धन्य धन्य हैं सेठ सुदर्शन, अद्भुत शील-व्रतधारी।
जिनकी पावन दृढ़ता से, कुटिला नारी भी हारी॥ टेक ॥
इक रोज महल में बैठे, दासी ने आय बताया।
तव मित्र बहुत घबड़ाये, इस क्षण ही तुम्हें बुलाया ॥
कुछ छल को समझ न पाये, थे सरल परिणति धारी।
वैसे ही दौड़े पहुँचे, पर वहाँ थी लीला न्यारी ॥ जिनकी …॥१॥
ज्यों सेठ गये थे अन्दर, दरवाजा बंद सु-कीना।
आसक्ति भरी नारी ने, निर्लज्ज प्रदर्शन कीना ॥
वह मित्र गया था बाहर, कपिला ने चाल विचारी।
हो सेठ रूप पर मोहित, उसने की थी तैयारी ॥ जिनकी …॥२॥
फँस गये धर्म संकट में, तब सेठ विचार सु-कीना।
इससे तो मरण भला है, निज शील बिना क्या जीना ?
तब हँसे वचन यों बोले, वे अनेकांत के धारी।
मैं तो हूँ अरे नपुंसक, तूने पहिले न विचारी॥ जिनकी …॥३॥
तत्क्षण ही घृणाभाव कर, हट गयी स्वयं ही पतिता।
तब सेठ सहज घर आये, लेकर अपनी पावनता।
पुरुषत्व शीलधारी का, नहीं होय कदापि विकारी।
नहीं धर्म मार्ग से च्युत हो, रहते ज्ञानी अविकारी ॥ जिनकी …।॥४॥
ओ भव्य समझना यों ही, आत्मा में शक्ति अनंता।
पर ज्ञाता-दृष्टा ही है, नहीं होवे पर का कर्त्ता ॥
आत्मन् अब भी तो चेतो, छोड़ो भ्रांति दुखकारी।
कर्तृत्व-विकल्प न लाओ, तब सुख पाओ अविकारी ।।जिनकी …।॥५॥
इक रोज वसंतोत्सव में, जाते थे सब नर-नारी।
अभया रानी भी जावे, कपिला भी जाये बेचारी ॥
तब रथ में आती देखी, सुत गोद लिये एक नारी।
अभया रानी ने पूछा, किसके सुत सुन्दर प्यारी ॥
जिनकी पावन दृढ़ता से, कुटिला नारी भी हारी ॥६।।
दासी ने तुरन्त बताया, जो सेठ सुदर्शन नामी।
उनके ही हैं सुत नारी, सुनकर कपिला मुस्कानी ॥
है सेठ नपुंसक कैसे फिर वह नारी सुत धारी।
हँस कर रानी तब बोली, धनि सेठ शील व्रतधारी ॥ जिनकी …॥७॥
चाहा था उन्हें फंसाना, ठग गयी स्वयं ही तू तो।
मूर्खा तू समझ न पाई, तत्काल सेठ युक्ति को ॥
मैं तो मूर्खा ही ठहरी, बोली झुंझला बेचारी।
वश में करके दिखलाओ, तुम रूप बुद्धि बलधारी ॥ जिनकी …॥८॥
रानी बातों में आयी, बुद्धि विवेक विसरानी।
दूती को लालच देकर, तब सेठ मिलन की ठानी ॥
धर्मात्मा सेठ सुदर्शन, धर नग्न दशा अविकारी।
मरघट में ध्यान लगाते, चौदश निशि धीरज धारी ॥ जिनकी …॥९॥
दूती ने जाल बिछाया, नर मूर्ति तुरत बनवायी।
कंधे पर रखकर उसको, महलों के द्वारे आयी ॥
ज्यों द्वारपाल ने रोका, दूती ने मूर्ति गिरादी।
व्रत टूट गया रानी का, तोहि सजा दिलाऊँ भारी ॥ जिनकी …।॥१०॥
यों द्वारपाल वश कीने, तब उठा सेठ को लाई।
बैठाया जाय पलंग पर, रानी अति ही हरषाई॥
भारी चेष्टायें कीनी, यों रात गुजर गयी सारी।
पर ध्यान मग्न थे श्रेष्ठी, उपसर्ग समझ अतिभारी ॥ जिनकी …॥११॥
ध्रुव का अवलम्बन जिनके, विचलित नहीं होते जग में।
उपसर्ग परीषह आवें, पर सतत बढ़ें शिवमग में ॥
है आत्मज्ञान की महिमा, हो अद्भुत समता धारी।
उनकी गरिमा वर्णन में, इन्द्रों की बुद्धि हारी ॥
जिनकी पावन दृढ़ता से, कुटिला नारी भी हारी ॥१२॥
जब विफल स्वयं को जाना, रानी षडयंत्र रचाया।
बिखराकर वस्त्राभूषण, तब उसने शोर मचाया ॥
तत्क्षण सब दौड़े आये, नृप क्रोध किया अतिभारी।
कुछ न्याय अन्याय न जाना, शूली की सजा सुना दी ।। जिनकी …।।१३।।
शूली के तख्ते पर थे, बैठे वे धर्म धुरन्धर।
किंचित् घबड़ाहट नाहीं, डूबे समता के अन्दर ॥
तब नभ से पुष्प बरसते, सिंहासन रच गया भारी।
इन्द्रादिक स्तुति करते, जय-जय बोलें नर-नारी ॥ जिनकी …।॥१४॥
चम्पापुरि धन्य हुयी थी, अरु वृषभदत्त यश पाया।
जिनके सुत सेठ सुदर्शन, यह चमत्कार दिखलाया ॥
पिछले ग्वाले के भव में, श्रद्धा जिनधर्म की धारी।
फिर श्रेष्ठी सुत होकर यों, महिमा पाई सुखकारी ॥ जिनकी …॥१५॥
चरणों में नत हो भूपति, पछताते क्षमा कराते।
तब सेठ सुदर्शन बोले, हम दीक्षा ले वन जाते॥
नहीं दोष किसी का कुछ भी, कर्मों की लीला न्यारी।
कर्मों का नाश करेंगे, निर्ग्रन्थ दशा धर प्यारी ॥ जिनकी …॥१६॥
उत्तम सुयोग पाकर भी, मैं समय न व्यर्थ गँवाऊँ।
भोगों के दुख बहु पाये, अब इनमें नाहिं फँसाऊँ॥
नश्वर अशरण जगभर में, शुद्धातम ही सुखकारी।
निज में ही तृप्ति पाऊँ, संकल्प जगा हितकारी ॥ जिनकी …॥१७॥
मुनि हो तप करते-करते, पटना नगरी में आये।
उपसर्ग वहाँ भी भारी, पर किंचित् नहीं चिगाये ॥
फिर शुक्लध्यान के द्वारा, कर्मों की धूल उड़ा दी।
प्रभु पौष शुक्ल पंचमि को, निर्वाण गये सुखकारी ॥ जिनकी …।॥१८॥
है निमित्त अकिंचित्कर ही, किंचित् नहिं सुख-दुख दाता।
निज की सम्यक् दृढ़ता से, मिटती है सर्व असाता ॥
प्रभु यही भावना मेरी, तुमसा पुरुषार्थ सु-धारी।
होकर शिवपदवी पाऊँ, चरणों में ढोक हमारी ॥ जिनकी …॥१९॥
भवि पढ़े सुने यह गाथा, हो तत्त्वज्ञान के धारी।
निज सम नारी भगनी सम, लघु सुता, बड़ी महतारी ॥
आत्मन् ज्ञानाराधन से, उपजें नहीं भाव विकारी।
सारे ही जग में फैले यह, शील धर्म सुखकारी ॥ जिनकी …॥२०॥
Artist: रवींद्र जी आत्मन्
स्रोत: जिनेन्द्र आराधना संग्रह