शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में जैनाचार की भूमिका | Shantipurn Sah Astitv Men Jainachar Ki Bhumika

शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में जैनाचार की भूमिका

-प्रो. वीरसागर जैन

जैनाचार एक विस्तृत एवं गम्भीर विषय है। यहाँ हमारा उद्देश्य उस सम्पूर्ण जैनाचार को प्रतिपादित करना नहीं हैं, अपितु शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना उत्पन्न करने में उसका कितना क्या योगदान है- इसी पक्ष पर विचार करना है । शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आज विश्व सिमट गया है और मनुष्य की भावनाएँ इतनी अराजक हो गई हैं कि सभी लोग अपने-अपने स्वार्थ में डूबे हुए एक-दूसरे को खा जाना चाहते हैं, किसी को किसी अन्य के अस्तित्व को ही स्वीकारने की कोई भावना नहीं बची है । खतरा इतना बढ़ गया है कि यदि हमने परस्पर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना सबमें उत्पन्न नहीं की तो एक दिन हम सभी समाप्त हो जाएंगे, कोई भी नहीं बच पाएगा।

जैनाचार को जैनागम-ग्रंथों में दो भागों में बाँटकर समझाया गया है-मुनि-आचार और श्रावकाचार। यहाँ हमारा प्रकरण आधुनिक समाज में हमारे शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व से है, अतः यहां श्रावकाचार की ही चर्चा करना अधिक उपयुक्त होगा। मुनि-आचार तो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का सर्वस्वीकृत रूप ही है ।

जैन श्रावकाचार को जैन-आगम-ग्रंथों में कुल मिलाकर 12 व्रतों के माध्यम से समझाया गया है, जिनके नाम एवं स्वरूप अति संक्षेप में इसप्रकार है-

  1. अहिंसाणुव्रत- स्थूल रूप से हिंसा का त्याग कर देना अहिंसाणुव्रत है।

  2. सत्याणुव्रत- स्थूल रूप से असत्य भाषण का त्याग कर देना सत्याणुव्रत है।

  3. अचौर्याणुव्रत- किसी की वस्तु को न चुराना और न चुराने की इच्छा करना अचौर्याणुव्रत है।

  4. ब्रह्मचर्याणुव्रत- अपने जीवनसाथी में ही संतुष्ट रहना, परस्त्री/परपुरुष के प्रति कुदृष्टि न रखना ब्रह्मचर्याणुव्रत है।

  5. परिग्रहपरिमाणव्रत- आवश्यकता से अधिक परिग्रह संचित न करना, उसे यथाशक्ति सीमित कर लेना परिग्रहपरिमाणव्रत है।

  6. दिग्व्रत- जीवनपर्यन्त दसों दिशाओं में जाने की मर्यादा निश्चित कर लेना दिग्व्रत है।

  7. देशव्रत- दिग्व्रत में ग्रहण की गई सीमा को भी यदा-कदा कुछ समय के लिए और भी कम कर लेना देशव्रत है।

  8. अनर्थदण्डव्रत- बिना प्रयोजन के हिंसा या झूठ आदि पापों को नहीं करना अनर्थदण्डव्रत है।

  9. सामायिक- प्रतिदिन थोडी देर शांतिपूर्वक आत्मा-परमात्मा का ध्यान करना सामायिक है।

  10. प्रोषधोपवास- सप्ताह में एक बार आहार एवं व्यापार आदि का त्याग करके दिनभर धर्मध्यान करना प्रोषधोपवास है।

  11. अतिथिसंविभागव्रत- मुनि या श्रावक रूप अतिथि को आहार कराके ही स्वयं आहार ग्रहण करना अतिथिसंविभागव्रत है।

  12. भोगोपभोगपरिमाणव्रत- दैनिक जीवन के उपयोग की सभी वस्तुओं की यथाशक्ति संख्या या सीमा निश्चित कर लेना ही भोगोपभोगपरिमाण व्रत है।

ज्ञातव्य है कि इन 12 व्रतों में से प्रारम्भ के पांच व्रत ‘अणुव्रत’ कहलाते हैं, क्योंकि गृहस्थ अवस्था में उनका पूर्ण पालन संभव नहीं होता, किंचित् मात्र ही हो पाता है; उनके बाद के तीन व्रत ‘गुणव्रत’ कहलाते हैं, क्योंकि उनके पालन से अणुव्रतों की गुणवत्ता में वृद्धि होती है; और अन्त के चार व्रत ‘शिक्षाव्रत’ कहलाते हैं, क्योंकि वे आगे के मुनिजीवन की शिक्षा का अभ्यास कराते हैं ।

उक्त 12 व्रतों में से प्रारम्भ के पाँच व्रतों को ‘व्रत’ और बाद के सात व्रतों को ‘शील’ भी कहते हैं, क्योंकि प्रारम्भ के पांच व्रतों की रक्षा के लिए ही वास्तव में बाद के सात व्रतों का विधान किया गया है। शील अर्थात् व्रतों का रक्षक, जो व्रतों की रक्षा करे, उसे शील कहते हैं ।

यहां यह भी विशेष उल्लेखनीय है कि जैनाचार्यों के अनुसार वस्तुतः तो व्रत एक ही है- अहिंसा, और बाकी के सभी व्रत उस एक अहिंसा के ही पोषण-संपोषण हेतु कहे गये हैं।

जिसप्रकार हाथी के पैर में सभी के पैर समाहित हो जाते हैं- ‘सर्वं पदाः हस्तिपदे निमग्नाः’, उसीप्रकार एक अहिंसा के पालन में सर्व व्रतों का पालन समाहित हो जाता है। तथा यदि अहिंसा व्रत का पालन नहीं हो रहा है तो समझना चाहिए कि अन्य किसी भी व्रत का पालन समीचीन रूप से नहीं हो रहा है। इस सन्दर्भ में प्रसिद्ध जैनाचार्य श्री अमृतचन्द्रसूरि का निम्नलिखित कथन विशेष ध्यानपूर्वक पठनीय है-

“आत्मपरिणामहिंसनहेतुत्वात् सर्वमेव हिंसैतत् ।
अनृतवचनादि केवलमुदाहृतं शिष्यबोधाय ।।” -पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, 42

अर्थ:- वास्तव में आत्मपरिणामों की हिंसा करने के कारण सभी पाप हिंसा ही हैं । असत्य, चोरी आदि तो केवल शिष्यों को विस्तारपूर्वक समझाने के लिए कहे गये हैं।

इस प्रकार यह अत्यन्त स्पष्ट है कि जैनाचार की मुख्य आधारशिला अहिंसा पर ही रखी गई है। इसे हम दूसरे शब्दों में इस प्रकार कह सकते हैं कि सम्पूर्ण जैनाचार का केन्द्रबिन्दु एक अहिंसा ही है।

अतः जैनधर्म के अनुसार जैनाचार का पालन करने के इच्छुक व्यक्ति को सर्वप्रथम एक अहिंसा को ही समीचीन रूप से समझने और पालने का प्रयास करना चाहिए । जैनदर्शन में अहिंसा की व्याख्या अत्यन्त सूक्ष्म रूप से की गई है। विश्व के आचारशास्त्री और दर्शनशास्त्री उस व्याख्या से आश्चर्यचकित होकर ऐसा कहते हैं कि जहाँ अन्य धर्मों की अहिंसा-व्याख्या समाप्त हो जाती है, वहां से तो जैनधर्म की अहिंसा-व्याख्या प्रारम्भ होती है । प्रायः अन्य सभी धर्मों ने धर्म आदि के नाम पर होनेवाली हिंसा को हिंसा की परिधि से बाहर निकालकर अहिंसा का दर्जा प्रदान कर दिया है, किन्तु जैनधर्म में हिंसा को इसप्रकार महिमा-मंडित करना सर्वथा त्याज्य बताया गया है। वहां हिंसा हिंसा ही है, चाहे वह कोई भी करे, कभी भी करे, किसी की भी करे, किसी भी लिए करे। जैनधर्म के अनुसार किसी जीव को मारना-सताना तो हिंसा है ही, किन्तु मारने-सताने का भाव करना भी हिंसा ही है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि जैनधर्म की अहिंसा में केवल मानवजाति ही नहीं आती, अपितु सम्पूर्ण प्राणि-जगत् ही उसमें समाहित हो जाता है। जैनधर्म के अनुसार पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति को भी जीव माना गया है। इसका अर्थ यह समझा जाना चाहिए कि जैनधर्म का आचारशास्त्र मानवमात्र के ही शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना उत्पन्न नहीं करता, अपितु सम्पूर्ण प्राणि-जगत् के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना उत्पन्न करता है, जो आज के समय में जबकि पर्यावरण का भी घोर संकट मनुष्य के मस्तिष्क पर मँडराने लगा है, बड़ा ही उपयोगी प्रतीत होता है।

इस प्रकार यह भी स्पष्ट है कि जैनधर्म में अहिंसा की अवधारणा का आधार मात्र आत्मकल्याण की ही भावना नहीं है अपितु उसमें सभी प्राणियों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना भी भरी हुई है। जैनधर्म सदय कहता है कि जो जीव स्वयं को काँटा चुभने के भय से पैरों में जूते धारण करता है और दूसरे जीवों पर तीर/अस्त्र चलाता है, वह महापापी है। जैन-आगम-ग्रन्थों में इसी आशय के अनेक कथन उपलब्ध होते हैं । यथा-

“सव्वे जीवा वि इच्छंति, जीविडं न मरिज्जउं ।
तम्हा पाणवहं घोरं, निग्गंथा वज्जयंति णं।।” -समणसुत्तं

अर्थ- सभी जीव जीना चाहते हैं, कोई मरना नहीं चाहता, इसलिए प्राणवध को भयानक पाप जानकर निर्ग्रन्थ उसका वर्जन करते हैं।

अहिंसाणुव्रत की भाँति सत्याणुव्रत, अचौर्याणुव्रत, ब्रह्मचर्याणुव्रत और परिग्रह-परिमाण नामक व्रतों के पालन में भी आत्मकल्याण के साथ-साथ परकल्याण की भावना भी निहित है, उनसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में विश्वशांति या सभी जीवों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में भी सहायता प्राप्त होती है; क्योंकि असत्यभाषण, चोरी आदि पापों से ही तो सभी का शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व खतरे में पड़ा है। यथा-

असत्यभाषण से कोई किसी का विश्वास नहीं करता | इससे कोई भी एक किसी अन्य को शांति से नहीं रहने देता। असत्यभाषी के साथ कोई रहना पसंद नहीं करता ।

चोरी से भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न होती है। सभी को अपना धन प्राणों से प्यारा होता है- ‘धनं वै प्राणाः’। जो उसे चुराए, उसके साथ कोई कैसे शांतिपूर्वक रह सकता है ?

ब्रह्मचर्याणुव्रत का अर्थ है- अपने साथी, पति या पत्नी में सन्तोष रखना, परस्त्री या परपुरुष के प्रति कुदृष्टि नहीं रखना। शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए यह भी एक अत्यन्त आवश्यक नियम है। जिस समाज में यह नहीं होगा, वहां कोई शांतिपूर्वक नहीं रह सकता।

प्रकृति के संसाधन सीमित हैं । यदि एक व्यक्ति उनका आवश्यकता से अधिक उपयोग करेगा तो कैसे अन्य लोगों का जीवनयापन होगा ? अतः शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में परिग्रह-परिमाण की भी महती भूमिका सिद्ध होती है।

अहिंसा आदि पांच अणुव्रतों की भाँति सात शीलव्रतों को भी शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए उपयोगी माना जाना चाहिए। जैनाचार का कोई भी व्रत-नियम ऐसा नहीं है, जो सभी प्राणियों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में बाधक हो।

जैनाचार में उक्त ‘व्रतों’ और ‘शीलों’ के साथ-साथ अनेक ऐसी बातों के पालन की भी प्रेरणा दी गई है, जिनसे शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का वातावरण निर्मित होता है। जैसे-

  1. सभी प्राणियों से मैत्री, गुणीजनों में प्रमोद, दुखियों के प्रति करुणा और दुर्जनों के प्रति मध्यस्थता की भावना करनी चाहिए ।

  2. पाले हुए पशु-पक्षियों का बंधन एवं वध नहीं करना चाहिए, उनके आहार जल एवं आराम का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए ।

  3. कभी किसी को झूठी सलाह नहीं देनी चाहिए, किसी की गुप्त बात प्रकट नहीं करनी चाहिए, किसी की धरोहर का अपहरण नहीं करना चाहिए।

  4. राज्यविरुद्ध कार्य करना, चोरी का माल खरीदना, व्यापार में मिलावट करना, कम तौलना इत्यादि कार्य भी नहीं करने चाहिए।

  5. पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति (पेड़-पौधे) एवं कीड़े-मकोड़ों तक की रक्षा करनी चाहिए।

  6. चित्र, पाषाणादि से बने हुए जीवों के साथ भी दुर्व्यवहार नही करना चाहिए।

  7. काम-भाव की तीव्रता अर्थात् परस्त्री-सेवन या वेश्यागमन का कार्य नहीं करना चाहिए।

  8. मन, वचन और काया की प्रवृत्ति सोच-विचार कर जैसी उचित हो, वैसी करनी चाहिए।

  9. आहार, जल आदि का भलीभाँति देखकर ही दिन में ही सेवन करना चाहिए।

  10. क्रोध, लोभ, चुगली, परनिन्दा, आत्मप्रशंसा आदि का भी त्याग कर देना चाहिए ।

कहने की आवश्यकता नहीं है कि उक्त सभी प्रकार के व्रत-नियमों वाली जैनाचार-संहिता न केवल मनुष्य के ही शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में उपयोगी सिद्ध होती है, अपितु संसार के समस्त प्राणियों में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का भी सुंदर वातावरण तैयार करती है | इसके परिपालन से एक स्वस्थ एवं सुंदर समाज की संरचना तैयार होती है।

सन्दर्भ-ग्रन्थ-

  1. तत्त्वार्थसूत्र, आचार्य उमास्वामी, संपादक पं. फूलचंद्र शास्त्री, श्री गणेश वर्णी शोध संस्थान, वाराणसी
  2. रत्नकरण्डश्रावकाचार, आचार्य समन्तभद्र, टीकाकार पं. सदासुखदासजी, वीतराग-विज्ञान ग्रन्थमाला, अजमेर, राजस्थान
  3. पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, आचार्य अमृतचन्द्र, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर
  4. सर्वार्थसिद्धि, आचार्य पूज्यपाद, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली
  5. समणसुत्तं, संकलन श्री जिनेन्द्र वर्णी, आगम प्रकाशन, 5373, जैनपुरी, रेवाडी, हरियाणा
  6. Ethical Doctrine in Jainism, Dr. K.C. sogani, Jain Vidya, Sansthan, Shri Mahaveerji, Jaipur