सर्वज्ञप्रणीत जैन भूगोल (डॉ. उज्ज्वला शहा) | Sarvagyapraneet Jain Bhoogol (Dr. Ujjwala Shah)

सर्वज्ञप्रणीत जैन भूगोल

लेखिका: डॉ. श्रीमती उज्ज्वला दिनेशचंद्र शहा (एम.बी.बी.एस., डी.सी.एच., डी.जी.पी.)
सम्पादक: पं. दिनेशभाई शहा (एम.ए., एल.एल.बी.)
प्रकाशक: वीतरागवाणीप्रकाशक, सायन (पूर्व), मुंबई
संस्करण: द्वितीय संस्करण, 29 अक्तूबर 2012 (प्रथम संस्करण 2000 प्रत, द्वितीय 4000 प्रत)
पृष्ठ: 216 + आरम्भ में 14 रंगीन चार्ट

परिचय (सार)

यह पुस्तक करणानुयोग के विषय ‘त्रिलोकरचना’ अर्थात् जैन भूगोल का सरल परिचय है। तीन लोक क्या हैं, कहाँ हैं, उनमें कौन-से जीव कहाँ रहते हैं, सिद्ध भगवान् कहाँ विराजमान हैं, और हम अनादि से कहाँ-कहाँ जन्म-मरण करते आए हैं, इन प्रश्नों का उत्तर जिनागम के आधार से क्रम से दिया गया है।

कैसे बनी: सन 2006 में देवलाली के कहाननगर में लेखिका ने चार दिन में बीस घण्टों का ‘जैन भूगोल’ शिबिर लिया था। उसकी बीस V.C.D. सुनकर प्रवचन अक्षरशः लिपिबद्ध किए गए। लेखिका ने स्वयं सुनकर त्रुटियाँ सुधारीं, नए कोष्टक बनाए और पूरा विषय पुस्तकरूप में फिर से लिखा। शिबिर में श्रोताओं के पूछे प्रश्न और उनके उत्तर उसी रूप में रखे गए हैं, इसलिए पूरी पुस्तक में प्रश्नोत्तर मिलते हैं।

आधार ग्रन्थ (पुस्तक में बताए अनुसार): आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती कृत त्रिलोकसार और उस पर पं. टोडरमलजी की ढूंढारी भाषा टीका, विशुद्धमति माताजी की त्रिलोकसार टीका, स्वामी कार्तिकेय कृत कार्तिकेयानुप्रेक्षा का लोकभावना अधिकार, आचार्य सूर्यसागरजी कृत ‘संयमप्रकाश’, तथा तत्त्वार्थसूत्र और उसकी टीकाएँ।

विशेषता:

  • आरम्भ के 14 रंगीन चार्ट लेखिका ने ग्रन्थों के वर्णन को पढ़कर उसी अनुपात में बनाए हैं: लोकाकाश, वातवलय, तिर्यक्लोक, ढाईद्वीप, जम्बूद्वीप, भरतक्षेत्र, लवणसमुद्र के पाताल, वैमानिक देवों के विमान आदि।
  • करणानुयोग के गंभीर विषय को द्रव्यानुयोग के सिद्धान्तों के साथ जोड़कर समझाया गया है: लोक का स्वरूप जानने का प्रयोजन संस्थानविचय धर्मध्यान और अपने ज्ञायक स्वभाव की ओर दृष्टि है।
  • बीच-बीच में त्रिलोकसार, कार्तिकेयानुप्रेक्षा आदि की मूल गाथाएँ उद्धृत हैं।

विषयसूची

क्र. अध्याय पृष्ठ
1 तीन लोक - सामान्य स्वरूप 1
2 आठ पृथ्वियाँ, वातवलय 14
3 अधोलोक - नरक 26
4 नारकियों में गति-आगति 41
5 शलाकापुरुष, अन्य शंका समाधान 55
6 अधोलोक के देव - भवनवासी 69
7 अधोलोक के देव - व्यंतर 79
8 ऊर्ध्वलोक - स्वर्गों के विमान 90
9 वैमानिक इन्द्र 103
10 देवों में गति-आगति, मध्यलोक 115
11 मध्यलोक : द्वीप-समुद्र 126
12 जम्बूद्वीप 133
13 भरतक्षेत्र 144
14 भोगभूमि, विदेहक्षेत्र 150
15 विद्याधर, कुभोगभूमि 160
16 लवणसमुद्र के पाताल 170
17 ज्योतिष्कविमान 179
18 पंचमेरु 190
19 नन्दीश्वर द्वीप (जयमाला सहित) 197
20 अकृत्रिम जिनचैत्यालय - वर्णन 204

(छपी हुई विषयसूची में अध्याय 1 से 14 ही दिए हैं; अध्याय 15 से 20 पुस्तक के अन्दर के शीर्षकों से लिए गए हैं।)

किसके लिए उपयोगी: जो करणानुयोग और तीन लोक की रचना का पहला परिचय चाहते हैं, स्वाध्याय मण्डल और शिबिर, तथा त्रिलोकसार जैसे बड़े ग्रन्थ पढ़ने से पहले आधार बनाना चाहने वाले पाठक। चार्ट और प्रश्नोत्तर इसे पढ़ाने में भी सहायक बनाते हैं।

नीचे पूरी पुस्तक की पीडीएफ है।

स्रोत: jain-bhoogol-hindi.pdf

jain-bhoogol-hindi.pdf (14705 KB)

खोज: Sarvagyapranit Jain Bhugol