सर्वसामान्य प्रतिक्रमण-आवश्यक
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ॐ
सर्वज्ञाय नमः।
सर्वसामान्य
प्रतिक्रमण-आवश्यक
प्रकाशक
श्री दिगंबर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
सोनगढ-३६४२५० (सौराष्ट्र)
श्री दिगंबर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, सोनगढ - ३६४२५०
भगवानश्रीकुंदकुंद-कहानजैनशास्त्रमाला, पुष्प-२४
ॐ
सर्वज्ञाय नमः।
सर्वसामान्य
प्रतिक्रमण-आवश्यक
प्रकाशक
श्री दिगंबर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
सोनगढ-३६४२५० (सौराष्ट्र)
Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250
श्री दिगंबर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, सोनगढ - ३६४२५०
अत्यार सुधी छपायेल कुल प्रत : ३९,४००
आवृत्ति ओगणीसमी : प्रत ३०००
वीर सं. २५३४ वि.सं. २०६४ ई.स. २००८
स्थायी प्रकाशन-पुरस्कर्ता
श्रीमती कंचनबेन हेमन्तलाल वोरा अने
श्री हेमन्तलाल दलीचंद वोरा मुंबई
किंमत रु. १०=००
मुद्रक :
स्मृति ऑफसेट
जैन विद्यार्थी गृह कंपाउंड, सोनगढ-३६४२५०
: (०२४६) २४४०४१
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श्री दिगंबर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, सोनगढ - ३९४२५०
अनुक्रमणिका
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| निश्चय अने व्यवहार | सम्यग्ज्ञानमां लागेला | ||
| प्रतिक्रमणनी व्याख्या | १ | दोषनुं प्रतिक्रमण | ३७ |
| प्रतिक्रमणना छ विभाग | १ | बार व्रतनुं स्वरूप | ३७ |
| नमस्कार-मंत्र | २ | संलेखना | ४१ |
| वंदना | २ | मिथ्यात्वनुं स्वरूप | ४३ |
| सामायिकनुं स्वरूप | ३ | चार मंगल | ४३ |
| तीर्थंकर भगवाननी | क्षमापना [आभामणा] | ४३ | |
| स्तुतिनुं स्वरूप | ६ | लोगस्स सूत्रनो कायोत्सर्ग | ४६ |
| छ पदो पाढ (कायोत्सर्ग) | ७ | प्रत्याख्यान | ४८ |
| श्री सद्गुरु-वंदन | ११ | नमोत्थुणं | ४८ |
| समकितनुं साधु स्वरूप | १२ | स्वाध्यायनी महिमा | ५० |
बीजुं प्रतिक्रमण
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| देवगुरुधर्म मंगल | प्रत्याख्यान | ६१ | |
| दिव्यध्वनि नमस्कार | ५१ | जिनजीनी वाणी | ६१ |
| ब्रह्मचर्य-महिमा | ५१ | अंतिम मंगल | ६२ |
| सर्वज्ञनुं स्वरूप | ५२ | उपादान-निमित्तनो दोहा | ६३ |
| समयसारजी-स्तुति | ५२ | उपादान-निमित्तनो संवाद | ६५ |
| आत्मसिद्धिज्ञानना पदो | ५३ | सद्गुरु-उपकारदर्शन | ७० |
| सामायिक पाठ | ५६ | प्रतिपात-स्तुति | ७१ |
| श्रावक-कर्तव्य | ५८ | गुरुदेव प्रत्य | |
| मिथ्या मि दुक्कडं | ५८ | क्षमापना-स्तुति | ७८ |
| परमपदप्राप्तिनी भावना | ५८ | तात्विक सुवाक्य | ७८ |
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सूचना
जेओ प्रतिक्रमण करती वखते मूळ गाथाओ अथवा कवित्त समजी शकता होय तेओए ते बोली तेनो भाव बराबर समजवो. तेओए तेनो अर्थ वांचवानी जरुर नथी.
जेओ मूळ गाथा के कवित्त वांचीने समजी शकता न होय तेओए नीचे आपेला अर्थो बोली प्रतिक्रमणना भाव बराबर समजवा. तेओए तेमनो मूळपाठ के कवित्त वांचवानी जरुर नथी.
जेओने थोडो वखत होय तेओए लघु प्रतिक्रमण बोली तेनो अर्थ बराबर समजवो. जेमणे संवत्सरीने दिवसे के धार्मिक तहेवारोना दिवसे जे प्रतिक्रमण करवां होय तेओए बे प्रतिक्रमण करवां.
जे कोई आत्माथी स्वलक्षे आ आवश्यक-क्रियाने प्रतिदिन आत्मशुद्धि माटे करशे ते जरुर आत्मशांति पामशे.
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।। श्री वीतरागाय नमः ।।
सर्वसामान्य प्रतिक्रमण—आवश्यक
प्रतिक्रमण के बे प्रकार है : (१) निश्चय अने (२) व्यवहार.
निश्चय-प्रतिक्रमणनी व्याख्या :–
पूर्व करेला जे अनेक प्रकारना विस्तारवाळु शुभाशुभ कर्म तेनाथी ज आत्मा पोतानाने निवर्तवे छे (पाछो वाळे छे), ते आत्मा प्रतिक्रमण छे.
व्यवहार-प्रतिक्रमणनी व्याख्या :–
पोतानां शुभाशुभ कर्मोनो आत्मनिंदापूर्वक त्याग करवानो भाव-आत्माना एवा विशुद्ध परिणाम के जेमां अशुभ परिणामोनी निवृत्ति थाय.
प्रतिक्रमणना नीचे प्रमाणे छ विभाग छे :–
(१) सामायिक,
(२) तीर्थंकर भगवाननी स्तुति,
(३) वंदन,
(४) प्रतिक्रमण,
(५) कायोत्सर्ग,
(६) प्रत्याख्यान.
(श्री सद्गुरुदेवनी विनयपूर्वक आज्ञा लईने अथवा तेओश्री बिराजमान न होय तो भगवान श्री सीमंधरप्रभुनी आज्ञा लईने प्रतिक्रमण शरु करवुं.)
१ समयसार गाथा २८३
२ श्रावकप्रतिक्रमण (पंडित नंदलालकृत प्रस्तावनामांथी)
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प्रतिक्रमण-आवश्यक
[ २ ]
[ सर्वसामान्य
पाठ १ लो
मंगलाचरण : नमस्कार-मंत्र
णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं ।।
अर्थ :–श्री अरिहंतोने नमस्कार हो, सिद्धोने नमस्कार हो,
आचार्योंने नमस्कार हो, उपाध्यायोंने नमस्कार हो अने लोकमां
रहेला सर्व साधुओने नमस्कार हो।¹
अरिहंत सिद्ध आचार्य ने, उपाध्याय मुनिराज,
पंच पद व्यवहारथी, निश्चये आत्मामां ज. १०४²
पाठ २ जो
वंदना (तिखुत्तो)
तिखुत्तो, आयाहिणं, पयाहिणं, वंदामि, घणसामि,
सक्कारमि, सम्माणमि, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, चेइयं,
पज्जुवासामि।
अर्थ :–पंच परमेष्ठीने हाथ जोडी आवर्तनथी त्रण
वखत प्रदक्षिणा करी हुं स्तुति करुं, नमस्कार करुं छुं; विनयथी
सत्कार करुं छुं, विवेकपूर्वक सन्मान करुं छुं. हे पूज्य ! आप
कल्याणरूप, मंगलरूप, देवरूप, ज्ञानरूप छो तेथी आपनी
पर्युपासना–सेवा करुं छुं.
१. आ पंच परमेष्ठीनुं स्वरूप मोक्षमार्गप्रकाशक (गुजराती) पाना २ थी ६ सुधीमां छे,
जिज्ञासुओ त्यांथी जोई लेवुं.
२. योगीन्द्रदेवकृत योगसारमांथी
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प्रतिक्रमण-आवश्यक
[ ३ ]
पाठ ३ जो*
आत्माना केवा भावने श्री भगवान सामायिक कहे छे ते हवे
कहेवाय छे :–
जे सत्तामां लीन थई, करे अधिक अभ्यास;
अखिल कर्म ते क्षय करी, पामे शिवपुर वास. ८२.
सर्व जीव छे ज्ञानमय, जाणे समता भाव;
ते सामायिक जिन कहे, प्रगट करे भवपार. ८८.
राग-द्वेष बे त्यागीने, धारे समता भाव;
सामायिक चारित्र ते, कहे जिनवर मुनिराव. ८९.
विरदो सव्वसावओ णियत्तो पिहिदिंदिओ।
तस्स सामाइयं ठाणं इदि केवलिसासणे ।। १२५ ।।
(हरिगीत)
साधुव्रतवंत, त्रिगुप्तनें, षट्इंद्रियसमूह निरुद्ध छे,
स्थायी सामायिक तेहनें भाख्युं श्री केवलीशासने. १२५.¹
अर्थ :–जे सर्व सावद्यक्रियाथी विरक्त थई, त्रण गुप्तियोने
धारीने पोतानां इंद्रियोने गोपवे, तेने स्थायी (खरी) सामायिक
होय छे एम श्री केवली भगवानने आगममां कह्युं छे.
जो समो सव्वभूएसु थावरेसु तसेसु वा।
तस्स सामाइयं ठाणं इदि केवलिसासणे ।। १२६ ।।
स्थावर अने त्रस सर्व भूतसमूहमां समभाव छे,
स्थायी सामायिक तेहनें भाख्युं श्री केवलीशासने. १२६.
- योगीन्द्रदेवकृत योगसारमांथी
१. आ नं. १२५ थी १३३ सुधीनी गाथाओ श्री नियमसारनी छे.
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[४]
[सर्वसामान्य]
अर्थ :- जे सर्व त्रस अने स्थावर प्राणीओमां समताभाव राखे छे, तेने स्थायी (खरी) सामायिक होय छे एम श्री केवली भगवाने आगममां कहुं छे.
जस्स सण्णिणो अप्पा संजमे णियमे ण तवे।
तस्स सामाइयं ठाउ इदि केवलिसासणे ॥१२७॥
संयम, नियम ने तप विषे आत्मा समीप छे जेहने,
स्थायी सामायिक तेहने भाष्युं श्री केवलीशासन. १२७.
अर्थ :- संयम पाळतां, नियम करतां तथा तप धरतां एक आत्मा ज जेने समीप वर्ते छे, तेने स्थायी (खरी) सामायिक होय छे एम श्री केवली भगवाने आगममां कहुं छे.
जस्स रागो दु दोसो दु विगडि ण जणेइ दु।
तस्स सामाइयं ठाउ इदि केवलिसासणे ॥१२८॥
नहि राग अथवा द्वेषरूप विकार जन्मे जेहने,
स्थायी सामायिक तेहने भाष्युं श्री केवलीशासने. १२८.
अर्थ :- जेने राग-द्वेष विकार पैदा थतो नथी, तेने स्थायी (खरी) सामायिक होय छे एम श्री केवली भगवाने आगममां कहुं छे.
जो दु अरुहं च रुहं च झाणं वज्जेदि णिच्चसो।
तस्स सामाइयं ठाउ इदि केवलिसासणे ॥१२९॥
जे नित्य वर्जे आर्त तेम ज रौद्र बने ध्यानने,
स्थायी सामायिक तेहने भाष्युं श्री केवलीशासने. १२९.
अर्थ :- जे नित्य आर्त अने रौद्र ध्याननो त्यागे छे, तेने स्थायी (खरी) सामायिक होय छे एम श्री केवली भगवाने आगममां कहुं छे.
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[५]
[प्रतिक्रमण-आवश्यक]
जो दु पुण्णं च पावं च वज्जेदि णिच्चसो।
तस्स सामाइयं ठाउ इदि केवलिसासणे ॥१३०॥
जे नित्य वर्जे पुण्य तेम ज पाप बन्ने भावनाने,
स्थायी सामायिक तेहने भाष्युं श्री केवलीशासने. १३०.
अर्थ :- जे कोई नित्य पुण्य अने पापभावनाने त्यागे छे, तेने स्थायी (खरी) सामायिक होय छे एम श्री केवली भगवाने आगममां कहुं छे.
जो दु हस्सं रई अरतिं वज्जेदि णिच्चसो।
तस्स सामाइयं ठाउ इदि केवलिसासणे ॥१३१॥
जो दु जुगुंछा भयं वेदं सव्वं वज्जेदि णिच्चसो।
तस्स सामाइयं ठाउ इदि केवलिसासणे ॥१३२॥
जे नित्य वर्जे हास्यने, रति अरति तेम ज शोकने,
स्थायी सामायिक तेहने भाष्युं श्री केवलीशासने. १३१.
जे नित्य वर्जे भय जुगुप्सा, वर्जे सो वेदने,
स्थायी सामायिक तेहने भाष्युं श्री केवलीशासने. १३२.
अर्थ :- जे हास्य, शोक, रति, अरति, जुगुप्सा, भय, त्रण प्रकारना वेद एम सर्व नोकषायने नित्य दूर राखे छे, तेने स्थायी (खरी) सामायिक होय छे एम श्री केवली भगवाने आगममां कहुं छे.
जो दु धम्मं च सुक्कं च झाणं वज्जेदि णिच्चसो।
तस्स सामाइयं ठाउ इदि केवलिसासणे ॥१३३॥
जे नित्य ध्यावे धर्म तेम ज शुक्ल उत्तम ध्यानने,
स्थायी सामायिक तेहने भाष्युं श्री केवलीशासने. १३३.
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[६]
[सर्वसामान्य]
अर्थ :- जे कोई नित्य धर्मध्यान अने शुक्लध्यानने ध्यावे छे, तेने स्थायी (खरी) सामायिक होय छे एम श्री केवली भगवाने आगममां कहुं छे.
पाठ ४ थो
हवे तीर्थंकर भगवाननी साची स्तुतिनुं स्वरूप कहेवामां आवे छे :-
जो इंदिये जिणिता णाणसहावियं मुणदि आर्द।
तं खलु जिणिदियं ते भणंति जे णिच्छित्ता साहू ॥३१॥
जेनी इन्द्रियो ज्ञानस्वभावे अधिक जाणे आत्माने,
निश्चय विषे स्थित साधुओ भाखे जितेंद्रिय तेहने. ३१.*
अर्थ :- जे इन्द्रियोने जीतीने ज्ञानस्वभाव वडे अभेदत्वथी अधिक आत्माने जाणे छे तेने, जे निश्चयनयमां स्थित साधुओ छे तेओ, खरोखर जितेंद्रिय कहे छे.
जो मोहं तु जिणिता णाणसहावियं मुणदि आर्द।
तं परमदव्वियाणो वेत्ति ॥३२॥
जेनी मोहने जीतीने पोताना आत्माने ज्ञानस्वभाव वडे अभेदत्वथी अधिक जाणे छे ते मुनिने परमार्थना जाणनाराओ जितमोह कहे छे.
जितमोहस्स दु जइया खीणो होवेइ साहरस।
तइया हु खीणमोहो भणदि सो णिच्छयविदुहिं ॥३३॥
- पाठ ३१ तथा ३२मां बे गाथाओ छे ते श्री समयसारनी छे.
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प्रतिक्रमण-आवश्यक
जितमोही साधु तणो वळी क्षय मोह ज्यारे थाय छे,
निश्चयविदी थकी तेहने क्षीणमोह नाम कथाय छे. उउ.
अर्थ :- जो मोहने जीत्यो छे एवा साधुने ज्यारे मोह क्षीण थई सत्तामाथी नाश थाय त्यारे निश्चयनो जाणनारा निश्चयी ते साधुने ‘क्षीणमोह’ एवा नामथी कहे छे.
पाठ ५ मो
आत्मातुं स्वरूप जाणवा आत्माना छ पदोनो पाठ
कायोत्सर्ग (काउस्सग्ग) रुपे कहेवामां आवे छे :-
(नमस्कार मंत्र बोलवो)
अनन्य शरणना आपनार एवा श्री सद्गुरुदेवने
अत्यंत भक्तिथी नमस्कार.
शुद्ध आत्मस्वरूपने पाक्या छे एवा ज्ञानीपुरुषोए नीचे कथां छे
ते छ पदने सम्यग्दर्शनना निवासनी सर्वोत्कृष्ट स्थानक कथां छे.
प्रथम पद :- ‘आत्मा छे.’ जेम घट घट आदि पदार्थो छे
तेम आत्मा पण छे. अमुक गुण होवाने लीधे जेम घट घट आदि
होवानुं प्रमाण छे, तेम स्वपरप्रकाशक एवी चैतन्यसत्तातो प्रत्यक्ष
गुण जेने विषे छे एवो आत्मा होवानुं प्रमाण छे.
बीजुं पद :- ‘आत्मा नित्य छे.’ घट पट आदि पदार्थो अमुक
काळवर्ती छे, आत्मा नित्यवर्ती छे. घटपटादि संयोगे करी थई
छे, आत्मा स्वभावे करीने पदार्थ छे; केम के तेनी उत्पत्ति माटे
कोई पण संयोगो अनुभवयोग्य थता नथी. कोई पण संयोगी
द्रव्यनी चेतनसत्ता प्रगट थवायोग्य नथी, माटे अनुत्पन्न छे.
असंयोगी होवाथी अविनाशी छे, केम के जेनी कोई संयोगथी
- श्रीमह राजचंद्रमांथी
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उत्पत्ति न होय, तेनो कोईने विषे लय पण नहीं.
त्रीजुं पद :- ‘आत्मा कर्ता छे.’ सर्व पदार्थ अर्थक्रियासंपन्न
छे. कई न कई परिणामक्रिया सहित ज सर्व पदार्थ जोवामां आवे
छे. आत्मा पण क्रियासंपन्न छे. क्रियासंपन्न छे, माटे कर्ता छे.
कर्तापणुं त्रिविध श्री जिनदेवे विवच्युं छे. परमार्थमां स्वभावपरिणतिने
निश्चयवनुं कर्ता छे. अनुपचरित (अनुभवमां आववायोग्य
विशेष संबंधसहित) व्यवहारथी ते आत्मा द्रव्यकर्मनो कर्ता छे.
उपचारथी घर, नगर आदिनो कर्ता छे.
चोथुं पद :- ‘आत्मा भोक्ता छे.’ जे कई क्रिया छे
ते सर्व सफल छे, निरर्थक नथी. जे कई पण करवामां आवे तेनुं
ફળ भोगववामां आवे एवो प्रत्यक्ष अनुभव छे. विष उपाधीथी
विषनुं फळ; साखर उपाधीथी साखरनुं फळ; अग्निसंस्पर्शी ते
अग्निसंस्पर्शतुं फळ; हिमने स्पर्शी करवाथी हिमस्पर्शतुं फळ जेम थया
विना रहेतुं नथी, तेम कषायादि के अकषायादि जे कई पण
परिणामे आत्मा प्रवर्ते तेनुं पण फळ थवायोग्य ज छे, अने ते
थाय छे, ते क्रियानो आत्मा कर्ता होवाथी भोक्ता छे.
पांचमुं पद :- ‘आत्मा छे.’ जे अनुपचरित व्यवहारथी
जीवन कर्मनुं कर्तापणुं निरुपण कयुं, कर्तापणुं होवाथी भोक्तापणुं
निरुपण कयुं, ते कर्मनुं टळाववापणुं पण छे; केम के प्रत्यक्ष
कषायादिनुं तीव्रपणुं होय पण तेना अनभ्यासथी, तेना
अपरिचयथी, तेने उपशम करवाथी, तेनुं मंदपणुं देखाय छे, ते
क्षीण थवायोग्य देखाय छे, क्षीण थई शके छे. अने ते बंधभाव
क्षीण थई शकवायोग्य होवाथी तेथी रहित एवी जे शुद्ध
आत्मसत्ता ते रुप मोक्षपद छे.
छठ्ठुं पद :- ‘मोक्षनो उपाय छे.’ जो कई कर्मबंध मात्र
थया करे ज होय, तो तेनी निवृत्ति कोई कांइ संभवे नहीं;
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प्रतिक्रमण-आवश्यक
[ ८ ]
पण कर्मबंधथी विपरीत स्वभाववाळी एवी ज्ञान, दर्शन, समाधि,
वैराग्य, भक्ति आदि साधनो प्रत्यक्ष छे; ए साधनो कर्मबंध
शिथिल थाय छे, उपशम पामे छे, क्षीण थाय छे. माटे ते ज्ञान,
दर्शन, संयमादि मोक्षपदना उपाय छे.
(नमस्कार मंत्र बोली कायोत्सर्ग पुरो करवो)
श्री ज्ञानीपुरुषोए सम्यग्दर्शनना मुख्य निवासभूत कथां एवा
आ छ पद अंगे संक्षेपमां जणाव्युं छे. समीपमुक्तिगामी जीवने
सहज विचारमां ते समग्रमा थवायोग्य छे, परम निश्चयरुप
जणावायोग्य छे, तेनो सर्व विलासे विस्तार थई तेना आत्मामां
विवेक थवायोग्य छे. आ छ पद अत्यंत संदेहरहित छे एम
परमपुरुषे निरुपण कयुं छे. ए छ पदोनो विवेक जीवन स्वरूप
समझवाने अर्थे कर्यो छे. अनादि स्वप्नदशाने लीधे उत्पन्न थयेलो
जीवो अहंबभाव, ममत्वभाव ते निवृत्त थवाने अर्थे आ छ
पदनी ज्ञानीपुरुषोए देशना प्रकाशी छे. ते स्वपदशाथी रहित मात्र
पोतानुं स्वरूप छे एम जो जीव परिणाम करे, तो सह्जमात्रमां
ते जागृत थई सम्यग्दर्शनने प्राप्त थाय; सम्यग्दर्शनने प्राप्त थई
स्वस्वभावमां मोक्षने पामे. कोई विनाशी, अशुद्ध अने अन्य एवा
भावने विषे तेने हर्ष, शोक, संयोग, उत्पन्न न थाय. ते विचारे
स्वस्वरूपने विषे ज शुद्धपणुं, संपूर्णपणुं, अविनाशीपणुं, अत्यंत
आनंदपणुं, अंतररहित तेना अनुभवमां आवे छे. सर्व
विषयविकार्यमां मात्र पोताने अभ्यासथी ऐक्यता थई, तेथी
केवळ पोतानुं भिन्नपणुं छे एम स्पष्ट-प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष
अपरोज्ञ तेनुं अनुभव थाय छे. विनाशी अथवा अन्य पदार्थना
संयोगने विषे तेने इष्ट-अनिष्टपणुं प्राप्त थतुं नथी. जन्म, जरा,
मरण, रोगादि बाधारहित संपूर्ण महापुरुषनुं देखाणुं निजस्वरूप
बाकी, वेदी ते कृतार्थ थाय छे. जे पुरुषोने ए छ पद समग्रमां
एवा पुरुषोना वचनने आत्मांनो निश्चय थयो छे, ते पुरुषो
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सर्वसामान्य
जो ]
सर्व स्वरूपने पाम्या छे; आवि, व्याधि, उपाधि सर्व संगथी रहित थया छे, तथाय छे अने भाविककाळमां पण तेम ज थशे.
जे सतपुरुषोए जन्म, जरा, मरणनो नाश करवावाळो, स्वस्वरूपमां सहज अवस्थान थवानो उपदेश कह्यो छे, ते सतपुरुषोने अत्यंत भक्तिथी नमस्कार छे. तेनी निष्ठाअज करणाने नित्य प्रत्ये निरंतर स्वत्त्वमां पण आत्मस्वभाव प्रगटे छे, एवा सर्व सतपुरुषो, तेना यथार्थिक सद्दाय हृदयने विषे स्थापन रहो!
जे छ पदथी सिद्ध छे एवुं आत्मस्वरूप ते जेना वचनने अंगीकार करी सद्भावमां प्रगटे छे, जे आत्मस्वरूप प्रगटवाथी सर्वकाळ जीव संपूर्ण आनंदने प्राप्त थई निर्भय थाय छे, ते वचनना कहनार एवा सतपुरुषना गुणनी व्याख्या करवावाने अरिहंतना, केम के जेनो प्रत्युपकार न थई शके एवो परमात्मभाव ते जणे कही ऊपज्या विना मात्र निष्कारण करुणाशीलताथी आप्यो, ओम छतां पण जेणे अन्य जीवने विषे आ मारो शिष्य छे, अथवा भक्तिनो कर्ता छे, मारो मित्र छे, ओम कही जोयुं नथी, एवा जे सतपुरुष, तेने अत्यंत भक्तिअने फरी फरी नमस्कार हो!
जे सतपुरुषोए सद्गुरुनी भक्तिने निरुपण करी छे, ते भक्ति मात्र शिष्यना कल्याणने अर्थे कही छे. जे भक्तिने प्राप्त थवाथी सद्गुरुना आत्मांनी श्रेष्ठाने विषे वृत्ति रहे, अपूर्व गुण दृष्टिगोचर थई अन्य स्वच्छंद मटे, अने सहेजे आत्मबोध थाय ओम भक्तीने जे भक्तिनुं निरुपण कर्यु छे, ते भक्तिने अने ते सतपुरुषोने फरी फरी त्रिकाल नमस्कार हो!
जो कही प्रगटपणे वर्तमानमां केवज्ञाननी उत्पत्ति थई नथी, पण जेना वचनना विचारोथीने शक्तिपणे केवज्ञान छे ओम स्पष्ट भाव्युं छे, श्रद्धापणे केवज्ञान थयुं छे, विचारदशाने केवज्ञान
प्रतिक्रमण-आवश्यक
थयुं छे, इच्छादशाए केवज्ञान थयुं छे, मुख्य नयन हेतुथी केवज्ञानना वर्तते छे, ते केवज्ञान सर्व अव्याबाध सुखनुं प्रगट करनार जेना योगे सहजमात्रमां जीव पामवा योग्य थयो, ते सतपुरुषना उपकारने सर्वोत्कृष्ट भक्तिने नमस्कार हो! नमस्कार हो!
पाठ छट्ठो
श्री सद्गुरु-वंदन
अहो! अहो! श्री सद्गुरु, करुणासिंधु अपार,
आ पामर पर प्रभु कर्यु, अहो! अहो! उपकार। १.
शुं प्रभुचरण कने, धरुं, आत्माथी सो दीन;
ते तो प्रभुए आपियो, वर्तुं चरणधीन। २.
आ देहादि आजथी, वर्तुं प्रभु आधीन,
दास, दास, हुं दास छुं, तेह प्रभुंनो दीन। ३.
पट्ट स्थानक समजावीने, भिन्न बताव्यो आप;
ज्ञान थकी तरवारवत, ए उपकार अमाप। ४.
जे स्वरूप समजाव्या विना, पाम्यो हुं दुःख अनंत;
समजाव्युं ते पद नवुं, श्री सद्गुरु भगवंत। ५.
परमपुरुष प्रभु सद्गुरु, परम ज्ञान सुखधाम;
जेणे आप्युं ज्ञान निज, तेने सदा प्रणाम। ६.
देह छतां जेनी दशा, वर्ते देहातीत;
ते ज्ञानीना चरणमां, हो वंदन अगणित। ७.
पाठ ७ मो
सर्वसामान्य
(१) समकितनुं सारुं स्वरूप भगवाने केवुं कहुं छे ते हवे कहेवामां आवे छे. ते समजने साची श्रद्धा करवी. प्रथम मुख्य बे तत्वो जे जीव अने अजीव तेमनुं स्वरूप.
जीवो चरित्तदंसणणाणट्ठो त्ति हि ससमयमं जाण।
पोग्गलकम्मपदेसट्ठिं च तं जाण परसमयमं ॥ १ ॥
जीव चरित्त-दर्शन-ज्ञानस्थित स्वसमय निश्चय जाणवो;
स्थित कर्मपुद्गलना प्रदेशो परसमय जीव जाणवो. १.
अर्थ :- हे भव्य! जे जीव दर्शन-ज्ञान-चारित्रमां स्थित थई रह्यो छे तेने निश्चयथी स्वसमय जाण; अने जे जीव पुद्गलकर्मना प्रदेशोमां स्थित थयेल छे तेने परसमय जाण.
ववहारोऽभूदत्थो भूदत्थो देसिदो दु सुदउणो।
भूदत्तमस्सिओ खलु सम्मादिट्ठी हवदि जीवो ॥ ११ ॥
व्यवहारनय अभूतार्थ छे, शुद्धनय भूतार्थ छे;
भूतार्थने आश्रित जीव सुदृष्टि निश्चय होय छे. ११.
अर्थ :- व्यवहारनय अभूतार्थ छे अने शुद्धनय भूतार्थ छे
ओम ऋषीश्वरोए दर्शायुं छे; जे जीव भूतार्थनो आश्रय करे छे
ते जीव निश्चयथी सम्यग्दृष्टि छे.
भूदत्थेणाभिगदा जीवाजीवा य पुण्णपावं च।
आसवसंवरणिज्जरबंधमोक्खं व सम्मत्तं ॥ १३ ॥
भूतार्थथी जाणेला जीव, अजीव, वळी पुण्य, पाप ने
आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष ते सम्यक्त्व छे. १३.
अर्थ :- भूतार्थ नयथी जाणेला जीव, अजीव वळी पुण्य, पाप
प्रतिक्रमण-आवश्यक
तथा आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष-ये नव तत्त्व सम्यक्त्व हैं।
जो परसदि अप्पाणं अववदुद्धं अण्णण्ण णियदं।
अविसेसमसुंजत्तं तं सुद्धणयं वियाणिहि ॥१४॥
अबद्धस्पृष्ट, अनन्य ये जे निश्चय दोषे आत्मने,
अविशेष, असंसृक्त, तेने शुद्धनय तुं जाणजे. १४.
अर्थ :-जे नय आत्माने बंध रहित ने परना स्पर्श रहित,
अनन्यपणा रहित, यथार्थता रहित, विशेष रहित, अन्यना संयोग
रहित-एवा पांच भावरूप देखे छे तेने, हे शिष्य! तुं शुद्धनय
जाण.
जो परसदि अप्पाणं अववदुद्धं अण्णण्णमविसेसं।
अपदेसत्तमसंजुत्तं परसवि जिणसाणं सव्वं ॥१५॥
अबद्धस्पृष्ट, अनन्य, जे अविशेष दोषे आत्मने,
ते द्रव्य तेम ज भाव जिनशासनना सकल देखे खरे. १५.
अर्थ :-जे पुरुष आत्माने अबद्धस्पृष्ट, अनन्य, अविशेष
(तथा उपलक्षणथी नियत अने असंयुक्त) देखे छे ते सर्व
जिनशासनने देखे छे,-जे के जिनशासन बाह्य द्रव्यभूत तेम ज
अभ्यंतर ज्ञानरूप भावभूतनां जाण.
सव्वे भावे जत्ता पच्चक्खाई परं ति णादूणं।
तम्हा पच्चक्खाणं णाणं णियमा मुणेदव्वं ॥३४॥
सो भावनने पर जाणीने पच्चक्खाण भावोनुं करे.
तेथी नियमथी जाणवुं के ज्ञान प्रत्याख्यान छे. ३४.
अर्थ :-जेथी ‘पोताना सिवाय सर्व पदार्थ पर छे’ एम
जाणीने प्रत्याख्यान करे छे-त्यागे छे, तेथी, प्रत्याख्यान ज्ञान ज
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[सर्वसामान्य]
ने एम नियमथी जाणवुं, पोताना ज्ञानमां त्यागनुंय अवस्था ते
ज प्रत्याख्यान छे, बीजुं कांई नथी.
अहमेक्को खलु सुद्धो दंसणणाणमओ सदारूवी।
ण वि अत्थि मण्ण किंचि वि अण्णं परमाणुमेत्तं पि ॥२८॥
हुं एक, शुद्ध, सदा अरूपी, ज्ञानदर्शनमय खरे;
कांई अन्य ते मारे जरी परमाणुमात्र नथी अरे! २८.
अर्थ :-दर्शनज्ञानचारित्ररूप परिणमेला आत्मा एम जाणे
छे के : निश्चयथी हुं एक छुं, शुद्ध छुं, दर्शनज्ञानमय छुं, सदा अरूपी
छुं; कांई पण अन्य परद्रव्य परमाणुमात्र पण मारे नथी ए
निश्चय छे.
ववहारेण दु एदे जीवस्स हवंति वण्णमादीया।
गुपदोगांता भावा ण दु केई णिच्छयणयस्स ॥६३॥
वर्णादि गुणस्थानमां भावो जीवना व्यवहारथी,
पण कोई ओ ए भावो नथी आत्मा तणा निश्चयथी. ६३.
अर्थ :-आ वर्णोथी मांडीने गुणस्थान पर्यंत भावो कहेवामां
आवता ते व्यवहारनयथी तो जीवना छे (मात्र सूत्रमां कहा छे),
परंतु निश्चयनयना मतमां तेमनामां कोई पण जीवना नथी.
(२) जीव परनो कर्ता नथी पण पोताना भावोनो कर्ता छे
बतावतुं स्वरूप :-
ण वि कुव्वदि कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीवगुणे।
अण्णोण्णणिमित्तेण दु परिणामं जाण दोण्हं पि ॥८१॥
एदेण कारणेण दु कत्ता आदा सएण भावेण।
पोग्गलकम्मसकदाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं ॥८२॥
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प्रतिक्रमण-आवश्यक
जीव कर्मगुणांनो करतो नथी, नहि जेवगुणां कर्मनां;
अन्योन्यना निमित्तथी परिणाम बेहुं तणा बने. ८१.
ए कारणे आत्मा खरे कर्ता खरे निज भावथी;
पुद्गलकर्मकृत सर्व भावोनो कांई कर्ता नथी. ८२.
अर्थ :-जीव कर्मना गुणोनो करतो नथी तेम ज कर्म जीवना
गुणोनो करतो नथी; परंतु परस्परना निमित्तथी बन्नेना परिणाम थाय छे।
आ कारणे आत्मा पोताना ज भावनी कर्ता (कहेवामां आवे) छे
परंतु पुद्गलकर्मथी करवामां आवेला सर्व भावोनो कर्ता नथी।
णिल्लयणयस्स एवं आदा अप्पाणमेव हि करेदि।
वेदयदि पुणो तं चेव जाण अत्ता दु अत्ताणं ॥८३॥
आत्मा खरे निजने ज ओ अंतथ्य निश्चयनय तणुं,
वळी भोगवे निजने ज आत्मा एम निश्चय जाणवुं. ८३.
अर्थ :-निश्चयनयनो एम मत छे के आत्मा पोताना ज करे
छे अने वळी आत्मा पोताना ज भोगे छे एम छे शिष्य! तुं
जाण.
उवओगस्स अणाई परिणामा तिण्णि मोहत्तस्स।
मिच्छत्तं अण्णाणं अविरदिभावो ण णादव्वो ॥८८॥
छे मोहभूत उपयोगना परिणाम त्रण अनादिना,
-मिथ्यात्व ने अज्ञान, अविरतिभाव ओ त्रण जाणवा. ८८.
अर्थ :-अनादिथी मोहभूत होवाथी उपयोगना अनादिना
मांडीने त्रण परिणाम छे; ते मिथ्यात्व, अज्ञान अने अविरतिभाव
(ए त्रण) जाणवा.
एदेसु उवओगो णिव्विण्णो गिरेज्जणो भावो।
जं सो करेदि भावे उवओगो तस्स सो कत्तो ॥९०॥
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निश्चित रूप से, यहाँ जैन धार्मिक/स्वाध्याय पुस्तिका के पृष्ठों का शुद्ध देवनागरी में पाठ है:
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१६ /
[ सर्वसामान्य
एनाथी औं उपभोग त्रणविध, शुद्ध निर्मळ भाव जे;
जे भाव कर्इ पण करे, ते भावंनो कर्ता बने. ८०.
अर्थ :-अनादिकी आ त्रण प्रकार परिभ्रमणकारी होवाथी,
आत्मांनो उपयोग—जोके (शुद्धनयथी) ते शुद्ध, निरंजन (एक)
भाव छे तोपण—त्रण प्रकारनो थयो थको ते उपयोग जे
(विकारी) भावनो पोते करे छे ते भावनो ते कर्ता थाय छे.
जे कुणदि भावमादा कत्तो सो होदि तरस भावस्स।
कम्मत्तं परिणमदे तह्सि सयं पोग्गल दव्वं ।।६१।।
जे भाव जीव करे अरे! जीव तेदनो कर्ता बने;
कर्ता थतां, पुद्गल स्वयं त्यां कर्मरूपे परिणमे. ८१.
अर्थ :-आत्मा जे भावनो करे छे ते भावनो ते कर्ता थाय
छे; ते कर्ता थतां पुद्गलद्रव्य पोतानी मेळे कर्मरूपे परिणमे छे.
जदि सो परदव्वणि व करेज्ज णियमेण तम्मुओ होज्ज।
जम्हा ण तम्मुओ तेण सो ण तेसिं हवदि कत्ता ।।६६।।
परद्रव्यने जीव जो करे तो जरूर तन्मय ते बने,
पण ते नथी तन्मय अरे! तेथी नहीं कर्ता करे. ८८.
अर्थ :-जो आत्मा परद्रव्यने करे तो ते नियमथी तन्मय
अर्थात् परद्रव्यमय थर्इ जाय; परंतु तन्मय नथी तेथी ते तेमनो
कर्ता नथी.
जं भावं सुहमसुहं चेदा आदा स तरस खलु कत्ता।
तं तरस होदि कम्मं सो तरस दु वेदयगो अप्पा ।।१०२।।
जे भाव जीव करे शुभाशुभ तेहनो कर्ता खरे,
तेनुं बने ते कर्म, आत्मा तेहनो वेदक बने. १०२.
अर्थ :-आत्मा जे शुभ के अशुभ (पोताना) भावनो करे छे
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प्रतिक्रमण-आवश्यक ]
[ १०
ते भावनो ते खरेज कर्ता थाय छे, ते (भाव) तेनुं कर्म थाय
छे अने ते आत्मा तेनो (ते भावरूप कर्मनो) भोक्ता थाय छे.
जो जम्हि गुणे दव्वे सो अण्णदि दु ण संकमदि दव्वे।
सो अण्णसंकरंतो कह तं परिणामए दव्वं ।।१०३।।
जे द्रव्य जे गुण-द्रव्यमां, नहि अन्य द्रव्ये संक्रमे;
असंख्यमां ते केम अन्य परिणामे द्रव्यने? १०३.
अर्थ :-जे वस्तु (अर्थात् द्रव्य) जे द्रव्यमां अने गुणमां वर्ते
छे ते अन्य द्रव्यमां तथा गुणमां संक्रामक पामती नथी (अर्थात्
बदलाइने अन्यमां भळी जती नथी); अन्यरूपे संक्रामक नहि पामी
थकी ते (वस्तु), अन्य वस्तुने केम परिणामवी शके?
जे कुणदि भावमादा कत्तो सो होदि तरस कम्मस्स।
णाणिसस स णाणमओ अण्णाणिसस अण्णाणिस ।।१२६।।
जे भावनो आत्मा करे, कर्ता बने ते कर्मनो;
ते ज्ञानमय छे ज्ञानीनो, अज्ञानमय अज्ञानीनो. १२६.
अर्थ :-आत्मा जे भावनो करे छे ते भावरूप कर्मनो ते कर्ता
थाय छे; ज्ञानीने तो ते भाव ज्ञानमय छे अने अज्ञानीने
अज्ञानमय छे.
णाणमया भावाओ णाणमओ चेव जायदे भावो।
जम्हा तम्हा णाणिसस भावा हु णाणमया ।।१२८।।
अण्णाणमया भावा अण्णाणमओ चेव जायदे भावो।
जम्हा तम्हा अण्णाणिसस भावा अण्णाणमया ।।१२६।।
वळी ज्ञानमय जो भावमांथी ज्ञानभाव ज दीपजे,
ते कारणे ज्ञानी तणा सो भाव ज्ञानमयथी भरे; १२८.
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१८ /
[ सर्वसामान्य
अज्ञानमय जो भावथी अज्ञानभाव ज दीपजे,
ते कारणे अज्ञानीना भाव अज्ञानमय ज बने. १२८.
अर्थ :-कारण के ज्ञानमय भावमांथी ज्ञानमय ज भाव
उत्पन्न थाय छे तेथी ज्ञानीना सर्व भावो खरेज ज्ञानमय ज
होय छे. अने, कारण के अज्ञानमय भावमांथी अज्ञानमय ज भाव
उत्पन्न थाय छे तेथी अज्ञानीना भावो अज्ञानमय ज होय छे.
कणयमय भावाओ जायदे कुंडलदाओ भावा।
अययमया भावाओ जह जायदे हु कडयादी ।।१३०।।
अण्णाणमया भावा अण्णाणमओ विव जायदे।
णाणिसस दु णाणमया सव्वे भावा होति ।।१३१।।
जेम कनकमय जो भावमांथी कुंडलदिक दीपजे,
पण लोहमय जो भावथी कटकादिक भावो नीपजे; १३०.
त्यम भाव बहुविध दीपजे अज्ञानमय अज्ञानीने,
पण ज्ञानीने तो सर्व भावो ज्ञानमय एम ज बने. १३१.
अर्थ :-जेम सुवर्णमय भावमांथी सुवर्णमय कुंडल वगैरे भावो
थाय छे, तेम अज्ञानीने (अज्ञानमय भावमांथी) अनेक प्रकारना
अज्ञानमय भावो थाय छे अने ज्ञानीने (ज्ञानमय भावमांथी) सर्व
ज्ञानमय भावो थाय छे.
(३) पुण्य अने पापनुं स्वरूप
कम्ममहं कुसीलं सुहकम्मं चावि जाणह सुसीलं।
कह तं होदि सुसीलं जं संसारं पवेसदि ।।१४५।।
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प्रतिक्रमण-आवश्यक
[१६
है कर्म अशुभ कुशील का ने जाणो सुशीला शुभकर्मना।
ते केम होय सुशीला जे संसारमां दाखला करे ? १४५.
अर्थ :-अशुभ कर्म कुशीला है (=खराब है) और शुभ कर्म सुशीला है (=साधु) ऐसा तुम जानो ! तो सुशीला कैसे होय के जे (जीवने) संसारमां प्रवेश करावे है?
सोवण्णपि पि गिव्वंतं वंदियं कालायस पि जह पुरिसं।
वंदियं एवं जीवं सुहमुहं वा कदं कम्मं ॥१४६॥
जयम लोहत्तुं तय कनकनुं जेजर जकड़े पुरुषने,
एवी रीते शुभ के अशुभ कृत कर्म बांधे जीवने. १४६.
अर्थ :-जेम सुवर्णनी बेड़ी पण पुरुषने बांधे है अने लोहानी पण बांधे है, तेवी रीते शुभ तेम ज अशुभ करेलुं कर्म जीवने (अविशेषपणे) बांधे है.
परमट्ठि दु अट्ठो जो कुणदि तवं वदं च धारेदि।
तं सव्वं वालव्वदं वंति सव्वण्णू ॥१४२॥
परमार्थमां अस्थित जे तप करे, व्रतने धरे,
सद्बुद्धु ते तप बाळ ने व्रत बाळ सर्वज्ञो कहे. १४२.
अर्थ :-परमार्थमां अस्थित एवो जे जीव तप करे है तथा व्रत धारण करे है, तेनां ते सर्व तप अने व्रतने सर्वज्ञो बाळतप अने बाळव्रत कहे है.
वदणियमणि भरंता सीलणिणो तह तवं च कुव्वंता।
परमट्ठवाहिरा जे णिव्वणं ते ण विंदंति ॥१४३॥
व्रतनियमने धारे भले, तपशीलने पण आचरे,
परमार्थथी जे बाह्य ते निर्वाणप्राप्ति नहीं करे. १४३.
अर्थ :-व्रत अने नियमो धारण करता होवा छतां तेम ज
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[२०]
[सर्वसामान्य
शील अने तप करता होवा छतां जेओ परमार्थथी बाह्य है (अर्थात् परम पदार्थरूप ज्ञाननो एटले के ज्ञानस्वरूप आत्माने जेमने श्रद्धान नहीं) तेओ निर्वाणने पामता नथी.
परमट्ठवाहिरा जे ते अण्णाण पुण्णमिच्छंति।
संसारगमणहेदु पि मोक्खहेदु अजाणंता ॥१४४॥
परमार्थबाह्य जीवो अरे! जाणो न हेतु मोक्षनो,
अज्ञानथी ते पुण्य इच्छे हेतु जे संसारनो. १४४.
अर्थ :-जेओ परमार्थथी बाह्य है तेओ मोक्षना हेतुने नहि जाणता थका—जोके पुण्य संसारगमननो हेतु है तोपण— अज्ञानथी पुण्यने (मोक्षनो हेतु जाणीने) इच्छे है.
सो सव्वण्णदंसी कम्मरण णियरेणाच्छण्णो।
संसारसमावण्णो ण विजाणदि सव्वो सव्वं ॥१४०॥
ते सर्वज्ञानी-दर्शी पण निज कर्मरज-आच्छादने,
संसारप्राप्त न जाणतो ते सर्व रीते सर्वने. १४०.
अर्थ :-ते आत्मा (स्वभावथी) सर्वने जाणनारो तथा देखनारो है तोपण पोताना कर्मरजथी परडाओ-व्याप्त थयो-थको संसारने प्राप्त थयेलो ते सर्व प्रकारे सर्वने जाणतो नथी.
(४) आस्रवनुं स्वरूप
[जीवमां थता विकारी भावो (आस्रव) छोडवा लायक है एम बतानवनुं स्वरूप]
मिच्छत्तं अविरमणं कसाओगा य सण्णसण्णा दु।
बहविहभेया जीवे तस्सेव अण्णोण्णपरिणामा ॥१६४॥
णाणावरणदीवस्स दु कम्मस्स कारणं होदि।
तेसिं पि होदि जीवो य रमदोसादिभाकरी ॥१६५॥
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[२१]
प्रतिक्रमण-आवश्यक
मिथ्यात्व ने अविरत, कषायो, योग संज्ञा असंज्ञा छे,
ए विविध भेद भेदामां, जीवना अनन्य परिणाम छे; १६४.
वळी तेह ज्ञानावरणादिक कर्मनां कारण बने,
ने तेमनुं पण जीव बने ज रागद्वेषादिक करे. १६५.
अर्थ :-मिथ्यात्व, अविरम, कषाय अने योग—आ आस्रवो संज्ञ (अर्थात् चेतनना विकार) पण है अने असंज्ञ (अर्थात् पुद्गलना विकार) पण है. विविध भेदवाळा आस्रवो—के जेओ जीवमां उत्पन्न थाय है तेओ—जीवना ज अनन्य परिणाम है.
वळी आस्रवो ज्ञानावरणादि कर्मनुं कारण (निमित्त) थाय है अने तेमने पण (अर्थात् असंज्ञ आस्रवने पण कर्मबंधननुं निमित्त थवामां) रागद्वेषादि भाव करनारो जीव कारण (निमित्त) थाय है.
जाव ण वेदि विसेसं तु आदासवणो दोण्हु वि।
अण्णाणी ताव दु सो कोहादिसु वट्टदे जीवो ॥६६॥
कोहादिसु वट्टंतस्स सव्वरिसीहो ॥६७॥
जीवसेवंधो भणिदो खलु सव्वरिसीहो ॥६७॥
आत्मा अने आस्रव तणो ज्यां भेद जीव जाणे नहीं,
क्रोधादिमां स्थिति त्यां त्यां अज्ञानी एवा जीवनी.
जीव वर्त्ततां क्रोधादिमां संचय कर्मनो थाय छे,
सहु सर्वदर्शी आ रीते बंधन कहे छे जीवने. ६७.
अर्थ :-जेम जीव सुधी आत्मा अने आस्रव—ए बन्नेना तफावत अने भेदने जाणतो नथी त्यां सुधी ते अज्ञानी रह्यो थको क्रोधादिक आस्रवोमां प्रवर्त्ते नथी; क्रोधादिकमां वर्त्तता तेने कर्मनो संचय थाय है. अरेपर आ रीते जीवनो बंधन सहु सर्वज्ञोओ कह्यो है.
जइया इमेण जीवो अप्पणो आसवण य तहेव।
णादं होदि विसेसंतरं तु तइया ण बंधो ॥६८॥
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२२ /
[ सर्वसामान्य
आ जव्व जारे आसवओ तेण णिज्ज आत्तमा तणुं
जाणे विसेशांतरे, तदा बंधनं न ही तेन न तु. ७१.
अर्थ :-ज्यारे आ जीव आत्माना अने आसवना तफावतने
भले जाणे त्यारे तेने बंध थतो नथी.
णादुण आसवणं असुचित्तं च विवरीयभावं च ।
दुक्खस्स कारणं ति य ततो णिव्वत्ति जीवो ॥७२॥
अशुचिपणूं, विपरीतता अने आसवनां जाणीने,
वळी जाणीने दुःखकारण, एथी निवर्तन जीव करे. ७२.
अर्थ :-आसवोनुं अशुचिपणूं अने विपरीतपणुं तथा तेओ
दुःखनां कारण छे एम जाणीने जीव तेमनाथी निवृत्ति करे छे.
जीवोणिव्वदा एदु असुत्तं अणिच्चा तहा असरणा व ।
दुक्खा दुक्खफल ति य णादुण णिव्वत्तई ॥७४॥
आ सर्व जीवणिवद्ध, अशुद्ध, अशरणहीन, अनित्य छे,
अने दुःख, दुःखभळ जाणीने एनाथी जीव पाछो वळे. ७४.
अर्थ :-आ आसवो जीवनी साथे निबद्ध छे, अशुद्ध छे, अनित्य
छे तेम ज अशरण छे, वळी तेम ज दुःखरूप छे, दुःख जे जेमनुं फळ
छे एवा छे, -एवुं जाणीने ज्ञानी तेमनाथी निवृत्ति करे छे.
(५) संवरनुं स्वरूप
[जीवना शुभाशुभ भावो केम एककाळवा ते बतावनानुं स्वरूप]
उवओगे उवओगो कोहाइसु णत्थि ते उवओगो ।
कोहो चेव हि उवओगे णत्थि खलु कोहो ॥१८९॥
उपयोगमां उपयोग, को उपयोग नहि क्रोधादिमां,
छे क्रोध कोइ मळी ज, निश्चय कोइ नहि उपयोगमां. १८९.
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[ प्रतिक्रमण-आवश्यक ]
/ २३
अर्थ :-उपयोगमां उपयोग छे, क्रोधादिकमां कोइ उपयोग
नथी; वळी क्रोध क्रोधमां ज छे, उपयोगमां निश्चयथी क्रोध नथी.
तह कम्मोदयवित्तो ण जहदि णु गाणीणु ॥१८९॥
जेम अग्निनत सुवर्ण पण निज स्वर्णभाव नहीं तजे,
त्यम कर्मोदयत पण पण ज्ञानीपणुं नतजे. १८९.
अर्थ :-जेम सुवर्ण अग्निनो तप्त थयुं थकुं पण तेना
सुवर्णपणाने छोडतुं नथी तेम ज्ञानी कर्मना उदयथी तप्त थयो थको
पण ज्ञानीपणाने छोडतो नथी.
सुद्धं तु वियाणंतो सुद्धं चेवप्पयं लहदि जीवो ।
जाणंतो दु असुद्धं असुद्धमेवप्पयं लहदि ॥१९८॥
जे शुद्ध जाणे आत्मने ते शुद्ध आत्म ज मेळवे;
अशुद्ध जाणे आत्मने अशुद्ध आत्म ज ते लहे. १९८.
अर्थ :-शुद्ध आत्माने जाणतो-अनुभवतो जीव शुद्ध आत्माने
ज पामे छे अने अशुद्ध आत्माने जाणतो-अनुभवतो जीव अशुद्ध
आत्माने ज पामे छे.
अप्पाणमप्पणा रुंधिऊण दोण्णुपओगमेसु ।
दंसणणाणम्हि ठिदा इव्वाविरो व अण्णम्हि ॥१९८॥
जो सव्वसंगमुक्को झायदि अप्पाणमप्पणो अप्पा ।
ण वि कम्मं णोकम्मं चेदा चित्तदि एव्वत्तं ॥१९९॥
अप्पाणं झाणंतो दंसणणाणओ अण्णमण्णो ।
लहदि अहिरेण अप्पामेव सो कम्मविमुक्कं ॥१९९॥
पुष्पामपायोगथी रोकीने निज आत्मामा आत्मा थई,
दर्शन ज्ञानने धरी, परद्रव्येच्छा परिहरी. १९८.
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२४ /
[ सर्वसामान्य
जे सर्वसंगविमुक्त, ध्यावे आत्मने आत्मा वडे,
-नहि कर्म के नोकर्म, चेतक चेततो एकत्वने. १९८.
ते आत्म ध्यातो, ज्ञानदर्शनमय, अनन्यमयी खरे,
बस अल्प काळे कर्मथी प्रविमुक्त आत्माने वरे. १९८.
अर्थ :-आत्माने आत्मा वडे जे पुण्य-पापशुभरूप
योगोथी रोकीने दर्शनज्ञानमां स्थित थयो थको अने अन्य (वस्तु)नी
संगथी विरमो थको, जे आत्मा, (झंझारहित थवाथी) सर्व
संगथी रहित थयो थको, (पोताना) आत्माने आत्मा वडे ध्यावे
छे-कर्म अने नोकर्मने ध्यातो नथी, (पोते) 'चेतयिता (होवाथी)
एकत्वने ज चेतवे छे-अनुभवे छे, ते (आत्मा) आत्माने
ध्यातो, दर्शनज्ञानमय अने अनन्यमय थयो थको अल्प काळमां ज
कर्मथी रहित आत्माने पामे छे.
(६) निर्जरानुं स्वरूप
[संवरपूर्वक जे पूर्वना विकारी भावोने तथा पूर्व बांधेला कर्मोने टाळे छे
तेने निर्जरा कहे छे, ते बतावनानुं स्वरूप.]
उदयवित्तानो विविहो कम्मणो तुण्णिदो जिव्वरहिं ।
ण दु ते मज्झ सहावा जाणगभावो दु अहमेक्को ॥१८८॥
कर्मो तणो जे विविध उदयविपाक जिव्वरहनो
ते नथी जो स्वभावो छे नहि, हुं एक ज्ञायकभाव छुं. १८८.
अर्थ :-कर्मोना उदयमनो विपाक (फळ) जिनवरोए अनेक
प्रकारनो वर्णव्यो छे ते मारा स्वभावो नथी; हुं तो एक
ज्ञायकभाव छुं.
१. चेतयिता = चेतना; जाणनार-जाणनार.
२. अनन्यमय = अन्यमय नहि होवो.
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प्रतिक्रमण-आवश्यक ]
— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —
मूल दस्तावेज़ (PDF): 2446.pdf
स्रोत: Gyata संग्रह।
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