श्रद्धा तो काल अनादि से, चेतन का अनुजीवी गुण है।
पर श्रद्धा का विपरीतपना, चेतन का भारी दुर्गुण है।। १।।
चेतन स्वरूप होकर भी श्रद्धा, जड़ को निज रूप समझती है।
स्वामी स्वभाव से दूर रह, भव-भव फाँसी दुःख सहती है।।2।।
चेतन चेतो पहले तो निज, श्रद्धा को सम्यक् कर लेना।
श्रद्धा रानी तुम सुनो-सुनो, निज चेतन पर दृष्टि देना।।3।।
चेतन स्व को तो स्व स्वीकार करे, पर को पर मान छोड़ देवे।
तो दिशा बदलने पर चेतन, खुद ही यह दशा बदल जावे।।4।।
पुरुषार्थ स्व-सन्मुख होवेगा, निज का सुख निज में प्रकटेगा।
फिर शीघ्र मुक्त पद पावेगा, भव में फिर कभी न भटकेगा।।5।।
पर श्रद्धा तो विपरीत रहे, अरु अन्य उपाय करे भारी।
फिर भी सुख लेश न पावेगा, होगी भव की ही तैयारी।।6।।
अतएव भव्य यह कार्य प्रथम, श्रद्धा में निज महिमा आना।
चेतन की श्रद्धा स्व-चेतन में ही, बस तन्मय हो जाना।।7।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Shraddha ka Swarup