जी भर विषयों को भोगा, इनमें नहीं सुःख लगारा।
ज्यों-ज्यों भोगे त्यों बढ़ती, तृष्णा अग्नि दुखकारा।। टेक।।
आशा का गड्ढा ऐसा, यह लोक अणूवत जिसमें।
ऐसे हैं जीव अनन्तों, कितना किसके हिस्से में।।
फिर कैसे भर सकता है, अब सोच तजो दुखकारा।। 1।।
हाथी के भय से राही, पहुँचा था गहन विपिन में।
कुएँ में वृक्ष को देखा, और लटक गया डाली में।।
चूहे काटें वह डाली, नीचे अजगर मुँह फारा।। 2।।
गुस्से में आकर गज ने, उस वृक्ष को था झकझोरा।
छत्ते से निकल पथिक पर, मधुमक्खी झुंड था दौड़ा।।
ऊपर से आई मुँह में, मधु बिन्दु इक तृष्णा कारा।। 3।।
पुण्योदय से विद्याधर, ऊपर से उसे पुकारे।
ओ पथिक व्यर्थ दुख भोगो, अब आओ साथ हमारे।।
पर शहद बिन्दु आशा में, मर गया पथिक बेचारा।। 4।।
त्यों विषयों के लालच में, यह तड़फ रहा है प्राणी।
सद्गुरु की सीख न मानें, शिवपुर की राह भुलानी।।
इन्द्रिय सुख की आशा में, नित बाँधे पाप अपारा।। 5।।
मृगतृष्णा सम ज्यों दौड़े, त्यों दूर-दूर सुख भागे।
बस तड़फ-तड़फ मर जाता, सुख लेश नहीं त्यों पावे।।
हैं धन्य-धन्य वे ज्ञानी, सुखमय निज रूप निहारा।। 6।।
‘आत्मन्’ अब भी चेतो तुम, झूठी पर आशा त्यागो।
अरु ज्ञान चेतना द्वारा, निज चिन्मय रूप संभारो।।
सच्चिदानंद में थिर हो, पाओ शिवपद अविकारा।। 7।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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