सांसारिक कार्यों को करते हुए भी पुण्यार्जन ! | Sansarik Karyon Ko Karate Hue Bhi Punyarjan

सांसारिक कार्यों को करते हुए भी पुण्यार्जन !

-प्रो. वीरसागर जैन

प्रायः लोग मानते हैं कि धार्मिक क्रियाएँ करते समय पुण्यबन्ध होता है और सांसारिक क्रियाएँ करते समय पापबन्ध होता है और एक अपेक्षा से ऐसा ही है भी, किन्तु वास्तव में देखा जाए तो कर्मबन्ध का सही सम्बन्ध तो आत्मा के अन्तरंग भावों से है। यदि कोई जीव मन्दिर में पूजा-पाठ करते हुए भी विषय-कषायादि का चिन्तन कर रहा है तो उसे पुण्यबन्ध नहीं हो सकता, अपितु पापबन्ध ही होगा। तथा यदि कोई जीव घर-गृहस्थी के सांसारिक कार्यों को करते हुए भी अहिंसा-करुणा-सत्यादि के शुभ भाव कर रहा है तो उसे पुण्यबन्ध भी अवश्य होगा।

इससे हमें अपने दैनिक जीवन के लिए यह महत्त्वपूर्ण शिक्षा मिलती है कि हम अपने सांसारिक कार्यों को करते समय भी कुछ इस तरह के शुभभाव अपने अन्दर में रखें कि घोर पाप से बच सकें; न केवल घोर पाप से बच सकें, बल्कि कुछ पुण्योपार्जन भी कर सकें। यथा-

  1. भोजन बनाते समय हमारे ऐसे भाव हों कि लोग भूखे न रहें, स्वस्थ रहें, तृप्त होकर अपने विद्याध्ययनादि कार्यों में भली प्रकार प्रवृत्त हों तथा दूसरों के सेवाकार्य भी अच्छी तरह सम्पन्न करें।

  2. भोजन करते समय भी स्वाद-लोलुपता, शरीर-पोषण आदि की भावनाएँ गौण करके धर्मसाधन एवं परोपकार हेतु शरीर-रक्षा ही हमारा मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।

  3. दुकान आदि पर व्यापार करते समय भी केवल धनार्जन का भाव ही न रखें, अपितु जनसेवा का भाव भी अधिक से अधिक रखें। व्यापार व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र की बड़ी सेवा भी है ।

  4. चिकित्सालय में सेवा करते समय भी धनार्जन को गौण रखें और अत्यन्त करुणाबुद्धि से दीन-दुःखी रोगी जनों की सेवा का भाव ही अधिक रखें।

  5. विद्यालय में सेवा करते समय भी धनार्जन को अत्यन्त गौण करके (अपनी मजबूरी समझकर) बड़े ही पवित्र भाव से, विश्वकल्याण की भावना भाते हुए ज्ञानदान का उत्कृष्ट कार्य सम्पादन करना चाहिए।

  6. इसीप्रकार खेती करते समय या मकान बनाते समय भी हृदय में जीवदया और परोपकार की पवित्र भावना को मुख्य किया जा सकता है।

इसीप्रकार अन्य भी सभी कार्यों में घटित कर लेना चाहिए। वहाँ जितना हिंसा, आरम्भ-परिग्रह का भाव होगा उतना तो पापबन्ध होगा, पर जितनी जीवदया एवं परोपकार आदि की भावना होगी, उतना पुण्यबन्ध भी अवश्य होगा। सांसारिक कार्य करना हमारी मजबूरी है, किन्तु यदि हम अपने भावों को सँभालें, उन्हें धर्मयुक्त रखें, धर्मपूर्वक ही अर्थ एवं काम का सेवन करें तो अकेला पापबन्ध नहीं होगा, कुछ पुण्य-बन्ध भी अवश्य होगा, अतः अपने भावों को सँभालना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने इसी उद्देश्य को बताने के लिए धर्म-अर्थ-काम-मोक्षरूप चार पुरुषार्थों में सर्वप्रथम धर्म को गिनाया है कि सब कुछ धर्मपूर्वक ही करो, बिना धर्म के नहीं; धर्मपूर्वक करोगे तभी उसे ‘पुरुषार्थ’ संज्ञा से कहा जा सकता है, अन्यथा उसे ‘पुरुषार्थ’ ही नहीं कहा जा सकता।

दरअसल, हम क्या कर रहे हैं -यह अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, अपितु कैसे कर रहे हैं, किन भावों से कर रहे हैं -यह अधिक महत्त्वपूर्ण है ।

मैं प्रायः कहता रहता हूँ कि कहाँ रहना है -यह अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, अपितु कैसे रहना है -यह अधिक महत्त्वपूर्ण है। लोग इस विषय पर तो बहुत विचार करते हैं कि मुझे यहाँ नहीं रहना है, वहाँ रहना है, आदि आदि, परन्तु कैसे रहना है -इस पर ध्यान नहीं देते, जबकि यही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।
|
उसी प्रकार यहाँ मैं यह कह रहा हूँ कि हम-आप क्या कर रहे हैं -यह अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, अपितु कैसे कर रहे हैं, किन भावों से कर रहे हैं -यह अधिक महत्त्वपूर्ण है ।

प्रायः देखा जाता है कि लोग काम तो अच्छे-अच्छे करते हैं (दान, पूजा, स्वाध्याय आदि); पर खेद, ताप, क्षोभ, छल, आफत जैसे भाव मन में रखकर करते हैं, अतः उन्हें उनका उत्तम फल प्राप्त नहीं होता, अपितु अशुभ कर्म का ही बन्ध होता है ।

निष्कर्ष यह है कि हम अपने सांसारिक कार्यों को भी उत्तम भावों के साथ करें, कोई भी दुर्भाव अपने मन में न रखें | जय जिनेन्द्र |