लेखक: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली
आज शांति की ‘भावना’ वाले जैनधर्म को शांति की ‘कामना’ वाला धर्म बनाने का सुनियोजित-षड्यंत्र चल रहा है और बड़े से बड़े विचारक, तपस्वी (?) एवं विद्वान् (?) भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। ये सब मिलकर वीतरागी-जैनधर्म और इसके आदर्श वीतरागी-देव के स्वरूप को विकृत करने के लिये कृतसंकल्प दिखायी दे रहे हैं। अतः मुझे यह अत्यन्त प्रासंगिक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य-आवश्यकता के रूप में प्रतीत हुआ कि ‘शान्तिधारा’ के इस वीतरागी-जैनधर्म-विरोधी एवं अकर्तावाद के विध्वंसक कर्मकांड की वास्तविकता से परदा उठाया जाये।
वीतरागी-जैनधर्म के अहिंसा, अपरिग्रह एवं अकर्तावाद के मूलभूत-सिद्धांतों को तिरोहित करनेवाले इस षड्यंत्रपूर्ण-कर्मकांड (शान्तिधारा) के पोषक वे लोग तो हैं ही, जो मूलतः वीतरागी-जैनधर्म के विरोधी हैं तथा जिनका उद्देश्य ही वीतरागी-जैनधर्म में वीतरागता के सिद्धान्तों एवं आचरण-पद्धतियों का विरोध करके ईश्वर-कर्तावाद, हिंसक-विचारधारा एवं वैदिक-धर्म की तरह कर्मकांडों की घुसपैठ कराना है। किन्तु आज बहुत से ऐसे लोग भी इस कार्य को वास्तविकता जाने-समझे बिना ही अन्धश्रद्धावश लोगों की देखादेखी करने लगे हैं। जिनकी मानसिकता ही हिंसा, परिग्रह और कर्तावाद की है, उन्हें तो समझाने की कोशिश करना ही लगभग व्यर्थ है; क्योंकि सोते हुये व्यक्ति को जगाना आसान है, किन्तु जो सोने का अभिनय कर रहा हो, उसे कौन जगाये? जो जागते हुये भी जागना नहीं चाहता हो; उसे जगाने का प्रयास लगभग अशक्य-अनुष्ठान जैसा ही है।
अतः मैं यहाँ उन सुषुप्त-चेतनावाले एवं शान्तिधारा नामक कर्मकांड की वास्तविकता से अनभिज्ञ लोगों के लिये उनके ज्ञानचक्षु उन्मीलित करने के लिये लिख रहा हूँ; जो मात्र वास्तविकता से अनभिज्ञ होने के कारण इस वीतरागी-जैनधर्म के विपरीत कर्मकांड को अज्ञानतावश अनुष्ठित कर रहे हैं। उनकी विचारधारा ऐसे हिंसा-समर्थक, परिग्रहबहुल एवं कर्तावादी-अनुष्ठान के समर्थन की कदापि नहीं है। पर वे तो इसे अज्ञानतावश जिनेन्द्र-भक्ति के रूप में शान्तिधारा जैसे जिनाम्नाय के पूर्णतः विरुद्ध कार्य रहे हैं।
शान्तिधारा पर कुछ भी कहने से पहले मैं वीतरागी-जैनधर्म के कुछ मूलभूत-सिद्धांतों का उल्लेख करते हुये उनकी परिचय देना चाहूँगा कि वे जैनधर्म के मूलभूत-सिद्धांत क्यों बने? और यदि उन्हें तिलांजलि दे दी जाये, तो क्या जैनधर्म की मूलभूत-पहिचान बच सकेगी?
जैनत्व की मूल-पहिचान ‘अकर्तावाद’ - यह जैनधर्म की मूलभूत-पहिचान है। सभी धर्म सत्य-अहिंसा आदि की बात करते हैं। 'यदि कोई विभाजक-रेखा जैनधर्म व अन्य धर्मों में कोई है, तो वह है ‘अकर्तावाद’ है अर्थात् न तो ईश्वर इस जगत् का कर्ता है और न ही अन्य कोई किसी दूसरे व्यक्ति का भला या बुरा कर सकता है।
इसीलिये जहाँ अन्य धर्मों के ईश्वर, अल्लाह, खुदा, यीशू, ब्रह्म-विष्णु-महेश आदि यह कहते हैं कि ‘‘तुम मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सुखी कर दूँगा;’’ तो वहीं जैनधर्म के जिनेन्द्र-परमात्मा किसी को अपनी शरण में नहीं बुलाते। वे कहते हैं कि ‘‘सुख तो आत्मा का स्वभाव है। वह बाहर किसी भी पदार्थ से मिलने वाला ही नहीं है। सुखी होना है, तो अपने स्वरूप की शरण में आओ। संसार में अन्य कोई तुम्हें सुखी नहीं बना सकता है।’’
अणु-अणु का परिपूर्णता एवं स्वतंत्रता का यही घोष जैनधर्म की मूलभूत-पहिचान है। जीव अपने स्वरूप को भूलकर ही दुःखी है और अपने स्वभाव का आश्रय ले कर ही वह सुखी हो सकता है - यह जैनधर्म का मूल-मंत्र है।
यदि कोई कहे कि ‘मैं तुम्हें सुखी बना सकता हूँ’, तो समझ लेना चाहिये कि वह कोई भी हो सकता है; पर ‘जिन’ या ‘जैन’ कदापि नहीं हो सकता है।
जब सुख अपने में ही है, परपदार्थों और परभावों में सुखी या दुःखी करने की सामर्थ्य ही नहीं है; तो भला फिर अपने सुख-साता के लिये अन्य किसी की शरण ली ही क्यों जाये ? और क्यों ऐसा उपदेश दिया जाये कि ‘अमुक की शरण में जाकर तुम सुखी हो सकते हो।’ ऐसा कथन जैनशासन की मर्यादा का पूर्णतः उल्लंघन है।
जब हमारे आगम-ग्रंथ स्पष्ट-शब्दों में यह कहते हैं कि ‘‘जिस द्रव्य का, जिस क्षेत्र में, जिस काल में, जिस भावरूप परिणमन जिस निमित्त से होना केवली के ज्ञान में आया है, वह वैसा ही होगा; उसे इन्द्र या जिनेन्द्र-- कोई भी बदलने में समर्थ नहीं है। क्योंकि ऐसा ही स्वाधीन वस्तुस्वरूप है।’’
- (द्रष्टव्य - स्वामी कार्तिकेय, कार्तिकेयानुप्रेक्षा; एवं आचार्य सिद्धसेन, सन्मतितर्क)
तब क्या शान्तिधारा हमारे भाग्य को बदल सकती है? कौन बदलेगा हमारा भाग्य? वीतरागी जिनेन्द्र परमात्मा तो बदलेंगे नहीं, क्योंकि वे तो वीतरागी हैं।
उन्हें हमसे या अन्य किसी से राग-द्वेष है ही नहीं, इसलिए वे तो बदलेंगे क्यों? और जैनधर्म तो किसी भी व्यक्ति को ऐसा करने की छूट ही नहीं देता है; क्योंकि वस्तु के स्वरूप में ही ऐसी कोई गुंजाइश ही नहीं है। प्रकृति के न्यायालय में घूसखोरी नहीं चलती है कि वीतरागी जिनेन्द्र परमात्मा अपने भक्तों का तो भला कर दें और बाकी जीवों का भाग्यविधाता उनका कर्म बना रहे।
यह सत्य है कि जिनेन्द्र परमात्मा अनन्तबल के धनी होते हैं। तब भी वे किसी को तनिक भी सुखी-दुःखी नहीं कर सकते हैं। यदि कर सकते होते, तो आदि-तीर्थंकर ऋषभदेव के पौत्र मारीच को करोड़ों वर्षों तक संसार के दुःख नहीं भोगना पड़ते। वे तभी उसे अगला-तीर्थंकर बनाकर अनंत-सुखी कर देते। उसे उनसे बाईस तीर्थंकरों के बाद चौबीसवाँ तीर्थंकर बनने के लिये पूरा पुरुषार्थ क्यों करना पड़ता?
और जब अपने सगे पौत्र का जो अनन्तबल के धनी जिनेन्द्र परमात्मा भला नहीं कर सकते हैं, तो फिर हम जैसों का भला करने वे क्यों आयेंगे? - यह विचारें। और यदि वे किसी का भला या बुरा नहीं करते हैं, तो उन पर शान्तिधारा करके हम क्या पाना चाहते हैं? विचार करें।
जिनबिम्ब पर या यंत्र आदि पर शान्तिधारा करने के पीछे भक्तों के ही अपने स्वार्थ हैं; जिनेन्द्र परमात्मा के बिम्ब या यंत्र आदि को तो शान्तिधारा की कोई अपेक्षा है नहीं।
शान्तिधारा की अपेक्षा किसे? :-
तब शान्तिधारा की अपेक्षा है किसे? कौन चाहता है कि शान्तिधारा की जाये? मात्र इस छल के धनी छलिये मायावी-लोग, जो वीतरागी-जैनधर्म के मूलभूत-सिद्धांतों को भुलाकर भोले-भाले लोगों को गृहीत-मिथ्यात्व में फँसाना चाहते हैं। कर्मकांडों के मायाजाल में उलझाकर अपनी पंडिताई चमकाना चाहते हैं।
बिडम्बना तो यहाँ तक बढ़ गयी है कि गृहीत-मिथ्यात्व के समर्थकों की तो बात दूर रहने दीजिये, अपने आप को शुद्धाम्नाय के कट्टर-समर्थक कहलानेवाले आज के दिगम्बराचार्य भी खुद अपने मुँह से शान्तिधारा के जिनाम्नाय-विपरीत पाठों का उच्चारण करके गृहस्थों से शान्तिधारा कराकर उनका पौरोहित्य करते दिखाई दे रहे हैं।
मुझे समझ नहीं आ रहा कि सारे संसार की मोह-माया त्यागने का दम भरनेवाले इन आज के दिगम्बराचार्यों को क्या किसी का भय सता रहा है? जो शान्तिधारा के माध्यम से उसका शमन करना चाहते हैं? अथवा वीतरागी जिनेन्द्र परमात्मा की वीतरागता से इनका विश्वास उठ गया है, जो उनके बिम्ब पर या यंत्र पर जल की धारा करके से शांति की अपेक्षा कर रहे हैं? या सम्यग्दर्शन से रहित अपने को घोषित ये कर देना चाहते हैं? क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव के सप्तभय नहीं होते हैं और ये शान्तिधारा में ‘‘शाकिनी-डाकिनी-भयानि छिंदि छिंदि, भिंदि भिंदि’’ कहकर भगवान् से इनका तुच्छ-व्यंतरों का भय दूर करने की कामना कर रहे हैं? यह पढ़कर तो ये गारंटी से अपने आपको व्यंतरों से डरनेवाला अर्थात् सप्तभय से सहित मिथ्यादृष्टि सिद्ध कर रहे हैं।
शान्तिधारा और मिथ्यात्व आदि शल्यत्रय :-
साथ ही लौकिक-आकांक्षायें व्यक्त करके ये अपने को आकांक्षा-सहित मिथ्यादृष्टि बता रहे हैं; क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव तो ‘निःकांक्षित-अंग’ का धनी होता है। यदि ये आकांक्षा-रहित होते, तो ‘विषभयानि छिंदि छिंदि भिंदि भिंदि’ कहकर ‘जीवित-मरणाशंसा’ की अभिव्यक्ति नहीं करते। ये ‘मारण-उच्चाटन-विद्वेषण-मोहन-वशीकरण’ आदि को नष्ट करने की मिथ्यात्ववर्द्धक-अपेक्षा वीतरागी जिनेन्द्र परमात्मा से कैसे कर सकते हैं? जबकि शान्तिधारा में ये सब कहा ही जाता है - यह सर्वविदित है।
इस विवरण से शान्तिधारा में ‘मिथ्यात्व’ का पोषण तो स्पष्ट है ही, यह जैनधर्म के मूलभूत-सिद्धांतों के विरुद्ध होकर भी जिनेन्द्र-भक्ति के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं, अतः छलरूप होने से ‘माया’ रूप भी है। तथा लौकिक-आकांक्षायें इस शान्तिधारा में स्पष्टरूप से निहित हैं, अतः ‘निदान’ रूप भी है। - इसप्रकार ‘मिथ्यात्व’, ‘माया’ और ‘निदान’ - इन तीनों शल्यों की केन्द्र होने से शान्तिधारा कभी भी जिनाम्नाय के अनुरूप नहीं कही जा सकती है।
जैनत्व का प्राण ‘अकर्तावाद’ :-
इसमें कर्तावाद के रूप में जिनमत से ठीक विपरीत-मान्यता का पोषण है। जिस कर्तावाद से बचाने के लिये आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने ‘समयसार’ ग्रंथराज में पहले ‘कर्ता-कर्म-अधिकार’ लिखकर कर्तावाद का पुरजोर खंडन किया। और फिर तब भी उन्हें तृप्ति नहीं हुई; क्योंकि उन्हें लगा कि जीव की कर्तावादी-दृष्टि उसे सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं करने देगी, तो पुनः इसी कर्तावाद का प्रकारान्तर से निवारण करने के लिये ‘सर्व-विशुद्ध-ज्ञानाधिकार’ लिखा। ज्ञातव्य है कि ये दोनों अधिकार ‘समयसार’ ग्रंथराज की मूल-वर्ण्य-विषय-वस्तु नहीं हैं; क्योंकि ‘समयसार’ ग्रंथराज की रचना उन्होंने भूतार्थ-दृष्टि से नवतत्त्वों को जानकर निजात्मा की अनुभूति के निमित्त की थी। परन्तु जब उन्हें लगा कि इस जीव को अनादिकाल से परपदार्थों और परभावों के कर्तापने का तीव्र-भाव विद्यमान है, जिसके रहते हुये यह न तो नवतत्त्वों का समीचीन-निर्णय कर सकता है और न ही आत्मानुभूति जैसी अनन्त-स्वाधीनता की क्रिया इसके द्वारा संभव है। इसीलिये उन्होंने दो अतिरिक्त-अधिकार ‘समयसार’ ग्रंथराज में लिखे, ताकि जीव की कर्तावादी-दृष्टि टूट सके।
किन्तु शान्तिधारा में तो इसी कर्तावाद की दृष्टि का ही पोषण हो रहा है। कभी जिनेन्द्र परमात्मा को कर्ता मानकर बात कही जा रही है, तो कभी भूत-प्रेत आदि को हमें दुःखदायी मानकर उनके उपद्रव दूर करने की कामना की गयी है। - यह सब जिनाम्नाय के पूर्णतः विरुद्ध है और ‘मिथ्यात्व’ ‘माया’ और ‘निदान’ - इन तीनों शल्यों का पोषक होने से जिनशासन का घातक-कार्य है।
सम्यग्दृष्टि जीव नियम से उक्त तीनों शल्यों का त्यागी होता ही है। अतः जब कोई अविरति-सम्यग्दृष्टि गृहस्थ जीव भी इस शान्तिधारा का समर्थन नहीं कर सकता है, तो मुनिपद-धारी कैसे कर सकते हैं? यह बिडम्बना ही है, जो वीतरागी-जैनधर्म के आम्नाय में इसके उच्चपद-धारकों द्वारा शान्तिधारा जैसे जिनाम्नाय के पूर्णतः विरुद्ध कार्य का अनुष्ठान देखा जा रहा है और उनकी देखादेखी भोली समाज के लोग हर मंदिर में यह कार्य करके ‘बड़ा धर्मानुष्ठान’ किया - ऐसा मानकर रहे हैं। जबकि यह कार्य जिनाम्नाय के पूरी तरह से विपरीत कार्य है।
अहिंसक-जैनधर्म और शान्तिधारा - जैनधर्म की अहिंसक-भित्ति अन्य सभी धर्मों एवं विचारधाराओं से बहुत उत्कृष्ट और सूक्ष्मतम है। हो भी क्यों न? यह धर्म केवली-प्रज्ञप्त जो है। जहाँ वैदेशिक-धर्म मात्र मनुष्यों तक अहिंसा को सीमित रखते हैं; किन्तु पशु-पक्षियों व कीड़े-मकोड़ों की हिंसा की परवाह तक नहीं करते हैं, वहीं जैनेतर भारतीय दर्शन अहिंसा को भले ही कहने को प्राणीमात्र तक व्यापक कहते हों; परन्तु वास्तविकता तो यह है कि जो चर्म-चक्षुओं से दिख जाये, उसी जीव की रक्षा को वे अहिंसा कहते हैं। जबकि जैनधर्म सूक्ष्मतम-जीवों के प्रति यत्नाचार-पूर्वक अहिंसा की ही बात नहीं करता है; अपितु यदि हमारे मन में भी उनके प्रति हिंसा या प्रमाद का भाव है, तो उसे भी यह हिंसा ही कहता है।
आचार्यदेव कहते हैं -
‘‘मरदु जियदु वा जीवो, अयदाचारेण णिच्छिदा हिंसा।’’
अर्थात् जीव मरे या नहीं मरे, किन्तु यदि आप असावधानीपूर्वक आचरण कर रहे हैं, तो आपको जीवहिंसा का पाप लग ही रहा है।
हिंसा के संकल्पी-हिंसा, आरम्भी-हिंसा, उद्योगी-हिंसा आदि भेद हमारे विचारों तक को हिंसारूपी महापाप से बचाने के लिये कहे गये हैं।
जैनधर्म में जीवों के प्राणघात को हिंसा का केन्द्र नहीं माना गया; अपितु हमारे विचारों में यदि हिंसा या प्रमाद तक का भाव/मनोवृत्ति जन्म लेती है, तो वहीं से हिंसा की शुरूआत जैनधर्म मानता है।
जबकि वैदिकधर्म तो स्पष्ट-शब्दों में कहते हैं कि:
‘वैदिकी-हिंसा हिंसा न भवति।’ अर्थात् वैदिक कर्मकांड में होने वाली हिंसा को ‘हिंसारूप पाप’ नहीं माना गया है।
इतना ही नहीं, वे यज्ञों में पशुओं का निर्ममतापूर्वक वध करने के लिये तर्क देते हैं कि:
‘यज्ञार्थः पशवः सृष्टाः’ अर्थात् ब्रह्माजी ने पशुओं की सृष्टि ही यज्ञों में उनकी बलि दिये जाने के लिये की है। (यद्यपि कुछ वैदिक विचारक इसका अर्थ ‘अपनी पाशविक वृत्तियों की यज्ञ में बलि देना’, ऐसा भी करते हैं।)
जैनधर्म में तो मानसिक, वाचिक और कायिक, तीनोंप्रकार की हिंसा को सबसे पहला पाप बताया है। इतना ही नहीं, आचार्य अमृतचन्द्र सूरि तो यहाँ तक लिखते हैं कि:
‘‘अनृत-वचनादि-केवलमुदाहृतं शिष्यबोधाय।’’
(पुरुषार्थसिद्ध्युपाय)
अर्थात् वास्तव में तो पाप केवल एक ही है, और वह है ‘हिंसा’। जो अनृत (झूठ) आदि अन्य पाप कहे गये हैं, वे तो बच्चों को समझाने के लिये कहे गये हैं; अन्यथा जैनधर्म तो हिंसा को ही पाप मानता है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि कोई वचन ‘स्व’ की या ‘पर’ की हिंसा का समर्थन करता है, तो वह भी हिंसा के अन्तर्गत ही परिगणित होगा। उसे ‘झूठ’ संज्ञा देना आवश्यक नहीं है। वह वास्तव में तो ‘हिंसा’ ही है। इसीप्रकार किसी वस्तु का क्षेत्र से क्षेत्रान्तरित होना ही ‘चोरी’ नहीं कही जा सकती है, जब तक कि उसके पीछे किसी के प्राणपीड़न का भाव न हो।
अन्यथा मुनिराज के पास कौवे के द्वारा लाकर डाले गये बहुमूल्य रत्नहार की चोरी का आरोप उन वीतरागी मुनिराज पर आना चाहिये, उसका पापबंध उन्हें होना चाहिये; क्योंकि वह उनके पास मिला। किन्तु आप सभी जानते हैं कि ऐसा नहीं हुआ था। अतः वस्तु का क्षेत्र से क्षेत्रान्तरित होना ही चोरी नहीं कही जा सकती है; बल्कि उस वस्तु के प्रति रागभाव होना, दूसरे से छीनने/चुराने का भाव होना ही वास्तव में ‘चोरी’ की संज्ञा के योग्य है और यह भाव मूलतः अन्य जीव के प्राणपीड़न का निमित्त होने से हिंसा ही है। इसी दृष्टि से आचार्य अमृतचन्द्रसूरि जी ने हिंसा को ही पाप कहा, शेष झूठ आदि संज्ञायें तो स्थूल-भेद समझाने के लिये कही गयी हैं।
यहाँ प्रकरण शान्तिधारा का है। अतः ‘संकल्पी-हिंसा’ एवं ‘वाचिक-हिंसा’ को लक्षित करके हमें सारी बात समझनी होगी। शान्तिधारा में बोलते समय ‘‘छिन्दि-छिन्दि भिन्दि-भिन्दि’’ जैसे शब्दों का उच्चारण किया जाता है। इनका सीधा अर्थ होता है ‘‘छेद डालो, भेद डालो’’। ऐसे आदेशात्मक-क्रियापदों का प्रयोग लोक में युद्ध की स्थिति में किया जाता है। अब शान्तिधारा में इनका प्रयोग कभी सर्प आदि तिर्यंच-जीवों के साथ किया जाता है, तो कभी शाकिनी-डाकिनी आदि निम्नवर्ग के देवों के साथ किया जाता है।
तो पहले तो शान्तिधारा करनेवाले यह बतायें कि जिस जैनशासन में सर्प की फणावलि-सहित सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ तीर्थंकरों की प्रतिमायें शास्त्र-सम्मत न होते हुये भी (क्योंकि ऐसी प्रतिमा अरिहंत-अवस्था की हो नहीं सकती है) बनायी गयीं और उन्हें वैकल्पिक-मान्यता भी दी गयी, तो उन सर्प-जाति के प्राणियों से क्या जैन-संस्कृति विद्वेष कर सकती है। उन्हें ‘छेदो-भेदो’ जैसे संकल्पी-हिंसा के वचन बोल सकती है? मेरे हिसाब से तो ‘सर्प आदि विषैली-प्रकृति के प्राणियों के प्रति तो क्या, किसी भी जीव के लिये ऐसे हिंसक-शब्दों का प्रयोग करने की अनुमति जैनधर्म में नहीं है।’ और शासनदेवी-देवताओं की जाति तो व्यंतर और भवनवासी-देवों के भी निम्नतम-श्रेणी के देवों की होती है। इनका भी जैन-संस्कृति में निषेध नहीं किया है। ये राष्ट्रपति महोदय के चोबदारों की तरह विद्यमान रहने की ड्यूटी वाले बताये गये हैं। (इन्हें आजकल लोग अज्ञानतावश पूजने लगे हैं, इसलिये इनकी पूजा का निषेध किया जाता है, न कि इनकी सत्ता का। जैसे कि कोई अज्ञानतावश राष्ट्रपति महोदय की जगह उनके चोबदारों का सम्मान करने लगे, तो उनके सम्मान का निषेध करना ही पड़ेगा।) किन्तु इनके प्रति हिंसक-शब्दों का प्रयोग करने की अनुमति जैनधर्म में कहीं भी नहीं दी गयी है। समवसरण में इन सभी को बैठने के स्थान निर्धारित होते हैं।
‘छेदो-भेदो’ - ऐसे प्रयोगों को जैनधर्म में ‘वधंकरी-भाषा’ कहा गया है।
अर्थात् ‘किसी जीव का वध करने का आदेश देनेवाली भाषा’ कहा गया है। अब आप ‘वधंकरी-भाषा’ को ‘हिंसा’ और ‘पाप-कार्य’ मानते हैं, तो फिर आप स्वयं ही निर्णय करें कि हम शान्ति की धारा कर रहे हैं या हिंसा की अजस्र-धारा वाली शब्दावलि बोल रहे हैं?
बुंदेलखंड में तो ‘देहावसान हो जाने’ को भी ‘शांत हो जाना’ कहा जाता है। तो कहीं आपकी शान्तिधारा के पीछे ऐसी ही भावना तो नहीं है? अर्थात् आप नाम तो शान्तिधारा का ले रहे हों और अभिप्राय उन जीवों की हिंसा का या मरण का हो? शान्तिधारा करनेवाले और करानेवाले लोग ही इसकी वास्तविकता बता सकते हैं।
और यह कार्य तो आजकल अपने को ‘अहिंसा-महाव्रत’ के धनी माननेवाले महानुभाव तक करा रहे हैं? क्या किसी को भी समय तक नहीं मिला कि इसकी वास्तविकता समझें और उसके बाद इसे कराने के विषय में विवेकपूर्वक-निर्णय करते!
यदि कोई यहाँ प्रश्न करे कि शब्दों को क्यों पकड़ते हो? शब्दों में तो ‘कर्मरूपी शत्रुओं का हनन करने के कारण’ ‘अरि हननात् अरिहन्तः’ - ऐसी व्याख्या दी गयी है। तो क्या अरिहंत भगवान् का नाम लेना भी हिंसा हो गया?’
इस कुतर्क पर मुझे हँसी आती है; क्योंकि कर्मरूपी शत्रु कोई जीवित-प्राणी नहीं हैं, जो कोई उनके हनन के लिये तीर-तलवार उठा लेगा। कर्म तो जड़/अचेतन हैं, अतः उनके लिये ऐसा प्रयोग स्वीकार है; उसमें हिंसा का भाव नहीं आता है। किन्तु सर्प आदि पशु-पक्षियों एवं शाकिनी-डाकिनी आदि निम्नवर्ग के देवों को अचेतन नहीं कही सकते हैं। अरे! जिस जैनशासन में मिट्टी या आटे के मुर्गे तक की बलि के आदेश को स्पष्ट-शब्दों में ‘हिंसा’ माना गया और उसका फल नरक-गति के दारुण-दुःख बताये गये हैं, उसमें किसी भी प्राणधारी को ‘छेदो-भेदो’ जैसे हिंसक-शब्दों का प्रयोग करके शान्तिधारा कैसे की जा सकती है? मुझे आश्चर्य है कि अपने कुत्सित-अभिप्राय को बचाने के लिये इन लोगों ने अरिहंत-भगवान् तक को विवाद में घसीट लिया !!! शायद इसीलिये इसे ‘दुष्काल’ या ‘पंचमकाल’ कहा गया है।
अपरिग्रह की दृष्टि से शान्तिधारा की समीक्षा - इस दृष्टि से भी शान्तिधारा किये जाने के पीछे पूरा षड्यंत्र ही परिग्रह के संचय का ज्ञात होता है। इस कथन का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि किसी भी आगमग्रंथ या प्रतिष्ठाशास्त्र में कहीं भी शान्तिधारा नामक कर्मकांड का कोई उल्लेख तक नहीं मिलता है। इसीप्रकार देववंदना एवं पूजाविधियों में भी कहीं शान्तिधारा किये जाने का निर्देश होना तो दूर रहो, इसकी नामोल्लेख एवं विधि तक का उल्लेख नहीं है तथा आज से कुछ दशक पहले तक मात्र दक्षिणभारत के मूलसंघ-बहिष्कृत-लोगों (रात्रिपूजन, स्त्री-द्वारा जिनाभिषेक, पंचामृत-अभिषेक आदि को माननेवाले ‘प्रच्छन्न-श्वेताम्बर’ कहे गये यापनीयसंघी लोगों, जिन्हें आज ‘बीसपंथी’ के नाम से जाना जाता है) के यहाँ यह विपरीत-मान्यता प्रचलित थी, जो कि स्पष्टरूप से गृहीत-मिथ्यात्व की ही पोषक है।
आजकल ‘अपरिग्रही-आचरणवाले’ कहे जाने वाले मुनिपद-धारकों के द्वारा ‘अपरिग्रह-महाव्रत’ की मर्यादाओं का पूर्णतः अतिक्रमण करते हुये मात्र परिग्रह के संचय का एकमात्र लक्ष्य लेकर शुद्धाम्नाय के जिनमंदिरों में मूलसंघ की आम्नाय के पूर्णतः विरुद्ध कार्य ‘शान्तिधारा’ का अनुष्ठान किये जाने का अलिखित-फरमान जारी किया गया है।
इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि “वे अपने लिये तो तिनका तक नहीं जोड़ रहे हैं। हमारे जिनमंदिरों की देखभाल और जीर्णोद्धार के लिये ही समाज की मददरूप में यह विधि करायी जा रही है। इससे सुबह मंदिर जी में प्रक्षाल-पूजन करनेवालों की संख्या भी बढ़ रही है और उनमें दान की भावना जागृत करने के लिये बोलियाँ लगाकर शान्तिधारा किये जाने का प्रवर्तन समाजहित में ही तो किया गया है। कोई महाराजजी तो वह पैसा लेते नहीं हैं।”
तो भाई! जिनाम्नाय में मुनिधर्म के स्वरूप में तो ऐसा कहीं कोई उल्लेख तक नहीं मिलता है कि निर्ग्रन्थ-दिगम्बर-जैन-मुनिराज को अपने लिये तो परिग्रह जोड़ने का निषेध है, किन्तु समाज के लिये परिग्रह जोड़ने की छूट है? मैंने तो मुनिधर्म पर व्यापक अध्ययन करके लगभग साढ़े पाँच सौ पृष्ठों की पुस्तक लिखी है। मुझे तो सारे जिनागम में कहीं भी ऐसा झूठ-मूठ तक का उल्लेख नहीं मिला है कि मुनिपद-धारण करके किसी भी निमित्त से परिग्रह जोड़ने का उपदेश भी दिया जा सकता हो। इसीलिये पूरा दृढ़ता से मैं यह बात कह रहा हूँ कि ‘मुनिपद-धारण करके अपने लिये या समाज/मंदिर/मठ/जीर्णोद्धार आदि किसी भी कार्य के लिये परिग्रह का संचय कराना, उसका उपदेश देना आदि किसी भी कार्य का प्रावधान कहीं भी नहीं मिलता है। यह अपरिग्रह-महाव्रत के संकल्प का ही उल्लंघन है।’
इसके विपरीत ‘परिग्रह की चिंता करना’ (क्योंकि परिग्रह का चिंतन तो संभव ही नहीं है, तत्त्व का चिंतन होता है, पाप का नहीं। परिग्रह तो सभी के लिये चिंता का ही विषय है) और जब तक परिग्रह न जुड़े, तब तक खेदजन्य होने से ‘आर्त्तध्यानरूप’ होता है। और परिग्रह जोड़ने के लक्ष्य में सफलता मिलते ही वह ‘परिग्रहानन्दी-रौद्रध्यान’ में बदल जाता है। जिनवाणी प्रमाण है कि ‘आर्त्तध्यानरूप-परिणाम तिर्यंचगति के कारण होते हैं और रौद्रध्यानरूप-परिणाम नरकगति के कारण होते हैं।’
अब यह आप यह स्वयं ही निर्णय कर लीजिये कि वीतरागी-जैनधर्म के नाम पर किये जाने वाले परिणाम और कार्य क्या तिर्यंचगति या नरकगति के कारण हो सकते हैं? यदि ऐसी दुर्गतियाँ इष्ट नहीं हैं, तो धर्म के नाम पर परिग्रह जोड़ने के अभियान भी जिनाम्नाय के विरुद्ध और जिनधर्म-विरोधी कार्य हैं। शान्तिधारा जैसे कार्यों से जिनधर्म की विराधना ही हो रही है, प्रभावना नहीं।
मैं तो दोटूक-शब्दों में कह देना चाहता हूँ कि शान्तिधारा तो क्या, किसी भी जैनविधि-विधान के पवित्र-दायित्वों के लिये योग्य-पात्रों का चयन नीलामी की तरह बोलियाँ लगाकर कदापि नहीं होना चाहिये। बल्कि जैसा श्रेष्ठ-पद है, वैसे ही श्रेष्ठ-आचरण वाले श्रावक को सादर उस पद के लिये चुना जाना चाहिये। धन के संग्रह की अपेक्षा ही इसमें नहीं रखनी चाहिये। जो स्वेच्छा से दानस्वरूप लोग सहर्ष दें, उसी में संतुष्ट रहकर तदनुरूप कार्य करना चाहिये। अनावश्यक तड़क-भड़क दिखाना तो जैनधर्म के अपरिग्रह-सिद्धान्त की मर्यादाओं के बाहर की बात है। ‘आचार और विचार की पवित्रता ही जैनधर्म के विधि-विधानों की गरिमा है, धन पर आधारित दिखावा नहीं।’
पर मेरे इस कथन का यह आशय कदापि नहीं है कि यदि किसी में भरपूर सामर्थ्य है, तो भी वह संसार के कार्य तो पूरी शान-ओ-शौकत से करे; और धर्मप्रभावना के कार्यों को कंजूसी और उपेक्षाबुद्धि से करे। किन्तु उसके लिये स्वयं सहर्ष दान देना चाहिये, न कि माँगने पर या बोलियों के द्वारा मान-कषाय की पूर्ति करके दिया जाये। बोलियों द्वारा नीलामी में ‘मान’ के बदले चुकायी गयी राशि को जिनाम्नाय में कहीं भी ‘दान’ नहीं कहा गया है।
और माँगकर या तिकड़म लड़ाकर संचय किया गया अथवा भौतिक-संसाधनों की सुविधा की भावना से एकत्रित किया गया ‘दान’ का धन भी एकमात्र ‘परिग्रह’ के अन्तर्गत ही आता है।
तथा जिन्होंने ‘परिग्रह’ का त्याग महाव्रत के रूप में किया हो, उन्हें तो मंदिर या धार्मिक-आयोजन के लिये धन को दिलवाने या ‘दान’ के रूप में उसकी प्रेरणा देने के कार्य तो ‘अपरिग्रह-महाव्रत’ के दोष ही हैं। अपरिग्रह-महाव्रतियों के लिये तो धन एवं संसाधन का उपदेश या प्रेरणा देना उसीतरह निषिद्ध है, जैसे कि शादी-विवाह आदि के लिये लड़का या लड़की बताना, रिश्ता कराना ‘ब्रह्मचर्य-महाव्रती’ मुनिराज के लिये पूर्णतः निषिद्ध है।
मुझे आज के मुनिराजों की दुहाई मत देना कि ‘‘आजकल तो हर मुनिराज ऐसा कर रहे हैं’’; क्योंकि जो भी मुनिपद पर होकर ऐसा कर रहे हैं, वे जिनवाणी की आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हैं। अतः ईमानदारी से कहा जाये तो वे मुनिराज हैं ही नहीं। वे ऐसा करके मुनिधर्म को कलंकित कर रहे हैं।
अस्तु, मेरा विवेच्य-विषय यहाँ मुनिधर्म नहीं है, बल्कि ‘शान्तिधारा के नाम पर बोलियाँ लगाकर इस कर्मकांड को महिमामंडित करना व धनसंचय का साधन’ बनाना पूर्णतः जिनाम्नाय का उल्लंघन है - यह बताना है। ‘परिग्रह’ जिनाम्नाय में धर्म नहीं, महापाप कहा गया है। और पहले तो तथाकथित शान्तिधारा ही जिनाम्नाय-सम्मत नहीं है। ऊपर से ‘कोढ़ में खाज’ की तरह उसे ‘परिग्रह के संचय का साधन’ बनाना तो अक्षम्य-अपराध ही है। चाहे यह कार्य मुनिपद-धारक अपनी क्षमता दिखाने अथवा तिकड़मबाजी से करें या गृहस्थ अपनी नादानी से करें।
जैनधर्म में ‘परिग्रह’ महापाप था, है और रहेगा; क्योंकि जैनधर्म कोई मौसमी-प्रभाव नहीं है कि जो मौसम बदलते ही बदल जायेगा। यह तो वस्तु के स्वरूप पर आधारित धर्म ( धम्मो वत्थुसहावो ) है, जो कि त्रिकाल-अबाधित है। किसी भी काल या मौसम के कारण उसका स्वरूप या उसकी व्याख्या बदली नहीं जा सकती है।
पहले ही सामान्य जिनेन्द्र-पूजनविधि की तुलना में शान्तिधारा के कर्मकांड में आरम्भ-परिग्रह की बहुलता है और जिनाम्नाय-विरुद्ध होने से यह कर्मकांड कदापि स्वीकार्य नहीं है। ऊपर से ‘परिग्रह’ रूपी महापाप के संचय का निमित्त इसे बनाया जाना इसे नितान्त-धर्मविरुद्ध-कार्य की श्रेणी में स्थापित करता है।
इतना ही नहीं, इस शान्तिधारा के नाम पर जो कर्मकांड किया/कराया जाता है, वह ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’ - इन दोनों धर्ममूलों के विरुद्ध ‘हिंसा’ और ‘परिग्रह’ - इन महापापों का अनुष्ठान इसे बना रहा है और मूल-शुद्ध-जिनाम्नाय के पूजाद्रव्यों की अनिवार्य-प्रासुकता के विपरीत सचित्त-पदार्थों के प्रयोग की घुसपैठ करानेवाला षड्यंत्रकारी-प्रयास है।
क्योंकि इस तथाकथित शान्तिधारा में बहुत सारा जल ढोला जाता है, जो कि प्रायः प्रासुकता की मर्यादा से बाहर होता है।
साथ ही इसमें शान्तिधारा के लोटे के ऊपर जलभरा सचित्त-नारियल जटा-जूट-सहित लगाने का निर्देश इसके समर्थक दे रहे हैं। तो पहले तो वह नारियल भीतर में जलयुक्त होने से सचित्त है, अतः जिनपूजा-सामग्री के योग्य नहीं है। ऊपर से जटा-जूट-सहित है, तो उसके जटा-जूट में स्पष्टरूप से त्रसजीवों का वास होता ही है और उस जटा-जूट का हिस्सा शान्तिधारा के लोटे में स्थित जल में डूबा रहता है, इसकारण वे जीव उस शान्तिधारा के लोटे के जल में आ जाते हैं और टोंटी के माध्यम से जिनबिम्ब या यंत्र पर आ जाते हैं, जो अत्यन्त-निंदनीय कार्य है। अतः उन त्रसजीवों की हिंसा का दोष भी इस ‘शान्तिधारा’ नामक कर्मकांड में लगना अनिवार्य ही है।
मुझे समझ नहीं आता कि अपने को ‘अहिंसा-महाव्रती’ कहने और माननेवाले व्यक्ति इस स्पष्टरूप से हिंसाप्रधान-कर्मकांड का उपदेश या प्रेरणा कैसे दे सकते हैं? उन्हें क्या इस ‘हिंसोपदेश’ नामक कुकर्म का तनिक भी भय नहीं है? जबकि सामान्य गृहस्थ-श्रावक को हिंसा के उपकरण देने या उनका प्रयोग बताने का जिनवाणी में स्पष्टरूप से निषेध किया गया है। पर इन्हें यदि जिनवाणी की आज्ञा के उल्लंघन का तनिक भी भय होता, तो उसे किसी भी हाल में शान्तिधारा जैसे कर्मकांड को करने की प्रेरणा नहीं देते।
इसीलिये मैं कहता हूँ कि शान्तिधारा नामक कर्मकांड करने की प्रेरणा देनेवाले मुनिपद-धारक एवं इसे कराकर जिनागम की मर्यादा को लजानेवाले तथाकथित पंडितगण - सभी जिनाम्नाय के उल्लंघन के दोषी हैं, प्रायश्चित्त के योग्य हैं। और जो गृहस्थ-श्रावक भय से, लोभ से या दबाव से यह कार्य करते हैं, वे भले ही मुनिपद-धारकों या पंडितों के कहने से यह कर्मकांड कर रहे हों; परन्तु यह कहकर वे अपने पाप को क्षम्य नहीं बना सकते हैं; क्योंकि जिनवाणी में स्पष्ट-आज्ञा है कि ‘‘कोई तुम्हें कुछ भी कह दे, परन्तु करनेवाले को अपने विवेक का प्रयोग करके ही जो विवेक की कसौटी पर खरी हो, वही बात माननी चाहिये, अन्यथा नहीं।’’
इस विवेचन के आलोक में यह स्पष्टरूप से प्रमाणित हो रहा है कि ‘शान्तिधारा नामक कर्मकांड जिनाम्नाय के विरुद्ध होने से जिनवाणी की आज्ञा का स्पष्ट उल्लंघन है। इसे करना व कराना धर्म तो है ही नहीं; उल्टे पापबंध का कारण है।’
शान्तिधारा की इस लेखन-शृंखला में आगे शान्तिधारा के पाठ से जुड़ी कई बातों पर विचार करने के साथ-साथ इस प्रश्न का भी समाधान किया जायेगा कि पूजनविधि में बोले जानेवाले ‘शान्तिपाठ’ में कुछ बातें शान्तिधारा के समान ही हैं, तो वह ‘शान्तिपाठ’ भी क्या आपके अनुसार त्याज्य है? यदि वह पूजनविधि का अंग हो सकता है, तो शान्तिधारा क्यों नहीं? आज कहें, तो हम कुछ आपके लिये आपत्तिजनक बातों को हटा देते हैं। पर आप पूरी शान्तिधारा की विधि का ही निषेध क्यों कर रहे हैं?
इनका क्रमशः विवेचन यहाँ प्रस्तुत है:
- शान्तिधारा के पाठ में आपत्तिजनक प्रयोग, शान्तिधारा के वर्तमान में प्रचलित-पाठ में ‘छिंदि-भिंदि’ के अलावा अन्य भी कई ऐसे प्रयोग हैं, जिनके बारे में प्रतिदिन शान्तिधारा करनेवालों को भी कुछ पता नहीं है कि यह है क्या? क्यों है? और इसका अर्थ क्या होता है? इनका क्रमशः विवेचन कर रहा हूँ, आप सब गम्भीरतापूर्वक चिंतन करें कि मेरी आपत्तियाँ उचित हैं या नहीं?
‘‘सुदर्शन-महाराज-चक्र-विक्रम’’: यह पढ़ते तो सभी हैं। किन्तु किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि ये ‘सुदर्शन-महाराज’ हैं कौन? और इनके ‘चक्र-विक्रम’ से यहाँ क्या तात्पर्य है? कोई इसे सुदर्शन-चक्र बतलाता है, तो किसी राजा या सम्राट का नाम बतलाता है।
परन्तु क्या किसी ने सोचा है कि यदि इसका अर्थ ‘सुदर्शन-चक्र’ लिया जाये, तो यह तो चक्रवर्ती का चक्ररत्न है। यह मात्र युद्ध के समय हिंसक-उपकरण के रूप में प्रयुक्त होता है। तो क्या युद्ध या हिंसा के उपकरण की हितकामना के लिये आप लोग शान्तिधारा कर रहे हैं? अर्थात् हिंसोपकरण की वृद्धि की कामना के साथ आप परम-अहिंसक वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में करना चाहते हैं? क्या वीतरागी जैनधर्म में किसी भी हिंसक-उपकरण की श्रीवृद्धि की मंगलकामना से कोई धार्मिक-अनुष्ठान किये जाने का कहीं विधान संभव है?
मुझे पूर्ण-विश्वास है कि आप लोग आज के कितने ही बड़े नामवाले महापुरुष के आदेश को मानकर यह शान्तिधारा नामक कर्मकांड कर रहे हों; किन्तु आप सब अहिंसक-जैन सज्जन-व्यक्ति हैं। अतः आज के किसी व्यक्ति-विशेष के प्रति कितनी ही आस्था रखते हों, फिर भी हिंसा का समर्थन करते हुये किसी भी हिंसक-उपकरण की श्रीवृद्धि की मंगलकामना नहीं कर सकते हैं। आज यह जानने के बाद आपकी जिह्वा इस पाठ का उच्चारण करने में साथ नहीं देगी।
और यदि इसे किसी राजा या सम्राट का नाम माना जाये, तो पहली-आपत्ति तो यही है कि किसी भी रागी-द्वेषी विषय-भोगी व्यक्ति-विशेष के लिये वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में मंगलकामना नहीं की जा सकती है।
राजा या सम्राट लोग रागी-द्वेषी, विषय-भोगी अनिवार्यतः होते हैं। यदि ये विकार उनके नहीं रहें, तो वे संसार छोड़कर मुनिदीक्षा लिये बिना नहीं रह सकते हैं। इसलिये यदि यह नाम किसी राजा या सम्राट का है, तो उसकी मंगलकामना वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में कदापि नहीं की जा सकती है।
और फिर जैन-इतिहास में कोई ‘सुदर्शन-महाराज’ नामक चरित्र (करेक्टर) का उल्लेख मुझे कहीं नहीं मिलता है, जिसकी मंगलकामना के लिये वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में मंगलकामना की जाये? सेठ सुदर्शन का उल्लेख है, किन्तु वे महाराज नहीं हैं और उनके लिए शान्तिधारा क्यों की जायेगी ?
अब बात आती है कि इस ‘सुदर्शन-महाराज’ के ‘चक्र-विक्रम’ की श्रीवृद्धि की मंगलकामना क्यों की जाये? पहले यह जान लें कि ‘चक्र’ शब्द के समूह, आयुध, गोलाकार, सेना, राजनीति आदि कई अर्थ कोश-ग्रंथों में प्रचलित हैं।
और ‘विक्रम’ शब्द तो शारीरिक-पराक्रम का वाचक है। इसलिये यह युद्ध के प्रसंग में तो समीचीन प्रतीत होता है, किन्तु वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में इसका प्रयोग किसी भी दृष्टि से संगत प्रतीत नहीं होता है।
अब शान्तिधारा करनेवाले सज्जन यह बतायें कि इनमें से आपको कौन-सा अर्थ यहाँ समीचीन प्रतीत होता है? क्योंकि इनमें से कोई भी अर्थ ऐसा नहीं है, जिसके वाच्य के लिये वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में मंगलकामना की जा सके।
उक्त-विवेचन से यह बात भलीभाँति स्पष्ट है कि शान्तिधारा में पढ़े जाने वाले ‘सुदर्शन-महाराज-चक्र-विक्रम’ पद वीतरागी जैनधर्म की आम्नाय के विरुद्ध हैं और इन जैसे पदों के प्रयोग वाली शान्तिधारा को इस कर्मकांड को करनेवाले पूरी तरह अज्ञानतापूर्वक दूसरों के दबाव में ही कर रहे हैं। उन्हें यदि इसकी वास्तविकता का सही ढंग से अवबोध करा दिया जाये, तो संभवतः कोई भी विवेकी-व्यक्ति इस कर्मकांड को आगे करेगा ही नहीं।
शान्तिधारा के प्रचलित-पाठ में और भी बहुत से ऐसे पद हैं, जिनकी वास्तविकता का यदि पता चल जाये, तो सभी विवेकी-व्यक्ति इस शान्तिधारा नामक सुनियोजित-षड्यंत्र से चलाये गये कर्मकांड से अपने को तत्काल अलग कर लेंगे।
स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 38-65
खोज: शान्तिधारा: भक्ति या रूढियों का मकडजाल, शान्तिधारा: भक्ति या रूढ़ियों का मकड़जाल, Shantidhara Bhakti Ya Rudhiyon Ka Makadjal, Shantidara Bhakti Ya Rudiyon Ka Makadjal