शान्तिधारा: भक्ति या रूढ़ियों का मकड़जाल | Shantidhara Bhakti Ya Rudhiyon Ka Makadjaal

लेखक: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

आज शांति की ‘भावना’ वाले जैनधर्म को शांति की ‘कामना’ वाला धर्म बनाने का सुनियोजित-षड्यंत्र चल रहा है और बड़े से बड़े विचारक, तपस्वी (?) एवं विद्वान् (?) भी इसकी चपेट में आ चुके हैं। ये सब मिलकर वीतरागी-जैनधर्म और इसके आदर्श वीतरागी-देव के स्वरूप को विकृत करने के लिये कृतसंकल्प दिखायी दे रहे हैं। अतः मुझे यह अत्यन्त प्रासंगिक ही नहीं, बल्कि अनिवार्य-आवश्यकता के रूप में प्रतीत हुआ कि ‘शान्तिधारा’ के इस वीतरागी-जैनधर्म-विरोधी एवं अकर्तावाद के विध्वंसक कर्मकांड की वास्तविकता से परदा उठाया जाये।

वीतरागी-जैनधर्म के अहिंसा, अपरिग्रह एवं अकर्तावाद के मूलभूत-सिद्धांतों को तिरोहित करनेवाले इस षड्यंत्रपूर्ण-कर्मकांड (शान्तिधारा) के पोषक वे लोग तो हैं ही, जो मूलतः वीतरागी-जैनधर्म के विरोधी हैं तथा जिनका उद्देश्य ही वीतरागी-जैनधर्म में वीतरागता के सिद्धान्तों एवं आचरण-पद्धतियों का विरोध करके ईश्वर-कर्तावाद, हिंसक-विचारधारा एवं वैदिक-धर्म की तरह कर्मकांडों की घुसपैठ कराना है। किन्तु आज बहुत से ऐसे लोग भी इस कार्य को वास्तविकता जाने-समझे बिना ही अन्धश्रद्धावश लोगों की देखादेखी करने लगे हैं। जिनकी मानसिकता ही हिंसा, परिग्रह और कर्तावाद की है, उन्हें तो समझाने की कोशिश करना ही लगभग व्यर्थ है; क्योंकि सोते हुये व्यक्ति को जगाना आसान है, किन्तु जो सोने का अभिनय कर रहा हो, उसे कौन जगाये? जो जागते हुये भी जागना नहीं चाहता हो; उसे जगाने का प्रयास लगभग अशक्य-अनुष्ठान जैसा ही है।

अतः मैं यहाँ उन सुषुप्त-चेतनावाले एवं शान्तिधारा नामक कर्मकांड की वास्तविकता से अनभिज्ञ लोगों के लिये उनके ज्ञानचक्षु उन्मीलित करने के लिये लिख रहा हूँ; जो मात्र वास्तविकता से अनभिज्ञ होने के कारण इस वीतरागी-जैनधर्म के विपरीत कर्मकांड को अज्ञानतावश अनुष्ठित कर रहे हैं। उनकी विचारधारा ऐसे हिंसा-समर्थक, परिग्रहबहुल एवं कर्तावादी-अनुष्ठान के समर्थन की कदापि नहीं है। पर वे तो इसे अज्ञानतावश जिनेन्द्र-भक्ति के रूप में शान्तिधारा जैसे जिनाम्नाय के पूर्णतः विरुद्ध कार्य रहे हैं।

शान्तिधारा पर कुछ भी कहने से पहले मैं वीतरागी-जैनधर्म के कुछ मूलभूत-सिद्धांतों का उल्लेख करते हुये उनकी परिचय देना चाहूँगा कि वे जैनधर्म के मूलभूत-सिद्धांत क्यों बने? और यदि उन्हें तिलांजलि दे दी जाये, तो क्या जैनधर्म की मूलभूत-पहिचान बच सकेगी?

जैनत्व की मूल-पहिचान ‘अकर्तावाद’ - यह जैनधर्म की मूलभूत-पहिचान है। सभी धर्म सत्य-अहिंसा आदि की बात करते हैं। 'यदि कोई विभाजक-रेखा जैनधर्म व अन्य धर्मों में कोई है, तो वह है ‘अकर्तावाद’ है अर्थात् न तो ईश्वर इस जगत् का कर्ता है और न ही अन्य कोई किसी दूसरे व्यक्ति का भला या बुरा कर सकता है।

इसीलिये जहाँ अन्य धर्मों के ईश्वर, अल्लाह, खुदा, यीशू, ब्रह्म-विष्णु-महेश आदि यह कहते हैं कि ‘‘तुम मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सुखी कर दूँगा;’’ तो वहीं जैनधर्म के जिनेन्द्र-परमात्मा किसी को अपनी शरण में नहीं बुलाते। वे कहते हैं कि ‘‘सुख तो आत्मा का स्वभाव है। वह बाहर किसी भी पदार्थ से मिलने वाला ही नहीं है। सुखी होना है, तो अपने स्वरूप की शरण में आओ। संसार में अन्य कोई तुम्हें सुखी नहीं बना सकता है।’’

अणु-अणु का परिपूर्णता एवं स्वतंत्रता का यही घोष जैनधर्म की मूलभूत-पहिचान है। जीव अपने स्वरूप को भूलकर ही दुःखी है और अपने स्वभाव का आश्रय ले कर ही वह सुखी हो सकता है - यह जैनधर्म का मूल-मंत्र है।

यदि कोई कहे कि ‘मैं तुम्हें सुखी बना सकता हूँ’, तो समझ लेना चाहिये कि वह कोई भी हो सकता है; पर ‘जिन’ या ‘जैन’ कदापि नहीं हो सकता है।

जब सुख अपने में ही है, परपदार्थों और परभावों में सुखी या दुःखी करने की सामर्थ्य ही नहीं है; तो भला फिर अपने सुख-साता के लिये अन्य किसी की शरण ली ही क्यों जाये ? और क्यों ऐसा उपदेश दिया जाये कि ‘अमुक की शरण में जाकर तुम सुखी हो सकते हो।’ ऐसा कथन जैनशासन की मर्यादा का पूर्णतः उल्लंघन है।

जब हमारे आगम-ग्रंथ स्पष्ट-शब्दों में यह कहते हैं कि ‘‘जिस द्रव्य का, जिस क्षेत्र में, जिस काल में, जिस भावरूप परिणमन जिस निमित्त से होना केवली के ज्ञान में आया है, वह वैसा ही होगा; उसे इन्द्र या जिनेन्द्र-- कोई भी बदलने में समर्थ नहीं है। क्योंकि ऐसा ही स्वाधीन वस्तुस्वरूप है।’’

  • (द्रष्टव्य - स्वामी कार्तिकेय, कार्तिकेयानुप्रेक्षा; एवं आचार्य सिद्धसेन, सन्मतितर्क)

तब क्या शान्तिधारा हमारे भाग्य को बदल सकती है? कौन बदलेगा हमारा भाग्य? वीतरागी जिनेन्द्र परमात्मा तो बदलेंगे नहीं, क्योंकि वे तो वीतरागी हैं।

उन्हें हमसे या अन्य किसी से राग-द्वेष है ही नहीं, इसलिए वे तो बदलेंगे क्यों? और जैनधर्म तो किसी भी व्यक्ति को ऐसा करने की छूट ही नहीं देता है; क्योंकि वस्तु के स्वरूप में ही ऐसी कोई गुंजाइश ही नहीं है। प्रकृति के न्यायालय में घूसखोरी नहीं चलती है कि वीतरागी जिनेन्द्र परमात्मा अपने भक्तों का तो भला कर दें और बाकी जीवों का भाग्यविधाता उनका कर्म बना रहे।

यह सत्य है कि जिनेन्द्र परमात्मा अनन्तबल के धनी होते हैं। तब भी वे किसी को तनिक भी सुखी-दुःखी नहीं कर सकते हैं। यदि कर सकते होते, तो आदि-तीर्थंकर ऋषभदेव के पौत्र मारीच को करोड़ों वर्षों तक संसार के दुःख नहीं भोगना पड़ते। वे तभी उसे अगला-तीर्थंकर बनाकर अनंत-सुखी कर देते। उसे उनसे बाईस तीर्थंकरों के बाद चौबीसवाँ तीर्थंकर बनने के लिये पूरा पुरुषार्थ क्यों करना पड़ता?

और जब अपने सगे पौत्र का जो अनन्तबल के धनी जिनेन्द्र परमात्मा भला नहीं कर सकते हैं, तो फिर हम जैसों का भला करने वे क्यों आयेंगे? - यह विचारें। और यदि वे किसी का भला या बुरा नहीं करते हैं, तो उन पर शान्तिधारा करके हम क्या पाना चाहते हैं? विचार करें।

जिनबिम्ब पर या यंत्र आदि पर शान्तिधारा करने के पीछे भक्तों के ही अपने स्वार्थ हैं; जिनेन्द्र परमात्मा के बिम्ब या यंत्र आदि को तो शान्तिधारा की कोई अपेक्षा है नहीं।

शान्तिधारा की अपेक्षा किसे? :-

तब शान्तिधारा की अपेक्षा है किसे? कौन चाहता है कि शान्तिधारा की जाये? मात्र इस छल के धनी छलिये मायावी-लोग, जो वीतरागी-जैनधर्म के मूलभूत-सिद्धांतों को भुलाकर भोले-भाले लोगों को गृहीत-मिथ्यात्व में फँसाना चाहते हैं। कर्मकांडों के मायाजाल में उलझाकर अपनी पंडिताई चमकाना चाहते हैं।

बिडम्बना तो यहाँ तक बढ़ गयी है कि गृहीत-मिथ्यात्व के समर्थकों की तो बात दूर रहने दीजिये, अपने आप को शुद्धाम्नाय के कट्टर-समर्थक कहलानेवाले आज के दिगम्बराचार्य भी खुद अपने मुँह से शान्तिधारा के जिनाम्नाय-विपरीत पाठों का उच्चारण करके गृहस्थों से शान्तिधारा कराकर उनका पौरोहित्य करते दिखाई दे रहे हैं।

मुझे समझ नहीं आ रहा कि सारे संसार की मोह-माया त्यागने का दम भरनेवाले इन आज के दिगम्बराचार्यों को क्या किसी का भय सता रहा है? जो शान्तिधारा के माध्यम से उसका शमन करना चाहते हैं? अथवा वीतरागी जिनेन्द्र परमात्मा की वीतरागता से इनका विश्वास उठ गया है, जो उनके बिम्ब पर या यंत्र पर जल की धारा करके से शांति की अपेक्षा कर रहे हैं? या सम्यग्दर्शन से रहित अपने को घोषित ये कर देना चाहते हैं? क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव के सप्तभय नहीं होते हैं और ये शान्तिधारा में ‘‘शाकिनी-डाकिनी-भयानि छिंदि छिंदि, भिंदि भिंदि’’ कहकर भगवान् से इनका तुच्छ-व्यंतरों का भय दूर करने की कामना कर रहे हैं? यह पढ़कर तो ये गारंटी से अपने आपको व्यंतरों से डरनेवाला अर्थात् सप्तभय से सहित मिथ्यादृष्टि सिद्ध कर रहे हैं।

शान्तिधारा और मिथ्यात्व आदि शल्यत्रय :-

साथ ही लौकिक-आकांक्षायें व्यक्त करके ये अपने को आकांक्षा-सहित मिथ्यादृष्टि बता रहे हैं; क्योंकि सम्यग्दृष्टि जीव तो ‘निःकांक्षित-अंग’ का धनी होता है। यदि ये आकांक्षा-रहित होते, तो ‘विषभयानि छिंदि छिंदि भिंदि भिंदि’ कहकर ‘जीवित-मरणाशंसा’ की अभिव्यक्ति नहीं करते। ये ‘मारण-उच्चाटन-विद्वेषण-मोहन-वशीकरण’ आदि को नष्ट करने की मिथ्यात्ववर्द्धक-अपेक्षा वीतरागी जिनेन्द्र परमात्मा से कैसे कर सकते हैं? जबकि शान्तिधारा में ये सब कहा ही जाता है - यह सर्वविदित है।

इस विवरण से शान्तिधारा में ‘मिथ्यात्व’ का पोषण तो स्पष्ट है ही, यह जैनधर्म के मूलभूत-सिद्धांतों के विरुद्ध होकर भी जिनेन्द्र-भक्ति के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं, अतः छलरूप होने से ‘माया’ रूप भी है। तथा लौकिक-आकांक्षायें इस शान्तिधारा में स्पष्टरूप से निहित हैं, अतः ‘निदान’ रूप भी है। - इसप्रकार ‘मिथ्यात्व’, ‘माया’ और ‘निदान’ - इन तीनों शल्यों की केन्द्र होने से शान्तिधारा कभी भी जिनाम्नाय के अनुरूप नहीं कही जा सकती है।

जैनत्व का प्राण ‘अकर्तावाद’ :-

इसमें कर्तावाद के रूप में जिनमत से ठीक विपरीत-मान्यता का पोषण है। जिस कर्तावाद से बचाने के लिये आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने ‘समयसार’ ग्रंथराज में पहले ‘कर्ता-कर्म-अधिकार’ लिखकर कर्तावाद का पुरजोर खंडन किया। और फिर तब भी उन्हें तृप्ति नहीं हुई; क्योंकि उन्हें लगा कि जीव की कर्तावादी-दृष्टि उसे सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं करने देगी, तो पुनः इसी कर्तावाद का प्रकारान्तर से निवारण करने के लिये ‘सर्व-विशुद्ध-ज्ञानाधिकार’ लिखा। ज्ञातव्य है कि ये दोनों अधिकार ‘समयसार’ ग्रंथराज की मूल-वर्ण्य-विषय-वस्तु नहीं हैं; क्योंकि ‘समयसार’ ग्रंथराज की रचना उन्होंने भूतार्थ-दृष्टि से नवतत्त्वों को जानकर निजात्मा की अनुभूति के निमित्त की थी। परन्तु जब उन्हें लगा कि इस जीव को अनादिकाल से परपदार्थों और परभावों के कर्तापने का तीव्र-भाव विद्यमान है, जिसके रहते हुये यह न तो नवतत्त्वों का समीचीन-निर्णय कर सकता है और न ही आत्मानुभूति जैसी अनन्त-स्वाधीनता की क्रिया इसके द्वारा संभव है। इसीलिये उन्होंने दो अतिरिक्त-अधिकार ‘समयसार’ ग्रंथराज में लिखे, ताकि जीव की कर्तावादी-दृष्टि टूट सके।

किन्तु शान्तिधारा में तो इसी कर्तावाद की दृष्टि का ही पोषण हो रहा है। कभी जिनेन्द्र परमात्मा को कर्ता मानकर बात कही जा रही है, तो कभी भूत-प्रेत आदि को हमें दुःखदायी मानकर उनके उपद्रव दूर करने की कामना की गयी है। - यह सब जिनाम्नाय के पूर्णतः विरुद्ध है और ‘मिथ्यात्व’ ‘माया’ और ‘निदान’ - इन तीनों शल्यों का पोषक होने से जिनशासन का घातक-कार्य है।

सम्यग्दृष्टि जीव नियम से उक्त तीनों शल्यों का त्यागी होता ही है। अतः जब कोई अविरति-सम्यग्दृष्टि गृहस्थ जीव भी इस शान्तिधारा का समर्थन नहीं कर सकता है, तो मुनिपद-धारी कैसे कर सकते हैं? यह बिडम्बना ही है, जो वीतरागी-जैनधर्म के आम्नाय में इसके उच्चपद-धारकों द्वारा शान्तिधारा जैसे जिनाम्नाय के पूर्णतः विरुद्ध कार्य का अनुष्ठान देखा जा रहा है और उनकी देखादेखी भोली समाज के लोग हर मंदिर में यह कार्य करके ‘बड़ा धर्मानुष्ठान’ किया - ऐसा मानकर रहे हैं। जबकि यह कार्य जिनाम्नाय के पूरी तरह से विपरीत कार्य है।

अहिंसक-जैनधर्म और शान्तिधारा - जैनधर्म की अहिंसक-भित्ति अन्य सभी धर्मों एवं विचारधाराओं से बहुत उत्कृष्ट और सूक्ष्मतम है। हो भी क्यों न? यह धर्म केवली-प्रज्ञप्त जो है। जहाँ वैदेशिक-धर्म मात्र मनुष्यों तक अहिंसा को सीमित रखते हैं; किन्तु पशु-पक्षियों व कीड़े-मकोड़ों की हिंसा की परवाह तक नहीं करते हैं, वहीं जैनेतर भारतीय दर्शन अहिंसा को भले ही कहने को प्राणीमात्र तक व्यापक कहते हों; परन्तु वास्तविकता तो यह है कि जो चर्म-चक्षुओं से दिख जाये, उसी जीव की रक्षा को वे अहिंसा कहते हैं। जबकि जैनधर्म सूक्ष्मतम-जीवों के प्रति यत्नाचार-पूर्वक अहिंसा की ही बात नहीं करता है; अपितु यदि हमारे मन में भी उनके प्रति हिंसा या प्रमाद का भाव है, तो उसे भी यह हिंसा ही कहता है।

आचार्यदेव कहते हैं -

‘‘मरदु जियदु वा जीवो, अयदाचारेण णिच्छिदा हिंसा।’’

अर्थात् जीव मरे या नहीं मरे, किन्तु यदि आप असावधानीपूर्वक आचरण कर रहे हैं, तो आपको जीवहिंसा का पाप लग ही रहा है।

हिंसा के संकल्पी-हिंसा, आरम्भी-हिंसा, उद्योगी-हिंसा आदि भेद हमारे विचारों तक को हिंसारूपी महापाप से बचाने के लिये कहे गये हैं।

जैनधर्म में जीवों के प्राणघात को हिंसा का केन्द्र नहीं माना गया; अपितु हमारे विचारों में यदि हिंसा या प्रमाद तक का भाव/मनोवृत्ति जन्म लेती है, तो वहीं से हिंसा की शुरूआत जैनधर्म मानता है।

जबकि वैदिकधर्म तो स्पष्ट-शब्दों में कहते हैं कि:

‘वैदिकी-हिंसा हिंसा न भवति।’ अर्थात् वैदिक कर्मकांड में होने वाली हिंसा को ‘हिंसारूप पाप’ नहीं माना गया है।

इतना ही नहीं, वे यज्ञों में पशुओं का निर्ममतापूर्वक वध करने के लिये तर्क देते हैं कि:

‘यज्ञार्थः पशवः सृष्टाः’ अर्थात् ब्रह्माजी ने पशुओं की सृष्टि ही यज्ञों में उनकी बलि दिये जाने के लिये की है। (यद्यपि कुछ वैदिक विचारक इसका अर्थ ‘अपनी पाशविक वृत्तियों की यज्ञ में बलि देना’, ऐसा भी करते हैं।)

जैनधर्म में तो मानसिक, वाचिक और कायिक, तीनोंप्रकार की हिंसा को सबसे पहला पाप बताया है। इतना ही नहीं, आचार्य अमृतचन्द्र सूरि तो यहाँ तक लिखते हैं कि:

‘‘अनृत-वचनादि-केवलमुदाहृतं शिष्यबोधाय।’’

(पुरुषार्थसिद्ध्युपाय)

अर्थात् वास्तव में तो पाप केवल एक ही है, और वह है ‘हिंसा’। जो अनृत (झूठ) आदि अन्य पाप कहे गये हैं, वे तो बच्चों को समझाने के लिये कहे गये हैं; अन्यथा जैनधर्म तो हिंसा को ही पाप मानता है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि कोई वचन ‘स्व’ की या ‘पर’ की हिंसा का समर्थन करता है, तो वह भी हिंसा के अन्तर्गत ही परिगणित होगा। उसे ‘झूठ’ संज्ञा देना आवश्यक नहीं है। वह वास्तव में तो ‘हिंसा’ ही है। इसीप्रकार किसी वस्तु का क्षेत्र से क्षेत्रान्तरित होना ही ‘चोरी’ नहीं कही जा सकती है, जब तक कि उसके पीछे किसी के प्राणपीड़न का भाव न हो।

अन्यथा मुनिराज के पास कौवे के द्वारा लाकर डाले गये बहुमूल्य रत्नहार की चोरी का आरोप उन वीतरागी मुनिराज पर आना चाहिये, उसका पापबंध उन्हें होना चाहिये; क्योंकि वह उनके पास मिला। किन्तु आप सभी जानते हैं कि ऐसा नहीं हुआ था। अतः वस्तु का क्षेत्र से क्षेत्रान्तरित होना ही चोरी नहीं कही जा सकती है; बल्कि उस वस्तु के प्रति रागभाव होना, दूसरे से छीनने/चुराने का भाव होना ही वास्तव में ‘चोरी’ की संज्ञा के योग्य है और यह भाव मूलतः अन्य जीव के प्राणपीड़न का निमित्त होने से हिंसा ही है। इसी दृष्टि से आचार्य अमृतचन्द्रसूरि जी ने हिंसा को ही पाप कहा, शेष झूठ आदि संज्ञायें तो स्थूल-भेद समझाने के लिये कही गयी हैं।

यहाँ प्रकरण शान्तिधारा का है। अतः ‘संकल्पी-हिंसा’ एवं ‘वाचिक-हिंसा’ को लक्षित करके हमें सारी बात समझनी होगी। शान्तिधारा में बोलते समय ‘‘छिन्दि-छिन्दि भिन्दि-भिन्दि’’ जैसे शब्दों का उच्चारण किया जाता है। इनका सीधा अर्थ होता है ‘‘छेद डालो, भेद डालो’’। ऐसे आदेशात्मक-क्रियापदों का प्रयोग लोक में युद्ध की स्थिति में किया जाता है। अब शान्तिधारा में इनका प्रयोग कभी सर्प आदि तिर्यंच-जीवों के साथ किया जाता है, तो कभी शाकिनी-डाकिनी आदि निम्नवर्ग के देवों के साथ किया जाता है।

तो पहले तो शान्तिधारा करनेवाले यह बतायें कि जिस जैनशासन में सर्प की फणावलि-सहित सुपार्श्वनाथ और पार्श्वनाथ तीर्थंकरों की प्रतिमायें शास्त्र-सम्मत न होते हुये भी (क्योंकि ऐसी प्रतिमा अरिहंत-अवस्था की हो नहीं सकती है) बनायी गयीं और उन्हें वैकल्पिक-मान्यता भी दी गयी, तो उन सर्प-जाति के प्राणियों से क्या जैन-संस्कृति विद्वेष कर सकती है। उन्हें ‘छेदो-भेदो’ जैसे संकल्पी-हिंसा के वचन बोल सकती है? मेरे हिसाब से तो ‘सर्प आदि विषैली-प्रकृति के प्राणियों के प्रति तो क्या, किसी भी जीव के लिये ऐसे हिंसक-शब्दों का प्रयोग करने की अनुमति जैनधर्म में नहीं है।’ और शासनदेवी-देवताओं की जाति तो व्यंतर और भवनवासी-देवों के भी निम्नतम-श्रेणी के देवों की होती है। इनका भी जैन-संस्कृति में निषेध नहीं किया है। ये राष्ट्रपति महोदय के चोबदारों की तरह विद्यमान रहने की ड्यूटी वाले बताये गये हैं। (इन्हें आजकल लोग अज्ञानतावश पूजने लगे हैं, इसलिये इनकी पूजा का निषेध किया जाता है, न कि इनकी सत्ता का। जैसे कि कोई अज्ञानतावश राष्ट्रपति महोदय की जगह उनके चोबदारों का सम्मान करने लगे, तो उनके सम्मान का निषेध करना ही पड़ेगा।) किन्तु इनके प्रति हिंसक-शब्दों का प्रयोग करने की अनुमति जैनधर्म में कहीं भी नहीं दी गयी है। समवसरण में इन सभी को बैठने के स्थान निर्धारित होते हैं।

‘छेदो-भेदो’ - ऐसे प्रयोगों को जैनधर्म में ‘वधंकरी-भाषा’ कहा गया है।

अर्थात् ‘किसी जीव का वध करने का आदेश देनेवाली भाषा’ कहा गया है। अब आप ‘वधंकरी-भाषा’ को ‘हिंसा’ और ‘पाप-कार्य’ मानते हैं, तो फिर आप स्वयं ही निर्णय करें कि हम शान्ति की धारा कर रहे हैं या हिंसा की अजस्र-धारा वाली शब्दावलि बोल रहे हैं?

बुंदेलखंड में तो ‘देहावसान हो जाने’ को भी ‘शांत हो जाना’ कहा जाता है। तो कहीं आपकी शान्तिधारा के पीछे ऐसी ही भावना तो नहीं है? अर्थात् आप नाम तो शान्तिधारा का ले रहे हों और अभिप्राय उन जीवों की हिंसा का या मरण का हो? शान्तिधारा करनेवाले और करानेवाले लोग ही इसकी वास्तविकता बता सकते हैं।

और यह कार्य तो आजकल अपने को ‘अहिंसा-महाव्रत’ के धनी माननेवाले महानुभाव तक करा रहे हैं? क्या किसी को भी समय तक नहीं मिला कि इसकी वास्तविकता समझें और उसके बाद इसे कराने के विषय में विवेकपूर्वक-निर्णय करते!

यदि कोई यहाँ प्रश्न करे कि शब्दों को क्यों पकड़ते हो? शब्दों में तो ‘कर्मरूपी शत्रुओं का हनन करने के कारण’ ‘अरि हननात् अरिहन्तः’ - ऐसी व्याख्या दी गयी है। तो क्या अरिहंत भगवान् का नाम लेना भी हिंसा हो गया?’

इस कुतर्क पर मुझे हँसी आती है; क्योंकि कर्मरूपी शत्रु कोई जीवित-प्राणी नहीं हैं, जो कोई उनके हनन के लिये तीर-तलवार उठा लेगा। कर्म तो जड़/अचेतन हैं, अतः उनके लिये ऐसा प्रयोग स्वीकार है; उसमें हिंसा का भाव नहीं आता है। किन्तु सर्प आदि पशु-पक्षियों एवं शाकिनी-डाकिनी आदि निम्नवर्ग के देवों को अचेतन नहीं कही सकते हैं। अरे! जिस जैनशासन में मिट्टी या आटे के मुर्गे तक की बलि के आदेश को स्पष्ट-शब्दों में ‘हिंसा’ माना गया और उसका फल नरक-गति के दारुण-दुःख बताये गये हैं, उसमें किसी भी प्राणधारी को ‘छेदो-भेदो’ जैसे हिंसक-शब्दों का प्रयोग करके शान्तिधारा कैसे की जा सकती है? मुझे आश्चर्य है कि अपने कुत्सित-अभिप्राय को बचाने के लिये इन लोगों ने अरिहंत-भगवान् तक को विवाद में घसीट लिया !!! शायद इसीलिये इसे ‘दुष्काल’ या ‘पंचमकाल’ कहा गया है।

अपरिग्रह की दृष्टि से शान्तिधारा की समीक्षा - इस दृष्टि से भी शान्तिधारा किये जाने के पीछे पूरा षड्यंत्र ही परिग्रह के संचय का ज्ञात होता है। इस कथन का सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि किसी भी आगमग्रंथ या प्रतिष्ठाशास्त्र में कहीं भी शान्तिधारा नामक कर्मकांड का कोई उल्लेख तक नहीं मिलता है। इसीप्रकार देववंदना एवं पूजाविधियों में भी कहीं शान्तिधारा किये जाने का निर्देश होना तो दूर रहो, इसकी नामोल्लेख एवं विधि तक का उल्लेख नहीं है तथा आज से कुछ दशक पहले तक मात्र दक्षिणभारत के मूलसंघ-बहिष्कृत-लोगों (रात्रिपूजन, स्त्री-द्वारा जिनाभिषेक, पंचामृत-अभिषेक आदि को माननेवाले ‘प्रच्छन्न-श्वेताम्बर’ कहे गये यापनीयसंघी लोगों, जिन्हें आज ‘बीसपंथी’ के नाम से जाना जाता है) के यहाँ यह विपरीत-मान्यता प्रचलित थी, जो कि स्पष्टरूप से गृहीत-मिथ्यात्व की ही पोषक है।

आजकल ‘अपरिग्रही-आचरणवाले’ कहे जाने वाले मुनिपद-धारकों के द्वारा ‘अपरिग्रह-महाव्रत’ की मर्यादाओं का पूर्णतः अतिक्रमण करते हुये मात्र परिग्रह के संचय का एकमात्र लक्ष्य लेकर शुद्धाम्नाय के जिनमंदिरों में मूलसंघ की आम्नाय के पूर्णतः विरुद्ध कार्य ‘शान्तिधारा’ का अनुष्ठान किये जाने का अलिखित-फरमान जारी किया गया है।

इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि “वे अपने लिये तो तिनका तक नहीं जोड़ रहे हैं। हमारे जिनमंदिरों की देखभाल और जीर्णोद्धार के लिये ही समाज की मददरूप में यह विधि करायी जा रही है। इससे सुबह मंदिर जी में प्रक्षाल-पूजन करनेवालों की संख्या भी बढ़ रही है और उनमें दान की भावना जागृत करने के लिये बोलियाँ लगाकर शान्तिधारा किये जाने का प्रवर्तन समाजहित में ही तो किया गया है। कोई महाराजजी तो वह पैसा लेते नहीं हैं।”

तो भाई! जिनाम्नाय में मुनिधर्म के स्वरूप में तो ऐसा कहीं कोई उल्लेख तक नहीं मिलता है कि निर्ग्रन्थ-दिगम्बर-जैन-मुनिराज को अपने लिये तो परिग्रह जोड़ने का निषेध है, किन्तु समाज के लिये परिग्रह जोड़ने की छूट है? मैंने तो मुनिधर्म पर व्यापक अध्ययन करके लगभग साढ़े पाँच सौ पृष्ठों की पुस्तक लिखी है। मुझे तो सारे जिनागम में कहीं भी ऐसा झूठ-मूठ तक का उल्लेख नहीं मिला है कि मुनिपद-धारण करके किसी भी निमित्त से परिग्रह जोड़ने का उपदेश भी दिया जा सकता हो। इसीलिये पूरा दृढ़ता से मैं यह बात कह रहा हूँ कि ‘मुनिपद-धारण करके अपने लिये या समाज/मंदिर/मठ/जीर्णोद्धार आदि किसी भी कार्य के लिये परिग्रह का संचय कराना, उसका उपदेश देना आदि किसी भी कार्य का प्रावधान कहीं भी नहीं मिलता है। यह अपरिग्रह-महाव्रत के संकल्प का ही उल्लंघन है।’

इसके विपरीत ‘परिग्रह की चिंता करना’ (क्योंकि परिग्रह का चिंतन तो संभव ही नहीं है, तत्त्व का चिंतन होता है, पाप का नहीं। परिग्रह तो सभी के लिये चिंता का ही विषय है) और जब तक परिग्रह न जुड़े, तब तक खेदजन्य होने से ‘आर्त्तध्यानरूप’ होता है। और परिग्रह जोड़ने के लक्ष्य में सफलता मिलते ही वह ‘परिग्रहानन्दी-रौद्रध्यान’ में बदल जाता है। जिनवाणी प्रमाण है कि ‘आर्त्तध्यानरूप-परिणाम तिर्यंचगति के कारण होते हैं और रौद्रध्यानरूप-परिणाम नरकगति के कारण होते हैं।’

अब यह आप यह स्वयं ही निर्णय कर लीजिये कि वीतरागी-जैनधर्म के नाम पर किये जाने वाले परिणाम और कार्य क्या तिर्यंचगति या नरकगति के कारण हो सकते हैं? यदि ऐसी दुर्गतियाँ इष्ट नहीं हैं, तो धर्म के नाम पर परिग्रह जोड़ने के अभियान भी जिनाम्नाय के विरुद्ध और जिनधर्म-विरोधी कार्य हैं। शान्तिधारा जैसे कार्यों से जिनधर्म की विराधना ही हो रही है, प्रभावना नहीं।

मैं तो दोटूक-शब्दों में कह देना चाहता हूँ कि शान्तिधारा तो क्या, किसी भी जैनविधि-विधान के पवित्र-दायित्वों के लिये योग्य-पात्रों का चयन नीलामी की तरह बोलियाँ लगाकर कदापि नहीं होना चाहिये। बल्कि जैसा श्रेष्ठ-पद है, वैसे ही श्रेष्ठ-आचरण वाले श्रावक को सादर उस पद के लिये चुना जाना चाहिये। धन के संग्रह की अपेक्षा ही इसमें नहीं रखनी चाहिये। जो स्वेच्छा से दानस्वरूप लोग सहर्ष दें, उसी में संतुष्ट रहकर तदनुरूप कार्य करना चाहिये। अनावश्यक तड़क-भड़क दिखाना तो जैनधर्म के अपरिग्रह-सिद्धान्त की मर्यादाओं के बाहर की बात है। ‘आचार और विचार की पवित्रता ही जैनधर्म के विधि-विधानों की गरिमा है, धन पर आधारित दिखावा नहीं।’

पर मेरे इस कथन का यह आशय कदापि नहीं है कि यदि किसी में भरपूर सामर्थ्य है, तो भी वह संसार के कार्य तो पूरी शान-ओ-शौकत से करे; और धर्मप्रभावना के कार्यों को कंजूसी और उपेक्षाबुद्धि से करे। किन्तु उसके लिये स्वयं सहर्ष दान देना चाहिये, न कि माँगने पर या बोलियों के द्वारा मान-कषाय की पूर्ति करके दिया जाये। बोलियों द्वारा नीलामी में ‘मान’ के बदले चुकायी गयी राशि को जिनाम्नाय में कहीं भी ‘दान’ नहीं कहा गया है।

और माँगकर या तिकड़म लड़ाकर संचय किया गया अथवा भौतिक-संसाधनों की सुविधा की भावना से एकत्रित किया गया ‘दान’ का धन भी एकमात्र ‘परिग्रह’ के अन्तर्गत ही आता है।

तथा जिन्होंने ‘परिग्रह’ का त्याग महाव्रत के रूप में किया हो, उन्हें तो मंदिर या धार्मिक-आयोजन के लिये धन को दिलवाने या ‘दान’ के रूप में उसकी प्रेरणा देने के कार्य तो ‘अपरिग्रह-महाव्रत’ के दोष ही हैं। अपरिग्रह-महाव्रतियों के लिये तो धन एवं संसाधन का उपदेश या प्रेरणा देना उसीतरह निषिद्ध है, जैसे कि शादी-विवाह आदि के लिये लड़का या लड़की बताना, रिश्ता कराना ‘ब्रह्मचर्य-महाव्रती’ मुनिराज के लिये पूर्णतः निषिद्ध है।

मुझे आज के मुनिराजों की दुहाई मत देना कि ‘‘आजकल तो हर मुनिराज ऐसा कर रहे हैं’’; क्योंकि जो भी मुनिपद पर होकर ऐसा कर रहे हैं, वे जिनवाणी की आज्ञा का उल्लंघन कर रहे हैं। अतः ईमानदारी से कहा जाये तो वे मुनिराज हैं ही नहीं। वे ऐसा करके मुनिधर्म को कलंकित कर रहे हैं।

अस्तु, मेरा विवेच्य-विषय यहाँ मुनिधर्म नहीं है, बल्कि ‘शान्तिधारा के नाम पर बोलियाँ लगाकर इस कर्मकांड को महिमामंडित करना व धनसंचय का साधन’ बनाना पूर्णतः जिनाम्नाय का उल्लंघन है - यह बताना है। ‘परिग्रह’ जिनाम्नाय में धर्म नहीं, महापाप कहा गया है। और पहले तो तथाकथित शान्तिधारा ही जिनाम्नाय-सम्मत नहीं है। ऊपर से ‘कोढ़ में खाज’ की तरह उसे ‘परिग्रह के संचय का साधन’ बनाना तो अक्षम्य-अपराध ही है। चाहे यह कार्य मुनिपद-धारक अपनी क्षमता दिखाने अथवा तिकड़मबाजी से करें या गृहस्थ अपनी नादानी से करें।

जैनधर्म में ‘परिग्रह’ महापाप था, है और रहेगा; क्योंकि जैनधर्म कोई मौसमी-प्रभाव नहीं है कि जो मौसम बदलते ही बदल जायेगा। यह तो वस्तु के स्वरूप पर आधारित धर्म ( धम्मो वत्थुसहावो ) है, जो कि त्रिकाल-अबाधित है। किसी भी काल या मौसम के कारण उसका स्वरूप या उसकी व्याख्या बदली नहीं जा सकती है।

पहले ही सामान्य जिनेन्द्र-पूजनविधि की तुलना में शान्तिधारा के कर्मकांड में आरम्भ-परिग्रह की बहुलता है और जिनाम्नाय-विरुद्ध होने से यह कर्मकांड कदापि स्वीकार्य नहीं है। ऊपर से ‘परिग्रह’ रूपी महापाप के संचय का निमित्त इसे बनाया जाना इसे नितान्त-धर्मविरुद्ध-कार्य की श्रेणी में स्थापित करता है।

इतना ही नहीं, इस शान्तिधारा के नाम पर जो कर्मकांड किया/कराया जाता है, वह ‘अहिंसा’ और ‘अपरिग्रह’ - इन दोनों धर्ममूलों के विरुद्ध ‘हिंसा’ और ‘परिग्रह’ - इन महापापों का अनुष्ठान इसे बना रहा है और मूल-शुद्ध-जिनाम्नाय के पूजाद्रव्यों की अनिवार्य-प्रासुकता के विपरीत सचित्त-पदार्थों के प्रयोग की घुसपैठ करानेवाला षड्यंत्रकारी-प्रयास है।

क्योंकि इस तथाकथित शान्तिधारा में बहुत सारा जल ढोला जाता है, जो कि प्रायः प्रासुकता की मर्यादा से बाहर होता है।

साथ ही इसमें शान्तिधारा के लोटे के ऊपर जलभरा सचित्त-नारियल जटा-जूट-सहित लगाने का निर्देश इसके समर्थक दे रहे हैं। तो पहले तो वह नारियल भीतर में जलयुक्त होने से सचित्त है, अतः जिनपूजा-सामग्री के योग्य नहीं है। ऊपर से जटा-जूट-सहित है, तो उसके जटा-जूट में स्पष्टरूप से त्रसजीवों का वास होता ही है और उस जटा-जूट का हिस्सा शान्तिधारा के लोटे में स्थित जल में डूबा रहता है, इसकारण वे जीव उस शान्तिधारा के लोटे के जल में आ जाते हैं और टोंटी के माध्यम से जिनबिम्ब या यंत्र पर आ जाते हैं, जो अत्यन्त-निंदनीय कार्य है। अतः उन त्रसजीवों की हिंसा का दोष भी इस ‘शान्तिधारा’ नामक कर्मकांड में लगना अनिवार्य ही है।

मुझे समझ नहीं आता कि अपने को ‘अहिंसा-महाव्रती’ कहने और माननेवाले व्यक्ति इस स्पष्टरूप से हिंसाप्रधान-कर्मकांड का उपदेश या प्रेरणा कैसे दे सकते हैं? उन्हें क्या इस ‘हिंसोपदेश’ नामक कुकर्म का तनिक भी भय नहीं है? जबकि सामान्य गृहस्थ-श्रावक को हिंसा के उपकरण देने या उनका प्रयोग बताने का जिनवाणी में स्पष्टरूप से निषेध किया गया है। पर इन्हें यदि जिनवाणी की आज्ञा के उल्लंघन का तनिक भी भय होता, तो उसे किसी भी हाल में शान्तिधारा जैसे कर्मकांड को करने की प्रेरणा नहीं देते।

इसीलिये मैं कहता हूँ कि शान्तिधारा नामक कर्मकांड करने की प्रेरणा देनेवाले मुनिपद-धारक एवं इसे कराकर जिनागम की मर्यादा को लजानेवाले तथाकथित पंडितगण - सभी जिनाम्नाय के उल्लंघन के दोषी हैं, प्रायश्चित्त के योग्य हैं। और जो गृहस्थ-श्रावक भय से, लोभ से या दबाव से यह कार्य करते हैं, वे भले ही मुनिपद-धारकों या पंडितों के कहने से यह कर्मकांड कर रहे हों; परन्तु यह कहकर वे अपने पाप को क्षम्य नहीं बना सकते हैं; क्योंकि जिनवाणी में स्पष्ट-आज्ञा है कि ‘‘कोई तुम्हें कुछ भी कह दे, परन्तु करनेवाले को अपने विवेक का प्रयोग करके ही जो विवेक की कसौटी पर खरी हो, वही बात माननी चाहिये, अन्यथा नहीं।’’

इस विवेचन के आलोक में यह स्पष्टरूप से प्रमाणित हो रहा है कि ‘शान्तिधारा नामक कर्मकांड जिनाम्नाय के विरुद्ध होने से जिनवाणी की आज्ञा का स्पष्ट उल्लंघन है। इसे करना व कराना धर्म तो है ही नहीं; उल्टे पापबंध का कारण है।’

शान्तिधारा की इस लेखन-शृंखला में आगे शान्तिधारा के पाठ से जुड़ी कई बातों पर विचार करने के साथ-साथ इस प्रश्न का भी समाधान किया जायेगा कि पूजनविधि में बोले जानेवाले ‘शान्तिपाठ’ में कुछ बातें शान्तिधारा के समान ही हैं, तो वह ‘शान्तिपाठ’ भी क्या आपके अनुसार त्याज्य है? यदि वह पूजनविधि का अंग हो सकता है, तो शान्तिधारा क्यों नहीं? आज कहें, तो हम कुछ आपके लिये आपत्तिजनक बातों को हटा देते हैं। पर आप पूरी शान्तिधारा की विधि का ही निषेध क्यों कर रहे हैं?

इनका क्रमशः विवेचन यहाँ प्रस्तुत है:

  1. शान्तिधारा के पाठ में आपत्तिजनक प्रयोग, शान्तिधारा के वर्तमान में प्रचलित-पाठ में ‘छिंदि-भिंदि’ के अलावा अन्य भी कई ऐसे प्रयोग हैं, जिनके बारे में प्रतिदिन शान्तिधारा करनेवालों को भी कुछ पता नहीं है कि यह है क्या? क्यों है? और इसका अर्थ क्या होता है? इनका क्रमशः विवेचन कर रहा हूँ, आप सब गम्भीरतापूर्वक चिंतन करें कि मेरी आपत्तियाँ उचित हैं या नहीं?

‘‘सुदर्शन-महाराज-चक्र-विक्रम’’: यह पढ़ते तो सभी हैं। किन्तु किसी के पास इस प्रश्न का उत्तर नहीं है कि ये ‘सुदर्शन-महाराज’ हैं कौन? और इनके ‘चक्र-विक्रम’ से यहाँ क्या तात्पर्य है? कोई इसे सुदर्शन-चक्र बतलाता है, तो किसी राजा या सम्राट का नाम बतलाता है।

परन्तु क्या किसी ने सोचा है कि यदि इसका अर्थ ‘सुदर्शन-चक्र’ लिया जाये, तो यह तो चक्रवर्ती का चक्ररत्न है। यह मात्र युद्ध के समय हिंसक-उपकरण के रूप में प्रयुक्त होता है। तो क्या युद्ध या हिंसा के उपकरण की हितकामना के लिये आप लोग शान्तिधारा कर रहे हैं? अर्थात् हिंसोपकरण की वृद्धि की कामना के साथ आप परम-अहिंसक वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में करना चाहते हैं? क्या वीतरागी जैनधर्म में किसी भी हिंसक-उपकरण की श्रीवृद्धि की मंगलकामना से कोई धार्मिक-अनुष्ठान किये जाने का कहीं विधान संभव है?

मुझे पूर्ण-विश्वास है कि आप लोग आज के कितने ही बड़े नामवाले महापुरुष के आदेश को मानकर यह शान्तिधारा नामक कर्मकांड कर रहे हों; किन्तु आप सब अहिंसक-जैन सज्जन-व्यक्ति हैं। अतः आज के किसी व्यक्ति-विशेष के प्रति कितनी ही आस्था रखते हों, फिर भी हिंसा का समर्थन करते हुये किसी भी हिंसक-उपकरण की श्रीवृद्धि की मंगलकामना नहीं कर सकते हैं। आज यह जानने के बाद आपकी जिह्वा इस पाठ का उच्चारण करने में साथ नहीं देगी।

और यदि इसे किसी राजा या सम्राट का नाम माना जाये, तो पहली-आपत्ति तो यही है कि किसी भी रागी-द्वेषी विषय-भोगी व्यक्ति-विशेष के लिये वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में मंगलकामना नहीं की जा सकती है।

राजा या सम्राट लोग रागी-द्वेषी, विषय-भोगी अनिवार्यतः होते हैं। यदि ये विकार उनके नहीं रहें, तो वे संसार छोड़कर मुनिदीक्षा लिये बिना नहीं रह सकते हैं। इसलिये यदि यह नाम किसी राजा या सम्राट का है, तो उसकी मंगलकामना वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में कदापि नहीं की जा सकती है।

और फिर जैन-इतिहास में कोई ‘सुदर्शन-महाराज’ नामक चरित्र (करेक्टर) का उल्लेख मुझे कहीं नहीं मिलता है, जिसकी मंगलकामना के लिये वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में मंगलकामना की जाये? सेठ सुदर्शन का उल्लेख है, किन्तु वे महाराज नहीं हैं और उनके लिए शान्तिधारा क्यों की जायेगी ?

अब बात आती है कि इस ‘सुदर्शन-महाराज’ के ‘चक्र-विक्रम’ की श्रीवृद्धि की मंगलकामना क्यों की जाये? पहले यह जान लें कि ‘चक्र’ शब्द के समूह, आयुध, गोलाकार, सेना, राजनीति आदि कई अर्थ कोश-ग्रंथों में प्रचलित हैं।

और ‘विक्रम’ शब्द तो शारीरिक-पराक्रम का वाचक है। इसलिये यह युद्ध के प्रसंग में तो समीचीन प्रतीत होता है, किन्तु वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में इसका प्रयोग किसी भी दृष्टि से संगत प्रतीत नहीं होता है।

अब शान्तिधारा करनेवाले सज्जन यह बतायें कि इनमें से आपको कौन-सा अर्थ यहाँ समीचीन प्रतीत होता है? क्योंकि इनमें से कोई भी अर्थ ऐसा नहीं है, जिसके वाच्य के लिये वीतरागी जिनेन्द्रदेव की अर्चना-विधि में मंगलकामना की जा सके।

उक्त-विवेचन से यह बात भलीभाँति स्पष्ट है कि शान्तिधारा में पढ़े जाने वाले ‘सुदर्शन-महाराज-चक्र-विक्रम’ पद वीतरागी जैनधर्म की आम्नाय के विरुद्ध हैं और इन जैसे पदों के प्रयोग वाली शान्तिधारा को इस कर्मकांड को करनेवाले पूरी तरह अज्ञानतापूर्वक दूसरों के दबाव में ही कर रहे हैं। उन्हें यदि इसकी वास्तविकता का सही ढंग से अवबोध करा दिया जाये, तो संभवतः कोई भी विवेकी-व्यक्ति इस कर्मकांड को आगे करेगा ही नहीं।

शान्तिधारा के प्रचलित-पाठ में और भी बहुत से ऐसे पद हैं, जिनकी वास्तविकता का यदि पता चल जाये, तो सभी विवेकी-व्यक्ति इस शान्तिधारा नामक सुनियोजित-षड्यंत्र से चलाये गये कर्मकांड से अपने को तत्काल अलग कर लेंगे।

स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 38-65

खोज: शान्तिधारा: भक्ति या रूढियों का मकडजाल, शान्तिधारा: भक्ति या रूढ़ियों का मकड़जाल, Shantidhara Bhakti Ya Rudhiyon Ka Makadjal, Shantidara Bhakti Ya Rudiyon Ka Makadjal

कुछ लोग यह आरोप लगा रहे हैं कि मैं आधी-अधूरी बात लिख रहा हूँ। जैसे कि ‘‘सर्प-वृश्चिक-आदि-कृत-दोषान् छिंदि-छिंदि, भिंदि-भिंदि’’ को अकेला ‘‘सर्प-वृश्चिक-आदि को छिंदि-छिंदि भिंदि-भिंदि’’ कहा। इसीप्रकार ‘‘डाकिनी-शाकिनी-कृत-भयानि छिंदि-छिंदि भिंदि-भिंदि’’ को ‘शाकिनी-डाकिनी छिंदि-छिंदि भिंदि-भिंदि’ कहा है। - यहाँ तक वे सही यह रहे हैं; किन्तु इस के आगे जो आक्षेप लगा रहे हैं कि ‘पूरे पाठ से अर्थ बदल जायेगा और हिंसक-अर्थ नहीं करेगा’ - यह नितान्त-गलत है; क्योंकि ‘छिंदि-छिंदि भिंदि-भिंदि’ का अर्थ तो वही का वही ‘छेदो-भेदो’ ही रहेगा। और यदि किसी भी जीव के द्वारा किये जाने वाले दोषों और भय के विनाश के लिये यदि ‘छिंदि-छिंदि भिंदि-भिंदि’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया जायेगा, तो उसकी अर्थ भय या उपद्रव/दोषों का विनाश उन जीवों को छेद-भेदकर ही किया जायेगा।

क्योंकि भय का विनाश तो सम्यग्दृष्टि-जीव के ही होता है। यदि शान्तिधारा करने और करानेवाले सम्यग्दृष्टि-जीव होते, तो उन्हें इन जीवों से तो क्या, सातों प्रकार के भयों में से कोई भय होता ही नहीं। और न ही ऐसी कामना वे कभी करते।

और इन शान्तिधारा करनेवालों को भय तो है, किन्तु इनसे स्वयं निबटने की हिम्मत एवं कौशल इनके पास नहीं है। अतः कायरतापूर्वक जिनेन्द्रदेव से वे इनके भय एवं दोषों को छेदने-भेदने की बात यह रहे हैं।

शान्तिधारा के समर्थक तो कायरता के साथ साथ वीतरागी जिनेन्द्रदेव से दूसरों को छेदने-भेदने की कामना करके वे सम्पूर्ण जिनशासन को कलंकित करने का कुचेष्टा रहे हैं।

ये लोग कहते शान्तिधारा में प्रयुक्त ‘छिंदि-भिंदि’ शब्दों को कहते तो भय के विनाश के हैं, किन्तु सातप्रकार के भयों में इन शाकिनी-डाकिनी का भय जैसे नाम अलग से हैं ही नहीं, जिन भयों के छेदने-भेदने की कामना ये शान्तिधारा करनेवाले करते हैं। इससे भी स्पष्ट है कि इनके लिये शान्तिधारा का कर्मकांड इनके लिए एक कीटनाशक-स्प्रे की तरह है। जैसे कि कीटनाशक-स्प्रे के विज्ञापन में बात तो मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया आदि का डर दूर करने की कही जाती है; किन्तु उस स्प्रे से हिंसा तो मच्छरों की ही होती है। किसी भी मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया आदि के मरीज को ये कीटनाशक-स्प्रे न तो आज तक पिलाये गये और न ही उस पर इनके छिड़काव किया गया। यदि गलती से ऐसा कर दिया जाता, तो ‘मर्ज’ की तो नहीं कह सकता, परन्तु ‘मरीज’ अवश्य निबट जाता। अतः ‘भयविनाश करने’ के शब्दों पर मत जाइये, इनके पीछे निहित-अभिप्राय को देखिये। मैंने उसे ही बिना किसी लागलपेट के यहाँ व्यक्त किया है।

मैंने संक्षेप में बात लिखी थी, लेकिन अभिप्राय में कोई अंतर नहीं था - यह आप सब इस स्पष्टीकरण के बाद संभवतः समझ गये होंगे। व्यर्थ के कुतर्क करनेवाले सिवाय बरगलाने के और कुछ नहीं कर सकते हैं। वे साक्षात् बृहस्पति को भी अपनी वकालत के लिये ले आयें, तो भी शान्तिधारा को जिनाम्नाय की मर्यादा के अनुरूप सिद्ध नहीं कर सकेंगे; क्योंकि वे रावण और कौरवों की तरह सत्य के विरुद्ध खड़े हैं और ‘सत्यमेव जयते’ की स्वीकृति तो भारतीय-शासन भी अपने आदर्श-वाक्य (‘लोगो’) में करता है।

अस्तु, मैं अपने विषय को अपने क्रम से ही आगे बढ़ाता हूँ। देखिये कि शान्तिधारा में और क्या-क्या कहा जाता है तथा उनका अर्थ क्या होता है? अब मैं पूरे वाक्य दूँगा, ताकि लोग अपनी गलती स्वीकार करने की जगह अधूरे-पाठ देने के मिथ्या-आरोप नहीं मढ़ सकें।

‘‘ओं ह्रीं क्ष्रूं फट् किरीटिं घातय घातय, परविघ्नान् स्फोटय स्फोटय, सहस्रखण्डान् कुरु कुरु, परमुद्रां छिन्दि-छिन्दि, परमन्त्रान् भिन्दि-भिन्दि, क्षः वः हं फट् सर्वशान्तिं कुरु कुरु।’’

इसमें ‘स्फोटय’ पद तो स्पष्ट ही ‘फोड़ डालने’ के अर्थ का वाचक है। यदि हम किसी को कहें कि ‘इस व्यक्ति का सिर फोड़ तो’, तो वह वचन क्या हिंसक-वचन नहीं है?

इसीप्रकार ‘सहस्रखण्डान् कुरु’ का तो स्पष्ट ही अर्थ है कि ‘तोड़कर हजार टुकड़े कर डालो।’ यदि हम क्या कोई कहें कि ‘इसके सिर के हजार टुकड़े कर दो’, तो क्या यह अहिंसक-आशीर्वाद है? कदापि नहीं। इनके अलावा बाकी ‘छिन्दि-छिन्दि भिन्दि-भिन्दि’ पदों के अर्थ पर तो पहले ही चर्चा हो चुकी है कि इनका अर्थ छेदने-भेदने के आदेशरूप में ही है।

अब आप ही निर्णय करिये कि ये सब ‘वधंकरी-भाषा’ है या नहीं; क्योंकि ये सब प्रयोग तो हिंसा कराने के प्रयोग हैं। तो क्या शान्तिधारा के समर्थकों के मत में जिनेन्द्र-अर्चना की विधि में किसी भी रूप में वधंकरी-भाषा के प्रयोग स्वीकार्य हो सकते हैं?

संकोच रहित होकर बताइये; क्योंकि यह अहिंसक-जैनधर्म की अस्मिता का प्रश्न है।

यदि आज परम-अहिंसक जैनधर्म में यह स्वीकार कर लिया, तो फिर कल के दिन ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का नारा लगाने की पात्रता नहीं बचेगी। जिस धर्म में - ‘‘षट्काय जीव न हननतैं, सब विधि दरव-हिंसा टरी।
रागादि-भाव निवारतैं, हिंसा न भावित अवतरी।।’’

जैसे वाक्य बोलने के अधिकारी तक आप नहीं कहे जायेंगे।

जिस धर्म में कहा जाता हो कि:

‘‘असि-धनु-हल-हिंसोपकरण नहिं दे यश लाधै।’’

अर्थात् स्वयं हिंसा तो नहीं करना, परन्तु दूसरा कोई भी हिंसा न कर सके, इस भावना से यदि आपके पास कोई हल, कुदाली, फावड़ा आदि उपकरण हों भी; और कोई आपसे उन्हें अपने उपयोग के लिये माँगने आये, तो भी नहीं देना।

इसप्रकार अहिंसा की रक्षा के लिये असत्यवचन को भी जिसमें त्याज्य नहीं बताया हो, इतनी पराकाष्ठा तक जो अहिंसा का पालन करने की बात करता हो; उसमें हिंसक-वचन बोलना, वह भी जिनेन्द्रदेव की अर्चनाविधि में? कदापि स्वीकार्य नहीं हो सकता है।

और इसप्रकार की शब्दावली के द्वारा वीतरागी जिनेन्द्रदेव को रागी-द्वेषी और पक्षपाती सिद्ध करने की कुत्सित-चेष्टा की गयी है, वह हिंसा से भी बड़ा जघन्य-अपराध है; क्योंकि हिंसक-व्यक्ति तो एक बार फिर भी सुधर सकता है, किन्तु पर-कर्तृत्व की भावनावाला रागी-द्वेषी और पक्षपाती-व्यक्ति कभी भी जिनेन्द्र-पद का पात्र नहीं बन सकता है।

यदि जिनेन्द्रदेव वीतरागी होकर भी पर-विघ्नकर्ताओं के सहस्रखण्ड करने जायेंगे, तो हिंसक तो वे बाद में बनेंगे; किन्तु अपने भक्त के पक्षपाती बनकर एवं उसके विरोधी के प्रति द्वेषभाव करके वे जिनेन्द्रदेव के पद की पात्रता ही खो देंगे।

क्या हम कलिकालसर्वज्ञ स्वामी समन्तभद्र को भूल गये, जिन्होंने ‘आप्त-मीमांसा’ जैसे कालजयी-ग्रंथ में जिनेन्द्रदेव को भी परीक्षा के घेरे में लाकर उनकी छत्र-चँवर-भामण्डल आदि विभूतियों को भी पूज्यता का आधार नहीं माना है और न ही शतेन्द्र-पूजित-चरण होने से अर्हन्तदेव को पूज्य माना है। बल्कि ‘मात्र वीतरागता आदि लोकोत्तर-गुणों के कारण ही उनकी पूज्यता सिद्ध की है।’

क्या हम जिनशासन की रक्षा के लिये अपने सगे भाई का प्राणोत्सर्ग अपनी आँखों से देखकर भी विचलित नहीं होनेवाले और एक धागे मात्र के कारण वीतरागता नष्ट होने की बात कहकर जिनबिम्ब को लांघ जानेवाले तार्किक-शिरोमणि भट्ट अकलंकदेव को भी भूल गये हैं?

इसीतरह के क्षुद्र-स्वार्थी-दृष्टिकोण के कारण जैनत्व की हानि हुई है। शान्तिधारा के समर्थक लोग अन्य मतियों के हिंसक-बलि लेकर प्रसन्न होनेवाले रागी-देवों आदि की तरह तामसिक-मानसिकता के रूप में वीतरागी जिनेन्द्रदेव को मानने लगे हैं। अन्यथा उनसे ‘मेरे शत्रुओं को मार दो, उनके टुकड़े टुकड़े कर दो’ - जैसे लोकनिंद्य-वचन बोलकर भी उसे ‘शान्तिधारा’ नाम नहीं देते। इसी से स्पष्ट है कि इन शान्तिधारा वालों को न तो ‘शान्ति’ शब्द का अर्थ पता है और न ही जिनेन्द्रदेव की ‘वीतरागता’ का इन्हें अभिप्राय ज्ञात है। ये सब तो उस अंधे भक्त की तरह हैं, जो मील के पत्थर (माइल-स्टोन) को ही टटोलकर शंकरजी की पिंडी मानकर उस पर जल चढ़ाकर ‘मैंने शंकरजी की पूजा की’ - ऐसा भ्रम पालता है। बल्कि वह तो आँखों से अंधा होने के कारण कदाचित् फिर भी क्षम्य हो सकता है; किन्तु ये शान्तिधारा करनेवाले तो उस जन्मांध-व्यक्ति से भी गये-बीते हैं, जो कि जिनेन्द्रदेव को वीतरागता आदि लोकोत्तर-गुणों से युक्त कहते हुये भी अतिसाधारण सांसारिक रागी-द्वेषी क्षुद्र-देवों के समान अपेक्षायें वीतरागी जिनेन्द्रदेव से भी कर हैं?

शान्तिधारा की यह प्रवृत्ति जैनदर्शन एवं जिनेन्द्रदेव के मूल-स्वरूप को विकृत करनेवाली आत्मघाती-चेष्टा है, जिसे क्षुद्र-परिग्रह के लोभी ये शान्तिधारा के समर्थक अन्धभक्ति में सोच तक नहीं रहे हैं।

अब बिना किसी भूमिका के मैं शान्तिधारा के अन्य-पाठों को मूलतः प्रस्तुत करते हुये समीक्षा लिख रहा हूँ।

‘‘तव भक्ति-प्रसादात् लक्ष्मी-पुर-राज्य-गेह-पद-भ्रष्ट-उपद्रवं, दारिद्र्य-उद्भव-उपद्रवं, स्वचक्र-परचक्र-उद्भव-उपद्रवं, प्रचण्ड-पवन-अनल-जल-उद्भव-उपद्रवं, शाकिनी-डाकिनी-भूत-पिशाच-कृत-उपद्रवं, दुर्भिक्ष-व्यापारवृद्धिरहित-उपद्रवाणां विनाशनं भवतु।’’

अर्थ - (हे जिनेन्द्रदेव!) आपकी भक्ति के प्रसाद (कृपा या फलस्वरूप) से-

  1. जो लोग लक्ष्मी अर्थात् धन-सम्पत्ति, पुर अर्थात् नगर से भ्रष्ट हो गये हैं (अपना पैतृक-नगर जिनका छूट या छिन गया है),

  2. राज्य से भ्रष्ट जो राजा है (अर्थात् जिनका राज्य छिन गया है),

  3. गेह अर्थात् पैतृक-भवन/मकान जिनका छिन गया है,

  4. जो अपने पद से भ्रष्ट हो गये हैं (अर्थात् जिनका पद छिन गया है)

  • इत्यादि के कारण हुये कष्ट से जो पीड़ित हैं (इसी पीड़ा को यहाँ ‘उपद्रव’ शब्द से संकेतित किया गया है), उनकी पीड़ा का;
  1. जो दरिद्रता के कारण उत्पन्न हुई पीड़ा से युक्त हैं, उनकी पीड़ा का;

  2. जो स्वचक्र अर्थात् अपनी नीति (प्लानिंग) की असफलता के कारण अथवा परचक्र अर्थात् दूसरे की नीति (प्लानिंग) सफल हो जाने के कारण उत्पन्न हुई पीड़ा से युक्त हैं,

  3. प्रचण्ड-वायु के कारण, या अग्नि के कारण, या जल के कारण उत्पन्न हुई पीड़ा से युक्त हैं,

  4. जो शाकिनी-डाकिनियों के अथवा भूतों-पिशाचों के द्वारा किये जानेवाले उपद्रवों से उत्पन्न हुई पीड़ा से युक्त हैं,

  5. जो दुर्भिक्ष (अकाल पड़ना, पानी नहीं बरसना, या बहुत अधिक बरसना, टिड्डीदल का आक्रमण होने से फसल नष्ट हो जाना आदि) के उपद्रवों से उत्पन्न हुई पीड़ा से युक्त हैं,

  6. जो व्यापारवृद्धि नहीं होने अर्थात् व्यापार में लाख-प्रयत्नों के बाद भी बढ़ोतरी नहीं होने रूप उपद्रवों से उत्पन्न हुई पीड़ा से युक्त हैं:

ऐसे लोगों को (अर्थात् शान्तिधारा करनेवालों की मुख्यता से, न कि गौणरूप से अन्य लोगों को) इन कारणों से जो पीड़ा/कष्ट उत्पन्न हुआ है, उसका निवारण होवे, अर्थात् ‘हे भगवन्! आप इन सब समस्याओं का निबटारा कीजिये (और हम जैसे चाहते हैं, सब कुछ वैसा कर कीजिये)।’

आप विचार कीजिये कि क्या यह सब कर्तावाद की पराकाष्ठा नहीं है? यह तो वैदिकों में होता है कि भक्त कुछ भी कर्म-कुकर्म करें, गड़बड़-घोटाला करें और जब उनसे बंधे कर्मों का उदय आये और प्रतिकूल-संयोग मिलें, तो वे भगवान् को कुछ भोग लगाकर उनसे माँगते हैं कि ‘भगवन्! हमारे जो भी कष्ट हैं, वे सब आप दूर कर दो।’ इसीतरह यहाँ भक्ति के नाम पर शान्तिधारा का कर्मकांड करके भगवान् से सारी सुविधायें माँगी जा रही हैं? अपने कर्म सुधारने की जगह समाज को कर्मकांड में उलझाया जा रहा है?

क्या यह सत्य नहीं है कि जो भी प्रतिकूलतायें आयी हैं, वे सब हमारे अप्रशस्त-कर्मों के ही दुष्परिणाम-स्वरूप हुईं हैं? जब उनके जिम्मेवार हम स्वयं हैं, तो उन्हें ठीक करने का जिम्मा भगवान् को क्यों सौंपा जा रहा है?

रही बात भूत-प्रेतादिक की, तो यह चिरंतन-सत्य जानना कि ‘सम्यग्दृष्टि-जीवों को उनकी देह में प्रवेश करके ये व्यंतरादि कभी कोई कष्ट नहीं दे सकते हैं।’ ऐसा यदि होता है (अर्थात् किसी की देह में प्रवेश करके या उसे काबू करके कोई व्यंतरादि कुछ भी कष्ट देता है), तो यह सुनिश्चितरूप से जान लेना कि वह व्यक्ति सम्यग्दृष्टि नहीं है।

इसलिये यदि मिथ्यात्व के कारण ये सब घटनायें व पीड़ायें हो रहीं हैं, तो भाई मेरे, पहले इस मिथ्यात्वरूपी बैरी का इलाज करो। तुम तो शान्तिधारा के कर्मकांड में फँसकर उल्टे ‘गृहीत-मिथ्यात्व’ बाँध रहे हो? मिथ्यात्व छोड़ो, तो ये सब प्रतिकूलतायें अपने आप बदल जायेंगीं। किसी से निवेदन या याचना करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि सम्यग्दृष्टि-जीवों को ऐसी पीड़ायें कभी नहीं होती हैं।

कदाचित् बाहरी-संयोग में ये पूर्वजन्म के बैर के कारण कुछ विपरीत-संयोगादि करें भी, तो सम्यग्दृष्टि-जीव उनसे प्रभावित ही नहीं होता है। जैसे कि मुनि-अवस्था में पार्श्वनाथ को कमठ के उपसर्गों से कोई विचलितता नहीं हुई और उन्होंने उस उपसर्ग के शमनार्थ किसी से शान्तिधारा भी नहीं करायी थी। उल्टे कमठ ही अपने आक्रोश की निष्फलता देखकर वह सारे उपद्रव छोड़कर आत्मजयी पार्श्वनाथ के चरणों में समर्पित हो गया था, यह आप सभी जानते ही हैं।

मेरे आत्मीयजनो! मैं किसी भी ईर्ष्या या विद्वेषभाव से आपको यह सब नहीं लिख रहा हूँ। बल्कि इस अत्यन्त-दुर्लभ मनुष्यभव को इन व्यर्थ के गृहीत-मिथ्यात्व बढ़ानेवाले कर्मकांडों और आडम्बरों में बर्बाद मत करो, आत्महित करो। उसी से सच्ची व स्थायी-शांति की प्राप्ति होगी, यह नरभव सफल करने की मार्मिक-प्रेरणा मेरा सात्त्विक-उद्देश्य है।

यह आप सब जान लीजिये (वैसे सुना व पढ़ा तो अनेकों बार है ही) कि ‘अपनी सुध भूल आप, आप दुःख उपायो’ अर्थात् इस जीव वे अपने स्वरूप को भूलकर ही आज तक अनेकविध दुःख भोगे हैं।

क्या आप यह जानते हैं कि सम्यग्दृष्टि-जीव के सभी पाप-प्रकृतियों का नवीन-बंध रुक जाता है और जब नवीन पाप-प्रकृतियों का बंध ही नहीं होगा, तो फिर उनका उदय कहाँ से आयेगा? और जब नवीन पाप-प्रकृतियों का उदय ही नहीं होगा, तो ऐसे विपरीत-संयोगादि कहाँ से व कैसे बनेंगे कि इतने प्रकार की प्रतिकूलतायें मिलें, प्रतिकूल-संयोग मिलें और उनको दूर करने के लिये किसी से प्रार्थना करना पड़े?

पूर्वबद्ध-पापकर्मों का उदय भले ही बने, पर सम्यग्दृष्टि-जीव उनका भी ज्ञाता रहकर शांतभाव से निजानंद-अमृतरूपी शान्तिधारा की शीतलता में निमग्न रहता है। वे दुःसंयोग उसे विचलित ही नहीं कर पाते हैं कि उसे किसी से उन्हें दूर करने की चिरौरी करनी पड़े और उसके लिये जिनाम्नाय के विपरीत कोई शान्तिधारा जैसा कर्मकांड करना पड़े?

अष्टप्रातिहार्य और शान्तिधारा ? :-

कई लोग छत्रत्रय, भामण्डल आदि प्रातिहार्यों से मंडित होने के कारण भगवान् को बड़ा/महान् मानते हैं और शान्तिधारा में उनका उल्लेख करते हुये शान्तिधारा करते हैं। उन्हें शायद ऐसा लगता है कि इन छत्रत्रय, भामण्डल आदि के कारण ही जिनेन्द्रदेव की पूज्यता व महत्ता है। परन्तु सर्वश्रेष्ठ न्यायवेत्ता व तर्कवागीश कलिकालसर्वज्ञ आचार्य समन्तभद्र स्वामी ‘आप्तमीमांसा’ नामक ग्रंथ में स्पष्ट लिखते हैं कि -

‘‘देवागम-नभोयान, चामरादि-विभूतयः।
मायाविष्वपि दृश्यन्ते, नातस्त्वमसि नो महान्।।’’

अर्थात् हे जिनेन्द्रदेव! आपके पास सौ सौ इन्द्रगण दर्शनार्थ आते हैं, छत्रत्रय-चौंसठ चँवर-भामण्डल आदि विभूतियों के कारण आप हमारे लिये महान् नहीं हो; क्योंकि ये विभूतियाँ तो मायावियों के पास भी देखी जाती हैं।

अतः स्वामी समन्तभद्र के अनुयायी होकर भी हम उनके वीतरागता आदि लोकोत्तर-गुणों का बहुमान न करके बाहरी-वैभव की महिमा करेंगे, तो यह जिनेन्द्रदेव की विराधना या अपमान है। इसलिये शान्तिधारा कोई धार्मिक-अनुष्ठान नहीं, बल्कि जिनेन्द्रदेव का अवर्णवाद है। ‘दर्शन-मोहनीय-कर्म’ के तीव्रतम स्थिति-अनुभाग के बंध का कारण है।

यह नरभव अत्यन्त-दुर्लभ है। इसे भोगों की आकांक्षा में गँवाना कौवे उड़ाने के लिये चिंतामणि-रत्न फेंकने के समान नितान्त-मूर्खतापूर्ण कार्य है।

‘शान्तिपाठ’ और ‘शान्तिधारा’ : तुलनात्मक अध्ययन :-

इस क्रम में मुझे पूजनविधि में पढ़े जानेवाले ‘शान्तिपाठ’ एवं शान्तिधारा का तुलनात्मक-विवेचन करते हुये यह स्पष्ट करना है कि कुछ बातें दोनों में समान दिखतीं हैं, फिर भी ‘शान्तिपाठ’ को मान्य किया जाये और ‘शान्तिधारा’ में दोष बताये जायें - इसका तात्त्विक-कारण क्या है? क्या यह मतभेद किसी पूर्वाग्रह की देन है? अथवा इनमें आधारभूत-अन्तर हैं - यह मैं सप्रमाण और निष्पक्ष होकर यहाँ तथ्यात्मक-रीति से प्रस्तुत करूँगा।

यहाँ मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ‘देव-वन्दना-विधि’ के विषय में मैंने सन् 1997 में ‘नमन और पूजन’ नामक पुस्तक लिखी थी। उसमें ‘देव-वन्दना-विधि’ के प्रत्येक अंगोपांग पर आगमिक-प्रमाण देते हुये उनकी सार्थकता प्रमाणित की थी।

उसमें यह सिद्ध किया था कि जो हम पूजन आदि करते हैं, वह सब ‘चउवीस-तित्थयर-थुदि’ नामक भक्ति के अन्तर्गत आता है तथा जो हम ‘शान्तिपाठ’ पढ़ते हैं, वह ‘शान्तिभक्ति’ एवं ‘समाधिभक्ति’ के अन्तर्गत आता है।

यहाँ मैं स्पष्ट कर देना आवश्यक समझता हूँ कि आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने स्वयं ‘दसभत्तिसंगहो’ नामक ग्रंथ लिखा है, जिसके अन्तर्गत ‘चउवीस-तित्थयर-थुदि’ या ‘चउवीस-तित्थयर-भत्ती’ एवं ‘शान्तिभक्ति’ तथा ‘समाधिभक्ति’ आती हैं। इनके अतिरिक्त ‘णंदीसरभत्ती’ (नन्दीश्वर-भक्ति), ‘सिद्ध-भत्ती’ (सिद्ध-भक्ति) आदि भक्तियाँ भी हैं। जैन-श्रावकाचार एवं श्रमणाचार के अन्तर्गत की जाने वाली चर्याओं में इन सभी दसों भक्तियों के प्रयोग (जहाँ जिस भक्ति की आवश्यकता है, वहाँ उसी भक्ति के प्रयोग) का प्रावधान मिलता है और इनका प्रयोग अत्यन्त-मनोवैज्ञानिक भी है। यहाँ उनके अति-विस्तार में 'न जाते हुये मैं मात्र इतना कहना चाहता हूँ कि इनकी रचना एवं प्रयोग का प्रावधान स्वयं युगप्रधान आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने किया है, अतः यहाँ उनका उल्लेख ही इनके प्रयोग की प्रामाणिकता के लिये पर्याप्त मानता हूँ; क्योंकि जैनशासन में आचार्य कुन्दकुन्द देव स्वयं प्रामाणिकता के मानक हैं, उनका उल्लेख आ जाने के बाद उस विषय के लिये प्रमाणित करने की आवश्यकता नहीं रह जाती है।

अस्तु, यहाँ मैं यह बताना चाहता हूँ कि आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने जिन दस-भक्तियों का निर्माण किया है, उनमें जो ‘शान्तिभक्ति’ और ‘समाधिभक्ति’ हैं, उन दोनों का सम्मिलितरूप ही आज का ‘शान्तिपाठ’ है। और ‘देव-वन्दना-विधि’ के अन्तर्गत अन्त में इन दोनों भक्तियों के किये जाने का प्रावधान जिनाम्नाय में है। और शान्तिपाठ भी ‘देव-वन्दना-विधि’ या जिनेन्द्र-पूजनविधि के अन्त में ही किया जाने वाला कार्य है। अतः इसकी वहाँ उपादेयता तो असन्दिग्ध है ही। बस यहाँ देखने की बात यह है कि शान्तिपाठ में ये दोनों भक्तियाँ कैसे आतीं हैं? यह स्पष्ट किया जाये। और शान्तिधारा के पाठ में कौन से वे पाठ हैं, जिनका प्रयोग शान्तिपाठ में भी मिल रहा है? और यदि शान्तिपाठ में भी वे (कुछ ही सही) पाठ समान हैं, तो शान्तिधारा की विधि और उसके पाठ का निषेध क्यों किया जा रहा है?

वस्तुतः ‘शान्तिधारा’ में कोई भी ऐसा वाक्य नहीं है, जो शान्तिपाठ के किसी भी वाक्य से ज्यों का त्यों मिलता हो। कुछ शब्द मिलते हैं, पर अभिप्राय तो संपूर्ण-वाक्य से ही लिया जा सकता है और असली मतभेद तो अभिप्राय का ही तो है। जैसे कि लोक के दो वाक्य लीजिये, और इस मर्म के समझिये। ‘नृत्य-गीत-संगीत आदि करनेवालों को मारकर भगा दो’, ‘परीक्षा के दिनों में नाचना-बजाना-गाना, ये बुरी प्रवृत्तियाँ हैं।’, इन दोनों वाक्यों में ‘नाचना-बजाना-गाना’ के वाचक शब्द समान (कॉमन) हैं। किंतु दोनों का अभिप्राय भिन्न है और शब्दों की शैली भी नितान्त-भिन्न ही है। तो क्या दोनों वाक्यों को समान कहा जा सकता है? कदापि नहीं। पहले वाक्य में नृत्य-गीत-संगीत आदि करने वालों को मारकर भगा देने का आदेश दिया गया है; क्योंकि शायद ये कार्य इस आदेश देनेवाले को पसंद नहीं रहे होंगे। जबकि दूसरे वाक्य में किसी उद्देश्य-विशेष से इन कार्यों को निश्चित-अवधि तक न करने की सलाह दी गयी है। ठीक यही अन्तर शान्तिपाठ और शान्तिधारा के वाक्यों और उनके अभिप्रायों में भी है। अतः शब्द-साम्य के आधार पर इन दोनों पाठों के वाक्यों को एकसमान कदापि नहीं कहा जा सकता है। आइये, तुलनात्मक रूप से इसे परखते हैं:

‘शान्तिपाठ’ में:

शान्ति-जिनेश शांति-सुखदाई। जगत्पूज्य पूजौं सिरनाई।
परम-शांति दीजै हम सबको, पढ़ैं सुनैं पुनि चार-संघ को।।
होवै चोरी न जारी, सुसमय वर्ते, हो न दुष्काल भारी।
सारे ही देश धारैं जिनवर-वृष को, जो सदा सौख्यकारी।।

‘शान्तिधारा’ में:

‘ओं नमो अर्हते भगवते श्रीशान्तिनाथाय जगच्छान्तिकराय सर्व-विघ्न-प्रणाशनाय सर्व-रोग-अपमृत्यु-विनाशकाय सर्व-परकृत-क्षुद्रोपद्रव-विनाशकाय सर्व-क्षामर-डामर-विघ्न-विनाशकाय…सर्व-शान्तिं तुष्टिं पुष्टिं च कुरु कुरु।’

गौर से देखिये, दोनों में निम्नलिखित-बिन्दुओं में समानता है:

  1. दोनों में शान्तिनाथ भगवान् को वंदन किया गया है।

  2. दोनों में लौकिक बिन्दुओं पर शान्ति की बात कही गयी है।

किन्तु निम्नलिखित-बिन्दुओं में दोनों में आमूलचूल-भिन्नता भी है:

  1. ‘शान्तिधारा’ के पाठ में शान्तिनाथ भगवान् को मात्र लौकिक शान्ति-कारक कहा गया है।

जबकि ‘शान्तिपाठ’ में शान्तिनाथ भगवान् को ‘त्रिलोकपूज्य’ कहकर उनकी गुणात्मक-प्रतिष्ठा बतायी गयी है।

  1. शान्तिधारा के पाठ में शान्तिनाथ भगवान् को मात्र लौकिक शान्ति-कारक और ‘विघ्नविनाशक’ कहकर उनसे ‘शान्ति एवं विघ्नों को दूर करने’ की अपेक्षा की गयी है।

जबकि ‘शान्तिपाठ’ में पहले शान्तिनाथ भगवान् की पूजा करनेवालों को, उसे पढ़ने और सुननेवालों को, चतुर्विध-संघ को शान्ति की अपेक्षा की गयी है।

  1. ‘शान्तिधारा’ के पाठ में विघ्नकर्ताओं का उल्लेख करके उनके द्वारा किये जाने वाले विघ्नों को दूर करने की अपेक्षा की गयी है।

जबकि ‘शान्तिपाठ’ में चोरी-व्यभिचार आदि पाप नहीं होवें, ताकि कोई नैतिक और मानसिक कष्ट की स्थिति न बने; तथा प्राकृतिकरूप से भी दुष्काल आदि की स्थिति नहीं बनने की भावना किसी भौतिक-स्वार्थ से व्यक्त न करके 'सभी लोग वीतरागी जिनेन्द्र-परमात्मा के द्वारा उपदिष्ट समीचीन-जैनधर्म का अनुपालन करने में अग्रसर हों - इस भावना से प्राकृतिकरूप से शान्ति की भावना की गयी है।

‘शान्ति’ की भावना ‘समाधि’ में पर्यवसित हो, तभी वह सार्थक हो सकती है। अन्यथा वह एक रागात्मक-अभिव्यक्ति अर्थात् ‘याचना’ के अलावा और कुछ नहीं सिद्ध हो सकेगी। इसीलिये ‘शान्तिपाठ’ में ‘शान्तिभक्ति’ के साथ-साथ ‘समाधिभक्ति’ को भी सम्मिलित किया गया है।

जब भक्त ‘शान्तिभक्ति’ के रूप में अपने व अन्य सभी जिनधर्म-भक्तों से लेकर राजा, प्रजा, प्रकृति और पर्यावरण तक की शान्ति की सदिच्छा व्यक्त कर लेता है; तो उसके तुरन्त बाद वह स्वयं में शान्ति की स्थापना के लिये परोन्मुखी नहीं रहता है। उतनी भावना व्यक्त करने के बाद वह आचार्य कुन्दकुन्ददेव द्वारा निर्दिष्ट ‘स्वरूप में समाधि’ की दिशा में अपने को अग्रसर करता हुआ जो स्वाधीन-भाव व्यक्त करता है, उनकी छाया तक ‘शान्तिधारा’ के पाठ में कहीं दिखाई नहीं देती है। देखिये -

शास्त्रों का हो पठन सुखदा, लाभ सत्संगति का।
सद्वृत्तों का सुयश कहके, दोष ढाँकूँ सभी का।।
बोलूँ प्यारे वचन हित के, आप का रूप ध्याऊँ।
तोलौं सेऊँ चरण जिन के, मोक्ष जोलौं न पाऊँ।।
तव पद मेरे हिय में, मम हिय तेरे पुनीत चरणों में।
तबलौं लीन रहौं प्रभु! जबलौं न पाया मुक्ति-पद मैंने।।

इनके शब्द विनय-युक्त होने से भक्तिपरक हैं; क्योंकि साक्षात् अरिहंतदेव के समक्ष अपने को रखकर भक्त यह भावना व्यक्त कर रहा है, अतः शब्दावलि विनय-युक्त होना स्वाभाविक भी है और अनिवार्य-शिष्टाचार भी है। किन्तु अभिप्राय में कहीं भी परापेक्षा या पराधीनता की गन्ध तक नहीं है। देखिये - 1. ‘शास्त्रों का हो पठन सुखदा’, यह कहकर वह कहीं यह संकेत तक नहीं करा रहा है कि ‘‘भगवान् मुझे शास्त्रों का पठन करायें या ऐसा आशीर्वाद दें कि मैं शास्त्रों का पठन कर सकूँ।’’ बल्कि वह यह भावना व्यक्त कर रहा है कि ‘‘मैं अब शास्त्रों का इस विधि से स्वाध्याय करूँगा, जो कि मुझे सुखदायक बने; न कि मात्र पुण्य को बढ़ानेवाला।’’ 'सुखदायक तो तभी होगा, जब उस स्वाध्याय के द्वारा वह स्वावलंबनपूर्वक आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त कर लेगा; क्योंकि सुखदायक-तत्त्व तो तीनों लोगों और तीनों कालों में स्वयं ही है। आत्मानुभूति के अतिरिक्त कहीं और सुख की प्राप्ति संभव ही नहीं है और आत्महितकारी-जिनवाणी का स्वाध्याय करना ही आत्मानुभूति की दिशा में पहला कदम होता है। आचार्यप्रवर स्वामी कार्तिकेय लिखते हैं:

‘जो जिणवयणं णिसुणदि, भेदं जाणादि जीव-देहाणं।’

अर्थात् जो भव्यजीव जिनेन्द्रदेव के भवान्तक-वचनों को सुन लेता है, वह शरीर और आत्मा का भेदविज्ञान करके आत्मानुभूति प्राप्त कर लेता है।

  1. इसके बाद वह भावना व्यक्त करता है कि ‘लाभ सत्संगति का’ अर्थात् यदि मुझे जिनवाणी का स्वाध्याय करने पर भी समाधि अर्थात् आत्मानुभूति की प्राप्ति नहीं हो सकेगी, तो ‘‘मैं सज्जनों अर्थात् आत्मानुभवी ज्ञानी-पुरुषों एवं सदाचारी जनों की संगति में रहूँगा।’’ ताकि उनके सान्निध्य में रहकर उनकी चर्चा और चर्या से मुझे जिनवाणी का स्वाध्याय करने पर भी जो कमी रह गयी है, जिसके कारण मैं आत्मानुभूति की दिशा में सफल नहीं हो पाया हूँ, उसका निरीक्षण-परीक्षण करके मैं समाधि अर्थात् आत्मानुभूति की दिशा में सफल होने का प्रयास करूँगा। वास्तव में तो ‘सत्’ स्वभावी आत्मा की संगति का लाभ ही ‘सत्संगति’ है।

  2. यदि इस दूसरे प्रयास से भी मुझे समाधि अर्थात् आत्मानुभूति की दिशा में सफलता अर्जित नहीं हुई, तो ‘सद्वृत्तों का सुयश कहके’ अर्थात् मैं आत्मानुभूति प्राप्त कर चुके महापुरुषों के आत्मानुभूतिमय जीवनचरित्र का बोलकर कथन करूँगा; क्योंकि मन ही मन में जो कहा जाता है, उससे अधिकांशत: अपनी कमी पकड़ में नहीं आती है और फिर यह कहकर वह बुरी-बातों और बुरे काम करनेवालों की चर्चा तक नहीं करने का संकल्प व्यक्त कर रहा है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि वह मात्र आत्मानुभूति कर चुके या आत्मानुभूति में लीन महापुरुषों को ही ‘सद्वृत्त’ या सदाचारी कह रहा है। क्योंकि जिस व्यक्ति का जो लक्ष्य होता है, वह उसी लक्ष्य में सफल हो चुके व्यक्ति को ही अपना आदर्श या रोलमॉडल बनाता है। इसीलिये यहाँ ‘सद्वृत्त’ शब्द से बाहरी देहाश्रित-सदाचार या पुण्यभाव कदापि ग्राह्य नहीं है। उनका निषेध भी नहीं है; किन्तु लक्ष्य में मात्र आत्मानुभवी-जीव ही हैं, अन्य कोई नहीं।

  3. इसके बाद वह भावना व्यक्त करता है कि ‘दोष ढाँकूँ सभी का’ अर्थात् मैं अपनी दृष्टि को इतना परिष्कृत कर लूँ कि मुझे किसी में दोष दिखाई ही नहीं पड़ें और कदाचित् कोई प्रकट-दोष कर भी रहा हो, तो वह उस दोष पर अपनी दृष्टि नहीं से जाये; बल्कि गुणों पर ही अपनी दृष्टि केन्द्रित रखूँ। यह बहुत ही मनोवैज्ञानिक-कथन है; क्योंकि जिसका लक्ष्य परमशुद्ध ज्ञायक भगवान् आत्मा हो और जो सभी को उसी दृष्टि से देखता हो, उसे दूसरों के दोष कहाँ से दिखाई पड़ सकते हैं? और यदि कदाचित् दिखाई पड़ भी जायें, तो वह तत्काल उनसे अपनी दृष्टि हटाकर गुणों पर केन्द्रित कर लेगा। क्योंकि ज्ञानी-पुरुष तो सदा यही कहते हैं कि ‘‘यदि मैंने किसी को पर्याय की दृष्टि से देखा हो, तो वह मुझे क्षमा करे।’’ क्योंकि पर्याय की दृष्टि में ही दोष दिखाई देना संभव हैं। द्रव्य-दृष्टिवालों को कहीं कोई दोष दिखाई ही नहीं देता। क्योंकि ध्रुव ज्ञायक-द्रव्य, जो दृष्टि का विषय होता है, उसमें विकार या दोष कभी स्पर्श तक नहीं कर सकता है। इसी भावना को वह ‘दोष ढाँकूं सभी का’ कहकर व्यक्त कर रहा है।

  4. इतना करने के बाद भी यदि कदाचित् परिणति स्वरूप में समर्पित नहीं हुई, तो वह भक्त विनयपूर्वक कहता है कि ‘बोलूँ प्यारे वचन हित के’ अर्थात् मैं वचनों का प्रयोग उतना ही सीमित करूँगा, जो आत्महितकारी हों। अन्य व्यर्थ का अपलाप मैं अब नहीं करूँगा। अरे! क्या आप जानते हैं कि ‘सिद्धचक्र-विधान के मांडले पर केन्द्र में सारी वर्णमाला के अक्षर क्यों अनिवार्यतः लिखे जाते हैं? यही भावना वहाँ भी निहित है कि हमने अपनी सारी वर्णमाला सिद्ध-भगवन्तों को समर्पित कर दी है। तो अब जब तक विधान पूर्ण नहीं हो जाता है, तब तक हम अन्य कोई सांसारिक-चर्चा नहीं करेंगे, क्योंकि हमने अपनी वर्णमाला सिद्ध-भगवन्तों को समर्पित कर दी है।’

इसीप्रकार यह भक्त भी कह रहा है कि हे भगवन्! अब स्वरूप में समाधि अर्थात् आत्मानुभूति करने के लिये मैंने अपने को पूर्णतः समर्पित कर दिया है, अतः कोई वचन-प्रयोग भी अब होगा, तो वह आत्महितकारी ही होगा, अन्य यद्वा-तद्वा नहीं।

  1. इसके बाद वह अगला संकल्प व्यक्त करता है कि ‘आप का रूप ध्याऊँ’ अर्थात् ‘आप’ का यानि आत्मा का स्वरूप ध्याऊँगा अर्थात् आत्मध्यान ही करूँगा। मन-वचन-कर्म को इतना मर्यादित करने के बाद अब और कुछ संभव ही नहीं है।

  2. फिर वह भक्त विनयपूर्वक कहता है कि '‘तोलौं सेऊँ चरण ‘जिन’ के, मोक्ष जोलौं न पाऊँ’ अर्थात् तब तक जिनेन्द्र देव के चरणों की सेवा तब तक निरन्तर करूँगा, जब तक मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती? नहीं, यहाँ ‘‘जिन के चरण सेऊँ’’ का यह अर्थ नहीं है कि पैरों की सेवा करूँ। ‘चरण’ शब्द आचरण या चारित्र जिनाम्नाय में बहुत प्रचलित है। देखिये -

‘सम्मद्दंसण-णाणं चरणं मोक्खस्स कारणं जाणे’

‘सम्यग्दर्शन ज्ञान-चरण-जुत’

ऐसे हजारों प्रयोग प्रचलित हैं, जिनसे आप सुपरिचित हैं। उसी अभिप्राय से यहाँ यह कथन है। ‘जिन’ के चरण सेऊँ - यह कहकर वह कहना चाहता है कि जैसी अविचल-आत्मानुभूति रूप चर्या जिनेन्द्रदेव की है, मैं भी अपने जीवन में जिनेन्द्रदेव के आचरण की तरह ही अपना आचरण बनाना चाहता हूँ अर्थात् स्वरूप से बाहर आऊँ ही नहीं - ऐसी अविचल-आत्मानुभूति अब मेरा लक्ष्य होगा।

  1. तव पद मेरे हिय में, मम हिय तेरे पुनीत चरणों में।
    तबलौं लीन रहौं प्रभु! जबलौं न पाया मुक्ति-पद मैंने।।
  • यह कहकर वह भक्त अपनी ‘समाधिभक्ति’ की भावना को परिपूर्णता देना चाहता है कि हे जिनेन्द्रदेव! तुम्हारा अविचल-आत्मानुभूतिरूप ‘पद’ मेरे हृदय में मानों टंकोत्कीर्ण हो चुका है और मेरा हृदय भी अब उसी अविचल-आत्मानुभूति रूप ‘पद’ के प्रति समर्पित है और यह प्रक्रिया तब तक मैं निरन्तर गतिशील रखने का संकल्प लेता हूँ कि जब तक अविचल-आत्मानुभूति रूप मोक्ष-दशा मेरा जीवन नहीं बन जाती है।

  • यह ‘समाधि-भक्ति’ की जो उत्कृष्टतम-भावना ‘शान्तिपाठ’ में निहित है, इसकी कहीं छाया भी ‘शान्तिधारा’ के पाठ में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती है।

इतनी उत्कृष्टतम-भावना वाले शान्तिपाठ को नियमितरूप से करनेवाले भक्तजनों को शान्तिधारा जैसे जिनाम्नाय से अत्यन्त दूर कर्मकांड को करने की आवश्यकता ही क्या है?

यदि विश्वशांति की भावना व्यक्त करना है, तो वह तो यहाँ सर्वोत्तम-रूप में व्यक्त ही हो रही है। फिर कोरे कर्तावाद की पोषक शान्तिधारा पढ़ने और करने की आवश्यकता ही क्या है?

यदि आप जिनेन्द्रदेव या यन्त्रजी पर जलधारा करने को बड़ा काम मानते हैं? तो यह आपका पूर्णतः अज्ञानभाव है, भ्रम है। जिनाम्नाय में कहीं भी अनावश्यकरूप से जल ढोलना निषिद्ध है, तो जिनेन्द्रदेव या यन्त्रजी पर इसकी छूट कैसे हो सकती है और फिर इसतरह से बननेवाला अतिरिक्त गन्धोदक का क्या होगा? वह क्या कहीं विसर्जित नहीं करना पड़ेगा। वह क्या अविनय नहीं है? ऐसे और भी कई आपत्तिजनक बातें इसे करने में निहित हैं।

कहाँ तक कहूँ, लिखता रहूँ, तो अभी बहुत लिख सकता हूँ। परन्तु विषय को मर्यादित करने की दृष्टि से इतना ही कहकर विश्राम लूँगा कि इतिहास, धर्म-दर्शन, विवेक और सदाचार, किसी भी दृष्टि से शान्तिधारा जिनाम्नाय-सम्मत नहीं है। जो जिद करके अपने सांसारिक-क्षुद्र-स्वार्थों की पूर्ति इसके द्वारा करना चाह रहे हैं, वे सभी जिनाम्नाय की मर्यादा का उल्लंघन ही कर रहे हैं। ○○○

शान्ति की कामना या शान्ति की भावना?

लोक में कुछ लोग मनोरंजन के नाम पर विभिन्न प्रकार के कोलाहलों को अपनाकर अपने लिये सुकून तलाशते हैं, परन्तु उन्हें बाद में यह समझ आता है कि सुकून कोलाहलों में नहीं है, बल्कि शांति में ही निहित है।

इसीलिये बड़े-बड़े साधक पहले बाह्य-शांति में सुख की संभावना मानकर एकान्त-साधन करते हैं। पर इस विधि में उन्हें परिवेश में ‘सन्नाटा’ भले ही मिल जाये, किन्तु शांति नहीं मिलती।

मिल भी नहीं सकती; क्योंकि शांति आत्मिक-संवेदन है, उसे बाह्य-संसाधनों में ढूँढ़ना ही अज्ञानतारूप परिणति है। अन्ततः विवेकी-साधक ही आत्मिक-शांति को पहिचान पाता है, और उसके लिये वह लोक से भागता नहीं है, बल्कि लोकैषणा से स्वयं को अनासक्त करके अपने शांत-स्वभाव की शीतल-छाँव में उस शांति को प्राप्त कर लेता है।

शांति के आत्मिक-स्वरूप को एवं उसकी स्वाधीन-प्रक्रिया को जो समझ जाता है, उसे तीनों लोकों में न तो कोई अशांत कर सकता है और न ही वह किसी लौकिक-साधनों में शांति की तलाश करता है। क्योंकि वह समझ चुका होता है कि शांति ‘याचना’ की वस्तु नहीं है; बल्कि ‘भावना’ है, संवेदन है। इसके लिये वह स्वाधीन-प्रक्रिया ही अपनाता है; क्योंकि शांति का निधान स्वयं है, तो किसी अन्य से शांति पाने का अनुष्ठान वह क्यों करेगा। अतः वह शांति के लिये न तो याचना करता है, न ही अनुष्ठान करता है; बस एक दृढ़-निष्ठापूर्ण संकल्प करता है और शांति को पा लेता है। यही लोकोत्तर-विधि शांति का मनोरम-पथ है।

स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 38-65