शास्त्रों के श्रोता को भी विद्वान् होना चाहिए
-प्रो. वीरसागर जैन
यूँ तो जिनवाणी का श्रोता या पाठक कोई भी हो सकता है- एक अत्यन्त अप्रतिबुद्ध (अज्ञानी) भी, और सभी को अपनी-अपनी योग्यतानुसार शास्त्रों के श्रवण और पठन का फल भी अवश्य प्राप्त होता है; परन्तु शास्त्रों के एकएक वाक्य में जो विविध अर्थ और गूढ़-गम्भीर अभिप्राय छिपे होते हैं, उनको विद्वान् श्रोता या पाठक ही सही रूप में समझ सकता है, साधारण श्रोता नहीं; अतः जिनवाणी के सभी श्रोताओं को यथासंभव विद्वत्ता (विविध शास्त्रों का ज्ञान) अर्जित करने का पुरुषार्थ अवश्य करना चाहिए। कोई भी बहाना बनाकर अपना प्रमाद पुष्ट करना उचित नहीं है।
इस संदर्भ में ‘पंचसंग्रह’ का एक श्लोक गंभीरतापूर्वक विचारणीय है-
“अप्रतिबुद्धे श्रोतरि वक्तृत्वमनर्थकं भवति पुंसाम् ।
नेत्रविहीने भर्तरि विलासलावण्यमिव स्त्रीणां ॥”
अर्थ- जिसप्रकार नेत्रविहीन पति के आगे पत्नी का शृंगार-सौन्दर्य एवं हाव-भाव-विलास निष्फल रह जाता है, उसीप्रकार अप्रतिबुद्ध श्रोता के आगे विद्वान् पुरुष का शास्त्र-व्याख्यान करना व्यर्थ रह जाता है।
आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी ने भी ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ में श्रोता का स्वरूप बताते हुए लिखा है कि यदि उसे न्याय-व्याकरणादि का ज्ञान हो तो श्रोतापना विशेष शोभा देता है।
उन्होंने वहाँ अन्यत्र भी अनेक बार विविध शास्त्रों के ज्ञानार्जन की बड़ी प्रेरणा दी है। यथा-
-
“अच्छा ज्ञान होने के अर्थ शब्द-न्यायशास्त्रादिक को भी जानना चाहिए। इसलिए अपनी शक्ति के अनुसार सभी का थोड़ा या बहुत अभ्यास करना योग्य है।”-(मोक्षमार्गप्रकाशक, पृष्ठ 201)
-
शास्त्र में ऐसा कहा है- “सामान्यशास्त्रतो नूनं विशेषो बलवान् भवेत्।” इसका अर्थ यह है- सामान्य शास्त्र से विशेष बलवान है। विशेष से ही अच्छी तरह निर्णय होता है, इसलिए विशेष जानना योग्य है।"-(वही, पृष्ठ 202)
-
“सामान्य जानने से विशेष जानना बलवान है। ज्यों-ज्यों विशेष जानता है त्यों-त्यों वस्तु स्वभाव निर्मल भासित होता है, श्रद्धान दृढ़ होता है, रागादि घटते हैं, इसलिए उस अभ्यास में प्रवर्तना योग्य है।"-(वही, पृष्ठ 294)
-
“उनके (व्याकरण, न्याय, काव्यशास्त्र के) अभ्यास के बिना महान् ग्रन्थों का अर्थ खुलता नहीं है, इसलिए उनका भी अभ्यास करना योग्य है।"-(वही, पृष्ठ 231)
इसका कारण यह है कि शास्त्रों के एक-एक कथन में बड़ी गंभीरता भरी होती है। आचार्य अत्यधिक परिश्रमपूर्वक बत्तीस दोष¹ टालकर एक-एक वाक्य की रचना करते हैं। उनमें बहुत व्यापक अर्थ निहित होते हैं। अर्थ की इस गंभीरता को विद्वान् व्यक्ति ही ठीक से समझ सकता है, मूर्ख या अल्पबुद्धि नहीं; उसीप्रकार जिसप्रकार प्रसव-पीड़ा को कोई भुक्तभोगी स्त्री ही भलीभाँति जान सकती है, वन्ध्या स्त्री नहीं। यथा-
"विद्वानेव हि जानाति विद्वज्जनपरिश्रमम् ।
न हि वन्ध्या विजानाति गुर्वी प्रसववेदनाम् ॥”
शास्त्रों के वाक्यों में प्रायः सर्वत्र कथ्य के साथ निराकृत्य भी बहुत छुपा होता है और अनेक बार वही उस कथन का असली उद्देश्य भी होता है, जिसे पूर्वपक्षादि को जाने बिना नहीं समझा जा सकता। बहुत लोग ‘समयसार’ को पढ़ते हैं; परन्तु उसमें भी इतर दर्शनों की इतनी बातें हैं कि उनको समझे बिना ‘समयसार’ की गाथाओं के पीछे छिपे गूढ़ार्थों को पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता। उदाहरणार्थ वैशेषिक आत्मा के अनेक लिंग बताते हैं, यदि हमें उसका ज्ञान हो तो ही हम ‘समयसार’ की 49वीं गाथा के ‘अलिंगग्रहण’ का गूढ़ अर्थ समझकर आनन्दित हो सकते हैं।
प्राचीनकाल में सभी विद्वज्जन स्व-पर-मत के विविध ग्रन्थों का अध्ययन करते थे, परन्तु आज लोग समय होते हुए भी थोड़ा भाषा, व्याकरण, काव्यशास्त्र, न्यायशास्त्र, दर्शनशास्त्र आदि का ज्ञानार्जन नहीं करते, अन्यथा उन्हें
¹ बत्तीस दोषों के सम्बन्ध में मैंने एक अन्य लेख में विस्तार से लिखा है जोप्राकृत-विद्या’ के अक्टूबर-दिसम्बर 2014 के अंक में छपा है।
शास्त्रों के रहस्य समझने में बड़ी सुविधा हो। उदाहरणार्थ जो शब्दब्रह्म को नहीं जानता, वह परब्रह्म को कैसे जानेगा-
“शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति।”
शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति ही परंब्रह्म को जान पाता है, क्योंकि-
“शब्दब्रह्म परब्रह्म के, वाचक-वाच्य नियोग।”
-पं. जयचंद छाबड़ा, समयसार-वचनिका
श्रोता के विद्वान् होने की बात तो छोड़िये; आज तो हमारे लेखक एवं वक्तागण भी विद्वान् नहीं दिखाई देते, जबकि शास्त्रों के लेखक एवं वक्ता को तो विविध शास्त्रों का बहुत बड़ा विद्वान् होना ही चाहिए; जैसा कि आचार्य गुणभद्र ने लिखा है-
“प्राज्ञः प्राप्तसमस्तशास्त्रहृदयः प्रव्यक्तलोकस्थितिः।”-(आत्मानुशासन, 5)
अर्थात् वक्ता को प्राज्ञ (बड़ा विद्वान्) होना चाहिए। उसे समस्त शास्त्रों का और सम्पूर्ण लोकव्यवहार का सुस्पष्ट ज्ञान होना चाहिए।
इसी प्रकार शब्दकोश का ज्ञान भी जैन शास्त्रों के जिज्ञासु को बहुत होना चाहिए-
"कोषस्येव महीपानां कोशस्य विदुषामपि।
उपयोगो महान् यस्मात् क्लेशस्तेन विना भवेत्॥”
राजाओं को ‘कोष’ और विद्वानों को ‘कोश’ की बड़ी उपयोगिता होती है, अन्यथा बड़ा क्लेश होता है।
‘वृहद्रव्यसंग्रह’ के टीकाकार श्री ब्रह्मदेवसूरि ने शास्त्रों के प्रत्येक कथन का अर्थ 5 प्रकार से समझने का निर्देश दिया है- शब्दार्थ, मतार्थ, नयार्थ, आगमार्थ, भावार्थ। विचारणीय है कि भाषा, दर्शन, अध्यात्म आदि विविध विषयों का विद्वान् हुए बिना ऐसा कैसे किया जा सकेगा?
अतः विविध शास्त्रों के अभ्यास में प्रमाद करना ठीक नहीं। वक्ता और लेखक को तो वस्तुतः बहुश्रुत विद्वान् होना बहुत आवश्यक है। अन्यथा उन पर आचार्य सिद्धसेन का यही कथन चरितार्थ होगा कि-
'दैवखातं च वदनं आत्मायत्तं च वाङ्मयम्।
श्रोतारः सन्ति चोक्तस्य निर्लज्जः को न पण्डितः॥” -(सिद्धसेन-बत्तीसी)
अर्थात् उनका मुँह-मुँह नहीं है, दैव का गड्ढ़ा है; वे जो बोलें, वही उनके घर का शास्त्र है; दुनिया में श्रोता तो हर बात के लिए मिल ही जाते हैं; बस और चाहिए ही क्या? निर्लज्ज हो जाइए तो कौन पंडित नहीं है?
हमारा कहने का अभिप्राय इतना ही है कि हमें अपनी शक्ति-अनुसार न्याय, दर्शन, भाषा, व्याकरण आदि विविध शास्त्रों का भी ज्ञानार्जन अवश्य करना चाहिए, ताकि हमारे तत्त्वज्ञान में और अधिक निर्मलता उत्पन्न हो। साथ ही उसके प्रतिपादन में भी विशेष कुशलता हासिल हो।
हमारे सभी पूर्वाचार्य ही नहीं, मध्यकालीन हिन्दीलेखक पं. टोडरमलजी, जयचन्दजी छाबड़ा, दौलतरामजी, भागचन्दजी, संतलालजी आदि भी विविध विषयों के बहुत बड़े विद्वान् थे, जैसा कि उनकी कृतियों से स्पष्ट झलकता है। आश्चर्य होता है कि इतना ज्ञान होने पर भी ये विद्वज्जन ऐसा लिखते हैं कि हम तो मंदबुद्धि और अल्पज्ञ हैं, शास्त्रों का व्यापक ज्ञान नहीं रखते हैं, सुधी पाठक हमें क्षमा करें।
श्रोता यदि विद्वान् होगा तो वक्ता को भी बड़ा लाभ होगा और उत्तम श्रोता-वक्ता की जोड़ी मिलकर महती धर्मप्रभावना कर सकेगी, जैसा कि हेमचन्द्रसूरि ने भी कहा है-
“श्राद्धः श्रोता सुधीर्वक्ता युज्येयातां यदीश! तत्।
त्वच्छासनस्य साम्राज्यमेकच्छत्रं कलावपि॥”-वीतराग-स्तोत्र, 3
अर्थात् हे प्रभो! यदि श्रद्धालु व सुधी (विद्वान्) श्रोता-वक्ता का योग मिल जाए तो इस कलियुग में भी आपके शासन का एकछत्र साम्राज्य हो।
प्रतीत होता है कि आजकल जिनवचनों के सुधी विद्वान् श्रोता-वक्ता बहुत कम हो गये हैं, इसीलिए जैन धर्म का प्रभाव क्षीण हो रहा है।
❖❖