शिक्षा ही उन्नति का आधार है | Shiksha Hi Unnati Ka Adhar Hai

शिक्षा ही उन्नति का आधार है

-डॉ. वीरसागर जैन

एक नगर था। वहाँ के लगभग सभी लोग विविध अपराधों में लिप्त थे। जैसेकि व्यापारी कम तोलना, मिलावट करना आदि अपराध करते थे तथा कर्मचारी कामचोरी, रिश्वतखोरी आदि में लिप्त थे।

वहाँ के राजा ने बड़े ही कठोर दण्ड के भी अनेक नियम बनाये, लेकिन नागरिकों की आपराधिक गतिविधियों में कोई सुधार नहीं हुआ।

उसी नगर में कोई एक साधु पुरुष भी रहता था, जो न्याय-नीति एवं संतोषपूर्वक जीवन-यापन करता था। एक दिन नगर का एक व्यक्ति उसके पास शिक्षा प्राप्त करने आया, और फिर प्रभावित होकर वह प्रतिदिन ही पढ़ने आने लगा। साधु पुरुष उसे प्रतिदिन पढ़ाने लगे। इससे उस व्यक्ति का जीवन बहुत उन्नत हो गया। उसकी देखा-देखी अनेक लोग उस साधु पुरुष के पास पढ़ने आने लगे। साधु पुरुष उन सबको अलग-अलग समय देकर पढ़ाने लगे।

किन्तु इसके कारण वे साधु पुरुष इतने अधिक व्यस्त हो गये कि उन्हें भोजन बनाकर खाने तक का समय मिलना मुश्किल हो गया, विश्राम आदि की बात तो दूर। अतः एक दिन उनके सभी विद्यार्थियों ने मिलकर उनसे निवेदन किया कि 'गुरुजी! क्यों न आप हम सबको एक ही साथ पढ़ा दें, ताकि आपका समय बच जाये । किन्तु गुरुजी ने कहा- “नहीं, ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि मेरी कुटिया में तुम सबको एक साथ बैठने की जगह नहीं है।” इस पर विद्यार्थियों ने सुझाव दिया कि वे राजा से कहकर इसके लिए कोई अन्य अच्छा-सा स्थान प्राप्त कर लें।

विद्यार्थियों के आग्रह पर गुरुजी राजा के पास गये। राजा ने उन्हें सम्मानपूर्वक एक अच्छा-सा स्थान वटवृक्ष के नीचे अध्ययन-अध्यापन हेतु दे दिया।

अब तो प्रतिदिन ही उस वटवृक्ष के नीचे एक सुन्दर पाठशाला चलने लग गई । विद्यार्थियों की संख्या भी बहुत बढ़ गई। शनैः-शनैः लगभग पूरा नगर ही पढ़ने आने लगा। दिन बीतते गये, नगर में से भ्रष्टाचार आदि अपराध समाप्त होने लग गये ।

एक दिन की बात, राजा ने अपने मंत्री से पूछा- “मन्त्रिवर ! क्या कारण है कि आजकल दरबार में आपराधिक शिकायतें बहुत कम आ रही हैं ?”

मंत्री- “राजन् ! यह सब उन गुरुजी की पाठशाला का कमाल है, जिन्हें आपने वटवृक्ष के नीचे भूमि प्रदान की थी।”

राजा ने पूछा- “वह कैसे? उसका इससे क्या सम्बन्ध ?"

“सम्बन्ध है राजन् !” - मंत्री ने उत्तर दिया- “बहुत गहरा सम्बन्ध है राजन् ! वहाँ पर लोगों को ज्ञान की बड़ी अच्छी-अच्छी बातें बताई जाती हैं जिससे लोग अपराधों को छोड़कर अच्छाइयों के रास्ते पर चल पड़े हैं।” राजा- “अरे वाह ! जो काम हमारे कठोर दण्डों से भी नहीं हो पा रहा था, वह एक छोटी-सी पाठशाला से हो गया ! हम कल ही उस पाठशाला को देखने जाएँगे ।”

शीघ्र ही गुरुजी को संदेश भेज दिया गया कि कल राजा स्वयं आपकी पाठशाला देखने आएंगे; किन्तु यह क्या, गुरुजी प्रसन्न होने की बजाय चिंतित हो उठे और तत्काल राजा के पास पहुँच गये- “राजन्! मेरे योग्य जो भी सेवा हो, मैं तैयार हूँ, परन्तु कृपा कर पाठशाला में मत पधारिए ।"

राजा- “अरे! लोग तो हमें बार-बार प्रार्थना करके बुलाते हैं और फिर भी हम नहीं जाते हैं और तुम्हारी पाठशाला में हम स्वयं आगे से आ रहे हैं फिर भी तुम मना कर रहे हो ! क्या बात है ?”

गुरुजी कोई उत्तर नहीं देना चाहते थे, किन्तु राजा ने बहुत आग्रह किया तो विनयपूर्वक बोले- “राजन् ! दरअसल बात यह है कि जब आप मेरी पाठशाला में पधारेंगे तो मैं अपने आसन से उठकर आपको अपना आसन दूंगा और आपको प्रणाम भी करूंगा । इससे मेरे विद्यार्थी आपको मुझसे अधिक बड़ा और अच्छा समझेंगे और आप-जैसा बनने का प्रयत्न करने लगेंगे। इससे मेरी पाठशाला का सारा प्रयोजन ही अन्यथा हो जाएगा। मैं चाहता हूँ कि ये लोग ऐसे अच्छे नागरिक बनें जो न्याय, नीति, संतोष अनुशासन आदि अनेक जीवनमूल्यों के साथ समाज की सेवा करते हुए उत्कृष्ट जीवन-यापन करें। मैं नहीं चाहता कि वे राजनीति के किसी भी बुरे कार्य में उलझ जाएँ।“

गुरुजी के उत्तर से राजा बिलकुल नाराज नहीं हुआ, अपितु बहुत सन्तुष्ट व प्रसन्न हुआ, परंतु उसने दृढ़तापूर्वक कहा- “गुरुदेव! अब आप मेरा भी आदेश सुन लीजिए। मैं कल पाठशाला में अवश्य ही आऊँगा और उस समय आपको अपने आसन से बिल्कुल नहीं उठना है, आप मुझे प्रणाम भी नहीं करेंगे, बल्कि मैं ही आपको प्रणाम करूँगा और विद्यार्थियों के आसन पर ही बैठूंगा। मैं सबको स्पष्ट संदेश देना चाहता हूँ कि संसार में राजा नहीं, गुरु/शिक्षक सबसे महान् होता है।”

राजा ने अपने आदेशानुसार पाठशाला में जाकर शिक्षक की महानता का संदेश दिया। सभी ग्रामवासियों ने शिक्षा प्राप्त कर अपने ग्राम को स्वर्ग से भी सुंदर बना दिया।निष्कर्ष यह है कि अशिक्षा दुःख एवं अपराधों की जननी है और शिक्षा ही उन्नति का आधार है। कहा भी गया है कि-

  1. “किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या” अर्थात् विद्या कल्पलता के समान सब-कुछ सिद्ध करती है।
  2. "स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।” अर्थात् राजा तो केवल अपने देश में ही पूजा जाता है, परंतु विद्वान् सर्वत्र पूजा जाता है।
  3. “न हि ज्ञानेन सदृश किञ्चित् पवित्रमिह विद्यते।” अर्थात् ज्ञान के समान पवित्र विश्व में कुछ भी नहीं है।