीसी का पाठ
अनन्त चौबीसी जिन नमूँ, सिद्ध अनन्ता क्रोड़ । केवल ज्ञानी गणधरा, वन्दूँ बे कर जोड़ ।।1।। दोय क्रोड़ केवल धरा, विहरमान जिन बीस । सहस्र युगल क्रोड़ी नमूँ, साधु नमूँ निश दीस ।।2।। धन साधु धन साध्वी, धन धन है जिन-धर्म । ये सुमर्या पातक झरे, टूटे आठों कर्म ।।3।। अरिहन्त सिद्ध समरूँ सदा, आचारज उपाध्याय । साधु सकल के चरण को, वन्दूँ शीश नमाय ।।4।। अँगुष्ठे अमृत बसे, लब्धि तणा भण्डार ।
श्री गुरु गौतम सुमरिये, वांछित फल दातार ।।5।। इसके बाद खड़े होकर अग्रलिखित पाठ बोलें । {39} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
- आयरिय उवज्झाए का पाठ
आयरिय-उवज्झाए, सीसे साहम्मिए कुल-गणे य ।
जे मे केइ कसाया, सव्वे तिविहेणं खामेमि ।। 1 ।।
सव्वस्स समण-संघस्स, भगवओ अंजलिं करिअ सीसे ।
सव्वं खमावइत्ता, खमामि सव्वस्स अहयं पि ।। 2 ।।
सव्वस्स जीव-रासिस्स, भावओ धम्मं निहिय नियचित्तो ।
सव्वं खमावइत्ता, खमामि सव्वस्स अहयं पि ।। 3 ।।
- अढ़ाई द्वीप पन्द्रह क्षेत्र का पाठ
ऐसे अढ़ाई द्वीप पन्द्रह क्षेत्र में तथा बाहर, श्रावक-श्राविका दान देवें, शील पाले, तपस्या करे, शुद्ध भावना भावे, संवर करे, सामायिक करे, पौषध करे, प्रतिक्रमण करे, तीन मनोरथ चिन्तवे, चौदह नियम चितारे, जीवादि नव पदार्थ जाने, ऐसे श्रावक के इक्कीस गुण करके युक्त, एक व्रतधारी जाव बारह व्रतधारी, भगवन्त की आज्ञा में विचरें ऐसे बड़ों से हाथ जोड़, पैर पड़कर, क्षमा माँगता हूँ। आप क्षमा करें, आप क्षमा करने योग्य हैं और शेष सभी को खमाता हूँ।
- चौरासी लाख जीव योनि का पाठ
सात लाख पृथ्वी काय, सात लाख अप्काय, सात लाख तेऊ
काय, सात लाख वायु काय, दस लाख प्रत्येक वनस्पति काय, चौदह लाख साधारण वनस्पति काय, दो लाख बेइन्द्रिय, दो लाख तेइन्द्रिय, दो लाख चउरिन्द्रिय, चार लाख देवता, चार लाख नारकी, चार लाख तिर्यंच पंचेन्द्रिय, चौदह लाख मनुष्य, ऐसे चार गति चौबीस दण्डक, चौरासी लाख जीव योनि में सूक्ष्म, बादर, पर्याप्त, अपर्याप्त जीवों में से किसी जीव का हालते, चालते, उठते, बैठते, {40} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
सोते जागते, हनन किया हो, हनन कराया हो, हनताँ प्रति अनुमोदन किया हो, छेदा हो, भेदा हो, किलामना उपजाई हो तो मन वचन काया करके (18,24,120) अठारह लाख चौबीस हजार एक सौ बीस प्रकारे जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।। 47. क्षमापना-पाठ
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे ।
मित्ति मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झं न केणई ।।। ।।
एवमहं आलोइय-निन्दिय-गरिहिय-दुगुंछियं सम्मं ।
तिविहेणं पडिक्कंतो, वंदामि जिण-चउव्वीसं ।। 2 ।।
इसके बाद अठारह पाप स्थान का पाठ बोलें। फिर तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वंदना करें। पहला सामायिक, दूसरा चउवीसत्थव, तीसरी वंदना, चौथा प्रतिक्रमण ये चार आवश्यक समाप्त हुए। पाँचवाँ आवश्यक
पाँचवें आवश्यक की आज्ञा है कहकर, निम्न पाठ बोलें । 48. प्रायश्चित्त का पाठ
देवसिय¹-पायच्छित्त-विसोहणत्थं करेमि काउस्सग्गं । इसके बाद नवकार मंत्र, करेमि भंते, इच्छामि ठामि और तस्सउत्तरी का पाठ झाणेणं तक बोल कर ‘चार लोगस्स² का काउस्सग्ग’ ऐसा बोलकर अप्पाणं वोसिरामि कहने के साथ ही काउस्सग्ग करें। 1. प्रातःकाल में राइय, पक्खी को पक्खिय, चौमासी को चाउम्मासियं और संवत्सरी को संवच्छरिय बोलें ।
- देवसिय व राइय को 4, पक्खी को 8, चौमासी को 12, संवत्सरी को 20 लोगस्स का काउस्सग्ग करें।
{41} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
फिर काउस्सग्ग पूर्ण होने पर ‘णमो अरिहंताणं’ कह कर काउस्सग्ग पारें । कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ बोलें फिर एक लोगस्स प्रकट व दो बार सविधि इच्छामि खमासमणो के पाठ से वन्दना करें। इसके बाद तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना करें। पहला सामायिक, दूसरा चउवीसत्थव, तीसरी वन्दना, चौथा प्रतिक्रमण, पाँचवाँ कायोत्सर्ग ये पाँच आवश्यक समाप्त हुए।
छठा आवश्यक
छठे आवश्यक की आज्ञा है कहकर, यदि गुरुदेव हों तो उनसे, वे न हों तो बड़े श्रावक जी से पच्चक्खाण करें अन्यथा स्वयं करें। 49. समुच्चय पच्चक्खाण का पाठ
गंठिसहियं, मुट्ठिसहियं, नमुक्कारसहियं, पोरिसियं, साढ - पोरिसियं, तिविहंपि चउविहंपि आहारं असणं, पाणं, खाइमं, साइमं, अपनी-अपनी धारणा प्रमाणे पच्चक्खाण, अन्नत्थऽ- णाभोगेणं, सहसागारेणं, महत्तरागारेणं, सव्व समाहिवत्ति- यागारेणं वोसिरामि ।’
पच्चक्खाण लेने के बाद निम्न पाठ बोलें ।
- अन्तिम पाठ
पहला सामायिक, दूसरा चउवीसत्थव, तीसरी वन्दना, चौथा
प्रतिक्रमण, पाँचवाँ काउस्सग्ग और छट्ठा प्रत्याख्यान इन 6 आवश्यकों में अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार जानते अजानते कोई दोष लगा हो तथा पाठ उच्चारण करते समय काना, मात्रा, अनुस्वार, पद, 1. स्वयं पच्चक्खाण करें तो ‘वोसिरामि’ दूसरों को करावें तो ‘वोसिरे-वोसिरे’ बोलें । {42} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
अक्षर, हस्व, दीर्घ, न्यूनाधिक, विपरीत पढ़ने में आया हो तो अनन्त सिद्ध केवली भगवान की साक्षी से देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
मिथ्यात्व का प्रतिक्रमण, अव्रत का प्रतिक्रमण, प्रमाद का प्रतिक्रमण, कषाय का प्रतिक्रमण, अशुभ योग का प्रतिक्रमण इन पाँच प्रतिक्रमणों में से कोई प्रतिक्रमण नहीं किया हो या अविधि से किया हो तथा ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप सम्बन्धी कोई दोष लगा हो तो देवसिय सम्बन्धी तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।।
गये काल का प्रतिक्रमण, वर्तमान काल की सामायिक, आगामी काल के पच्चक्खाण जो भव्य जीव करते हैं, कराते हैं, करने वाले का अनुमोदन करते हैं उन महापुरुषों को धन्य है, धन्य है। सम, संवेग, निर्वेद, अनुकम्पा और आस्था, ये पाँच व्यवहार समकित के लक्षण हैं, इनको मैं धारण करता हूँ। देव अरिहन्त, गुरु निर्ग्रन्थ, केवली भाषित दयामय धर्म ये तीन तत्त्व सार, संसार असार भगवन्त महाराज आपका मार्ग सच्चं, सच्चं, सच्चं थवथुई मंगलं । दोहा
आगे आगे दव बले, पीछे हरिया होय ।
बलिहारी उस वृक्ष की, जड़ काट्याँ फल होय ।।
इसके बाद बायाँ घुटना खड़ा करके दो बार नमोत्थुणं का पाठ बोलें, फिर तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना करें। प्रतिक्रमण पूर्ण होने पर स्वधर्मी भाई परस्पर क्षमायाचना करें। इसके बाद चौबीसी, स्तवन आदि बोलें ।
।। सविधि प्रतिक्रमण सूत्र समाप्त ।।
{43} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
प्रतिक्रमण की विधि
सर्वप्रथम तिक्खुत्तो के पाठ से वन्दना करें। 1. चउवीसत्थव की आज्ञा-नवकार मंत्र, इच्छाकारेणं, तस्सउत्तरी, एक लोगस्स के पाठ का काउस्सग्ग करें, कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ, एक लोगस्स प्रकट, दो बार नमोत्थुणं, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना । 2. प्रतिक्रमण ठाने (करने) की आज्ञा-इच्छामि णं भंते, नवकार मन्त्र, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना । 3. प्रथम आवश्यक की आज्ञा-करेमि भंते, इच्छामि ठामि, तस्स उत्तरी, 99 अतिचारों का काउस्सग्ग, (काउस्सग्ग में आगमे तिविहे, अरिहंतो महदेवो, बारह स्थूल, छोटी संलेखना, 99 अतिचारों के समुच्चय का पाठ, अठारह पापस्थान, इच्छामि ठामि का चिन्तन करें) कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना ।
-
दूसरे आवश्यक की आज्ञा-लोगस्स का पाठ, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना ।
-
तीसरे आवश्यक की आज्ञा-इच्छामि खमासमणो के पाठ से विधिसहित दो बार वन्दना, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना ।
-
चौथे आवश्यक की आज्ञा-
(अ) आगमे तिविहे, अरिहंतो महदेवो, बारह स्थूल, छोटी {44} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र / 89
90 / श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
संलेखना, 99 अतिचारों के समुच्चय का पाठ, अठारह पापस्थान, इच्छामि ठामि, तस्स सव्वस्स का पाठ, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना ।
(ब) श्रावक सूत्र जी की आज्ञा-नवकार मंत्र, करेमि भंते, चत्तारि मंगलं, इच्छामि ठामि, इच्छाकारेणं, आगमे तिविहे, दंसण समकित, बारह व्रत, बड़ी
संलेखना (पालथी लगाकर), अठारह पापस्थान,
इच्छामि ठामि, तस्स धम्मस्स, इच्छामि खमासमणो के पाठ से विधिवत् दो बार वन्दना ।
(स) पाँच पदों की वन्दना-नवकार मंत्र, पाँचों पद, अनन्त चौबीसी, आयरिय उवज्झाए, अढ़ाई द्वीप का पाठ, चौरासी लाख जीवयोनि का पाठ, क्षमापना पाठ, अठारह पापस्थान, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना । 7. पाँचवें आवश्यक की आज्ञा-प्रायश्चित्त का पाठ, नवकार मंत्र, करेमि भंते, इच्छामि ठामि, तस्सउत्तरी, लोगस्स का (सामान्य दिनों में 4, पक्खी को 8, चौमासी को 12 तथा संवत्सरी को 20 लोगस्स का) काउस्सग्ग करें, कायोत्सर्ग शुद्धि का पाठ एवं लोगस्स प्रकट में, इच्छामि खमासमणो के पाठ से विधिवत् दो बार वन्दना, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना ।
- छड्डे आवश्यक की आज्ञा-समुच्चय पच्चक्खाण का पाठ, प्रतिक्रमण समुच्चय (अन्तिम पाठ), नमोत्थु णं दो बार, तिक्खुत्तो के पाठ से तीन बार वन्दना ।
।।।
{45} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
सामायिक सूत्र-अर्थ
गुरु वन्दना सूत्र
तिक्खुत्तो
आयाहिणं
तीन बार ।
स्वयं के दाहिनी ओर (अपने दोनों हाथों को जोड़कर मस्तक पर रखकर अपने स्वयं के दाहिने (Right) कान की ओर से ले जाते हुए गले के पास से बायें कान की ओर ऊपर ले जाकर पुनः मस्तक के बीच में लाना, आवर्तन है।
पयाहिणं
करेमि
वंदामि
नमंसामि
प्रदक्षिणा ।
करता हूँ।
वन्दना (गुणगान-स्तुति) करता हूँ। नमस्कार करता हूँ। (यहाँ पर माथा जमीन पर लगायें)
सक्कारेमि
सम्माणेमि
कल्लाणं
मंगलं
देवयं
सत्कार करता हूँ।
सम्मान देता हूँ। (क्योंकि)
आप कल्याण रूप हैं।
आप मंगल रूप हैं।
आप धर्ममय देव रूप हैं।
चेइयं
पज्जुवासामि
मत्थएण
वंदामि
ज्ञानवान अर्थात् ज्ञान से शिष्यों के चित्त को प्रसन्न करने वाले हो। (इसलिए) (मैं) आपकी उपासना करता हूँ, (व) मस्तक झुकाकर ।
वन्दना (नमस्कार) करता हूँ।
{46} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र नवकार महामन्त्र
णमो अरिहंताणं अरिहंत भगवन्तों को नमस्कार हो। णमो सिद्धाणं सिद्ध भगवंतों को नमस्कार हो। णमो आयरियाणं आचार्यों को नमस्कार हो।
णमो उवज्झायाणं उपाध्यायों को नमस्कार हो। णमो लोए सव्वसाहूणं लोक में सब साधुओं को नमस्कार हो। एसो यह।
पंच- पाँच अर्थात् पाँचों पदों को किया गया। णमोक्कारो नमस्कार।
सव्व-पावप्पणासणो सब पापों का नाश करने वाला है। मंगलाणं च सव्वेसिं और सभी मंगलों में। पढमं हवइ मंगलं प्रथम (प्रधान-सर्वोत्कृष्ट-सर्वोत्तम) मंगल है।
ईर्यापथिक सूत्र
इच्छाकारेणं संदिसह भगवं ! हे भगवान ! इच्छापूर्वक आज्ञा दीजिए (क्योंकि मेरी इच्छा है कि मैं)।
इरियावहियं पडिक्कमामि मार्ग में आने-जाने सम्बन्धी क्रिया का प्रतिक्रमण करूँ ।
इच्छं आज्ञा मिलने पर साधक बोलता है कि आपकी आज्ञा स्वीकार ।
इच्छामि चाहता हूँ।
पडिक्कमिउं निवृत्त होना (प्रतिक्रमण करना)। {47} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
इरियावहियाए
विराहणाए
गमणागमणे
पाणक्कमणे
बीयक्कमणे
हरियक्कमणे
ओसा
उत्तिंग
पणग
दग
मट्टी
मक्कडा संताणा
संकमणे
जे मे जीवा विराहिया
एगिंदिया
बेइंदिया
तेइंदिया
चउरिंदिया
पंचिंदिया
अभिहया
वत्तिया
लेसिया
ईर्या (आने-जाने का) पथ सम्बन्धी । विराधना से ।
जाने व आने में।
प्राणी के दबने से । बीज के दबने से ।
हरी (वनस्पति) के दबने से । ओस का पानी ।
कीड़ियों के बिल । पाँच प्रकार की काई (पाँच रंग की काई)। सचित्त पानी ।
सचित्त मिट्टी ।
मकड़ी के जाले को। कुचल जाने से ।
जो मेरे द्वारा जीवों की विराधना हुई अथवा जो मैंने जीवों की विराधना की। (उन) एक इंद्रिय वाले। दो इंद्रियों वाले । तीन इंद्रियों वाले । चार इन्द्रियों वाले । पाँच इन्द्रियों वाले जीवों को। सामने आते हुए को ठेस पहुँचाई हो। धूल आदि से ढँके हो। भूमि आदि पर रगड़े-मसले हों। {48} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र संघाइया
संघट्टिया
परियाविया
किलामिया
उद्दविया
ठाणाओ ठाणं संकामिया
जीवियाओ ववरोविया
तस्स मिच्छा मि दुक्कडं इकट्ठे किये हों।
पीड़ा पहुँचे जैसे गाढ़े छुए हों। परिताप (कष्ट) पहुँचाया हो। खेद उपजाया हो।
हैरान किया हो।
एक स्थान से दूसरे स्थान पर रखे हों। जीवन (प्राणों) से रहित किया हो। वह मेरा पाप मिथ्या हो (निष्फल हो)। आत्म शुद्धि सूत्र
तस्स
उत्तरीकरणेणं
पायच्छित्तकरणेणं
विसोहिकरणेणं
विसल्लीकरणेणं
पावाणं कम्माणं
निग्धायणट्ठाए
ठामि काउस्सग्गं
अन्नत्थ
ऊससिएणं
नीससिएणं
उस (दूषित आत्मा) को।
उत्कृष्ट (शुद्ध) बनाने के लिए। प्रायश्चित्त करने के लिए। विशेष शुद्धि करने के लिए। शल्य रहित करने के लिए। पाप कर्मों का।
नाश करने के लिए।
कायोत्सर्ग करता हूँ। अर्थात् शरीर से ममता हटाता हूँ-काया के व्यापारों का त्याग करता हूँ।
इन निम्नोक्त क्रियाओं को छोड़कर। (ऊँचा) श्वास लेने से। (नीचा) श्वास छोड़ने से। {49} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र खासिएणं
छीएणं
जंभाइएणं
उड्डुएणं
वाय-निसग्गेणं
भमलीए
पित्त-मुच्छाए
सुहुमेहिं अंग-संचालेहिं सुहुमेहिं खेल-संचालेहिं सुहुमेहिं दिद्वि-संचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहिं
अभग्गो अविराहिओ
हुज्ज मे काउस्सग्गो
जाव अरिहंताणं भगवंताणं णमोक्कारेणं ण पारेमि
ताव कायं
ठाणेणं
मोणेणं
झाणेणं
अप्पाणं वोसिरामि
खाँसी आने से ।
छींक आने से ।
उबासी (जम्हाई) आने से । डकार आने से ।
अधो-वायु निकलने से ।
चक्कर आने से ।
पित्त के कारण मूर्छित्त होने से । सूक्ष्म रूप से अंग हिलने से । सूक्ष्म रूप से कफ का संचार होने से । सूक्ष्म रूप से दृष्टि का संचार होने से अर्थात् नेत्र फड़कने से ।
इस प्रकार इत्यादि आगारों से । अभग्न (अखण्ड) अविराधित । मेरा कायोत्सर्ग हो ।
जब तक अरिहंत भगवान को । नमस्कार करके (इस कायोत्सर्ग को) नहीं पालूँ ।
तब तक शरीर को ।
स्थिर रख कर ।
मौन धरकर (रख कर) ।
मन को एकाग्र करने के साथ ही। अपनी आत्मा को पाप कर्मों से अलग करता हूँ अर्थात् पापात्मा को छोड़ता हूँ। {50} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र लोगस्स (तीर्थङ्कर स्तुति) सूत्र लोगस्स उज्जोयगरे
धम्म-तित्थयरे
जिणे
अरिहंते कित्तइस्सं
चउवीसंपि केवली
उसभमजियं च वंदे
संभवमभिणंदणं च
सुमई च
पउमप्पहं सुपासं
जिणं च
चंदप्पहं वंदे
सुविहिं च पुप्फदंतं
सीयल-सिज्जंस-
वासुपुज्जं च
विमलमणंतं च जिणं
धम्मं संतिं च वंदामि
कुंथु अरं च मल्लिं वंदे
मुणिसुव्वयं नमिजिणं च
लोक में प्रकाश (उद्योत) करने वाले । धर्मतीर्थ की स्थापना करने वाले “धर्म तीर्थङ्कर” (चतुर्विध संघ के संस्थापक)। राग द्वेष के विजेता जिनेश्वर । (ऐसे) अरिहंतों का कीर्त्तन (स्तुति)। सभी चौबीसों तीर्थङ्करों की । ऋषभदेवजी व अजितनाथजी को वन्दना करता हूँ।
सम्भवनाथजी व अभिनन्दनजी को । सुमति नाथ जी को और ।
पद्मप्रभजी, सुपार्श्वनाथजी को । और जिनेश्वर ।
चन्द्रप्रभ को वन्दना करता हूँ। सुविधिनाथजी जिनका दूसरा नाम पुष्पदंत जी है उनको तथा
शीतलनाथजी, श्रेयांसनाथजी को । और वासुपूज्यजी को व
विमलनाथजी और अनन्तनाथजी जिनेश्वर को एवं
धर्मनाथजी और शान्तिनाथजी को वन्दना करता हूँ।
कुंथुनाथजी, अरनाथजी और मल्लिनाथजी को वन्दना करता हूँ।
मुनिसुव्रत स्वामीजी और नमिनाथजी (जिन) को और
{51} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र वंदामि रिट्ठनेमिं
पासं तह वद्धमाणं च
एवं मए
अभिथुआ
विहूय-रयमला
पहीण-जरमरणा
चउवीसंपि
जिणवरा
तित्थयरा मे पसीयंतु
कित्तिय वंदिय महिया
जे ए लोगस्स उत्तमासिद्धा
आरुग्ग-बोहिलाभं
समाहिवरमुत्तमं दिंतु
चंदेसु निम्मलयरा
आइच्चेसु अहियं पयासयरा
सागरवर-गंभीरा
सिद्धा सिद्धिं मम
दिसंतु
अरिष्टनेमिजी को वन्दना करता हूँ। पार्श्वनाथजी और वर्धमान महावीर स्वामी को (वन्दना करता हूँ)।
इस प्रकार, मेरे द्वारा।
स्तुति किये गये।
कर्म रूपी रज मैल से रहित।
बुढ़ापा और मृत्यु से रहित।
चौबीसों ही।
जिनवर।
तीर्थंकर देव मुझ पर प्रसन्न होवें। वचन योग से कीर्तित, मनोयोग से पूजित, काय योग से वंदित।
जो ये लोक के अन्दर उत्तम सिद्ध हैं। वे मुझे आरोग्यता व बोधि लाभ एवं श्रेष्ठ उत्तम समाधि देवें। जो चन्द्रमाओं से भी अधिक निर्मल हैं। सूर्यों से अधिक प्रकाश करने वाले। श्रेष्ठ महासागर के समान गम्भीर। सिद्ध भगवान् मुझे सिद्ध गति प्रदान करें।
सामायिक प्रतिज्ञा सूत्र (करेमि भंते) करेमि भंते ! सामाइयं
हे भगवन् ! मैं सामायिक ग्रहण करता हूँ। सावज्जं जोगं
पच्चक्खामि
सावद्य (पापकारी) योग (व्यापारों) का। त्याग करता हूँ।
{52} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र जाव नियमं पज्जुवासामि
दुविहं तिविहेणं
न करेमि
न कारवेमि
मणसा वयसा कायसा
तस्स भंते !
पडिक्कमामि
निंदामि
गरिहामि
अप्पाणं वोसिरामि
नमोत्थु णं
अरिहंताणं भगवंताणं
आइगराणं
तित्थयराणं
सयं-संबुद्धाणं
पुरिसुत्तमाणं
पुरिससीहाणं
पुरिसवरपुंडरीयाणं
पुरिसवरगंधहत्थीणं
जब तक सामायिक के नियम का सेवन करूँ तब तक ।
दो करण, तीन योग से ।
(पापकर्म) मैं स्वयं नहीं करूँगा। (व) दूसरों से नहीं करवाऊँगा। मन, वचन और काया से (और)
हे भगवन् ! उन पूर्वकृत पापों का। प्रतिक्रमण करता हूँ अर्थात् पापों से पीछे हटता हूँ।
आत्म साक्षी से निंदा करता हूँ। गुरु साक्षी से गर्हा (निंदा) करता हूँ। पाप युक्त आत्मा को छोड़ता हूँ, अर्थात् आत्मा को पाप से अलग करता हूँ।
शक्रस्तव (नमोत्थु णं) सूत्र नमस्कार हो ।
अरिहंत भगवन्तों को। (जो)
धर्म की आदि करने वाले ।
धर्मतीर्थ (चतुर्विध संघ) की स्थापना करने वाले ।
अपने आप बोध को प्राप्त ।
पुरुषों में उत्तम ।
पुरुषों में सिंह के समान (पराक्रमी) । पुरुषों में श्रेष्ठ पुंडरीक कमल के समान । पुरुषों में श्रेष्ठ गंधहस्ती के समान । {53} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र लोगुत्तमाणं
लोग-नाहाणं
लोग-हियाणं
लोग-पईवाणं
लोग-पज्जोअगराणं
अभयदयाणं
चक्खुदयाणं
मग्गदयाणं
सरणदयाणं
जीवदयाणं
बोहिदयाणं
धम्मदयाणं
धम्मदेसयाणं
धम्मनायगाणं
धम्मसारहीणं
धम्मवर-चाउरंत-
चक्कवट्टीणं
दीवोत्ताणं
सम्पूर्ण लोक में उत्तम ।
सम्पूर्ण लोक के नाथ ।
सम्पूर्ण लोक का हित करने वाले । लोक में प्रकाशित दीप के समान । लोक में धर्म का प्रद्योत (प्रकाश) करने वाले ।
सम्पूर्ण जीवों को भय रहित करने वाले अर्थात् अभय-दान देने वाले ।
ज्ञान रूपी चक्षु देने वाले । मोक्ष-मार्ग बताने वाले, मार्ग प्रदाता । (कुमार्ग से बचाकर सन्मार्ग में लगाने में सहायक भूत होने से) शरण देने वाले अर्थात् शरणदाता ।
संयम-मय जीवन देने वाले ।
सम्यक्त्व रत्न रूपी बोधि के दाता । धर्म ग्रहण कराने वाले (धर्म पथ का बोध देने वाले) धर्म दाता ।
धर्मोपदेशक ।
धर्म संघ का नायकत्व करने से धर्म के नेता ।
धर्म रूप रथ को चलाने वाले धर्म सारथी । चार गति का अन्त करने वाले श्रेष्ठ धर्म । चक्रवर्ती ।
संसार-सागर में द्वीप के समान त्राण (सहारा-रक्षक) आधारभूत ।
{54} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र सरणगइपइट्ठाणं
अप्पडिहय-
वरनाणदंसण-धराणं
विअट्टछउमाणं
जिणाणं
जावयाणं
तिन्नाणं
तारयाणं
बुद्धाणं
बोहयाणं
मुत्ताणं
मोयगाणं
सव्वण्णूणं सव्वदरिसीणं
सिव-मयल-मरूअ-मणंत-
मक्खय-मव्वाबाह-
मपुणरावित्ति-
सिद्धिगइ-नामधेयं ठाणं
संपत्ताणं
णमो जिणाणं जिअभयाणं
ठाणं संपाविउकामाणं
दुःखी प्राणियों को आश्रय देने वाले सुगति में सहायक, पृथ्वी के समान आधारभूत । पुनः नष्ट नहीं होने वाला अप्रतिहत । श्रेष्ठ ज्ञान, दर्शन के धारक । छद्मस्थता से रहित ।
स्वयं रागद्वेष के विजेता ।
दूसरों को जिताने में सहायता देने वाले । स्वयं संसार-सागर से तिरने वाले । दूसरों को तिराने वाले ।
स्वयं बोध पाये हुए।
दूसरों को बोध कराने वाले ।
स्वयं कर्मों से मुक्त ।
दूसरों को कर्मों से मुक्त कराने वाले। सब कुछ जानने देखने वाले सर्वज्ञ, सर्वदर्शी ।
निरुपद्रवी, अचल, रोग रहित, अनंत । अक्षय, अव्याबाध ।
पुनरागमन रूप वृत्ति से रहित । सिद्ध गति नामक स्थान को
प्राप्त सिद्ध भगवान ।
भय विजेता जिनेश्वरों को नमस्कार हो। स्थान को प्राप्त करने वाले अरिहन्त भगवान ।
{55} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र एयस्स नवमस्स का पाठ
(सामायिक समापन सूत्र)
एयस्स नवमस्स इस नवमें
सामाइय-वयस्स पंच-अइयारा सामायिक व्रत के पाँच अतिचार हैं। (जो) जाणियव्वा जानने योग्य हैं। (किन्तु)
न समायरियव्वा आचरण करने योग्य नहीं हैं।
तं जहा ते आलोउं वे इस प्रकार हैं, उनकी आलोचना करता हूँ।
मणदुप्पणिहाणे मन से अशुभ विचार किये हों।
वयदुप्पणिहाणे अशुभ वचन बोले हों।
कायदुप्पणिहाणे शरीर से अशुभ कार्य (सावद्य प्रवृत्ति) किये हों।
सामाइयस्स सइ-अकरणया सामायिक की स्मृति नहीं रखी हो। सामाइयस्स सामायिक को।
अणवट्ठियस्स करणया अव्यवस्थित रूप से (सुचारु रूप से नहीं) की हो तो।
तस्स मिच्छा मि दुक्कडं वह मेरा पाप निष्फल हो। सामाइयं सम्मं सामायिक को सम्यक् प्रकार से। काएणं काया द्वारा।
न फासियं न पालियं स्पर्श न की हो, पालन न की हो। न तीरियं न किट्टियं पूर्ण न की हो, कीर्त्तन (स्मरण) न की हो। न सोहियं न आराहियं शुद्धि (शोधन) न की हो, आराधना न की हो।
{56} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
आणाए अणुपालियं न भवइ
आज्ञा के अनुसार पालना न हुई हो।
तस्स मिच्छा मि दुक्कडं
वह मेरा दुष्कृत कर्म निष्फल हो ।।
सामायिक-महिमा
दिवसे दिवसे लक्खं देई, सुवण्णस्स खंडियं एगो। एगो पुण सामाइयं, करेइ ण पहुप्पए तस्स। एक व्यक्ति प्रतिदिन लाख स्वर्ण मुद्राओं का दान करता है और दूसरा व्यक्ति मात्र 2 घड़ी सामायिक करता है तो वह स्वर्ण मुद्राओं का दान करने वाला व्यक्ति सामायिक करने वाले की समानता नहीं कर सकता।
समता सर्वभूतेषु, संयमः शुभभावना ।
आर्त्त-रौद्र-परित्यागस्तद्धि सामायिकव्रतम् ।। {57} श्रावक सामायिक प्रतिक्रमण सूत्र
प्रतिक्रमण सूत्र कठिन शब्दार्थ
इच्छामि णं भंते !
तुब्भेहिं अब्भणुण्णाए समाणे देवसियं पडिक्कमणं
ठाएमि
देवसिय-नाण-दंसण-
चरित्ताचरित्त-
तव-
अइयार-चिंतणत्थं
करेमि काउस्सग्गं
इच्छामि ठामि काउस्सग्गं
जो मे देवसिओ
अइयारो कओ
काइओ, वाइओ, माणसिओ
उस्सुत्तो
उम्मग्गो
हे भगवान ! चाहता हूँ यानी मेरी इच्छा है । इसलिए आपके द्वारा आज्ञा मिलने पर । दिवस सम्बन्धी प्रतिक्रमण को । करता हूँ। (व)
दिवस सम्बन्धी ज्ञान-दर्शन । श्रावक व्रत
तप
अतिचारों का चिन्तन करने के लिए । कायोत्सर्ग करता हूँ।
इच्छामि ठामि का पाठ
मैं कायोत्सर्ग करना चाहता हूँ। जो मैंने दिवस सम्बन्धी ।
अतिचार (दोष) सेवन किये हैं। (चाहे वे) काया, वचन व मन सम्बन्धी । सूत्र सिद्धान्त के विपरीत उत्सूत्र की प्ररूपणा की हो ।
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 2443.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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