संस्कार : क्या, कब और कैसे ?
-डॉ. वीरसागर जैन
मिट्टी बन जाती कलश, शिला बने भगवान् |
संस्कार का महत्त्व है, बालक बने महान् ||
‘संस्कृति’ एवं ‘संस्कार’ शब्दों का प्रयोग हम बहुत करते हैं, परन्तु जबतक उनका सही-सही अर्थ नहीं जानेंगे, तब तक उनसे लाभान्वित होना संभव नहीं है।
‘संस्कृति’ का अर्थ समझने के लिए हमें उसके साथ ‘प्रकृति’ और ‘विकृति’ शब्दों का भी अर्थ समझना बहुत उपयोगी रहेगा।
स्वाभाविक स्थिति को ‘प्रकृति’ कहते हैं, उसका विकृत होना ‘विकृति’ है और उसका उन्नत होना ‘संस्कृति’ है। जैसे कि- भूख लगे तब भोजन करना ‘प्रकृति’ है, भूख के बिना ही लोभवश (लोलुपता आदि के कारण) भोजन करना ‘विकृति’ है और भूख लगे तब भी और भोजन मिले तब भी अपने धर्म का निर्वाह करके ही भोजन करना, धर्मच्युत होकर नहीं करना ‘संस्कृति’ है।
इसी प्रकार सर्वत्र घटित कर लेना चाहिए। जैसे कि एक और उदाहरण देते हैं | मरना प्रकृति है- ‘मरणं प्रकृतिः शरीरिणाम्’, आत्महत्या करके मरना विकृति है और धर्मध्यान करते हुए निर्भयतापूर्वक मरना संस्कृति है | ‘संस्कृति’ से मनुष्य महान् बनता है। जिस प्रकार खान में से निकला हुआ लोहा या सोना कुछ भी हो, ज्यों-ज्यों संस्कारित होता जाता है, त्यों-त्यों अधिक मूल्यवान होता जाता है, उसी प्रकार मनुष्य भी ज्यों-ज्यों ज्ञान-चरित्रादि के द्वारा संस्कारित होता जाता है, त्यों-त्यों अधिकाधिक मूल्यवान होता जाता है।
इस बात को और अधिक स्पष्टरूप से समझने के लिए यहाँ दो दृष्टान्त प्रस्तुत किये जाते हैं-
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एक उद्यान की पुष्पलताएं अपने सुवर्ण, सुगन्ध, सुरभित रूप में दशों दिशाओं को अपनी ओर आकर्षित करते हुए अपनी खिली हुई पंखुड़ियों से जन-जन को प्रभावित कर रही थीं। उसी उद्यान में एक विशालकाय पाषाण-शिला भी पड़ी हुई थी। उद्यान में खिली हुई पुष्पलतायें उस शिला को देखकर घृणाभरी, अट्टहास-मिश्रित व्यंग्य छोड़ती थी। उससे कहती थीं- देखो ! हमारे गुण, सुन्दरता, सुरभि के कारण हमको सब चाहते हैं, परन्तु तुम्हारी कुरूपता, जड़ता के कारण कोई तुम्हारी ओर देखता तक नहीं है, बल्कि सब तुम्हारे ऊपर पैर रखकर रौंदते हुए ठुकराते हुए चलते हैं। शिला उनकी गर्वपूर्ण बात सुनकर लज्जित होती थी एवं स्वयं को अभागा समझती थी। किन्तु एक दिन पुष्प ने स्वयं को एक मूर्ति के चरणों में समर्पित हुआ पाया। वह मूर्ति वास्तव में वही पाषाण-शिला थी, जो उद्यान में उपेक्षित पड़ी थी और पुष्प भी जिसे चिढ़ाता रहता था । अतः पुष्प ने आश्चर्यचकित होकर उस मूर्ति से पूछा कि तुम्हारी परिस्थिति पहले तो घृणित व निन्दनीय थी, आज पूज्य कैसे हो गई ? तब वह शिला (मूर्ति) उत्तर देती है कि एक दिन एक शिल्पी ने मुझे उद्यान में पड़ा देखकर विचार किया कि इस शिला में मूर्ति बनने की योग्यता है, और उसने मुझे वहाँ से ले जाकर छैनी एवं हथौड़ी की सहायता से काट-काटकर मेरे अनावश्यक अंश को अलग करके यह मूर्ति बनायी। उसके बाद अनेक भक्तों एवं प्रतिष्ठाचार्यों ने मंत्रों से संस्कारित करके मुझे भगवतरूप में प्रतिष्ठित किया, पूज्य बनाया।
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एक दिन एक सुन्दर नवयुवती मिट्टी के घड़े में पानी लेकर नदी से आ रही थी। उसी समय सुन्दरी के पैर के नीचे दबी पड़ी हुई मिट्टी अपमानित रून्द स्वर से सुन्दरी के सिर पर स्थित घड़े की मिट्टी से पूछने लगी कि हे बहिन ! मेरी और तेरी एक ही जाति है, फिर भी तेरा स्थान सुन्दरी के सिर पर है और मेरा स्थान सुन्दरी के पैरों के नीचे, ऐसा क्यों ? तब घड़े की मिट्टी बोली- बहिन ! मुझे सिर पर आने के लिये अनेक प्रकार के संस्काररूप कष्ट सहन करने पड़े हैं। मुझे पहले तो कुम्हार खोदकर लाया, फिर पैरों से खूब रौंदा, फिर चक्र में रखकर घुमाया, चीवर से काटा, लकड़ी के पलक से पीटा तथा आग की भट्टी में तपाया। इसप्रकार अनेक संस्कारों से सुसंस्कृत होने के कारण ही मैं सुन्दरी के सिर पर बैठ सकी हूँ।
अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि संस्कार कब और कैसे दिये जा सकते हैं?
उत्तर- संस्कार एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है और इसमें माता-पिता, गुरु, विद्यालय, शास्त्र आदि की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। मनुष्य में उत्तम संस्कारों का बीजारोपण वस्तुतः गर्भावस्था से ही हो जाता है। यहाँ तक कि उससे भी पूर्व ही प्रारंभ हो जाता है, क्योंकि जैसे भाव माता-पिता करते हैं, वैसे ही शिशु को सहज प्राप्त होते हैं।
एक दिन की बात, एक महिला गुरुजी के समीप जाकर पूछती है- “हे गुरुदेव! मेरे पुत्र की शिक्षा कब से किस मुहूर्त से प्रारंभ करनी चाहिए?”
गुरुजी ने पूछा- “पुत्र की आयु कितनी है?"
महिला बोली- “पुत्र की आयु पाँच वर्ष है।"
गुरुजी बोले- “शिक्षा देने के काल में प्रायः ६ वर्ष का विलम्ब हो गया है। बच्चे का संस्कार गर्भ से ही करना चाहिए।"
ठीक ही है, गर्भावस्था और उसके बाद बालावस्था संस्कारों के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समय होता है। इस समय का कोमल एवं एकाग्र मस्तिष्क इसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त होता है।
तथा जिस प्रकार बाल्यावस्था में अच्छे संस्कार शीघ्र एवं सहजता से डाले जा सकते हैं, उसी प्रकार कुसंस्कारों का भी इस अवस्था में शीघ्र जन्म होता है, अतः उनसे बचाना भी अत्यन्त आवश्यक है।
बाल्यावस्था में शीघ्र एवं सुदृढ़ संस्कार पड़ने का कारण यह है कि बालक के मन में कोई प्रकार का विशेष विकार भाव, छल, कपट, तनाव, कषाय, दुराग्रह, हठग्राहिता आदि नहीं होती।
किन्तु बच्चों में संस्कार डालना कोई बच्चों का खेल नहीं है, उसमें बड़ी कुशलता की आवश्यकता होती है। एक तो सबसे पहले स्वयं को ही अनेक बुरी आदतों से बचाना होता है, अन्यथा कोरे उपदेश का बच्चों पर कोई असर नहीं होता, वे तो स्वभाव से अनुकरणप्रिय होते हैं- ‘अनुकरणप्रियाः बालाः’। दूसरे, लालन (लाड़-प्यार) और ताड़न (डाँट-फटकार) में समुचित सन्तुलन भी बैठाना आवश्यक होता है। अधिक लालन और अधिक ताड़न दोनों से ही बच्चे बिगड़ जाया करते हैं। अतः बड़ी सावधानी से बच्चों में संस्कार डालना चाहिए। यह माता-पिता का विशेष आवश्यक कर्त्तव्य है।
केवल जन्म देने मात्र से कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती, जन्म तो कुत्ते-बिल्ली भी देते हैं, उसमें क्या? जो माता-पिता अपने बच्चों को उत्तम संस्कार देते हैं, उन्हीं का जीवन धन्य है।
लालनात् बहवः दोषा, ताडनात् बहवः गुणाः ।
तस्मात् पुत्रं च शिष्यञ्च, ताडयेत् न तु लालयेत् ॥
( अर्थ- पुत्र एवं शिष्य का लालन नहीं, ताड़न करना चाहिए, क्योंकि लालन से अनेक दोष उत्पन्न होते हैं और ताड़न से अनेक गुण उत्पन्न होते हैं। )
गुरु कुम्हार सिख कुम्भ है, घटि-घटि काढ़े खोट ।
अंदर हाथ पसारिके, बाहर मारे चोट ॥