शान्ति पाठ
हूँ शान्तिमय ध्रुव ज्ञानमय, ऐसी प्रतीति जब जगे।
अनुभूति हो आनन्दमय, सारी विकलता तब भगे॥1॥
निजभाव ही है एक आश्रय, शान्ति दाता सुखमयी।
भूल स्व दर-दर भटकते, शान्ति कब किसने लही॥2॥
निज घर बिना विश्राम नाहीं, आज यह निश्चय हुआ।
मोह की चट्टान टूटी, शान्ति निर्झर बह रहा॥3॥
यह शान्तिधारा हो अखण्डित, चिरकाल तक बहती रहे।
होवें निमग्न सुभव्यजन, सुखशान्ति सब पाते रहें॥4॥
पूजोपरान्त प्रभो यही, इक भावना है हो रही।
लीन निज में ही रहूँ, प्रभु और कुछ वाँछा नहीं॥5॥
(दोहा)
सहज परम आनन्दमय निज ज्ञायक अविकार।
स्व में लीन परिणति विषैं, बहती समरस धार॥6॥
॥ कायोत्सर्गं करोम्यहम् ॥
मूल पृष्ठ (छवि):
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह, पृष्ठ 97।
प्रूफरीडिंग बाकी है
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ४०० से ४०४
स्रोत: जैन विधि विधान (सं. पण्डित अभयकुमार जैन, अखिल भारतीय जैन युवा फैडरेशन), पृष्ठ १०८
