शिक्षा के क्षेत्र में जैनाचार्यों का योगदान | Shiksha Ke Kshetr Men Jainacharyon Ka Yogadan

शिक्षा के क्षेत्र में जैनाचार्यों का योगदान

-प्रो. वीरसागर जैन

जैनाचार्यों की यह बड़ी विशेषता है कि उन्होंने मात्र धर्म-दर्शन-अध्यात्म के क्षेत्र में ही महान् कार्य नहीं किया है, अपितु भाषा, लिपि, व्याकरण, साहित्य, कला, वास्तु, ज्योतिष, भूगोल, खगोल, गणित, राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र इत्यादि सभी क्षेत्रों में अपना अद्भुत योगदान प्रदान किया है। उन्होंने उक्त सभी विषयों पर अनेकानेक ग्रन्थ लिखे हैं और उस विषय के सम्बन्ध में अपने मौलिक एवं ठोस विचार व्यक्त कर जनता का अमूल्य मार्गदर्शन किया है।

उक्त अनेकानेक क्षेत्रों की भाँति शिक्षा के क्षेत्र में भी जैनाचार्यों का विशेष योगदान रहा है। यद्यपि हम कह सकते हैं कि उक्त विविध क्षेत्रों का योगदान भी एक दृष्टि से शिक्षा के क्षेत्र में ही किया गया योगदान है, क्योंकि उसके द्वारा उन्होंने शिक्षा को व्यापकता प्रदान की है।

जैनाचार्यों के शिक्षा के क्षेत्र में किये गये योगदान को भी हम मूलतः दो भागों में विभाजित करके समझ सकते हैं- 1. सैद्धान्तिक योगदान और 2. प्रायोगिक योगदान ।

1. सैद्धान्तिक योगदान

जैनाचार्यों का शिक्षा के क्षेत्र में किया गया सैद्धान्तिक योगदान यह है कि उन्होंने सर्वप्रथम शिक्षा को एक ठोस संविधान प्रदान किया। शिक्षा किसे कहते हैं, शिक्षक कैसा होना चाहिए, शिक्षार्थी कैसा होना चाहिए, शिक्षा के साधन/उपाय क्या हैं, शिक्षा प्राप्त करने की समीचीन विधि क्या है- इत्यादि प्रश्नों पर उन्होंने गम्भीरतापूर्वक विचार किया और बड़े ही सन्तुलित, सारग्राही एवं ठोस निष्कर्ष प्रस्तुत किये जो उनके तत्त्वार्थसूत्र, समयसार, महापुराण, क्षत्रचूड़ामणि आदि सैंकड़ों ग्रन्थों में यत्र-तत्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं। उदाहरणार्थ कविवर पं. दौलतराम कृत ‘छहढाला’ की निम्नलिखित पंक्तियाँ ध्यानपूर्वक द्रष्टव्य हैं -

तातैं दुखहारी सुखकारि। कहैं सीख गुरु करुणाधारि ।।
ताहि सुनो भवि मन थिर आन । जो चाहो अपनो कल्यान ॥

यदि गम्भीरतापूर्वक चिन्तन किया जाए तो प्रतीत होता है कि उक्त पंक्तियाँ अत्यन्त सारगर्भित हैं। कवि ने केवल दो ही पंक्तियों में समूचा शिक्षा-सिद्धान्त भर दिया है, क्योंकि शिक्षाशास्त्र के तीन ही मूलाधार तत्त्व होते हैं- शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी, और ये तीनों ही तत्त्व उक्त पंक्तियों में बड़ी ही कुशलतापूर्वक व्याख्यायित कर दिये गये हैं। यथा -

1. शिक्षा- शिक्षा के विषय में कविवर का कहना है कि शिक्षा वही है जो शिक्षार्थी के सर्व दुःखों को दूर कर दे और उसे सुख-शान्ति प्रदान करे | जिससे ऐसा न हो सके, वह शिक्षा नहीं है। शिक्षा नियम से दुःखहारी और सुखकारी होनी चाहिए।

2. शिक्षक- शिक्षक के विषय में कविवर का कहना है कि वह ‘करुणाधारी’ होना चाहिए अर्थात् उसके हृदय में छात्र के हित की गहरी भावना होनी चाहिए। इसके बिना कोई सच्चा या अच्छा शिक्षक नहीं हो सकता। जिसके हृदय में शिक्षार्थी के हित की प्रबल करुणा हो, वही सफल शिक्षक हो सकता है। ‘करुणा’ शिक्षक का एक ऐसा बुनियादी गुण है, जिसके बिना अन्य सारे गुण व्यर्थ हैं तथा जिसके होने पर अन्य सारे गुण सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।

3. शिक्षार्थी - शिक्षार्थी के विषय में कविवर का कहना है कि उसे भव्य अर्थात् पात्र होना चाहिए और मन से, एकाग्र मन से सुनने वाला होना चाहिए। शिक्षार्थी के इन दो गुणों में उसके समस्त गुण समाहित हो जाते हैं, क्योंकि अभव्य/अपात्र को शिक्षा दी नहीं जा सकती और एकाग्र मन से नहीं सुनने वाला शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकता।

इस प्रकार शिक्षा, शिक्षक और शिक्षार्थी की समीचीन परिभाषा प्रस्तुत करना जैनाचार्यों का शिक्षा के क्षेत्र में किया गया एक बहुत ही बड़ा सैद्धान्तिक योगदान है। इसे समझे और स्वीकार किये बिना शिक्षा का कोई भी कार्य ठीक से नहीं किया जा सकता।

इसी प्रकार जैनाचार्यों ने शिक्षा की विधि/पद्धति को स्पष्ट करने के लिए भी स्वाध्याय के पांच भेद बताए हैं जो बड़े वैज्ञानिक हैं। यथा वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश।

तथा सम्यग्ज्ञान के आठ अंग भी बताए हैं- शब्दाचार, अर्थाचार, उभयाचार, कालाचार, विनयाचार, उपधानाचार, बहुमानाचार और अनिह्नवाचार।

उक्त स्वाध्याय के पांच भेद और सम्यग्ज्ञान के आठ अंग शिक्षा की विधि को समझने के लिए गम्भीर चिन्तन की अपेक्षा रखते हैं। यहाँ समयाभाव के कारण हम उनके विस्तार में नहीं जा रहे हैं।

इसी प्रकार शिक्षा के सम्बन्ध में व्यक्त किये गये कतिपय निम्नलिखित विचार भी जैनाचार्यों के शिक्षा के क्षेत्र में किये गये सैद्धान्तिक योगदान को भलीभाँति रेखांकित करते हैं | इन पर भी गम्भीर चिन्तन-मनन की आवश्यकता है, यहाँ मात्र बिन्दुशः संकेतित किया जा रहा है-

  1. शिक्षा उभयलोक सुखकारी होती है।

  2. शिक्षा मन, वचन व काय तीनों के दोष दूर कर मनुष्य का सर्वांगीण विकास करती है।

  3. शिक्षा का उद्देश्य नर को नारायण बनाना है।

  4. शिक्षा वही उत्तम है जो आचरण में उतरे- ‘हतं ज्ञानं क्रियाहीनम्’।

  5. शिक्षा का मूलाधार, उद्देश्य या प्रयोजन आत्मज्ञान है, उसके बिना सारी शिक्षा निरर्थक है।

  6. शिक्षार्थी को स्वयं के सुधार पर अधिक जोर देना चाहिए, दुनिया के सुधार पर नहीं- ‘आदहिदं कादव्वं’।

  7. शिक्षक नहीं, अपितु शिक्षार्थी बनने की कोशिश करो। यदि सच्चे शिक्षार्थी बन गये तो जीवन सफल है। अज्ञानियों का गुरु बनने की बजाय ज्ञानी का शिष्य बनना अच्छा है।

  8. यदि हम सच्चे शिक्षार्थी बन सके तो हमें किसी बाहरी शिक्षक और विद्यालय की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, यह जगत् ही विद्यालय बन जाएगा और इसका हर पदार्थ शिक्षक।

  9. केवल बचपन में ही नहीं, अपितु जीवन भर सतत अध्ययन करते रहना चाहिए- ‘यावज्जीवमधीते विप्रः’।

  10. ज्ञान वही है जो आनन्द प्रदान करे, आनन्द का अविनाभावी हो- ‘नहि विषादो विधेयात्र तद्धि वैदुष्यजं फलम्’।

शिक्षा के सम्बन्ध में व्यक्त किये गये उक्त सभी बिन्दु अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं | विस्तारभय से यहाँ इनकी व्याख्या नहीं की जा रही है, किन्तु इनका विश्लेषण अनेक रहस्यों का उद्घाटन करेगा ।

2. प्रायोगिक योगदान -

जैनाचार्यों ने समाज में शिक्षा के प्रचार-प्रसार में भी अपना प्रत्यक्ष-परोक्ष भाव से अद्भुत योगदान प्रदान किया है, जो प्राचीन काल से आज तक अनवरत चल रहा है। यही कारण है कि आज अत्यन्त विषम समय में भी जैन समाज में सर्वाधिक शिक्षा पाई जाती है। गांव-गांव तक में स्त्रियाँ तक भी जैन समाज में सर्वाधिक शिक्षित हैं- ऐसा सरकारी आंकड़े सिद्ध करते हैं। जैन समाज में आज भी अनेक विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालयों का संचालन किया जाता है | जैन धर्म का लगभग हर मन्दिर ही शिक्षा का केन्द्र बना रहता है। प्रायः प्रत्येक जैन मन्दिर में एक अच्छा पुस्तकालय उपलब्ध होता है, शास्त्रसभाएं चलती हैं और लोग अलग से भी स्वाध्याय करते रहते हैं। इस सबके पीछे जैनाचार्यों की ही महती प्रेरणा रही है। जैनाचार्यों ने जनता को जीवन में ज्ञान का सर्वोपरि महत्त्व समझाया और उसी से शिक्षा के प्रचार-प्रसार को भारी बल मिला। उदाहरणार्थ उनके निम्नलिखित कथन द्रष्टव्य हैं-

  1. एदम्हि रदो णिच्चं संतुट्ठो होहि णिच्चमेदम्हि |
    एदेण होहि तित्तो होहिदि तुह उत्तमं सोक्खं || -आचार्य कुन्दकुन्द, समयसार, गाथा २०६
    अर्थ- नित्य एक ज्ञान में ही रत रहो, ज्ञान में ही संतुष्ट रहो और ज्ञान में ही तृप्त हो जाओ, तुमको उत्तम सुख प्राप्त होगा |

  2. हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थं हि प्रमाणं ततो ज्ञानमेव तत् | -आचार्य माणिक्यनन्दी, परीक्षामुख, १.३
    अर्थ- ज्ञान ही हित की प्राप्ति और अहित के परिहार में समर्थ है, अतः ज्ञान ही प्रमाण है |

  3. तत्त्वज्ञानं हि जीवानां लोकद्वयसुखावहम् | -आचार्य वादीभसिंह, क्षत्रचूड़ामणि,
    अर्थ- तत्त्वज्ञान ही जीवों को दोनों लोकों में सुख देने वाला है |

  4. तत्त्वज्ञानविहीनानां दुःखमेव हि शाश्वतम् | -आचार्य वादीभसिंह, क्षत्रचूड़ामणि
    अर्थ- तत्त्वज्ञान से रहित जीवों को सदा दुःख ही प्राप्त होता है |

  5. धन कन कंचन राजसुख, सब हि सुलभ कर जान | दुर्लभ है संसार में, एक यथारथ ज्ञान || -महाकवि भूधरदास, पार्श्वपुराण

  6. धन समाज गज बाज राज तो काज न आवे |
    ज्ञान आपको रूप भये फिर अचल रहावे ||
    ज्ञान समान न आन जगत् में सुख को कारन |
    इह परमामृत जन्म जरा मृतु रोग निवारन || -कविवर दौलतराम, छहढाला

सन्दर्भ-

  1. इस सन्दर्भ में मेरा अन्य लेख ‘जैन विद्या की व्यापकता’ पठनीय है।
  2. कविवर पं. दौलतराम, छहढाला १.२
  3. वाचनापृच्छनानुप्रेक्षाम्नायधर्मोपदेशाः । -तत्त्वार्थसूत्र, ९.२५
  4. पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, ३६
  5. इस सन्दर्भ में मेरा अन्य लेख ‘यह जगत् एक खुली किताब है’ पठनीय है।

जीवनमूल्यों की शिक्षा जरूरी है
शिक्षा का उद्देश्य नर को नारायण बनाना है। किन्तु आजकल शिक्षा की स्थिति को देखकर लगता है कि वह नर को नारायण बनाना तो दूर, नर भी नहीं रहने दे रही है, उसे जानवर बना रही है। जानवर भी क्या, नारकी ही बना रही है, क्योंकि आज के अनेक शिक्षित व्यक्ति ऐसे-ऐसे घिनौने कृत्य करते देखे जाते हैं, जो कोई जानवर भी नहीं करता । अतः हमें हमारी शिक्षा-प्रणाली पर पुनः गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। मात्र तकनीकी शिक्षा से काम चलने वाला नहीं है। यदि हमें मानव को दानव बनाने से बचाना है तो उसे जीवन-मूल्यों की शिक्षा अवश्य देनी होगी। न केवल देनी होगी, बल्कि मुख्यतापूर्वक देनी होगी, वैज्ञानिक रीति से देनी होगी। अन्यथा हमारे समाज एवं राष्ट्र का भी विनाश अवश्यम्भावी है।

प्रश्न है कि वे जीवन-मूल्य किसे कहते हैं और वे कौन से हैं ?

उत्तर- जिनके द्वारा मनुष्य का जीवन मूल्यवान बने, वह काम, क्रोध, अहंकार, स्वार्थ, ईर्ष्या, लालच, भय, चिंता आदि विकारों से मुक्त हो, वे उत्तम भाव ही जीवन-मूल्य कहलाते हैं। ये जीवन-मूल्य असंख्य गिनाये जा सकते हैं, परन्तु वे एक-एक के साथ अनेक-अनेक आ जाते हैं। अतः यदि निम्नलिखित दस-बीस जीवनमूल्यों को भी हम हमारी शिक्षा में समाहित कर दें तो शिक्षार्थियों का बड़ा कल्याण हो । उनका अपना जीवन तो नंदन वन के सामान शीतल-सुरभित बनेगा ही, उसका लाभ समाज और राष्ट्र को भी अवश्य मिलेगा । ऐसे चुनिंदा जीवन-मूल्य मेरी दृष्टि में कुछ इस प्रकार हैं- अहिंसा, क्षमा, करुणा, परोपकार, विनम्रता, सरलता, निर्भयता, राष्ट्रभक्ति, कृतज्ञता, ध्यानयोग, सत्यनिष्ठा, न्यायप्रियता, समयपालन, शील या चारित्रिक दृढ़ता, आहारशुद्धि, स्नेह-वात्सल्य, प्रसन्नता, अर्थशुचिता आदि |

हमें अपने बालकों को उक्त जीवनमूल्य अवश्य सिखाने चाहिए, ताकि वे शारीरिक, मानसिक आदि सभी रूपों से स्वस्थ एवं श्रेष्ठ नागरिक बन सकें।

-सागर विश्वविद्यालय की राष्ट्रिय संगोष्ठी में प्रो. वीरसागर जैन के भाषण का सार