सर्वसामान्य प्रतिक्रमण - आवश्यक | Sarvsamanya Pratikraman - Aavashyak

सर्वसामान्य प्रतिक्रमण - आवश्यक

— यह ग्रंथ का अंश है; पूर्ण ग्रंथ नीचे संलग्न PDF में उपलब्ध है —

सर्वसामान्य
प्रतिक्रमण - आवश्यक

: प्रकाशक :
श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट,
सोनगढ - ३६४२५० (सौराष्ट्र)

श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, सोनगढ - ३६४२५०

भगवान श्री कुंदकुंद-कहान जैन शास्त्रमाला, पुष्प-२५४


सर्वज्ञाय नमः।

सर्वसामान्य
प्रतिक्रमण-आवश्यक

प्रकाशक
श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
सोनगढ-३६४२५० (सौराष्ट्र)

Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250

श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, सोनगढ - ३६४२५०

[ २ ]
प्रथम संस्करण : ८०० वि. सं. २०७३ ई. स. २०१७

सर्व-सामान्य प्रतिक्रमण आवश्यक (हिन्दी)के
स्थायी प्रकाशन-पुरस्कर्ता
सीडनी मुमुक्षु मंडल,
सीडनी (ऑस्ट्रेलिया)

मूल्य : रू. 10=00

मुद्रक :
स्मृति ऑफसेट
प्लॉट नं. १३, कहानवाडी, अंकुर स्कूल रोड
सोनगढ-३६४२५०

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परम पूज्य अध्यात्ममूर्ति सद्गुरुदेव श्री कानजीस्वामी

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अनुक्रमणिका

प्रथम प्रतिक्रमण

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
निश्चय और व्यवहार समयज्ञानमें लगे हुवे दोषोंका
प्रतिक्रमणकी व्याख्या — 1 प्रतिक्रमण — 37
प्रतिक्रमण के छ विभाग — 1 बारह प्रकारके व्रतोंका स्वरूप 37
नमस्कार मंत्र — 2 संलेखना — 41
वंदना — 2 मिथ्यात्वका स्वरूप — 41
सामायिकका स्वरूप — 3 चार मंगल — 43
तीर्थंकर भगवानकी स्तुतिका क्षमापना — 43
स्वरूप — 6 लोगस्ससूत्रका कायोत्सर्ग — 46
छः पदका पाठ (कायोत्सर्ग) - 7 प्रत्याख्यान — 48
श्री सद्गुरु-वंदन — 11 णमोत्थुणं — 48
समकितका सच्चा स्वरूप — 12 स्वाध्यायकी महिमा — 50

द्वितीय प्रतिक्रमण

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
देवगुरुधर्म मंगल — 51 प्रत्याख्यान — 61
दिव्यध्वनि नमस्कार — 51 जिनजीकी वाणी — 61
ब्रह्मचर्य-महिमा — 51 अंतिम मंगल — 62
सर्वज्ञका स्वरूप — 52 उपादान-निमित्तके दोहे — 63
समयसारजी स्तुति — 52 उपादान-निमित्तका संवाद — 65
आत्मसिद्धि शास्त्रके पद — 53 सद्गुरु-उपकारदर्शन — 77
सामायिक पाठ — 56 प्रणिपात-स्तुति — 77
श्रावकका कर्तव्य — 58 गुरुदेवश्री प्रति
मिच्छामि दुक्कडं — 58 क्षमापना स्तुति — 78
परमपद प्राप्तिकी भावना — 59 तात्त्विक सुवाक्य — 79

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सूचना

  1. जो मुमुक्षु प्रतिक्रमण करते समय मूल गाथाएँ एवं कवित्त समझ सकते हो उनको वह बोलकर उनका भाव बराबर समझना। उनको अर्थ पढ़नेकी जरूरत नहीं।

  2. जो मूल गाथा एवं कवित्त पढ़कर समझ न सकते हो उनको अर्थ बोलकर प्रतिक्रमणके भाव यथार्थ समझना चाहिये। उनके लिये उसका मूल पाठ एवं कवित्त पढ़नेकी जरूरत नहीं।

  3. जिनके पास समय कम हो वे लघुप्रतिक्रमण बोलकर उनका अर्थ बराबर समझे। जिनको संवत्सरीके दिन एवं धार्मिक त्योहारके दिन दो प्रतिक्रमण करने हो वे दो प्रतिक्रमण करें।

  4. कोई आत्माथी स्वलक्षसे यह आवश्यक क्रियाको प्रतिदिन आत्मशुद्धिके लिये करेगा वह जरूर आत्मशांति पायेगा।

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॥ श्री वीतरागाय नमः ॥

सर्व सामान्य प्रतिक्रमण-आवश्यक

प्रतिक्रमणके दो प्रकार है : (१) निश्चय और (२) व्यवहार।

निश्चयप्रतिक्रमणकी व्याख्या :-

पूर्वमें किये हुए जो अनेक प्रकारके विस्तारवाले शुभाशुभ कर्म उससे जो आत्मा, अपनेको दूर रखता (निवर्तता) है वो आत्मा प्रतिक्रमण है।

व्यवहार-प्रतिक्रमणकी व्याख्या :-

अपने शुभाशुभ कर्मका आत्म निंद्यापूर्वक त्याग करनेका भाव-आत्माके ऐसे विशुद्ध परिणाम कि जिसमें अशुभ परिणामोकी निवृत्ति हो।
प्रतिक्रमणके निम्न प्रकारसे छ विभाग है :-
(१) सामायिक,
(२) तीर्थंकर भगवानकी स्तुति,
(३) वंदन,
(४) प्रतिक्रमण,
(५) कायोत्सर्ग,
(६) प्रत्याख्यान।
[श्री सीमंधरप्रभुकी आज्ञा लेकर प्रतिक्रमण शुरु करता हूँ।]

१. समयसार गाथा २८३
२. श्रावक प्रतिक्रमण (पंडित नंदलालकृत प्रस्तावनामेंसे)

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[२]

पाठ : १

मंगलाचरण : नमस्कार-मंत्र

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं॥

अर्थ :-

श्री अरिहंतोंको नमस्कार हो, सिद्धोंको नमस्कार हो, आचार्योंको नमस्कार हो, उपाध्यायोंको नमस्कार हो और लोकमें स्थित सर्व साधुओंको नमस्कार हो।¹

अरिहंत सिद्ध आचार्य ने, उपाध्याय मुनिराज,
पंच पद व्यवहारथी, निश्चयै आत्मामां ज. १०४²

पाठ : २

वंदना (तिकखुत्तो)

तिकखुत्तो, आयाहिणं, पयाहिणं, वंदामि, णमंसामि, सक्कारमि,
सम्माणेमि, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, चेइयं, पज्जुवासामि.

अर्थ :-

पंच परमेष्ठिको दो हाथ जोडकर आवर्तनसे तीन बार प्रदक्षिणा देकर मैं स्तुति करता हूँ। नमस्कार करता हूँ, विनयसे सत्कार करता हूँ, विवेकपूर्वक सन्मान करता हूँ। हे पूज्य! आप कल्याणरूप, मंगलरूप, देवरूप, ज्ञानरूप हो, इसलिये मैं आपकी पर्युपासना-सेवा करता हूँ।

१. यह पंच परमेष्ठीका स्वरूप मोक्षमार्ग प्रकाशक (गुजराती) पेज २ से ६ तक है। जिज्ञासु वहाँसे देख ले।
२. योगीन्द्र देवकृत योगसारमेंसे।

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[प्रतिक्रमण-आवश्यक]
[३]

पाठ : ३*

आत्मा के कैसे भावको श्री भगवान सामायिक कहते है, वह अब कहनेमें आता है :-

जे समतामां लीन थई, करे अधिक अध्याय;
अखिल कर्म ते क्षय करी, पामे शिवपुर वास. ६३.
सर्व जीव छे ज्ञानमय, जाणे समता धार;
ते सामायिक जिन कहे, प्रगट करे भवपार. ६६.
राग-द्वेष बे त्यागीने, धारे समता भाव;
सामायिक चारित्र ते, कहे जिनवर मुनिराव. १००.

(हरिगीत)

बिरदो सव्वसवे विगुत्तो विविदिओ।
तरस सामाइगं ठाउ इदि केवलिसासणे॥ १२५॥

सावदविरत, त्रिगुम्मय अरु पिहितइन्दिय जो रहे।
स्थायी सामायिक है उसे, यों केवलीशासन कहे॥ १२५॥

अर्थ :-

जो सर्व सावद्यमें विरत है, जो तीन गुप्तियोंवाला है और जिसने इन्द्रियोंको बन्द (निरुद्ध) किया है, उसे सामायिक स्थायी है। ऐसा केवलीके शासनमें कहा है।

जो समो सव्वभूदेसु थावरेसु तसेसु वा।
तरस सामाइगं ठाउ इदि केवलिसासणे॥ १२६॥

स्थावर तथा त्रस सर्व जीवसमूह प्रति समता लहे।
स्थायी सामायिक है उसे, यों केवली शासन कहे॥ १२६॥

अर्थ :-

जो स्थावर अथवा त्रस सर्व जीवोंके प्रति समभाववाला है, उसे सामायिक स्थायी है ऐसा केवलीके शासनमें कहा है।

  • योगीन्द्र देवकृत योगसारमेंसे।
    १. यह नं. १२५ से १३३ तककी गाथा श्री नियमसारकी है।

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[ 4 ]

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 2449.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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