शासननायक श्री वर्धमान जिन पूजा
रचयिता: राजेश कासलीवाल, उज्जैन
पूर्ण पाठ नीचे दिया है, मूल PDF (6 पृष्ठ) सबसे नीचे संलग्न।
शासननायक श्री वर्धमान जिन पूजा (रचियता- राजेश कासलीवाल, उज्जैन)
स्थापना
(हरिगीत)
सुरेंद्र से - असुरेंद्र से - चक्रेश से पूजित प्रभो ।
चउ घातिया क्षयकार हो अरहंत कहलाए विभो ।
तीर्थ के नायक अहो ! तुम धर्म के करतार हो ।
वर्धमान जिनेन्द्र को वंदन अतः शतबार हो ।
(दोहा)
मंगल उत्तम शरण हो, तीन भुवन सरताज ।
आओ तिष्ठो हृदय में, महावीर जिनराज ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्र! अत्र अवतर अवतर संवौषट । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः । अत्र मम
सन्निहितो भव भव वषट् ।
(छंद: - लावनी; निज रूप मगन मन ध्यान…)
समकित से सुंदर अंतस है प्रभु तेरा ।
रे ! मलिन महा मिथ्यातम से गृह मेरा ।
शासन नायक हे महावीर ! जिनराजा ।
मैं नीर चरण में लाया निज हित काजा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय मिथ्यामलप्रक्षालनार्थ निर्मलनीरं निर्वपामिती स्वाहा ।
परिणति मेरी जल रही क्रोध अनल से ।
प्रभु मिले शांति तव चरण-शरण शीतल से ।
शासन नायक हे महावीर ! जिनराजा ।
मलयागिरि चंदन लाया निज हित काजा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय निष्कषायशीतलपरिणाम प्राप्ताय मलयागिरीचंदनं निर्वपामिती स्वाहा ।
अक्षय अखंड अविनाश अचल ध्रुव अनुपम ।
मम अंतर को प्रभु हो प्रतिछंद स्वरूपम ।
शासन नायक हे महावीर ! जिनराजा ।
तंदुल चरणों में लाया निज हित काजा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अनंतअक्षय पद प्राप्ताय अखंडअक्षतां निर्वपामिती स्वाहा ।
मृदुता पुष्पों सी प्रभू आपकी जैसी ।
मनसिज को तजकर पाऊँ मै भी वैसी ।
शासन नायक हे महावीर ! जिनराजा ।
ये कुसुम मनोहर लाया निज हित काजा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय मृदुभाव प्राप्ताय ऋजुपुष्पं निर्वपामिती स्वाहा ।
अरे ! त्रिलोकी-भोग रहे सब अक्षम ।
तृष्णा खाई जो रिक्त रही प्रभु ! हरदम ।
शासन नायक हे महावीर ! जिनराजा ।
षटरस चरणों में लाया निज हित काजा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय चिरतृप्तिप्रदायक आत्मानुभवरस प्राप्ताय षटरस नैवैद्यं निर्वपामिती स्वाहा ।
मोहान्ध रहा अज्ञान-अमा है भारी ।
निज पर परकाशक ज्ञान, तिमिर क्षयकारी।
शासन नायक हे महावीर ! जिनराजा ।
ये रत्नदीप मैं लाया निज हित काजा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय केवलज्ञानप्राप्ताय रत्नदीपं निर्वपामिती स्वाहा ।
रज कर्म नही, है भाव-करम दुःखकारण।
सब विकृत को तज हुए प्रभू जगतारण ।
शासन नायक हे महावीर! जिनराजा ।
मै धूप सुगंधित लाया निज हित काजा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय चिद्विकृतपरिणामनिवारणाय अष्टांग धूपं निर्वपामिती स्वाहा ।
जिस पंथ चले भगवंत अनंत अविचल ।
अनुसरण चरण का कर पाऊँ मैं शिवफल ।
शासन नायक हे महावीर ! जिनराजा ।
फल दिव्यतरु के लाया निज हित काजा ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अशरीरीसिद्धपदप्राप्ताय दिवद्रुमफलं निर्वपामिती स्वाहा ।
बहुमुल्य जगत का वैभव सब संयोगी ।
तुम छोड़ चले वन बने दिगंबर योगी ।
कर शेष कषाय अशेष हुए भगवंता ।
निर्द्वंद्व निराकुल निराबाध निश्चिंता ।
शासन नायक हे महावीर ! जिनराजा ।
ये अर्घ्य अमोलक लाया निज हित काजा।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अपूर्व अनर्घ्य पद प्राप्ताय अमोलक अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।
पंच कल्याणक (तर्ज - रे मन भजले श्री भगवान…)
कल्याणक हो गए पांच प्रभु श्री वर्धमान के ।
है सबको मंगलकार कल्याणक भगवान के ।
गर्भ कल्याणक
छठमी अषाढ़ सुदी की, त्रिशला उर आए प्रभु जी ।
रे ! बरसे रत्न अपार, कल्याणक भगवान के ।
है सबको मंगलकार, कल्याणक भगवान के ।
ॐ ह्रीं अषाढ़शुक्लषष्टम्यां गर्भमंगल मंडिताय शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।
जन्म कल्याणक
चैत्र सुदी का शुभ दिन, तेरस थी मंगलकारी ।
रे ! जन्मे वीर कुमार, कल्याणक भगवान के ।
है सबको मंगलकार, कल्याणक भगवान के ।
ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लत्रयोदशम्यां जन्ममंगल मंडिताय शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।
तप कल्याणक
मगसिर कृष्णा दसमी थी, तज वैभव दीक्षा ली थी ।
आए लौकान्त कुमार, कल्याणक भगवान के ।
है सबको मंगलकार, कल्याणक भगवान के ।
ॐ ह्रीं मगसिरकृष्णदशम्यां तपोमंगल मंडिताय शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।
ज्ञान कल्याणक
वैशाख सुदी दशमी को, घाति चतुष्टय क्षय कर ।
प्रगटा था ज्ञान अपार, कल्याणक भगवान के ।
है सबको मंगलकार, कल्याणक भगवान के ।
ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लदशम्यां ज्ञानमंगल मंडिताय शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।
मोक्ष कल्याणक
कार्तिक की सुखद अमावस, प्रभु मोक्ष गए तजि तन को ।
रे ! घर-घर मंगलाचार, कल्याणक भगवान के ।
है सबको मंगलकार, कल्याणक भगवान के ।
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्णअमावस्यां मोक्षमंगल मंडिताय शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।
जयमाला
(दोहा)
अहो अनुपम आतमा, पूर्ण शुद्ध परिणाम ।
अद्भुत महिमा वीर की, नमन तुम्हे गुणधाम ।
(छंद-लक्ष्मीधरा; नंदीश्वरद्वीपपूजन जयमाला)
ज्ञान - दर्श - वीर्य के सुख के धाम हो ।
पूर्ण निर्दोष हो, पूर्ण निष्काम हो ।
आप गुणगान को आज आया प्रभो ।
वर्धमान वीतराग विज्ञ विश्व के विभो ।
ऋषभ के पौत्र बन कुपथ गामी हुए ।
क्रूर पशु सिंह बन सुपथ गामी हुए ।
मोह को मार मुक्ति-मार्ग पाया प्रभो ।
वर्धमान वीतराग विज्ञ विश्व के विभो ।
धरम को धारकर आत्म-आश्रय लिया ।
भरम को नाशकर करम को क्षय किया ।
परम सुख धाम चरम तीर्थनायक प्रभो ।
वर्धमान वीतराग विज्ञ विश्व के विभो ।
धन्य कुंडग्राम है धन्य त्रिशला मात है ।
धन्य सिद्धार्थ है विश्व विख्यात है ।
धन्य मुनिराज बन मौन हो गए प्रभो ।
वर्धमान वीतराग विज्ञ विश्व के विभो ।
धान्य - धन - धाम त्याग ध्रुवधाम ध्याइयो ।
पुण्य - पाप आग त्याग परम पद पाइयो ।
ध्रुव में अचल हो अनुपम हुए प्रभो ।
वर्धमान वीतराग विज्ञ विश्व के विभो ।
आपके चरण चल शिवपद पाएगें ।
आपके भक्त भगवान बन जाएगें ।
वीर अतिवीर महावीर सन्मति प्रभो ।
वर्धमान वीतराग विज्ञ विश्व के विभो ।
दोहा
महावीर की वंदना, मंगलमय गुण गान ।
जिन सम निज को जानकर, शीघ्र मिले निर्वाण ।
ॐ ह्रीं शासननायक श्रीवर्धमान जिनेंद्राय अपूर्व अनर्घ्य पद प्राप्ताय अमोलकअर्घ्यं निर्वपामिती स्वाहा ।
मूल दस्तावेज़ (PDF):
- Shasannayak_Shri_Vardhaman_Jin_Puja_Rajesh_Kasliwal.pdf (0.2 MB, 6 पृष्ठ)
स्रोत: Jain Granth E Library (Telegram), t.me/jainegranth/60009।