सर्वज्ञसिद्धि : महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर | Sarvajnasiddhi Mahattvapurn Prashnottar

सर्वज्ञसिद्धि : महत्त्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

-प्रो. वीरसागर जैन

प्रश्न- सर्वज्ञसिद्धि के सामान्य सर्वज्ञसिद्धि और विशेष सर्वज्ञसिद्धि -ऐसे दो भेद करने का प्रयोजन क्या है ?
उत्तर- दरअसल, कुछ लोग तो यहीं बुरी तरह अटके रहते हैं कि सर्वज्ञ कोई हो ही नहीं सकता, सम्भव ही नहीं है; अतः ऐसे लोगों का यह दुराग्रह छुड़वाने के लिए पहले सामान्य सर्वज्ञसिद्धि करना आवश्यक है | सामान्य सर्वज्ञसिद्धि में पहले सामने वाले को अनेक तर्कों से यह समझाया जाता है कि कोई आत्मा सर्वज्ञ हो सकता है, ऐसा होना सम्भव है, असम्भव नहीं है | तथा जब वह इस बात को नहीं मानता है, अपने दुराग्रह पर ही अडिग रहता है तो उससे कहा जाता है कि अच्छा चलो, तुम सिद्ध करो कि सर्वज्ञ नहीं हो सकता | इस पर वह यह भी सिद्ध नहीं कर पाता है कि सर्वज्ञ नहीं हो सकता है तो उसका दुराग्रह टूट जाता है और उसमें सर्वज्ञ को समझने की पात्रता उत्पन्न हो जाती है |

प्रश्न- विशेष सर्वज्ञसिद्धि में क्या सिद्ध किया जाता है ?
उत्तर- विशेष सर्वज्ञसिद्धि में यह सिद्ध किया जाता है कि अरिहंत ही सर्वज्ञ हैं, कपिलादि नहीं |

प्रश्न- हम कैसे जान सकते हैं कि अरिहंत ही सर्वज्ञ हैं, कपिलादि नहीं ? इसका प्रमाण क्या है ?
उत्तर- अनुमान प्रमाण के द्वारा हम जान सकते हैं कि अरिहंत ही सर्वज्ञ हैं, कपिलादि नहीं; क्योंकि अरिहंत ही निर्दोष हैं, कपिलादि निर्दोष नहीं |

प्रश्न- अरिहंत ही निर्दोष हैं, कपिलादि निर्दोष नहीं -इसका क्या हेतु है ?
उत्तर- अरिहंत ही निर्दोष हैं, कपिलादि निर्दोष नहीं -इसका हेतु यह है कि अरिहंत ही यथार्थवादी (सत्यवादी) हैं, कपिलादि यथार्थवादी नहीं |

प्रश्न- अरिहंत ही यथार्थवादी हैं, कपिलादि यथार्थवादी नहीं -इसका क्या हेतु है ?
उत्तर- अरिहंत ही यथार्थवादी हैं, कपिलादि यथार्थवादी नहीं -इसका हेतु यह है कि अरिहंत के ही वचन दृष्टेष्ट-अविरोधी हैं, कपिलादि के वचन दृष्टेष्ट-अविरोधी नहीं |

प्रश्न- दृष्टेष्ट-अविरोधी का क्या अर्थ है ?
उत्तर- दृष्ट का अर्थ है प्रत्यक्ष और इष्ट का अर्थ है अनुमान आदि | अरिहंत के ही वचन दृष्टेष्ट-अविरोधी हैं -इसका अर्थ हुआ कि अरिहंत के वचन प्रत्यक्ष और अनुमान आदि से अविरोधी है | दृष्टेष्ट-अविरोधी को हम प्रमाण-अविरोधी भी कह सकते हैं | तात्पर्य है कि अरिहंत के वचन प्रमाणसंगत हैं, युक्तिसंगत हैं, प्रमाणविरुद्ध नहीं हैं, युक्तिविरुद्ध नहीं हैं | किन्तु कपिलादि के वचन दृष्टेष्ट-विरोधी हैं, प्रमाणविरोधी हैं, युक्तिविरुद्ध हैं |

प्रश्न- अरिहंत के ही वचन यथार्थ हैं, कपिलादि के वचन यथार्थ नहीं -इसका क्या हेतु है ?

उत्तर- अरिहंत के ही वचन यथार्थ हैं, कपिलादि के वचन यथार्थ नहीं - इसका हेतु यह है कि अरिहंत के ही वचन स्याद्वाद-मुद्रांकित हैं, कपिलादि के वचन नहीं, कपिलादि के वचन तो एकान्तरूप हैं |

प्रश्न- स्याद्वादी ही यथार्थवादी होता है, एकांतवादी यथार्थवादी नहीं - इसका क्या हेतु है ?

उत्तर- स्याद्वादी ही यथार्थवादी होता है, एकांतवादी यथार्थवादी नहीं होता, क्योंकि वस्तु का स्वरूप अनेकान्तात्मक है, एकान्तात्मक नहीं है |

प्रश्न- वस्तु का स्वरूप अनेकान्तात्मक है-इसका क्या प्रमाण है ?

उत्तर- हमें प्रत्यक्ष दिखाई देता है कि वस्तु में एक साथ सत्-असत्, नित्य-अनित्य आदि अनेक परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले अनेक धर्म रहते हैं | कोई भी व्यक्ति उन्हें सरलता से जान सकता है, सिद्ध कर सकता है | एकान्तरूप वस्तु में किसी प्रकार की कोई अर्थक्रिया घटित नहीं होती, बन्ध-मोक्षादि की भी कोई व्यवस्था नहीं बनती | अन्य भी अनेक महादोष एकान्तवाद में उत्पन्न होते हैं ।

प्रश्न- यहाँ सर्वज्ञसिद्धि के लिए अरिहंत के यथार्थवादित्व (सत्यवादित्व) को हेतु बनाया गया है तो क्या सर्वज्ञ को यथार्थवादी होना अनिवार्य है ? क्या कोई अयथार्थवादी (मिथ्यावादी) सर्वज्ञ नहीं हो सकता है ?

उत्तर- अयथार्थ (मिथ्या) कथन करने के दो ही कारण होते हैं- राग-द्वेष एवं अज्ञान | अन्य तीसरा कोई कारण नहीं होता | अतः मिथ्यावादी निश्चित रूप से दोषावरण से सहित सिद्ध होता है | जो दोषावरण से सहित है, वह सर्वज्ञ सिद्ध नहीं हो सकता |

प्रश्न- जो सत्यवादी हो वह भी तो असर्वज्ञ हो सकता है, फिर सत्यवादित्व को सर्वज्ञता का हेतु कैसे बनाया जा सकता है ?

उत्तर- आपने विपरीत व्याप्ति लगाने का प्रयास किया है | सीधी व्याप्ति यहाँ यह है कि जो सर्वज्ञ होगा, वह सत्यवादी ही होगा, मिथ्यावादी नहीं हो सकता |

इसप्रकार यहाँ सर्वप्रथम आप्त की हितोपदेशिता सिद्ध की गई, उसके बाद हितोपदेशिता से उनकी निर्दोषता सिद्ध की गई और फिर निर्दोषता से उनकी सर्वज्ञता सिद्ध की गई | प्रतीत होता है कि इसीलिए तत्त्वार्थसूत्र के मंगलाचरणश्लोक में आप्त के तीन गुणों का क्रम यह रखा गया है- हितोपदेशिता, वीतरागता, सर्वज्ञता |

आचार्य विद्यानंद स्वामी ने भी अपनी आप्तपरीक्षा में इस क्रम के अनुसार प्रथम अर्हत्सर्वज्ञसिद्धि, द्वितीय अर्हत्कर्मभूभृद्धेतृत्वसिद्धि और तृतीय अर्हन्मोक्षमार्गनेतृत्वसिद्धि को लिखा है |

प्रश्न- सामान्य सर्वज्ञसिद्धि के प्रकरण में एक अतिशायन हेतु दिया गया है। कहा गया है कि रागादि घटते जाते हैं और ज्ञानादि बढ़ते जाते हैं -इससे सिद्ध होता है कि एक स्थिति ऐसी भी आ सकती है कि जब रागादि का पूर्ण अभाव हो जाए और ज्ञानादिक का पूर्ण विकास हो जाए | यहाँ प्रश्न है कि यह बात विपरीत भी तो हो सकती है कि ज्ञानादि का पूर्ण अभाव हो जाए और रागादिक का पूर्ण विकास हो जाए ?

उत्तर- रागादि आत्मा के विभाव हैं और ज्ञानादि आत्मा के स्वभाव हैं | स्वभाव का पूर्ण अभाव कभी नहीं होता |

प्रश्न- यह भी तो हो सकता है कि रागादि आत्मा के स्वभाव हों और ज्ञानादिक आत्मा के विभाव ?

उत्तर- नहीं, रागादि आत्मा के स्वभाव नहीं हैं | स्वभाव और विभाव में बड़ा अंतर होता है | जो स्वभाव हो वह दुःख का कारण नहीं हो सकता, बन्ध का कारण नहीं हो सकता | रागादि दुःख के कारण हैं, बन्ध के कारण हैं - इससे सिद्ध होता है कि वे आत्मा के स्वभाव नहीं हैं | रागादि परलक्ष्य से ही होते हैं, उसके बिना नहीं होते -इससे भी सिद्ध होता है कि वे आत्मा के विभाव हैं, स्वभाव नहीं | जिस प्रकार उष्णता जल का स्वभाव नहीं है, क्योंकि वह अग्नि के संयोग से आती है, उसीप्रकार रागादि भी आत्मा के स्वभाव नहीं हैं, क्योंकि वे कर्म के उदय से होते हैं |

प्रश्न- अतिशायन का अर्थ क्या है ?

उत्तर- अतिशायन अर्थात् प्रकर्ष, वृद्धि, रागादि के अपकर्ष से ज्ञानादि का प्रकर्ष | जैसे जैसे रागादि घटते जाते हैं, वैसे वैसे ज्ञानादि बढ़ते जाते हैं, उनका प्रकर्ष होता है | रागादि की हानि के साथ ज्ञानादिक की वृद्धि का नियम है |

प्रश्न- माना कि रागादि का पूर्ण अभाव हो सकता है, किन्तु रागादि के पूर्ण अभाव से सर्वज्ञता प्रकट हो ही -यह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि रागादि (दोषावरण) का अभाव तो पाषाणादि में भी हो जाता है ?

उत्तर- पाषाणादि का दृष्टान्त यहाँ उचित नहीं है, क्योंकि पाषाणादि में से तो आत्मा का ही अभाव हो गया है, वहाँ आत्मा ही नहीं रहा है, आत्मा तो वहाँ से कहीं अन्यत्र चला गया है | यहाँ तो आत्मा में से रागादि के अभाव की बात कही जा रही है, विभावों के विनाश की बात कही जा रही है | जिस आत्मा में से रागादि विभावों का अभाव होगा, वह अवश्य ही पूर्ण शुद्ध होगा और उसमें सर्वज्ञता प्रकट होगी ही |

प्रश्न- सामान्य सर्वज्ञसिद्धि के प्रकरण में एक हेतु यह दिया गया है कि सूक्ष्म-अंतरित-दूरवर्ती सभी पदार्थ अनुमेय हैं -इससे सिद्ध होता है कि वे किसी के प्रत्यक्ष भी अवश्य हैं। सो यह कैसे है ? यह भी तो हो सकता है कि वे किसी के भी प्रत्यक्ष न हों | जो जो अनुमेय होगा वह सब प्रत्यक्ष हो ही -यह अनिवार्य तो नहीं ।

उत्तर- यह सामान्य सर्वज्ञसिद्धि का प्रकरण है | यहाँ केवल इतना सिद्ध किया जा रहा है कि सभी पदार्थ प्रत्यक्ष हो सकते हैं, उसमें किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है, क्योंकि कुछ लोग यह स्थापित करते हैं कि सभी पदार्थ प्रत्यक्ष हो ही नहीं सकते हैं, उन्हें तो केवल वेद आदि ही जान सकते हैं, इत्यादि (यथा मीमांसक कहते हैं- ‘चोदना हि भूतं भवन्तं भविष्यन्तं सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टमवगमयति’ ) | अतएव यहाँ जैन आचार्य कह रहे हैं कि दुनिया में दो प्रकार के पदार्थ हैं- प्रत्यक्ष और परोक्ष | प्रत्यक्ष पदार्थ तो प्रत्यक्ष हैं ही, परोक्ष पदार्थ भी जो कि सूक्ष्म, अंतरित, दूर के भेद से तीन प्रकार के हैं, प्रत्यक्ष सिद्ध होते हैं, क्योंकि वे सब अनुमेय हैं | अनुमेय वही हो सकता है जो प्रत्यक्ष होता हो | प्रत्यक्ष के बिना अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती | परीक्षामुखसूत्र में भी कहा गया है कि- ‘प्रत्यक्षादिनिमित्तं स्मृतिप्रत्यभिज्ञानतर्कानुमानागमभेदम्’ अर्थात् स्मृति, प्रत्यभिज्ञान, तर्क, अनुमान और आगम ये सब प्रत्यक्षपूर्वक ही होते हैं । इस प्रकार यहाँ यह सिद्ध किया गया है कि अनुमेय (परोक्ष) पदार्थ भी प्रत्यक्ष हो सकते हैं, उसमें कोई बाधा नहीं है ।

जो लोग ऐसा कहते हैं कि वेद ही सब पदार्थों को जान सकता है, उन्हें जैन आचार्य एक तर्क यह भी देते हैं कि यदि आपकी यह बात मानी जाए तब भी यह तो सिद्ध हो ही गया कि सब पदार्थ ज्ञेय हैं, प्रमेय हैं, उनमें ज्ञेयत्व, प्रमेयत्व अवश्य है । यदि नहीं होता तो वे वेद के द्वारा भी नहीं जाने जा सकते थे ।

इस प्रकार यहाँ यह स्थापित किया गया है कि सभी पदार्थ प्रत्यक्ष जाने जा सकते हैं । नहीं जाने जा सकते हों ऐसी बात नहीं है ।

प्रश्न- आप्तमीमांसा की तीसरी कारिका में कहा है कि सभी मतों और उनके प्रणेताओं में परस्पर विरोध पाया जाता है - इससे सिद्ध होता है कि उनमें से कोई एक ही सत्य है । सो यह कैसे है ? यह भी तो हो सकता है कि उनमें से एक भी सत्य न हो, वे सभी मिथ्या हों ?

उत्तर- दरअसल, वहाँ पहले सभी मतों को दो भागों में विभाजित कर लिया गया है- एकान्तरूप और अनेकान्त रूप । उसके बाद आचार्य कहते हैं कि इनमें परस्पर विरोध है, अतः सिद्ध होता है कि इनमें से कोई एक ही सत्य हो सकता है, दोनों सत्य नहीं हो सकते । दोनों मिथ्या भी नहीं हो सकते और दोनों सत्य भी नहीं हो सकते । जिस प्रकार अन्धकार और प्रकाश दोनों में विरोध है, उसी प्रकार एकान्त और अनेकान्त में परस्पर विरोध है । यदि एकांत सत्य है तो अनेकांत मिथ्या है और यदि अनेकांत सत्य है तो एकांत मिथ्या है । कोई एक ही सत्य हो सकता है ।

प्रश्न- सर्वज्ञता के सम्बन्ध में नियमसारादि में ऐसा भी तो लिखा है कि वह व्यवहार से ही होती है, निश्चय से तो केवलज्ञानी केवल अपनी आत्मा को ही जानते हैं ?

उत्तर- पराश्रित कथनों को जिनागम में व्यवहार कहने की शैली है, अतः वहाँ ऐसा लिखा है । उसका अभिप्राय यही है कि केवलज्ञानी पर के साथ तन्मय नहीं होते । यह अभिप्राय नहीं है कि वे पर को जानते ही नहीं है । यह अभिप्राय वहीं कुछ आगे-पीछे की गाथाओं और उनकी टीका को पढ़कर भी अत्यंत स्पष्ट हो जाता है तथा अन्यत्र भी अनेक ग्रन्थों में यही स्पष्टीकरण किया गया है (देखें- जैनेन्द्र सिद्धांत कोश, पृष्ठ 2/153) । दरअसल बात यह है कि यदि केवलज्ञानी पर को उसके साथ तन्मय होकर जानते हों तो उन्हें उसमें सुख-दुःख का भी अनुभव होगा, जो कि बिलकुल नहीं होता । अनुभव तो उन्हें केवल अपनी आत्मा के आनन्द का ही होता है । इस बात को पं. दौलतरामजी ने बहुत अच्छा लिखा है- “सकल ज्ञेय ज्ञायक तदपि, निजानन्द रस लीन” । (स्वानुभूत्या चकास्ते)

प्रश्न- अनेक ग्रन्थों में ऐसा भी लिखा है कि जो आत्मज्ञ है वही सर्वज्ञ है तो उसका क्या अभिप्राय है ?

उत्तर- यह एक आध्यात्मिक कथन है, जो आत्मज्ञान की प्रबल प्रेरणा देने के लिए किया गया है । इसका अभिप्राय है कि सभी शास्त्रों का सार एक आत्मा ही है । जिसने उस आत्मा को नहीं जाना उसने अन्य बहुत जाना हो तब भी समझो कुछ नहीं जाना और जिसने उस आत्मा को जान लिया उसने अन्य कुछ भी नहीं जाना हो तब भी समझो सब जान लिया । अथवा इसका अभिप्राय यह भी है कि अब वह शीघ्र ही सर्वज्ञ होनेवाला है । अथवा इसका

अभिप्राय यह भी है कि वह व्याप्तिज्ञान से सर्वज्ञ हो गया है | यह सब परमात्मप्रकाश १/९९ की संस्कृत- टीका में स्पष्ट लिखा है | अतः उक्त कथन का ऐसा अभिप्राय बिलकुल नहीं समझना चाहिए कि सर्व द्रव्य-पर्यायों को जाननेवाला सर्वज्ञ कोई नहीं है ।

प्रश्न- जिस प्रकार श्रुत के माध्यम से आत्मा को जानने वाले को श्रुतकेवली कहते हैं, उसी प्रकार लोकालोक में सारभूत आत्मा को जानने वाले को लोकालोकज्ञ कहते हैं, यदि ऐसा कहा जाए तो क्या दोष है ?

उत्तर- पूर्व प्रश्न के उत्तर में बताई गई आध्यात्मिक विवक्षा के अनुसार तो ऐसा कहा जा सकता है | उसमें कोई दोष नहीं है | परन्तु इस कथन का अभिप्राय ऐसा नहीं समझना चाहिए कि सर्व द्रव्य-पर्यायों को जाननेवाला सर्वज्ञ कोई है ही नहीं, केवल आत्मज्ञ को ही सर्वज्ञ कहा गया है, इत्यादि |

प्रश्न- क्या सर्व द्रव्य-गुण-पर्याय को जानने रूप सर्वज्ञता को स्वीकार करना अनिवार्य है ? उसके बिना आत्महित नहीं हो सकता ?

उत्तर- सर्वज्ञता को स्वीकार करना अनिवार्य ही है, क्योंकि वह आत्मा का स्वभाव है | आत्मस्वभाव को जाने बिना आत्महित कैसे हो सकता है ?

प्रश्न- क्या सिंह आदि पशुओं को सम्यक्त्व की प्राप्ति हुई तो उन्होंने सर्वज्ञता को स्वीकार किया था ?

उत्तर- हाँ, अवश्य किया था | भले ही वे उसे ठीक से शब्दों में व्यक्त न कर सकें, उसका पूरा विवरण प्रस्तुत न कर सकें, परन्तु उन्हें आत्मस्वभाव की अनुभूति में सर्वज्ञता की स्वीकृति गर्भित हो जाती है | मैं ज्ञानादि गुणों का धारी अनंत शक्तिशाली परमात्मा हूँ -ऐसा ज्ञान-श्रद्धान उन्हें भी स्पष्ट हो जाता है ।

प्रश्न- सर्वज्ञता के सम्बन्ध में अन्य दर्शनों का क्या कहना है ?

उत्तर- देखिए-

सांख्य दर्शन कहता है- सर्वज्ञता मुक्त जीव की एक विशेष विभूति है ।
योग दर्शन कहता है- सर्वज्ञता मुक्त जीव की एक विशेष विभूति है ।
न्याय दर्शन कहता है- महेश्वर सर्वज्ञ ही है।
वैशेषिक दर्शन कहता है- सर्वज्ञता मुक्त जीव का एक गुण है ।
मीमांसा दर्शन कहता है- सर्वज्ञ कोई पुरुष नहीं हो सकता, वेद ही हो सकता है ।
वेदान्त दर्शन कहता है- ब्रह्म सर्वस्व है ।
बौद्ध दर्शन कहता है- आत्मज्ञ ही सर्वज्ञ है।
चार्वाक दर्शन कहता है- सर्वज्ञ दुनिया में कोई नहीं है ।
जैन दर्शन कहता है- सर्वज्ञता प्रत्येक आत्मा का स्वभाव है, जो उसके शुद्ध होते ही प्रकट हो जाता है |