सर्व सामान्य प्रतिक्रमण-आवश्यक | Sarv Samanya Pratikraman-Aavashyak

सर्व साधान्य प्रतिक्रमण-आवश्यक

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सर्वज्ञाय नमः।

सर्व सामान्य
प्रतिक्रमण-आवश्यक

प्रकाशक
श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
सोनगढ़-३६४२५० (सौराष्ट्र)

श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, सोनगढ़ - ३६४२५०

भगवान श्री कुंदकुंद-कहान जैन शास्त्रमाला, पुष्प-२३५


सर्वज्ञाय नमः।

सर्व सामान्य
प्रतिक्रमण-आवश्यक

हस्तलिखित पाठ: अहम् सिद्धानाम्

प्रकाशक
श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट
सोनगढ़-३६४२५० (सौराष्ट्र)

Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250

परम पूज्य अध्यात्ममूर्ति सद्गुरुदेव श्री कानजीस्वामी

Shri Digambar Jain Swadhyay Mandir Trust, Songadh - 364250

अनुक्रमणिका

प्रथम प्रतिक्रमण

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
निश्चय और व्यवहार सम्यग्ज्ञानके दोषका
प्रतिक्रमणकी व्याख्या 1 प्रतिक्रमण 37
प्रतिक्रमण के छ विभाग 1 बारह व्रतोंका स्वरूप 37
नमस्कार मंत्र 2 संल्लेखना 41
वंदना 2 मिथ्यात्वका स्वरूप 41
सामायिकका स्वरूप 3 चार मंगल 43
तीर्थंकर भगवानकी स्तुतिका क्षमापना 43
स्वरूप 6 लोगस्ससूत्रका कायोत्सर्ग 46
छः पदका पाठ (कायोत्सर्ग) 7 प्रत्याख्यान 48
श्री सद्गुरु-वंदन 11 नमोऽर्हत् 48
समकितका सच्चा स्वरूप 12 स्वाध्यायकी महिमा 50

द्वितीय प्रतिक्रमण

विषय पृष्ठ विषय पृष्ठ
देवगुरुधर्म मंगल 51 प्रत्याख्यान 61
सिद्धध्वनि नमस्कार 51 जिनजीकी वाणी 61
ब्रह्मचर्य-महिमा 51 अंतिम मंगल 62
सर्वज्ञका स्वरूप 52 उपादान-निमित्तका दोहा 63
समयसारजी स्तुति 52 उपादान-निमित्तका संवाद 65
आत्मसिद्धि शास्त्रके पदों 53 सद्गुरु-उपकारदर्शन 77
सामायिक पाठ 56 प्रणिपात-स्तुति 77
श्रावक कर्तव्य 58 गुरुदेवश्री प्रति
मिच्छामि दुक्कडं 58 क्षमापना स्तुति 78
परमपद प्राप्तिकी भावना 59 तात्त्विक सुवाक्य 79

प्रतिक्रमण-आवश्यक

[1]

॥ श्री वीतरागाय नमः ॥

सर्व सामान्य प्रतिक्रमण-आवश्यक

प्रतिक्रमण के दो प्रकार है : (1) निश्चय और (2) व्यवहार।

निश्चयप्रतिक्रमणकी व्याख्या :-

पूर्व क्रिया हुआ जो अनेक प्रकारके विस्तारवाला शुभाशुभ कर्म उनसे जो आत्मा अपनेको दूर रखता है वो आत्म प्रतिक्रमण है।

व्यवहार-प्रतिक्रमणकी व्याख्या :-

अपने शुभाशुभ कर्मका आत्म निंद्यपूर्वक त्याग करनेका भाव-आत्मा ऐसा विशुद्ध परिणाम कि जिसमें अशुभ परिणामोकी निवृत्ति हो।

प्रतिक्रमणके निम्न प्रकारसे छ विभाग है :-

(1) सामायिक,
(2) तीर्थंकर भगवानकी स्तुति,
(3) वंदन
(4) प्रतिक्रमण
(5) कायोत्सर्ग
(6) प्रत्याख्यान

[ श्री सद्गुरुदेवकी विनयपूर्वक आज्ञा लेकर वा उनकी गैरहाजरीमें भगवान श्री सीमंधरप्रभुकी आज्ञा लेकर प्रतिक्रमण शुरु करना ]

  1. समयसार गाथा २८३
  2. श्रावक प्रतिक्रमण (पंडित नंदलालकृत प्रस्तावनामेंसे)

[2]

[सर्वसामान्य]

पाठ : १

मंगलाचरण : नमस्कार-मंत्र

णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं॥

अर्थ :- श्री अरिहंतों को नमस्कार हो, सिद्धों को नमस्कार हो, आचार्यों को नमस्कार हो, उपाध्यायों को नमस्कार हो और लोकमें स्थित सर्व साधुओं को नमस्कार हो।¹

अरिहंत सिद्ध आचार्य ने, उपाध्याय मुनिराज,
पंच पद व्यवहारथी, निश्चये आत्मामां ज. १०४²

पाठ : २

वंदना (तिकखुत्तो)

तिकखुत्तो, आयाहिणं, पयाहिणं, वंदामि, सक्कारेमि,
सम्माणेमि, कल्लाणं, मंगलं, देवयं, चेइयं, पज्जुवासामि।

अर्थ :- पंच परमेष्ठी को दो हाथ जोडकर आवर्तनसे तीन प्रदक्षिणाके बाद मैं स्तुति करता हूँ। नमस्कार करता हूँ विनयसे सत्कार करता हूँ, विवेकपूर्वक सन्मान करता हूँ हे पूज्य ! आप कल्याणरूप, मंगलरूप, देवरूप, ज्ञानरूप हो, इसलिये मैं आपकी पर्युपासना-सेवा करता हूँ।

  1. यह पंच परमेष्ठीका स्वरूप मोक्षमार्ग प्रकाशक (गुजराती) पेज नं २ से ६ तक है। जिज्ञासु वहाँसे देख ले।
  2. योगीन्द्र देवकृत योगासारमेंसे।

श्री दिगम्बर जैन स्वाध्यायमंदिर ट्रस्ट, सोनगढ - ३६४२५०

प्रतिक्रमण-आवश्यक ]

पाठ : ५

अब तीर्थंकर भगवानकी सच्ची स्तुतिका स्वरूप कहते हैं :

जो इंदिये जिणिता णाणसहावियावि मुणदि आदं।
तं खलु जिंदिदियं ते भणंति जे णिच्छिदा साहू।।३१।।

जिती इन्द्रियोंको ज्ञानस्वभावसे अधिक जाने आत्माने,
निश्चय विषे स्थित साधुओंने भाखे जितेन्द्रिय तेहने. ३१.१

अर्थ :- जो इन्द्रियोंको जीतकर ज्ञानस्वभाव द्वारा आत्मा को,
अन्तर्व्यक्तसे अधिक जानता है, उसे जो निश्चय नयमें स्थित साधु है, वो
सचमें जितेन्द्रिय कहते है।

जो मोहं तु जिणिता णाणसहावियावि मुणदि आदं।
तं जिदमोहं साहू परमट्ठवियाणा वेंति।।३२।।

जिती मोह ज्ञानस्वभावथी जे अधिक जाणे आत्माने,
परमार्थना विज्ञाको ते साधु जितमोही कहे. ३२.

अर्थ :- जो मुनि मोहको जीतकर, अपने आत्माको ज्ञानस्वभाव
द्वारा अन्य द्रव्यभावोंसे अधिक जानता है, वो मुनिको, परमार्थके जाननेहार
जित मोह कहते है।

जिदमोहस्स हु जइया खीणो मोहो होइ सव्वो साहूस्स।
तइया हु खीणमोहे भण्णदि सो णिच्छयविद्धे।।३३।।

जितमोह साधु तणो वळी क्षय मोह ज्यारे थाय छे,
निश्चयविदो थकी तेहने क्षीणमोह नाम कथाय छे. ३३.

अर्थ :- जिसने मोहको जीता है ऐसे साधुको जब मोह क्षीण
होकर सत्तामेंसे नष्ट होता है, तब निश्चय के जाननेहार निश्चयसे वह
साधुको ‘क्षीणमोह’ कहते है।

१. पाठ ४ और ७ में जो गाथाएँ हैं, वह श्री समयसामाजीकी है।

पाठ : ५

आत्माका स्वरूप जाननेके लिए आत्माका छः पदका

पाठ कायोत्सर्ग रूपसे कहेंगे :-

(नमस्कार मंत्र बोलना)

अनन्य शरणके दातार ऐसे श्री सद्गुरुदेवको
अत्यंत भक्तिसे नमस्कार।

शुद्ध आत्मस्वरूपको प्राप्त ऐसे ज्ञानी पुरुषों ने निम्न कथित वे
छः पदको सम्यग्दर्शनके निवासके सर्वोत्कृष्ट स्थानक कहे है।

प्रथम पद :-

‘आत्मा है।’ जैसे घट-पट आदि पदार्थो है,
वैसे आत्मा भी है। कोई गुणके कारण जैसे घट-पट आदि होनेका
प्रमाण है, वैसे स्वपर प्रकाशक ऐसी चैतन्यसत्ताका प्रत्यक्ष गुण जिसमें
है, ऐसा आत्मा होनेका प्रमाण है।

द्वितीय पद :-

‘आत्मा नित्य है।’ घटपट आदि पदार्थ कुछ
कालवर्ती है, आत्मा त्रिकालवर्ती है। घटपटादि संयोगी पदार्थ है,
आत्मा स्वाभाविक पदार्थ है; क्योंकि उसकी उत्पत्तिके लिए कोई भी
संयोग अनुवगोचर नहीं पाए जाते। कोई भी संयोगी द्रव्यसे चेतनसत्ता
प्रगट होने योग्य नहीं होनेसे अनुपन्न है। असंयोगी होनेसे अविनाशी
है, क्योंकि जिसकी कोई संयोगसे उत्पत्ति नहीं होती, उसका किसीमें
लय भी नहीं होगा।

तीसरा पद :-

‘आत्मा कर्ता है।’ सर्वपदार्थ अर्थक्रियासंपन्न
है। कुछकुछ परिणामक्रिया सहित ही सर्व पदार्थ देखनेमें आते है।
आत्मा भी क्रिया संपन्न है, इसलिए कर्ता है। वह
कर्तापना त्रिविधरूपसे श्री जिनकथित है। परमार्थसे स्वभाव परिणति द्वारा
निज स्वरूपका कर्ता है। अनुपचरित (अनुभवमें आनेयोग्य विशेष संबंधसहित)

व्यवहारसे वह आत्मा द्रव्य कर्मका कर्ता है। उपचारसे घर, नगर
आदिका कर्ता है।

चौथा पद :-

‘आत्मा भोक्ता है।’ जो जो भी क्रिया है,
वह सर्व सफल है, निरर्थक नहीं है। जो कुछ भी करनेमें आता
है, उनका फल भुगतना पड़े ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव है। विष खानेसे
विषका फल, शर्करा खानेसे शर्कराका फल, अग्निसंस्पर्शसे अग्निसंस्पर्शका
फल, हिमस्पर्शसे हिमस्पर्शका फल हुए बिना नहीं रहता, वैसे कषायादि
व अकषायादि, जो कोई भी परिणाम से आत्मा परिणमे, उसका फल
भी होनेयोग्य ही है और वह होता है। वह क्रियाका आत्मा कर्ता
होनेसे भोक्ता है।

पाँचवाँ पद :-

‘मोक्षपद है।’ जो अनुपचरित व्यवहारसे जीव
के कर्मका कर्तापना निरूपण किया, कर्तापना होनेसे भोक्तापना
निरूपण किया, वह कर्मका नष्ट होना भी है; क्योंकि प्रत्यक्ष
कषायादिका तीव्रपना हो, लेकिन उनके अनायाससे, उनके
अपरिपचयसे, उनको उपशम करनेसे, उनका मंदपना दिखाई देता है,
वे क्षीण होनेयोग्य दिखता है, क्षीण हो सकता है। वे सर्व बंधभाव
क्षीण हो सकते है, इसलिए उससे रहित ऐसा जो शुद्ध आत्मस्वरूप
उस रूप मोक्षपद है।

छठा पद :-

‘मोक्षका उपाय है।’ यदि मात्र कर्मबंध ही हुआ
करे ऐसा ही हो, तो उनकी निवृत्ति भी कोई कालमें संभावित नहीं
है, लेकिन कर्मबंधसे विपरीत स्वभावी ज्ञान, दर्शन, समाधि, वैराग्य,
भक्ति आदि साधन प्रत्यक्ष है; जो साधनके बलसे कर्मबंध शिथिल
होता है, उपशम होता है, क्षीण होता है, इसी कारणसे ज्ञान, दर्शन,
संयमादि मोक्षपदके उपाय है।

(नमस्कार मंत्र बोलकर कायोत्सर्ग पूर्ण करना)

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[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

श्री ज्ञानी पुरुषोंने, सम्यग्दर्शनके मुख्य निवासभूत कहे हुए ये छः पद इधर संक्षेपमें बताये हैं। समीप मुक्तिगामी जीवको सहज विचारसे वे सप्रमाण होनेयोग्य हैं। परम निश्चयस्वरूप जानने योग्य है, वे सर्वविभागसे विस्तार होकर, उसके आत्मामें विवेक होने योग्य है। ये छः पद अत्यंत संदेह रहित है, ऐसा परमपुरुषने निरूपण किया है। वो छः पदका विवेक जीवको स्वरूपरूप समझनेके लिए कहा गया है। अनादि स्वप्रदशाके कारण उत्पन्न हुआ है ऐसा जीवका अहंभाव, ममत्वभाव, वह निवृत्त करनेको, यह छः पद की ज्ञानीपुरुषोंने देशना प्रकाश की है। वह स्वप्रदशासे रहित ही, अपना स्वरूप है, ऐसा परिणाम जो जीव करे, तो सहजमात्रमें वह जागृत होकर सम्यग्दर्शनको प्राप्त करे; सम्यग्दर्शन को पाकर, स्वस्वभाव रूप मोक्षको पाये, कोई विनाशी, अशुद्ध और अन्य भाव विषे उसे हर्ष, शोक, संयोग उत्पन्न न होगा। और स्वरूपरूपके लक्षमें शुद्धपना, अविनाशीपना, अत्यंत आनंदपना, अंतररहित उसके अनुभवमें आता है। सर्वविभागपर्याय मात्र मुझे अध्यायसे ऐच्छता हुई है, उससे केवल ‘मैं भिन्न ही हूँ’ ऐसा स्पष्ट-प्रत्यक्ष-अत्यंत प्रत्यक्ष-अपरोक्ष उसे अनुभव होता है। विनाशी वा अन्य पदार्थके संयोग प्रति उसे इष्ट-अनिष्टपना महसूस नहीं होता। जन्म, जरा, मृत्यु, रोगादि बाधारहित संपूर्ण माहात्म्यका स्थान ऐसा निजस्वरूपके ज्ञान और वेदनसे, वह कृतार्थ होता है। जो जो पुरुषोंको ये छः पद सप्रमाण ऐसे परम पुरुषके वचन बलसे, आत्माका निश्चय हुआ है वे सब पुरुषोंने सर्व स्वरूपको प्राप्त किया है।

आधि, व्याधि, उपाधि सर्वसंगसे रहित हुए है, हो रहे है और भाविकालमें भी होंगे।

जो सत्पुरुषोंने जन्म, जरा, मृत्युको नष्ट करनेवाला, स्वस्वरूपमें सहज अवस्थितीत होनेका उपदेश किया है, वे सत्पुरुषोंको अत्यंत भक्तिसे नमस्कार हो। उनकी निष्कारण करुणाको नित्य प्रति निरंतर

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१०

[सर्वसामान्य]

स्तवनसे ही आत्मभाव प्रगट होता है, ऐसे सर्व सत्पुरुषों, आपके चरणारविंद सदय हृदयमें स्थापित रहो!

जो छः पदसे सिद्ध है ऐसा आत्मस्वरूप, वह जिनके वचनको ग्रहणसे सहजमें प्रगट होता है, जो आत्मस्वरूप प्रगट होनेसे सर्वकाल जीव संपूर्ण आनंदको प्राप्त करके निर्भय होता है, ऐसे वचनके कहना, ऐसे सत्पुरुषके गुणोंकी व्याख्या करनेकी अशक्ति है, क्योंकि जिनका प्रत्युपकार न हो सके, ऐसा परमात्मभाव वह जिन्होंने कुछ भी अपेक्षासहित मात्र निष्कारण करुणाशीलतासे प्रदान किया, फिर भी जिन्होंने अन्य जीव के बारेमें ‘यह मेरा शिष्य है’ वा ‘भक्ति का कर्ता है, इसलिए मेरा है’—ऐसा कभी सोचा नहीं है, ऐसे जो सत्पुरुष, उन्हें अत्यंत भक्तिसह बारंबार नमस्कार हो!

जो सत्पुरुषोंने सद्गुरुकी भक्ति निरूपण की है, वह भक्तिमात्र शिष्यके कल्याण अर्थ कही है। जो भक्ति प्राप्त होनेसे सद्गुरुके आत्माकी वेश्याके बारेमें वृत्ति रहे, अपूर्व गुण दृष्टिगोचर होकर अन्य स्वच्छंद मिटे और सहेजे आत्मबोध होवे, इसीकारण जो भक्ति का निरूपण किया है, वह भक्तोंको और वे सत्पुरुषोंको बार बार त्रिकाल नमस्कार हो!

जो कभी प्रगटपने वर्तमानमें केवलज्ञानकी उत्पत्ति नहीं हुई है, लेकिन जिनके वचन के विचारयोगसे शक्तिरूप केवलज्ञान है, ऐसा स्पष्ट जाना है, श्रद्धारूप केवलज्ञान हुआ है, विचारदशामें केवलज्ञान हुआ है, इच्छादशारूप केवलज्ञान हुआ है, मुख्य हेतुसे केवलज्ञान वर्तता है, सर्व अव्याबाध सुखको प्रगट करनार वह केवलज्ञान, जिनके योगसे सहजमात्रमें जीव पाने योग्य हुआ, वे सत्पुरुष के उपकार को सर्वोत्कृष्ट भक्तिसे नमस्कार हो! नमस्कार हो!

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[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

११

पाठ : ६

श्री सद्गुरु-वंदन

अहो! अहो! श्री सद्गुरु, करुणासिंधु अपार;
आ पापर पर प्रभु कर्या, अहो! अहो! उपकार। १.
शुं प्रभुचरण कने, धरूं, आत्माथी सौ हीन;
ते तो प्रभुअं आपीयो, वर्तुं चरणाधीन। २.
आ देहादि आजथी, वर्तुं प्रभु आधीन;
दास, दास, हुं दास छुं, तेह प्रभुंनो दीन। ३.
षट् स्थानक समजावीने, भिन्न बताव्यो आप;
ध्यान थकी तरवावतुं, ओ उपकार अमाप। ४.
जे स्वरूप समज्या विना, पाम्यो दुःख अनंत;
समजाव्युं ते पद नमुं, श्री सद्गुरु भगवंत। ५.
परमपुरुष प्रभु सद्गुरु, परम ज्ञान सुखधाम;
जेणे आव्युं भान निज, तेने सदा प्रणाम। ६.
देह छतां जेनी दशा, वर्ते देहातीत;
ते ज्ञानीना चरणमां, हो वंदन अगणित। ७.

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[१२] [सर्वसामान्य]

पाठ : ७

१. जीव-अजीवका स्वरूप

(१) समकितका सच्चा स्वरूप भगवानने जैसा कहा है वह अब कहेंगे। वह समझकर सच्ची श्रद्धा करना। प्रथम मुख्य दो तत्त्वो जो जीव और अजीव उनका स्वरूप।

जीवो चरित्तदंसणणाणट्ठिदो हि ससम्मदं जाण।
पोग्गलकम्मपदेसट्ठिं च तं जाण परसम्मदं ॥२॥

जीव चरित्त-दंसण-ज्ञानस्थित स्वसमय निश्चय जाणवो;
स्थित कर्मपुद्गलना प्रदेशे परसमय जीव जाणवो. २.

अर्थ :- हे भव्य ! जो जीव दर्शन-ज्ञान-चारित्रमें स्थित हो रहा है, उसे निश्चयसे स्वसमय जान; और जो जीव पुद्गलकर्मके प्रदेशोंमें स्थित हुआ है, उसे परसमय जान।

ववहारेण दुभत्थो भूदत्थो देसिदो दु सुदण्णओ।
भूदत्थमस्सिदो खलु सम्मादिट्ठी हवदि जीवो ॥११॥

व्यवहारनय अभूतार्थ दर्शित, शुद्धनय भूतार्थ छे;
भूतार्थने आश्रित जीव सुदृष्टि निश्चय होय छे. ११.

अर्थ :- व्यवहारनय अभूतार्थ है और शुद्धनय भूतार्थ है, ऐसा ऋषीश्वरोने दर्शाया है; जो जीव भूतार्थका आश्रय करता है, वह जीव निश्चयसे सम्यग्दृष्टि है।

भूदत्थेणभिदा जीवाजीवा य पुण्णपावं च।
आसवसंवरणिज्जरबंधो मोक्खो य सम्मत्तं ॥१२॥

भूतार्थथी जाणेल जीव, अजीव, वळी पुण्य, पाप ने
आसव, संवर, निर्जरा, बंध, मोक्ष ते सम्यक्त्व छे. १२.

अर्थ :- भूतार्थ नयसे जाने हुए जीव, अजीव और पुण्य, पाप तथा आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष ये नव तत्त्व सम्यक्त्व है।

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[१३]

[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

जो पस्सदि अप्पाणं अवद्धपुण्णं अणण्णं णियदं।
अविसेसमसंयुत्तं तं सुद्धणयं वियाणीहि ॥१४॥

अबद्धपुष्ट, अनन्य ने जे नियत देखे आत्मने,
अविशेष, असंयुक्त, तेने शुद्धनय तुं जाणजे. १४.

अर्थ :- जो नय आत्माको बंध रहित और परके स्पर्शरहित, अत्यन्तअनारहित, चलाचलरहित, विशेषरहित, अन्यके संयोग रहित-ऐसे पाँच भावरूप देखता है, उसे हे शिष्य ! तुं शुद्ध नय जान।

जो पस्सदि अप्पाणं अवद्धपुण्णं अणण्णमविसेस।
अप्पदेससन्तमुज्जं पस्सदि जिणसासणं सव्वं ॥१५॥

अबद्धपुष्ट, अनन्य, जे अविशेष देखे आत्मने,
ते द्रव्य तेम ज भाव जिनशासन सकल देखे खरे. १५.

अर्थ :- जो पुरुष आत्माको अबद्धस्पृष्ट, अनन्य अविशेष (तथा उपलक्षणसे नियत और असंयुक्त) देखता है, वह सर्व जिनशासनको देखता है-कि जो जिनशासन बाह्यभूत और अभ्यंतर ज्ञानरूप भावश्रुतवाला है।

सब्बे भावे पच्चक्खाई वेत्ति ण पादणं।
तम्हा पच्चक्खाणं अप्पाणं णियमा मुणेदव्वं ॥१४॥

सौ भावनने पादणो जाणतो करे,
तेथी नियमथी जाणवुं के ज्ञान प्रत्याख्यान छे. १४.

अर्थ :- जो “स्वत्माना के अलावा सर्व पदार्थो पर है” ऐसा जानकर प्रत्याख्यान करता है, त्याग करता है, उसे ‘प्रत्याख्यान ज्ञान ही है’ ऐसा नियमसे जानना, (क्योकि) अपने ज्ञानमें त्यागरूप अवस्था वोही प्रत्याख्यान है, दूसरा कुछ नहीं है।

अहमिंको खलु सुद्धो दंसणणाणमओ सयारूवी।
ण वि अत्थि मज्झ किंचि वि अण्णं परमाणुमेत्तं पि ॥३८॥

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[१४]

[सर्वसामान्य]

हुं एक, शुद्ध, सदा अरूपी, ज्ञानदर्शनमय खरे;
कइं अन्य ते मारुं जरी परमाणुमात्र नथी अरे! ३८.

अर्थ :- दर्शनज्ञानचारित्ररूप परिणत आत्मा ऐसा जानता है कि : “निश्चयसे मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, दर्शनज्ञानमय हूँ, सदा अरूपी हूँ, कोई भी अन्य परद्रव्य परमाणुमात्र भी मेरा नहीं है-यह निश्चय है।”

ववहारेण दु एदे जीवस्स हवंति वण्णणादीया।
गुणठाणंता भावा ण दु केई णिच्छयस्स ॥५६॥

वर्णादि गुणस्थाननांत भावो जीवना व्यवहारथी,
पण कोई ए भावो नथी आत्मा तना निश्चय थकी. ५६.

अर्थ :- यह वर्णसे लेकर गुणस्थान पर्यंत जो जो भावो कहनेमें आये, वो सब व्यवहारनयसे जीवका है। (इसलिये सूत्रमें कहे है) लेकिन निश्चय नयके मतमें उनमेंसे कोई भी जीवका नहीं।

२. कर्ता-कर्मका स्वरूप

(२) जीव परका कर्ता नहीं, लेकिन अपने भावका कर्ता है, यह बतानेवाला स्वरूप :-

ण वि कुव्वदि कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीवगुणे।
अण्णोण्णणिमित्तेण दु परिणामं जाण दोण्हं पि ॥८१॥

जीव कर्मगुण करतो नथी, नहि जीवगुण कर्म करे;
अन्नोन्न्य निमित्तथी परिणाम बेउ तणा बने. ८१.

पोग्गलकम्मकदाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं ॥८२॥

जीव कर्मगुण करतो नथी, नहि जीवगुण कर्म करे;
अन्नोन्न्य निमित्तथी परिणाम बेउ तणा बने. ८१.

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प्रतिक्रमण-आवश्यक ]
[ १५

ओ कारणे आत्मा ठरे कर्ता खरे निज भावथी;
पुद्गलकरमकृत सर्व भावोनो कदी कर्ता नथी. ६२.
अर्थ :- जीव कर्मके गुणोंको करता नहीं, वैसे ही कर्म जीवके गुणोंको करता नहीं; लेकिन परस्पर निमित्तसे दोनोंका परिणाम जानना।
इसी कारणसे आत्मा अपने ही भावका कर्ता (कहने में आता) है; लेकिन
पुद्गलकर्मसे किये हुए सर्व भावोंका कर्ता नहीं है।

छिन्नवयस्स एवं आदा अप्पगमेव हि करयदि।
वेदयदि पुणो तं चेव जाण अत्ता दु अत्ताणं ॥ ८३ ॥

आत्मा करे निजने ज ओ मंतव्य निश्चयणु तणी,
वळी भोगवे निजने ज आत्मा ओम निश्चय जाणवुं. ६३.
अर्थ :- निश्चयनयका मत है कि आत्मा अपने को ही करता है
और फिर आत्मा अपनेको ही भोगता है, ऐसा हे शिष्य ! तू जान।

उवओगस्स अणाई परिणामा तिणि मोहजुत्तरस।
मिच्छत्तं अण्णाणं अविरदिभावो य णादव्वो ॥ ८९ ॥

छे मोहयुत उपयोगना परिणाम त्रण अनादिना,
—मिच्छ्यात ने अज्ञान, अविरतभाव ओ त्रण जाणवा. ६६.
अर्थ :- अनादिसे मोहयुक्त होनेसे, उपयोगका अनादिसे
लेकर तीन परिणाम है; वो मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरतिभाव (ये तीन)
जानना।

एदेसु य उवओगो तिविहो सुद्धो णिरंजणो भावो।
जं सो करयदि भावं उवओगो तत्स सो कत्ता ॥ ९० ॥
अनाधी छे उपयोग त्रणविध, शुद्ध निर्मळ भाव जे;
जे भाव कंई पण ते करे, ते भावतो कर्ता बने. ६०.
अर्थ :- अनादिसे ये तीन प्रकार परिणाम विकार होनेसे आत्माका

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[ १६
[ सर्वसामान्य
उपयोग-चूंकि (शुद्धनयसे) वह शुद्ध निरंजन (एक) भाव है, फिर भी-तीन
प्रकारसे होता हुआ, वह उपयोग जो (विकारी) भावको (स्वयं) खुद ही करता
है, वह भाव का खुद (स्वयं) ही कर्ता होता है।

जं कुणदि भावादा सो होदि तत्स भावस्स।
कम्मत्तं परिणमदे तत्तिह सयं पोग्गलं दव्वं ॥ ९१ ॥
जे भाव जीव करे अरे! जीव तेहनो कर्ता बने;
कर्ता थतां, पुद्गल स्वयं त्यां कर्मरूपे परिणमे. ६१.
अर्थ :- आत्मा जो भावको करता है वह भावका स्वयम् कर्ता होता
है; वह कर्ता होनेसे पुद्गलद्रव्य स्वयम् कर्मरूप परिणमता है।

जदि सो परदव्वाणि य करेज्ज णियमेण तम्मो होज्ज।
जं खण तम्मो सो ण सेसि हवदि कत्ता ॥ ९२ ॥
परद्रव्यने जीव जो करे तो जरूर तन्मय ते बने,
पण ते नथी तन्मय अरे! तेथी नहीं कर्ता ठरे. ६६.
अर्थ :- यदि आत्मा परद्रव्योंको करे तो वह नियमसे तन्मय अर्थात्
परद्रव्यमय हो जाय, लेकिन तन्मय नहीं है, इसलिये आत्मा उनका कर्ता
नहीं है।

जं भावं सुहमसुहं करेदि आदा स तत्स खलु कत्ता।
तं तत्थ होदि कम्मं सो तत्तु दु वेदगो अप्पा ॥ १०२ ॥
जे भाव जीव करे शुभाशुभ तेहनो कर्ता खरे,
तेनुं बने ते कर्म, आत्मा तेहनो वेदक बने. १०२.
अर्थ :- आत्मा जो शुभके अशुभ (स्वयंके) भावको करता
है…वह भावका वास्तवमें कर्ता होता है, वह (भाव) आत्माका कर्म
होता है और वह आत्मा उसका (उस भावरूप कर्मका) भोक्ता होता है।

जो जम्हि गुणे दव्वे सो अण्णम्हि दु ण संकमदि दव्वे।
सो अण्णसंकेतो कहं परिणमए दव्वं ॥ १०३ ॥

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प्रतिक्रमण-आवश्यक ]
[ १७

जे द्रव्य जे गुण-द्रव्यमां, नहि अन्य द्रव्यने संक्रमे;
अणसंक्रम्युं ते केम अन्य परिणामवे द्रव्यने? १०३.
अर्थ :- जो वस्तु (अर्थात् द्रव्य) जिस द्रव्यमें और गुणमें वर्तती है,
वह अन्य द्रव्यरूप तथा गुणरूप संक्रमण नहीं होती (अर्थात् पलटकर अन्य में
मिलती नहीं); अन्यरूप संक्रमण नहीं होती हुई वह (वस्तु), अन्य वस्तुको कैसे
परिणमित कर सके?

जं कुणदि भावादा सो होदि तत्स कम्मस्स।
णाणिरस स णाणमओ अण्णाणिरस अण्णाणो ॥ १२६ ॥
जे भावने आत्मा करे, कर्ता बने ते कर्मनो;
ते ज्ञानमय छे ज्ञानीनो, अज्ञानमय अज्ञानीनो. १२६.
अर्थ :- आत्मा जो भावको करता है, उस भावरूप कर्मका वह
कर्ता होता है; ज्ञानीको तो वो भाव ज्ञानमय है और अज्ञानीको अज्ञानमय
है।

णाणमया भावा णाणो चेव जायदे भावा।
तम्हा तम्हा णाणमया णाणो चेव जायदे भावा ॥ १२९ ॥
अण्णाणमया भावा अण्णाणो चेव जायदे भावा।
जम्हा तम्हा अण्णाणमया अण्णाणिरस ॥ १२९ ॥
वळी ज्ञानमयना भावमांथी ज्ञानभाव ज ऊपजे,
ते कारणे ज्ञानी तणा सौ भाव ज्ञानमयी खरे; १२६.
अज्ञानमयना भावमांथी अज्ञानभाव ज ऊपजे,
ते कारणे अज्ञानीना अज्ञानमय भावो बने. १२६.
अर्थ :- क्योंकि ज्ञानमयके भावमेंसे ज्ञानमय ही भाव उत्पन्न होता
है, इसलिये ज्ञानीके सर्व भाव वास्तवमें ज्ञानमय ही होते है। और क्योंकि
अज्ञानमय भावमेंसे अज्ञानमय ही भाव उत्पन्न होता है, इसलिये अज्ञानीके
(सभी) भाव अज्ञानमय ही होते है।

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[सर्वसामान्य]

कणयमया भावाओ जावंते कुंडलाओ भावा।
अययमया भावाओ जह जायते दु कडयारी।।१३०।।
अण्णणमया भावा अण्णाणिणो बहुविहा वि जायते।
णाणिस दु णाणमया सव्वे भावा तहा होंति।।१३१।।
जस कनकभय को भावमयी कुंडलादिक ऊपजे,
पण लोहमय को भावयी कटकादि भावो नीपजे; १३०.
त्यम भाव बहुविध ऊपजे अज्ञानमय अज्ञानीने,
पण ज्ञानीने तो सर्व भावो ज्ञानमय जेम ज बने. १३१.

अर्थ :- जैसे स्वर्णमय भावमेसे स्वर्णमय कुण्डल इत्यादि भाव होते हैं और लोहमय भावमेसे लोहमय कड़ा इत्यादि भाव होते हैं, उसीप्रकार अज्ञानीके (अज्ञानमय भावमेसे) अनेक प्रकारके अज्ञानमय भाव होते हैं और ज्ञानीके (ज्ञानमय भावमेसे) सभी ज्ञानमय भाव होते हैं।

३. पुण्य और पापक स्वरूप

कम्ममसुहं कुसीलं सुद्धकम्मं चवि णाणह सुसीलं।
कह ते होदि सुसीलं जं संसारं पवेसेदि।।१४५।।
छे कर्म अशुभ कुशील ने जाणो सुशील शुभकर्मने!
ते केम होय सुशील जे संसारमां दाखल करे? १४५.

अर्थ :- अशुभ कर्म कुशील है (-बुरा है) और शुभ कर्म सुशील है (-अच्छा है) ऐसा तुम जानते हो! (किन्तु) वह सुशील कैसे हो सकता है, जो (जीवको) संसारमें प्रवेश कराता है?

संवण्णिप्पि ण णियलं बंधदि कालायसं पि जह पुरिसं।
बंधदि एवं जीवं सुहमसुहं वा कर्द कम्मं।।१४६।।
जेम लोहतुं त्यम कनकनुं जंजीर जकड़े पुरुषने,
एवी रीते शुभ के अशुभ कृत कर्म बांधे जीवने. १४६.

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[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

अर्थ :- जैसे सोनेकी बेड़ी भी पुरुषको बाँधती है और लोहेकी भी बाँधती है, इसीप्रकार शुभ तथा अशुभ किया हुआ कर्म जीवको (अविशेषतया) बाँधता है।

परमट्ठि दु अट्ठिदो जो कुणदि तवं वरदं च धारेदि।
तं सव्वं बालवदं बालवदं वंति सव्वण्णू।।१५२।।
परमार्थमां अस्थित जे तपने करे, व्रतने धरे,
सयळ्ळय ते तप बाळ ने व्रत बाळ सर्वज्ञ कहे. १५२.

अर्थ :- परमार्थमें अस्थिरत जो जीव तप करता है और व्रत धारण करता है, उसके उन सब तप और व्रतोंको सर्वज्ञदेव बालतप और बालव्रत कहते हैं।

वदणियमणि धारेत्ता सीलाणो तहा तवं कुव्वंता।
परमट्ठिबाहा जे णिव्वाणं ण विरंदंति।।१५३।।
व्रतनियमने धारे भले, तपशीलने पण आचरे,
परमार्थथी जे बाहा ते निर्वाणप्राप्ति नहीं करे. १५३.

अर्थ :- व्रत और नियमोंको धारण करते हुए भी तथा शील और तप करते हुए भी जो परमार्थसे बाह्य है (अर्थात् परम पदार्थरूप ज्ञानको-ज्ञानस्वरूप आत्मा का जिसको श्रद्धान नहीं है), वे निर्वाणको प्राप्त नहीं होते।

परमट्ठिबाहा जे अण्णाणेण पुण्णमिच्छंति।
संसारगमणहेदु पि मोक्खहेदु अजाणंता।।१५४।।
परमार्थबाहा जीवो अरे! जाणे न हेतु मोक्षनो,
अज्ञानथी ते पुण्य इच्छे हेतु जे संसारनो. १५४.

अर्थ :- जो परमार्थसे बाह्य हैं वे मोक्षके हेतुको न जानते हुए-पुण्य संसारगमनका हेतु होने पर भी अज्ञानसे पुण्यको (मोक्षका हेतु समझकर) चाहते हैं।

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[सर्वसामान्य]

५. आस्रवका स्वरूप

[जीवमें होते विकारी भावों (आस्रव) त्यागने योग्य है, ऐसा बतलानेवाला स्वरूप]

मिच्छत्तं अविरमणं कसाओयगा य सण्णसण्णा दु।
बहुविहभेया जीवे तस्सेवं अणण्णपरिणामा।।१६४।।
णाणावरणादीस्स दु कम्मस्स कारणं होंति।
तेसिं पि होदि जीवो य रागदोसादिभावकरो।।१६५।।
मिथ्यात्व ने अविरत, कषायो, योग संज्ञ असंज्ञ छे,
ए विविध भेद जीवमां, जीवनना अनन्य परिणाम छे; १६४.
वळी तेह ज्ञानावरणादिक कर्मनां कारण बने,
ने तेनुं पण जीव बने जे रागद्वेषादिक करे. १६५.

अर्थ :- मिथ्यात्व, अविरमण, कषाय और योग-यह आस्रव संज्ञ (चेतनके विकार) भी है और असंज्ञ (पुद्गलके विकार) भी हैं। विविध भेदवाले संज्ञ आस्रव-जोकि जीवमें उत्पन्न होते हैं वे-जीवके ही अनन्य परिणाम हैं। और असंज्ञ आस्रव ज्ञानावरणादि कर्मके कारण (निमित्त) होते हैं और उनका भी (असंज्ञ आस्रवोंके भी कर्मबंधका निमित्त होनेमें) रागद्वेषादि भाव करनेवाला जीव कारण (निमित्त) होता है।

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[प्रतिक्रमण-आवश्यक]
[21]
जीव ण वेदि विसेसंतरं तु आदासव्वाण दोण्णं पि।
अण्णाणी ताव दु सो कोहादिसु वट्टदे जीवो ।।६९।।
कोहादिसु वट्टंतस्स तस्स कम्मस्स संचओ होदि।
जीवस्सेदे बंधो भणिदो खलु सव्वदरिसीहिं ।।७०।।

आत्मा अपने आस्रव तथा जीवों भेद को जाने नहीं,
क्रोधादिकों स्थिति त्यागी, अज्ञानी अब जीवनी. ६६.
जीव वर्तता क्रोधादिकों संचय करमनो थाय छे,
सहु सर्वज्ञों अरीते बंधन कहे छे जीवनो. ७०.

अर्थ :-जीव जब तक आत्मा और आस्रव-इन दोनोंके अंतर
और भेदको नहीं जानता तब तक वह अज्ञानी रहता हुआ क्रोधादिक
आस्रवोंमें प्रवर्त्तता है; क्रोधादिकमें प्रवर्त्तमान उसके कर्मका संचय होता है।
वास्तवमें इसप्रकार जीवके कर्मोंका बन्ध सर्वज्ञ देवोंने कहा है।

जइया इमेण जीवेण अप्पणो आसवण य तहेव।
णादं होदि विसेसंतरं तु तइया ण बंधो से ।।७१।।

आ जीव ज्यारे आस्रवनुं तेम निज आत्मा तणुं
जाणे विशेषोत्तर, तदा बंधन नहीं तेने थतुं. ७१.

अर्थ :-जब यह जीव आत्माका और आस्रवोंके अंतर और भेदको
जानता है तब उसे बंध नहीं होता।

णादूण आसवाणं असुचित्तं च विरीयभावं च।
दुक्खस्स कारणं ति य तदो णियत्ति कुणदि जीवो ।।७२।।

अशुचिपणुं, विपरीतता जे आस्रवोनां जाणीने,
वळी जाणीने दुःक्खकारणो, अेथी निवर्तन जीव करे. ७२.

अर्थ :-आस्रवोंकी अशुचिता और विपरीतता तथा वे दुःक्खके
कारण हैं, ऐसा जानकर जीव उनसे निवृत्ति करता है।

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[22]
[सर्वसामान्य]
जीवणिवद्धा अदे असुव्व अणिच्चा तहा असरण य।
दुक्खा दुक्खफला ति य णादूण णिव्वत्ते तेहिं ।।७३।।

आ सर्व जीवनिबद्ध, अशुव्व, शरणहीन, अनित्य छे,
अे दुःक्ख, दुःक्खफळ जाणीने अनाथी जीव पाछो वळे. ७३.

अर्थ :-यह आस्रव जीवके साथ निबद्ध है, अशुच है, अनित्य हैं
तथा अशरण हैं और वे दुःख रूप हैं, दुःख ही जिनका फल है ऐसे हैं-
ऐसा जानकर ज्ञानी उनसे निवृत्त होता है।

५. संवर का स्वरूप

[जीवके शुभाशुभ भावोंको कैसे रोकना वह बतानेवाला स्वरूप]
उवओगे उवओगो कोहादिसु णत्थि को वि उवओगो।
कोहो कोहो णेव हि उवओगे णत्थि खलु कोहो ।।८१।।

उपयोगमां उपयोग, को उपयोग नहिं क्रोधादिमां,
छे क्रोध क्रोध मही ज, निश्चय क्रोध नहिं उपयोगमां. ८१.

अर्थ :-उपयोगमें उपयोग है, क्रोधादिमें कोई भी उपयोग नहीं
है; और क्रोध क्रोधमें ही है, उपयोगमें निश्चयसे क्रोध नहीं है।

जह कणयग्गिमित्तविण पि कणयभावं ण तं परिचयदि।
तह कम्मोदयत्तदो ण जहदि णाणी दु णाणित्तं ।।९८।।

ज्यम अग्नितप्त सुवर्ण पण निज सुवर्णभाव नहिं तजे,
त्यम कर्मोदयने तदन पण ज्ञानी न ज्ञानीपणुं तजे. ९८.

अर्थ :-जैसे सुवर्ण अग्निसे तप्त हुआ भी अपने सुवर्णत्वको
नहीं छोड़ता, इसीप्रकार ज्ञानी कर्मके उदयसे तप्त होता हुआ भी
ज्ञानित्वको नहीं छोड़ता।

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[प्रतिक्रमण-आवश्यक]
[23]
सुद्धं तु वियाणंतो सुद्धं चेवप्पयं लहदि जीवो।
जाणंतो दु असुद्धं असुद्धमेवप्पयं लहदि ।।९८।।

जे शुद्ध जाणे आत्माने ते शुद्ध आत्म ज मेळवे;
अनशुद्ध जाणे आत्माने अनशुद्ध आत्म ज ते लहे. ९८.

अर्थ :-शुद्ध आत्माको जानता हुआ-अनुभव करता हुआ जीव
शुद्ध आत्माको ही प्राप्त करता है और अशुद्ध आत्माको जानता हुआ-
अनुभवता हुआ जीव अशुद्ध आत्मा को ही प्राप्त करता है।

अप्पामप्पमणा रूंधिऊण दोपुण्णपावजोणेसु।
दंसणणाणट्ठिदो इच्चादिविदो य अण्णाणो ।।९८।।

जो सव्वसंगमुक्को झायदि अप्पामप्पमण्णो अप्पा।
ण वि कम्मं णोकम्मं वेदा वितिदि अप्पत्तं ।।९८।।

अप्पामं झाणंतो दंसणणाणमओ अण्णण्णमओ।
लहदि अचिरेण अप्पामेव सो कम्मविमुक्कं ।।९८।।

पुण्यपापयोगथी रोकीने निज आत्मने आत्मा थकी,
दर्शन अने ज्ञानने धारी, परद्रव्यछूट्टा परिहरी. ९८.
जो सर्वसंगविमुक्त, ध्यावे आत्माने आत्मा वडे-,
-नहिं कर्म के नोकर्म, चेतक चेततो अेकत्वने, ९८.
ते आत्म ध्यातो, ज्ञानदर्शनमय, अनन्यमय खरे,
बस अल्प काले कर्मथी प्रविमुक्त आत्माने वरे. ९८.

अर्थ :-आत्माको आत्माके द्वारा दो पुण्य-पापरूप शुभाशुभ योगोंसे
रोककर दर्शनज्ञानमें स्थित होता हुआ और अन्य (वस्तु) की इच्छासे विरत
होता हुआ, जो आत्मा (इच्छा रहित होनेसे) सर्वसंगसे रहित होता हुआ, (अपने)
आत्माको आत्माके द्वारा ध्याता है, कर्म तथा नोकर्मको नहीं ध्याता, एवं
(स्वयं) चेतयिता’ (होनेसे) एकत्वको ही चिंतन करता है-चेतता है-अनुभव
करता है, वह (आत्मा) आत्माको ध्याता हुआ, दर्शनज्ञानमय और अनन्यमय
होता हुआ अल्प कालमें ही कर्मोंसे रहित आत्माको प्राप्त करता है।

१. चेतयिता = चेतना, देखनार जानना। २. अनन्यमय = अनन्य नहीं है ऐसा।

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६. निर्जरा का स्वरूप

[संवरपूर्वक जो पूर्वके विकारी भावोंको तथा पूर्वमें बांधे हुए कर्मोंको नष्ट करता है, उसे निर्जरा कहते है-यह बतानेवाला स्वरूप।]

उदयविविहो विविहो कम्माणं वण्णिदो जिणवरेहिं।
ण हु ते मज्झ सहावा जाणगभावो दु अहमेक्को ॥१९८॥
कर्मों तणो जे विविध उदयविपाक जिनवर वर्णव्यो,
ते मुझ स्वभावो छे नहीं, हुं ओक ज्ञायकभाव छुं. १९८.
अर्थ :-कर्मोंके उदयका विपाक (फल) जिनेन्द्रदेवोंने अनेक प्रकारका कहा है वे मेरे स्वभाव नहीं है; मैं तो एक ज्ञायकभाव हूँ।

पोग्गलकम्मं रागो तस्स विवगीदाओ हवदि एसो।
ण हु एस मज्झ भावो जाणगभावो हु अहमेक्को ॥१९९॥
पुद्गलकरमरूप रागनो ज विपाकरूप छे उदय आ,
आ छे नहीं मुझ भाव, निश्चय ओक ज्ञायकभाव छुं. १९९.
अर्थ :-राग पुद्गलकर्म है, उसका विपाक रूप उदय यह है, यह मेरा भाव नहीं है, मैं तो निश्चयसे एक ज्ञायकभाव हूँ।

एवं सम्मट्ठिी अप्पाणं मुणदि जाणगसहावं।
उदयं कम्मविगारां च मुयदि तं चियविणतो ॥२००॥
सुदृष्टि ओ रीत आत्मने ज्ञायकस्वभाव ज जाणतो,
ने उदय कर्मविपाकरूप ते तत्त्वज्ञायक छोडतो. २००.
अर्थ :-इसप्रकार सम्यग्दृष्टि आत्माको (अपनेको) ज्ञायकस्वभाव जानता है और तत्त्वको अर्थात् यथार्थ स्वरूपको जानता हुआ कर्मके विपाकरूप उदयको छोडता है।

पम्मापुमित्तयं पि हु रागादीणं तु विज्जदे जस्स।
ण वि सो जाणदि अप्पाणं तु सव्वागमधरो वि ॥२०१॥

प्रतिक्रमण-आवश्यक

अणुमात्र पण रागादिनो सद्भाव वर्ते जेहने,
ते सर्वआगमधर भले पण जाणतो नहि आत्मने. २०१.
अर्थ :-वास्तवमें जिस जीवके परमाणु मात्र-लेशमात्र-भी रागादिक वर्तता है, वह जीव भले ही सर्वागमका धारी (समस्त आगमोंको पढ़ा हुआ) हो तथापि आत्माको नहीं जानता।

मज्झं परिग्गहो जदि ततो अहमीव्वो तु गच्छेज्ज।
णादेव अह जम्हा तम्हा ण परिग्गहो मज्झ ॥२०२॥
परिग्रह कदी मारो बने तो हुं अजीव बनुं खरे,
हुं तो खरे ज्ञाता ज, तेथी नहि परिग्रह मुझ बने. २०२.
अर्थ :-यदि परद्रव्य-परिग्रह मेरा हो तो मैं अजीवतत्त्वको प्राप्त हो जाऊँ। क्योंकि मैं तो ज्ञाता ही हूँ, इसलिये (परद्रव्यरूप) परिग्रह मेरा नहीं है।

छिञ्जदु वा भिञ्जदु वा गह्वदु वा जदु विप्पलयं।
जम्हा तम्हा गच्छदु तह वि हु ण परिग्गहो मज्झ ॥२०३॥
छेदाव, वा भेदाव, को लई जाव, नष्ट बनो भले,
वा अन्य को रीत जाव, पण परिग्रह नथी मारो खरे. २०३.
अर्थ :- छिद जावे अथवा भिद जावे अथवा कोई ले जाये, अथवा नष्ट हो जाये; अथवा चाहे जिस प्रकारसे चला जाये, फिर भी वास्तवमें परिग्रह मेरा नहीं है।

अपरिग्गहो अणिच्छो भणिओ णाणी य णेच्छदे धम्मं।
अपरिग्गहो दु धम्मस्स जाणगो तेण सो होदि ॥२९०॥
अणिच्छक कह्यो अपरिग्रही, ज्ञानी न इच्छे पुण्यने,
तेथी न परिग्रही पुण्यनो ते, पुण्यनो ज्ञायक रहे. २१०.

सर्वसामान्य

अर्थ :-अनिच्छकको अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी धर्मको (पुण्यको) नहीं चाहता, इसलिये वह धर्मका परिग्रही नहीं है, (किन्तु) धर्मका ज्ञायक ही है।

अपरिग्गहो अणिच्छो भणिओ णाणी य णेच्छदे धम्मं।
अपरिग्गहो दु धम्मस्स जाणगो तेण सो होदि ॥२११॥
अणिच्छक कह्यो अपरिग्रही, ज्ञानी न इच्छे पापने,
पापनो ज्ञायक रहे. २११.
अर्थ :-अनिच्छकको अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी अधर्मको (पापको) नहीं चाहता, इसलिये वह अधर्मका परिग्रही नहीं है, (किन्तु) (अधर्मका) ज्ञायक ही है।

सम्मट्ठिी जीवा णिसंका होति णिव्भया तेण।
सत्तभयविप्पमुक्का जम्हा तम्हा दु णिसंका ॥२१२॥
सम्यक्त्ववंत जीवो निःशंकित, तेथी छे निर्भय अने
छे सप्तभयप्रविमुक्त जेथी, तेथी ते निःशंक छे. २१२.
अर्थ :-सम्यग्दृष्टि जीव निःशंक होते हैं, इसलिये निर्भय होते हैं; और क्योंकि वे सात भयसे रहित हैं, इसलिये निःशंक होते हैं (-अडोल होते हैं)।

जो चत्तारि वि पाए छिंददि ते कम्मबंधमोहकरे।
सो णिसंको वेदा सम्मट्ठिी मुणेदव्वो ॥२१३॥
जे कर्मबंधनमोहकर्ता पाद चारे छेदतो,
चिन्मूर्ति ते शंकारहित सम्यग्दृष्टि जाणवो. २१६.
अर्थ :-जो 'चेतयिता, कर्मबंध सम्बन्धी मोह करनेवाले (अर्थात् जीव निष्प्रगतः कर्मके द्वारा बंधा हुआ है ऐसा भ्रम करनेवाले) मिथ्यात्वादि भावरूप चारों पादोंको छेदता है, उसको निःशंक सम्यग्दृष्टि जानना चाहिये।

१ चेतयिता = चेतनेवाला, जानने-देखनेवाला; आत्मा

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[प्रतिक्रमण-आवश्यक]

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


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स्रोत: Gyata संग्रह।

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