तर्ज : शांतचित्त हो निर्विकल्प हो…
नित्य निरंजन प्रभु परमेश्वर, अकृत्रिम शाश्वत भगवान।
रागादिक दोषों से न्यारा, ध्येय रूप आतम अम्लान।। 1।।
क्रोध नहीं है, काम नहीं है, नहीं लोभ, नहीं माया-मान।
सहज रूप निर्द्वन्द्व सदा ही, है निर्दण्ड-निर्ग्रन्थ महान।। 2।।
रोग न होवे, शोक न होवे, निर्विकल्प आनन्द स्वरूप।
क्षण-क्षण भाऊँ, अविरल ध्याऊँ, महिमामय चिद्रूप अनूप।। 3।।
हीन स्वयं को समझा भ्रम से, रहा ताकता पर की ओर।
हुआ आकुलित फिरा जगत में, किन्तु न देखा अपनी ओर।। 4।।
भव-भव में दुःख पाये स्वामिन्, रहा भटकता चहुँगति में।
दैव योग से आ पहुँचा हूँ, श्रावक कुल में, नरगति में।। 5।।
दिव्य देशना मिली भाग्य से, प्रगटा उर में तत्त्वज्ञान।
पर भावों से भिन्न ज्ञान में, भासा निज ज्ञायक भगवान।। 6।।
न्यारे भासें देहादिक पर, रागादि दुख रूप लगे।
वीतराग-विज्ञान भाव प्रभु, शिवकारण शिवरूप लगे।। 7।।
धन्य हुआ कृतकृत्य हुआ प्रभु, समता का संचार हुआ।
अपनी निधि अपने में प्रगटी, आनंद अपरम्पार हुआ।। 8।।
मोहमयी जग के सब रिश्ते, दीखें आज असार प्रभो।
सारभूत बस एकहि भासे, समयसार अविकार अहो।। 9।।
उदासीनता हुई सहज निज, शुद्धातम ही एक सुहाय।
होगी धन्य घड़ी हे जिनवर, जब निर्ग्रन्थ दशा विलसाय।। 10।।
यथाजात जिनमुद्रा होवे, अंतर-बाहर सहज पवित्र।
निरतिचार व्रत संयम होवे, हो सुमेरु सम अचलित चित्त।। 11।।
मैत्री भाव सर्व जीवों प्रति, गुणीजनों प्रति परम प्रमोद।
दुखियों के प्रति होवे करुणा, नहीं दुर्जनों पर भी क्षोभ।। 12।।
रहे सहज माध्यस्थ भाव प्रभु, निर्विकल्प कल्याणमयी।
सहज निराकुल निस्पृह होवे, परिणति ज्ञानानन्दमयी।। 13।।
अप्रमत्त आदर्श रूप हो, चर्या आगम के अनुसार।
नहीं अपेक्षा कभी किसी की, जीवन हो अपने आधार।। 14।।
पापोदय या पुण्योदय हो, ज्ञेयमात्र ही रहे सदा।
निजानंद में तृप्त रहूँ प्रभु, राग-द्वेष जागें न कदा।। 15।।
लेशमात्र भी नहीं आडम्बर, सावधान निज माँहि रहूँ।
हो प्रमुदित एकाकी स्वामिन्, सब परीषह-उपसर्ग सहूँ।। 16।।
अद्भुत चेतन चमत्कार प्रभु, दीख रहा अपने में ही।
जग के झूठे चमत्कार अब, भावें नहीं सपने में भी।। 17।।
अहो! अतीन्द्रिय ज्ञान-ज्ञान है, और अतीन्द्रिय सुख ही सुख।
इन्द्रिय ज्ञान अज्ञान रूप है, इन्द्रिय सुख भी प्रत्यक्ष दुःख।। 18।।
चाह नहीं कुछ शेष नाथ, बस पाऊँ निज में ही विश्राम।
रहूँ निशल्य ध्यान में वर्ते, सहजपने इक आतम राम।। 19।।
ध्यान अग्नि में जलें सर्व ही, दुखमय वैभाविक परिणाम।
होवे प्रगट अनंत चतुष्टय, श्री अरहंत दशा अभिराम।। 20।।
योग विनष्टे कर्म रहित हो, पाऊँ अविनाशी शिवधाम।
नित्य निरंजन रहे परिणति, आवागमन विमुक्त ललाम।। 21।।
रहें नाथ! आदर्श आप, सम्यक् पुरुषार्थ स्वयं में हो।
द्रव्य नमन हो, भाव नमन हो, सहज नमन अंतर में हो।। 22।।
सहज प्राप्य है, सदा प्राप्य है, अपना पद अपने में ही।
तृप्त रहूँ संतुष्ट रहूँ प्रभु, मग्न रहूँ अपने में ही।। 23।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह