षट्-कारक दर्शन | Shat-Kaarak Darshan

मैं पर का कर्त्ता कभी नहीं, पर तो है मेरा कर्म नहीं।
मेरे द्वारा पर कर्म नहीं, मुझ हेतु कोई पर कर्म नहीं।। 1 ।।

मुझमें से हो पर कार्य नहीं, पर कार्य का मैं आधार नहीं।
पर मेरा कर्त्ता कभी नहीं, मैं भी हूँ पर का कर्म नहीं ।। 2 ।।

पर के द्वारा मम कार्य नहीं, पर हेतु कोई पर कार्य नहीं।
पर में से मेरा कार्य नहीं, मम कार्य का पर आधार नहीं ।। 3 ।।

मैं कर्त्ता-कर्म-सम्प्रदान नहीं, अधिकरण करण अपादान नहीं।
षट्-कारक कार्य के कार्य में हैं, मेरा कोई सम्बन्ध नहीं ।। 4 ।।

है कार्य अरे पर्याय क्षणिक, अपने से अपने में होती।
है कार्य स्वयं षट्कारकमय, अति भिन्न ज्ञानमय मैं ज्योति ।। 5 ।।

हूँ ध्रुव अखण्ड सच्चिदानंद, निरपेक्ष त्रिकाली अविकारी।
हो परिणति सर्व विकल्प मुक्त, शाश्वत स्वभाव की बलिहारी ।। 6 ।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

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