शिव वाँछक -
हे शिवनारी ! मिलन की इच्छा, झूठे जग की ना अब वांछा।
जग का सब सौन्दर्य निहारा, इसमें तो दुःख भरा अपारा ।। 1 ।।
शिव नारी-
हे चेतन राजा ! सुन लीजे, मेरी शर्त हृदय धर लीजे।
नारी से तुम करहु न यारी, तो होऊँ मैं सुख सहचारी ।। 2 ।।
शिव वाँछक-
मैं तो नारी प्रथमहि छोड़ी, अब मैं प्रीति तुम्हीं ते जोड़ी।
तातें पूरो मुझ अभिलाषा, मैं चाहूँ शिवधाम निवासा।। 3।।
शिव नारी-
नारी का संयोग ही त्यागा, पर नारीपन तुम से लागा।
ज्यों नारी आधीन पराये, त्यों सुख हेतु मुझे तू चाहे ।। 4 ।।
यदि नारीपन त्यागा होता, लक्ष्य न तेरा मुझमें होता।
आश्रय कर स्वभाव सुखकारा, सुख पाता अनुपम अविकारा ।। 5 ।।
शिव वाँछक-
नारीपन का भाव बताओ, अरु पुरुषत्व भाव दर्शाओ।
मेरी लगन तुम्हीं से लागी, तेरे कारण हुआ विरागी ।। 6।।
शिव नारी -
जिससे सुख तो पर में दीखे, पर बिन निज सुख माने फीके ।
वह नारीपन है दुःखदाई, अब पुरुषत्व सुनो सुखदाई ।। 7 ।।
जो सुख ज्ञान लखे स्वधीना, जिसने पर को निज नहीं चीन्हा।
आत्म स्वभाव जु जग में सारा, थिर उसमें हो सुखी अपारा ।। 8 ।।
शिव वाँछक-
हे शिव रमणी ! मैंने जाना, पर दृष्टि नारीपन माना।
और स्वभाव दृष्टि सुखकारी, है पुरुषत्व सदा अविकारी ।। 9 ।।
रागादिक विकारी भाव न चाहूँ, अब आशा है तुमको पाऊँ।
आने की तुम करो तैयारी, मैंने मानी शर्त तुम्हारी ।। 10 ।।
शिव नारी -
क्या तुम मानी शर्त हमारी, फिर भी दृष्टि मुझ पर डारी।
ध्रुव स्वभाव को नहीं निहारा, कैसे होवे मिलन हमारा।।11।।
मैं भी तो हूँ पर ही भाई, नहीं विवेक किया सुखदाई।
मैं तो क्षणिक सदा ध्रुव नांहि, भेद रहित तुम अचल सदा ही।।12।।
उसमें निजता थिरता धारो, मुझको भी तुम नहीं निहारो।
वांछा से नहीं मुझको पाओ, वांछा त्याग स्वयं अपनाओ।।13।।
शिव वांछक-
हे शिवरूपा! मैं भ्रम में था, तुमको लौकिक नारि लखे था।
तुम मेरी निर्मल पर्याया, जिसमें पूर्ण स्वभाव दिखाया।।14।।
बाहर की वांछा सब त्यागी, भावकर्म से हुआ विरागी।
दृष्टि शुद्ध दशा में फाँसी, इससे हुई जगत् में हाँसी।।15।।
अब ऐसी दृष्टि परिहारूँ, भेद कल्पना भी न निहारूँ।
ध्रुव में ही तन्मय हो जाऊँ, सुख निराकुल तब उपजाऊँ।।16।।
दोहा
ज्ञानोदय मुझमें हुआ, छूटी भूल महान्।
आश्रय निज का प्राप्त कर, पाऊँ अविचल थान।।17।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह