भावना सहज होय स्वामी, भावना सहज होय स्वामी।
स्वयं स्वयं में मग्न रहूँ, तुम-सम त्रिभुवन नामी ।। टेक ।।
नहीं स्वप्न में भी अपना, परमाणुमात्र भासे,
सदा सहज अनुभूतिरूप, आतम ही प्रतिभासे।
एक शुद्ध ज्ञायक स्वरूप परमानन्दमय आतम,
स्वयंसिद्ध शाश्वत परमातम जाना शुद्धातम ।। 1 ।।
निरतिचार निर्मल सम्यग्दर्शन वर्ते सुखमय,
निजस्वभाव में सहज निःशंकित निर्वाञ्छक निर्भय।
ज्ञेयमात्र ही रहें ज्ञेय, नहीं ग्लानि उपजावे,
तत्त्वदृष्टि हो दोषों प्रति, मध्यस्थ न द्वेष आवे।। 2।।
चित्त-चंचलता मिटे स्वयं में ही थिरता पाऊँ,
वात्सल्य से आतम ही उत्कृष्टपने भाऊँ।
भेदज्ञान हो मद नहीं उपजे महाक्लेशकारी,
दैन्य और अभिमान रहित हो जीवन हितकारी ।। 3 ।।
तीन मूढ़ता षट् अनायतन नहिं आयें मन में,
प्रभु निर्मूढ़ प्रवृत्ति होवे, चिदानन्दघन में।
नहीं वृत्ति हो लोकनिंद्य या धर्मनिंद्य प्रभुवर,
धर्मप्रभावक मंगलदायक हो वृत्ति जिनवर ।। 4 ।।
विनयवंत भगवंत कहावें, नहीं पर माँहि झुकें,
वे ही हैं आदर्श जगत् में सब दुख द्वन्द्व मिटें।
अविनय नहीं हो पाय किसी की, विनय योग्य होवे,
आत्मविनतता रूप विनय निश्चय सब दुख खोवे ।। 5 ।।
दृष्टा-ज्ञाता रहूँ शील अंतर में प्रगटावे,
भोगूँ निजानन्दरस अविरल नहिं विकल्प आवे।
अपनी मर्यादा में रहकर ध्रुव प्रभुता पाऊँ,
ब्रह्मचर्य की होय पूर्णता निजपद प्रगटाऊँ।।6।।
भेदज्ञान की रहे भावना तब तक हे स्वामी,
ज्ञान-ज्ञान में होय प्रतिष्ठित शाश्वत सुखदानी।
हो अविछिन्न ज्ञानानुभूति दुर्वार मोह नाशे,
शुद्ध चेतना का प्रकाश स्वाभाविक परकाशे ।। 7 ।।
रहा नहीं उत्साह शेष किंचित् पर-भावन में,
हौंस जगी है एक मात्र निज शिवपद साधन में।
सब संसार असार दुःखमय दुःखों का कारण,
धन्य घड़ी आतम आराधू, कर मुनिपद धारण।।४।।
अपनी शक्ति अपने में ही सहज प्रत्यक्ष दिखी,
वैभाविक परिणति अति दु:खमय सहजपने छूटी।
जीवन का क्षण-क्षण सार्थक हो धर्माराधन में,
सर्व समर्पण हो जावे जिनधर्म प्रभावन में।।9।।
समझ न पाया व्यर्थहि चिर से पर में भरमाया,
धन्य हुआ अपने में ही विश्राम सहज पाया।
चाह नहीं कुछ शेष नाथ, निज में ही रम जाऊँ,
कर्म जलाऊँ तप-अग्नि में मुक्त दशा पाऊँ।। 10।।
सहयोगी होऊँ समाधि में साधु साधकों की,
रही नहीं परवाह प्रभो अब मुझे बाधकों की।
अखण्ड ज्ञानमय सहज भावना रूप समाधि को,
आनन्दपूर्वक धारण करके तजूँ उपाधि को।।11।।
ज्ञानी गुरुओं की सेवा में ही तत्पर निश-दिन,
उन-सम ही वैराग्य बढ़ाऊँ मैं अपना क्षण-क्षण।
शुद्धातम की सेवा करते खेद नहीं पाऊँ,
हर्ष सहित धारूँ रत्नत्रय भव से तिर जाऊँ।। 12।।
धर्म पिता अरहंत जिनेश्वर साँची भक्ति करूँ,
झूठे विषय-कषाय त्याग कर क्षण-क्षण ध्यान धरूँ।
स्वानुभूति ही निश्चय भक्ति द्वैत विकल्प नहीं,
संकट-त्राता शिवसुख-दाता जाना सार यही।। 13।।
अहो संघनायक आचारज विज्ञानी-ध्यानी,
स्वयं आचरण करें-करायें सबको शिवदानी।
उनकी चरण शरण से हो निर्दोष चरण सुखमय,
बढ़ती जावे वीतरागता पाऊँ पद अक्षय ।। 14 ।।
उपाध्याय गुरु पढ़ें-पढ़ावें संघ में जिनवाणी,
अनेकान्तमय तत्त्व-प्रकाशें मोह-तिमिर हानी।
तज एकान्त-पक्ष दुःखमय पक्षातिक्रान्त पावें,
फैले धर्म अहिंसा जग में आनन्द विलसावें ।। 15 ।।
मंगलदायक श्री जिन-प्रवचन नित जग में गूँजें,
तत्त्वभावना के प्रसाद से सर्व पाप धूजें।
समयसार ही जिन-प्रवचन का सार सहज पाया,
ज्ञायक की ज्ञायकता लख परमानन्द विलसाया ।। 16 ।।
यथायोग्य हों षट्-आवश्यक पापों के हारक,
किन्तु अवश का कर्म ज्ञानमय निश्चय आवश्यक।
निर्विकल्प आनन्दरूप मैं उपादेय जाना,
रागादिक से भिन्न अहो मेरा चेतन वाना ।। 17 ।।
नित प्रभावना योग्य आत्मा भाऊँ अन्तर में,
ज्ञान, दान, व्रत, संयम, पूजा से हो बाहर में।
जैनधर्म की नित प्रभावना दिन दूनी स्वामी,
लहें भव्य सन्मार्ग अहो मंगलमय अभिरामी।।18 ।।
शुद्धातम ही तीर्थ है शाश्वत सब जग पहिचानें,
आत्मज्ञान प्रगटाकर सब ही मोह-तिमिर हानें।
सम्यग्चारित्र धारण करके अक्षय सुख पावें,
कर्म नशावें शिवपद पावें नहीं भव भरमावें ।।19 ।।
ये ही भावना सोलह कारण ज्ञानी को होवें,
वे बिन चाहे तीर्थंकर हों जग के दुःख खोवें ।
धर्मतीर्थ प्रगटावें जिसमें भवि स्नान करें,
आप तरें औरन को तारें शिव साम्राज्य लहें ।। 20।।
धन्य हुआ जिनशासन पाया आत्मरुचि लागी,
परभावों से भिन्न स्वाभाविक निज महिमा जागी।
स्वर्णिम अवसर मिला व्यर्थ नहीं पर में भरमाऊँ,
तोड़ सकल जगद्वन्द्व-फंद निज शुद्धातम ध्याऊँ ।। 21 ।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: षोडश कारण विंशतिका, षोड़श कारण विंशतिका