शरद-पूर्णिमा
वायु का शीतल स्वच्छ-प्रवाह, चन्द्रिका फैली है चहुँ ओर।
कहीं धन कहीं स्वच्छ-आकाश, तारकावलि थी एक हिलोर।।1।।
चन्द्र निज-यौवन-मद में भूल, चन्द्रिका से करता है केली।
चन्द्रिका विलसित आँख-मिचौनी, करती एक अनूठी-खेली।।2।।
चन्द्रिका इठलाती उन्मत्त, कभी सहसा ही होती लुप्त।
ढूँढने जाती है उस ओर, चन्द्र जब होता घन में सुप्त।।3।।
पकड़ती जब वह घन में चन्द्र, उछलती उसकी सुरभित-देह।
देख ज्यों प्रिय को वर्षों बाद, उमड़ पड़ता रमणी का स्नेह।।4।।
चन्द्रिका यौवन-मद में चूर, आज है उसका अपना साज।
देखती रजनी निज-तारों से, चन्द्र-चन्द्रिका का अनुराग।।5।
देखकर कवि भी रहता दंग, कल्पना उसकी होती क्षुब्ध।
सोचती भू पर किसने आज, बिखेरे किसने ये रति-पुष्प।।6।
कीर्ति-पुष्पों के सुन्दर-भाव, चन्द्रिका देख उमड़ते आज।
किन्तु इसके विलास को देख, चित्त होता अति-क्षुब्ध उदास।।7।।
चन्द्रिका की क्रीड़ायें देख, आज हिय के होते शत-खण्ड।
प्रभो! क्या परतन्त्र के लिए, उचित है क्रीड़ा जैसा दण्ड।।8।।
अरी! निठुरे निर्लज्ज अपार, आज होता यदि देश स्वतंत्र।
सुहानी लगती तेरी केली, किन्तु तू स्वयं आज परतंत्र।।9।।
खेलकर हिन्द-गोद में सदा, गँवाया तूने शैशव-काल।
निठुर तू क्रीड़ा करती आज, आज जब देश हुआ बेहाल।।10।।
अरी तू मत्त और उन्मत्त, तुझे नहिं मातृभूमि का ध्यान।
निठुर हो जावे तेरा अन्त, तुझे नहिं अपनेपन का ज्ञान।।11।।
व्यर्थ है तेरे तन की ज्योति, श्वेत से काली पड़ जा दुष्ट!
पतंगे के सम अथवा अभी, अभी तू हो जा दावा-दग्ध।।12।।
अन्यथा काली-क्रीड़ा छोड़, हिन्द में पाया तूने सारा।
सदा ही खेल खेलकर दुष्ट, इसी में पाया जीवन-प्राण।।13।।
इसी में यौवन पाया देख, इसी में मिले चन्द्र-भरतार।
इसी को परतंत्र में देख, बनी है तू निर्लज्ज-अपार।।14।।
अरी बेशर्म! निठुर-निर्लज्ज! छिने हैं तेरे सब अधिकार।
चन्द्र की क्रीड़ा को ही समझा, तूने नया स्वर्ण-संसार।।15।।
अहो! जब पार-तंत्र्य ही मृत्यु, कहो तब क्यों जीवन की आस।
कभी क्या परतंत्र में मिला, किसी को जीवन का आभास।।16।।
बना है आज देश परतंत्र, कर रही तू क्रीड़ा का साज।
त्याग री त्याग निठुर! अब त्याग, लगा दे निर्बल-हिय में आग।।17।।
जगाकर जग को कर स्वाधीन, सिखा निज-गौरव से अनुराग।
जाग जावें भारत के बाल, सीख स्वाधीन-प्रेम का पाठ।।18।।
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