असि-सम प्रहार में तीव्र धार की मनोवृत्ति ही संयम है,
जो चैतन्य दीप्ति से मुखरित हो, वह कठिन तपस्या संयम है,
जब राग-द्वेष, मद-मोह बढ़े, तब उन्हें छोड़ना संयम है,
विषय वासना तजकर जो हो, वह निजानुभूति ही संयम है,
इंद्रियवश भोग की वृद्धि हो, तब त्याग उसी का संयम है,
जो निज से निज का दर्श कराए, वह आत्म जागरण संयम है,
जो भक्त नहीं भगवान बनाए, वो पथ आकिंचन संयम है,
रचनाकार: संस्कार जैन (Sanskar Jain), जबलपुर
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