संन्यास भावना | Sanyas Bhavana

तर्ज – ज्ञान ही सुख है…

आधि व्याधि उपाधि रहित सहज जो।
ज्ञानमय भावना ही समाधि अहो ।। टेक ।।

आत्मा तो सहज ही समाधिस्वरुप ।
सहज स्वाश्रय से होवे समाधि अहो ।।
रे पराश्रय से तो मोह रागादि हों।
फिर पराश्रय से कैसे समाधि भी हो।। 1।।

छूटे पर दृष्टि जब आत्म-अनुभूति हो।
दृष्टि में आवे प्रत्यक्ष शाश्वत प्रभो।।
मैं अनादिनिधन हूँ अजर अरु अमर।
जीवन चैतन्य प्राणों से मेरा अहो।। 2।।

होवे संयोग-वियोग तो देह का।
देह कर्मादि तो हैं सदा भिन्न ही।।
फिर मुझे क्या चली जाय यदि देह तो।
मैं तो पूर्ण स्वयं में स्वयं ही अहो।। 3।।

ऐसी दृष्टि हो अनुभव हो, हो मग्नता।
झूठे संकल्प-विकल्प हों ही नहीं।।
छूट जावे अरे देह स्वकाल में।
शान्तमन हो निराकुल समाधि अहो।। 4।।

साधकों को जदपि दृष्टि सम्यक् हुई।
शेष है फिर भी रागांश चारित्र में।।
बाह्य निमित्तों का ज्ञान इससे दिया।
ज्ञानियों ने हमें अब उसे भी सुनो।। 5।।

मोही परिजन तो रागादि को पोषते।
उनसे न्यारे हो निर्ग्रन्थ उत्तम यही।।
शक्ति नहीं हो तो साधर्मी के संग में।
होवे निशल्य निर्मम सभी से अहो।। 6।।

होवें धनादि तो दानकर त्यागकर।
होके मध्यस्थ ध्याओ निजातम सहज।।
योग्य अवसर में आहार भी छोड़कर।
क्षीण होवें कषायें यों उद्यम करो।। ७।।

तत्त्वचिंतन करो आत्म अनुभव करो।
जग से निरपेक्ष हो, तृप्त निज में रहो।।
साधु पुरुषों के जीवन का आदर्श ले।
घोर प्रतिकूलताओं में भी नहीं डरो।। ८।।

वर्तो निर्भय निशंकित सहज ध्यान में।
आत्मा ज्ञान आनन्द का धाम है।।
व्यर्थ भटको नहीं क्लेश सब दूर हों।
सुख निज में ही शाश्वत मिलेगा अहो।। ९।।

सहित आराधना देह छूटे जभी।
देव हो ऋद्धिसम्पन्न क्षण मात्र में।।
वहाँ भी सम्यक्त्व का बल नहीं लिप्त हो।
तहँतें चयकर मनुज श्रेष्ठ होवे अहो।। 10।।

धार मुनिदीक्षा आराधन पूर्ण कर।
कर्म निर्मुक्त हो, पावे शिवधाम को।।
भव्य ! यों जानकर ज्ञान अभ्यास से।
धारो वैराग्य पाओ समाधि अहो।। 11।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह