शब्दों में झांकती जैन संस्कृति | Shabdon Men Jhankati Jain Sanskriti

शब्दों में झांकती जैन संस्कृति

-प्रो. वीरसागर जैन

शोधकर्ता विद्वानों ने जैन संस्कृति को अत्यंत प्राचीन सिद्ध किया है | यह बात हमें जनभाषा के अनेक शब्दों में भी प्रतिबिम्बित होती दिखाई देती है | यद्यपि एकदम निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, अभी इनका और अध्ययन होना आवश्यक है, परन्तु हमारे दैनिक व्यवहार में इस तरह के अनेकानेक शब्दों का प्रयोग दिखाई देता है, जो अकारण नहीं हो सकता | हमें लगता है कि इनका जैन संस्कृति से बहुत गहरा सम्बन्ध है और वही विद्वानों के विचारार्थ प्रस्तुत है | यथा-

1. छानबीन- जैन लोग अनिवार्य रूप से सभी पेय पदार्थों (पानी, दूध, घी, तेल आदि) को छानकर काम में लेते हैं और सभी खाद्य पदार्थों (दाल, चावल, चीनी आदि) को बीनकर काम में लेते हैं | उनकी रसोई में निरन्तर छानबीन चलती रहती है | यह शुद्धता का आधार है |

2. खटकर्म- जैन लोग नित्य ही षट् आवश्यक कर्मों का पालन करते हैं, उनके बिना एक भी दिन नहीं व्यतीत करते | यह उसी का रूप है- षट्कर्म= खटकर्म |

3. अन्थऊ - यह शब्द संस्कृत के ‘अनस्तमित’ से बना है | इसका अर्थ है- सूर्य अस्त होने से पूर्व किया जाने वाला भोजन, शाम का भोजन |

4. चेला - चेल अर्थात् वस्त्र और जो वस्त्र-सहित हो उसे चेला कहते हैं | जैन संस्कृति के अनुसार गुरु वही हो सकता है जो पूर्णतः निर्वस्त्र हो | वस्त्रधारी कोई भी हो, गुरु नहीं हो सकता, चेला ही हो सकता है |

5. निकम्मा- जैन संस्कृति में सिद्धात्मा, शुद्धात्मा, या मुक्तात्मा को प्राकृत भाषा में ‘णिकम्मा’ या ‘निकम्मा’ कहा जाता है, क्योंकि वे सम्पूर्ण कर्मों से रहित हो जाते हैं |

6. लुच्चा- जैन संस्कृति में साधुओं को अपने हाथों से अपना केशलोंच करना होता है, वे किसी कैंची आदि उपकरण का प्रयोग नहीं करते, अतः उन्हें प्राकृत भाषा में ‘लुच्चा’ कहा जाता है | कालान्तर में साम्प्रदायिक विद्वेष के कारण इस शब्द का दुरुपयोग प्रारम्भ हुआ |

7. शायद - जैन लोग स्याद्वादी होते हैं, वे सदा ही प्रत्येक वाक्य में ‘स्यात्’ निपात का प्रयोग करना पसंद करते हैं | ‘शायद’ शब्द उसी ‘स्यात्’ का विकृत रूप जान पड़ता है ।

8. पूजा- प्रो. सुनीतिकुमार चटर्जी ने लिखा है कि ‘पूजा’ शब्द मूलतः द्रविड़ भाषा के ‘पूजे’ शब्द से आया है और उसका विग्रह है- पू + जे; जिसने पू अर्थात् पुष्प/राग को जे अर्थात् जीत लिया वही पूजा का योग्य है | तात्पर्य हुआ कि जो वीतरागी हो गया हो वही पूज्य हो सकता है, रागी नहीं |

9. शुद्धबुद्ध- जैन दर्शन के अनुसार भगवान् वही है जो वीतराग और सर्वज्ञ हो | रागी-द्वेषी और अल्पज्ञ भगवान् नहीं हो सकता | ‘शुद्धबुद्ध’ शब्द के द्वारा भगवान् के इन्हीं दो गुणों का सरलतापूर्वक बोध कराया जाता है | ‘शुद्ध’ अर्थात् वीतराग और ‘बुद्ध’ अर्थात् सर्वज्ञ |

10. सराक - यह एक जाति का नाम है जो प्रायः आदिवासी या पिछड़े क्षेत्रों में पाई जाती है | विद्वानों ने बताया है कि इसका ‘सराक’ नाम जैनों के ‘श्रावक’ शब्द से विकसित हुआ है ।

11. डिमरी- यह भी एक जाति का नाम है जो प्रायः पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है | विद्वानों ने बताया है कि इसका ‘डिमरी’ नाम जैनों के ‘दिगम्बरी’ शब्द से विकसित हुआ है।

12. झा/ओझा- ये भी जातिविशेष के उपनाम हैं जो प्रायः बिहार में पाई जाती है | विद्वानों ने बताया है कि इनके ‘झा’ एवं ‘ओझा’ नाम जैनों के ‘उवज्झाय’ शब्द से विकसित हुये हैं |

13. शर्मा- यह भी एक जातिविशेष का उपनाम है | विद्वानों ने बताया है कि इसका ‘शर्मा’ नाम जैनों के ‘श्रमण’ या ‘शर्मन’ शब्द से विकसित हुआ है |

14. जर्मनी- जर्मनी देश के एक प्रोफेसर ने विश्व संस्कृत सम्मेलन में बताया कि लोगों को ‘श’ को ‘ज’ बोलने की आदत है, जैसे कि विसडम- विजडम, ट्रांसिस्टर- ट्रांजिस्टर आदि; अतः वास्तव में उनके देश का असली नाम ‘जर्मनी’ नहीं है, अपितु ‘शर्मनी’ है और वहाँ के निवासियों का भी असली नाम ‘जर्मन’ नहीं ‘शर्मन’ है, क्योंकि पहले यहाँ श्रमण संस्कृति का प्रचलन था |

15. चौमूं/चाकसू- ये दोनों ग्रामों के नाम हैं जो राजस्थान में अभी मौजूद हैं | विद्वानों ने बताया है कि इनके ये नाम जैनों के ‘चातुर्मास’ या ‘चौमासा’ शब्द से विकसित हुये हैं | प्रतीत होता है कि पहले कभी इनके खुले स्थान में किसी जैन मुनि के चातुर्मास स्थापित हुये होंगे और ये गाँव बस गये होंगे |

16. अंडमान/निकोबार- प्रो. राजाराम जैन ने सिद्ध किया है कि अंडमान और निकोबार द्वीप जैन संस्कृति के बड़े केंद्र थे और उनका असली नाम ‘आदमन्न’ और ‘नग्गावरम्’ था, क्योंकि यहाँ बड़ी संख्या में आत्मा का मनन करने वाले आध्यात्मिक नग्न दिगम्बर मुनि निवास करते थे |

17. भारतवर्ष- यह तो सभी प्रमाणों से निर्विवाद सिद्ध है कि भारतवर्ष का नाम ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र भरत के नाम पर ही ‘भारतवर्ष’ पड़ा है |

18. बृजभूमि- कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहाँ बहुत ‘प्रव्रज्या’ होती थी, दीक्षा होती थी, बड़े-बड़े राजा-महाराजा लोग भी सब कुछ त्यागकर नग्न दिगम्बर मुनि हो जाते थे, अतः यह प्रदेश ‘बृजभूमि’ के नाम से विख्यात हुआ |

19. दुनिया- एक बार एक विद्वान् ने कहा था कि दुनिया को सम्भवतः इसीलिए ‘दुनिया’ कहते हैं, क्योंकि यहाँ हर बात में निश्चय और व्यवहार इन दो नयों का प्रयोग होता है | यदि ऐसा है तो यह भी जैन संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण शब्द हुआ | ‘नय’ जैनों की मौलिक अवधारणा है |

20. एशिया- एक बार एक विद्वान् के श्रीमुख से मैंने ऐसा भी सुना था कि ‘एशिया’ शब्द की कहीं कोई व्युत्पत्ति-निरुक्ति नहीं मिलती, जैन संस्कृति के व्यापक प्रभाव को देखते हुए ऐसा लगता है कि जैन लोग ‘असिआउसा’ ‘असिआउसा’ बहुत बोलते हैं, ‘एशिया’ नाम उसी से पड़ा होगा |

21. बैकुंठ- वय + कुंठ अर्थात् आयु पूर्ण हो जाना | किसी की मृत्यु होने पर कहा जाता है कि उनका बैकुंठ हो गया, इसका असली अर्थ है कि उनकी आयु पूर्ण हो गई |

22. गोविंद - यह श्रीकृष्ण का प्राकृतभाषा में नाम है और प्राकृतभाषा का जैन संस्कृति से गहरा सम्बन्ध है | ‘गोविंद’ को संस्कृत भाषा में ‘गोपेन्द्र’ कहते हैं, परन्तु लोक भाषा में उसका प्रचलन नहीं है, ‘गोविंद’ का है।

23. गणेश- विद्वानों ने सिद्ध किया है कि ‘गणेश’ हिन्दू देवता नहीं है । जैन संस्कृति में ‘गणधर’ के रूप में ‘गणेश’ शब्द का बहुत प्रयोग हुआ है- ‘गौतमांतगणेशिने’ ।

24. आदम- ‘आदम’ या ‘बाबा आदम’ जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव के विख्यात नाम ‘आदिनाथ’ से विकसित हुआ है ।

25. खमा- राजस्थान और गुजरात में ‘खमा-खमा’, ‘घणी खम्मा’ या ‘खमत खामणा’ बहुत बोला जाता है । यह जैन संस्कृति के ‘क्षमा’ या ‘क्षमावाणी’ से प्रभावित है ।

26. ओनामासीधम- पढ़नेवाले बच्चे अक्सर मजाक में गाते रहते हैं- ‘ओनामासीधम, बाप पढ़े ना हम’। डॉ. प्रेमसागर जैन ने लिखा है कि यह ‘ओनामासीधम’ जैन व्याकरण ‘जैनेन्द्र’ के प्रथम सूत्र ‘ॐ नमः सिद्धेभ्यः’ का ही अपभ्रंश रूप है ।

27. युसूफ/जोसेफ- मैसूर विश्वविद्यालय के प्रो. एन. सुरेशकुमार ने अपने शोधपत्र ‘जैनधर्म की विश्व व्यापकता’ (अनेकान्त, जुलाई-सितम्बर 2013 ) में लिखा है कि ‘ऋषभ’ शब्द के ‘ऋ’, ‘ष’ और ‘भ’ क्रैस्त धर्म में प्राकृतव्याकरण के नियमानुसार क्रमशः ‘य’ ‘स’ और ‘भ’ हो जाते हैं, अतः यसफ, युसूफ योसेफ, जोसेफ, जहोव आदि सभी शब्द ‘ऋषभ’ के ही परिवर्तित रूप हैं । प्रो. सुरेशकुमार ने इस शोधपत्र में अन्य भी अनेक शब्दों को जैन संस्कृति से उद्भूत या प्रभावित सिद्ध किया है । जैसे- ‘अल्हा’ को ‘अर्हत्’ या ‘अर्ह’ से, ‘ईरान’ को ‘अर्हन्’ से, ‘मक्का’ को ‘मोक्ष’ से, ‘चीन’ को ‘जिन’ से, इत्यादि ।

28. रहीम- जैन संस्कृति का ‘ह्रीं’ मन्त्र ही ‘रहीम’ के रूप में विकसित हो गया होगा, ऐसा लगता है ।

29. करीम- जैन संस्कृति का ‘क्लीं’ मन्त्र ही ‘करीम’ के रूप में विकसित हो गया होगा, ऐसा लगता है ।