शास्त्राभ्यास से होने वाले दस लाभ –
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क्रोधादि कषायों की मंदता होती है।
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पाँच इन्द्रियों के विषयों में प्रवृत्ति रुकती है।
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अति चंचल मन भी एकाग्र होता है।
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हिंसादि पाँच पाप नहीं होते।
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अल्प ज्ञान होने पर भी त्रिलोक के त्रिकाल संबंधी समस्त चराचर पदार्थों का जानना होता है।
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हेय उपादेय की पहचान होती है।
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आत्मज्ञान सन्मुख होता है या ज्ञान आत्मसन्मुख होता है।
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अधिक-अधिक ज्ञान होने पर आनंद उत्पन्न होता है।
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लोक में महिमा, यश, विशेष होता है।
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सातिशय पुण्य का बन्ध होता है।
इसलिए जिनवाणी का अभ्यास निरंतर करना ही चाहिए।